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सुख-दुख

माइक्रोसॉफ्ट की तर्ज पर राष्ट्रपति और राज्यपालों को कॉलेजों में घुसे संघी वाइस चांसलरों को SACK कर देना चाहिए!

Hindi newspaper article announcing Microsoft offering 60,000 employees the option to leave their jobs, impact across four countries; small photo of a presenter at a Microsoft booth.

रवीश कुमार-

माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनी 60,000 कर्मचारियों को निकाल रही है। जो निकाले जा रहे हैं, वो कहाँ जा रहे हैं, पता नहीं। स्टार्ट अप के नाम पर गाड़ी स्टार्ट हो रही है या यह भी एक बहाना जैसा बनता जा रहा है। स्टार्ट अप के लिए इतने अवसर हैं तो बड़ी कंपनियाँ 60,000 को निकालती क्यों? वो भी अपने भीतर स्टार्ट अप क्रिएट कर सकती हैं। उन्हें नए और छोटे अवसरों से बैर तो है नहीं। आई टी मंत्री को बताना चाहिए कि सरकार ने ऐसा कुछ अध्ययन किया है? नए अवसर कहाँ बन रहे हैं? किस स्तर के बन रहे हैं?

भारत भर में फैले बी और सी ग्रेड के इंजीनियरिंग कॉलेजों में लाखों की फीस देकर पढ़ने वाले छात्रों को क्या करना चाहिए?

Hindi newspaper clipping reporting Microsoft's plan affecting Indian employees, featuring a bold headline and two columns of text detailing the policy and related notes.

आई टी मंत्रालय को सोशल मीडिया के पोस्ट हटवाना छोड़ ये सब ज़रूरी काम करने चाहिए। सरकार को इंजीनियरिंग कॉलेजों के ऐसे कोर्स तुरंत बंद कर देने चाहिए जिनका कोई भविष्य नहीं है। वरना नोएडा से लेकर मेरठ तक में फैले औसत और बेहद ख़राब इंजीनियरिंग कॉलेज सपना बेच कर लाखों रुपये ठगते रहेंगे। माँ-बाप भी इस उम्मीद में बच्चों को भेजते रहेंगे कि कुछ न कुछ हो जाएगा। उन्हें सच्चाई बताई जाए नहीं तो ज़मीन बेच कर, लोन लेकर इंजीनियरिंग पढ़ाने की ज़िद उनके परिवार को और ग़रीब कर देगी। इन कॉलेजों का कुछ नहीं बिगड़ रहा है। इस लूट पर तुरंत रोक लगनी चाहिए।

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े के बाद अख़बार में ख़बर छपी थी कि बीजेपी जेन ज़ी से संवाद बढ़ाएगी। अपने मंत्रियों को कॉलेजों में भेजेगी। कितने मंत्री गए हैं? इस देश में जितने कबाड़ कॉलेज ज़िले ज़िले में फैले हैं, दुनिया के किसी भी देश में रद्दी कॉलेजों की इतनी भरमार नहीं होगी। जानबूझ कर कबाड़ किया गया है, औसत मास्टर भरे गए हैं ताकि भारत की जवानी अपनी कहानी लिखने लायक भी न रहे। दो चार की सफल कहानियाँ सुना-सुना कर सबको सुलाते रहो। भारत के युवाओं को बर्बाद किया है शिक्षा मंत्रियों ने। शिक्षा सचिवों ने। वाइस चांसलरों ने। पर्ची से भरे गए अयोग्य शिक्षकों ने। इस कड़वी सच्चाई से इंकार कर कोई फायदा नहीं है। हम सब देख रहे हैं कि खराब शिक्षा ने भारत की क्षमता को औसत कर दिया है। हर आदमी अपनी क्षमता से 70 प्रतिशत कम पर प्रदर्शन कर रहा है। केवल शिक्षा नहीं है, घूस से लेकर टैक्स का सिस्टम, फर्ज़ी केस में फंसाने का विधिवत सिस्टम भी भारत की क्षमता को नीचे कर रहा है।

हम इन सभी का ईमानदारी से मूल्यांकन नहीं कर पाएंगे। इसकी क्षमता भी समाप्त हो चुकी है। आप इतने सारे वाइस चांसलर को रातों रात बर्ख़ास्त नहीं कर सकते। मंत्रिमंडल में बदलाव की ख़बर मई के महीने से ही चल रही है, उसी में इतना चैलेंज है। अगर राष्ट्रपति और राज्यपाल एक साथ सभी वाइस चांसलरों को SACK कर दें, माइक्रो सॉफ्ट की तरह तो कितना बड़ा संदेश जाएगा। इतने सारे वाइस चांसलर को बर्ख़ास्त करने का मतलब होगा कि आर एस एस को बर्ख़ास्त कर देना। RSS को ही यह काम करना चाहिए। देखना चाहिए उससे निकटता के नाम पर कितने अयोग्य लोग चांसलरी का सुख प्राप्त कर रहे हैं। संघ यह काम कर देगा तो उसकी शाखा में जाने के लिए कोई बचेगा नहीं।

संघ में साहस नहीं कि जिसे अपनी निष्ठा के नाम पर वाइस चांसलर बनाया है, उससे पूछे कि पाँच साल में आपके कॉलेज ने क्या किया क्योंकि पूछेगा तो क्या पूछेगा, और चांसलर क्या बताएगा? यही कि संस्कृति पर इतने कार्यक्रम किए, इतने प्रचारकों को बुलाया। बात इसकी नहीं है, सेमिनार की लिस्ट मत दीजिए, बताइये कि पढ़ाई का स्केल कितना सुधरा है। भारतीयकरण के नाम पर शिक्षा की गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं आया है। विचारों पर अंकुश लगाने के तरीके अपनाकर यूनिवर्सिटी सिस्टम को बर्बाद कर दिया गया। इस सच्चाई का सामना कीजिए कि भारत रद्दी कॉलेजों का महादेश बन कर रह गया है। पहले भी नहीं किया, आज भी नहीं कर रहा है और कल भी अपनी क्षमता के उच्चतम स्तर पर प्रदर्शन नहीं करेगा।

एक आसान रास्ता भी है। हर कॉलेज में भजन क्लबिंग शुरू कर देनी चाहिए। हर दिन पहली कक्षा भजन क्लबिंग की हो, हर महीने भजन क्लबिंग का बड़ा कार्यक्रम हो। जिसमें ख़राब गाने वाले गायकों और तुकबंदी करने वाले कवियों को खूब पैसा देकर बुलाया जाए जो भजन के माधुर्य को ख़त्म कर क्लब का यौवन दे सकें। भाई लोग उपनिवेशवाद से लड़ रहे थे, कोलोनियल माइंडसेट से लड़ रहे थे, शिक्षा का भारतीयकरण कर रहे थे और भजन का क्लबीकरण करने लग गए। एक हिन्दी नाम तक नहीं मिला, संस्कृत तो छोड़िए। जेन ज़ी जवानियों को लुभाने के लिए पूरब के गिलास में पश्चिम नहीं,पश्चिम के गिलास में पूरब को मिला दिया। सुधा शरबत की जगह जिंजर मिक्स मोइतो बना रहे हो तुम लोग। ख़ूब समझते हैं। भजन की आत्मा क्लब में मुक्ति पा रही है और भारत का युवा थर्ड क्लास कॉलेज में एडमिशन लेकर थर्ड क्लास पढ़ाई करते हुए राष्ट्रवाद का परचम लहरा रहा है। जो मन में आए, करो, लेकिन बात यही है।

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