-नवीन कुमार-
हंस का नवंबर अंक कल ही मेरे पास पहुंचा। इसे अपने संपादकीय के लिए पढ़ा और सहेजा जाना चाहिए। एक निरंकुश सत्ता, उसके नफरती कार्यकर्ताओं और लोकतांत्रिकता के बूचड़खाने में तब्दील मीडिया के ख़िलाफ़ प्रतिरोध के जो स्वर पिछले दिनों उठे हैं, उस पर हिंदी का स्वनामधन्य लेखक समाज बेहद शातिर तरीके से एक अश्लील चुप्पी ओढ़े हुए है। संजय सहाय ने इस प्रतिरोध की पूरी प्रक्रिया की अकादमिक, साहित्यिक, सामाजिक और राजनीतिक पड़ताल की है।
इस मुद्दे पर अकादमिक और साहित्यिक मोहल्लों में जिस तरह का सन्नाटा है, उस पर बोलना और लिखना तो छोड़िए, संपादकों ने सोचना तक छोड़ दिया है। मैंने पिछले कुछ महीनों में आई महत्त्वपूर्ण मानी जाने वाली लगभग सभी साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकीय पढ़े हैं। उन सभी में सत्ता के ख़ौफ़ से पैदा हुई बेचारगी से ज़्यादा वैचारिक बौनापन नज़र आता है। वैचारिक लोगों को बहुत दिनों तक डराकर नहीं रखा जा सकता। अगर आप डरे हुए हैं तो वैचारिक नहीं हो सकते। दोनों सत्ताएं समानांतर नहीं चल सकतीं। लेखक, संपादक, कवि, आलोचक, अध्यापक अगर डरा हुआ है तो उसका दूरदर्शी होना एक ढोंग है।
संजय सहाय ने ऐसे नाज़ुक और दहशतगर्दी भरे वक्त में इतिहास के आंदोलनों को रेखांकित करते हुए कॉक्रोच जनता पार्टी के इर्द-गिर्द बने माहौल की जैसी विशद विवेचना की है, वैसी महीन वैचारिक दृष्टि आज हिंदी की किसी पत्रिका के किसी संपादक के पास नहीं है। बिल्कुल ठीक पढ़ा आपने। किसी पत्रिका के किसी संपादक के पास नहीं।
संजय सहाय लकीरों को देखते हैं, उन्हें हिलाते हैं और फिर उन्हें पलटकर नीचे बनी रेखाओं और पीछे छूटे निशानों के पास जाकर परखते हैं। यह भाषा की बाजीगरी से नहीं आता। केवल हिम्मत से भी नहीं आता। ना ही सिर्फ़ ज़िद या जुनून से। यह वही कर सकता है जो फैली हुई विचारदृष्टि में लहरों के ख़िलाफ़ खड़े होकर गहराई की थाह लेने का हुनर साधना जानता हो।
साहित्य की पत्रिकाएं कथा-कहानियों से आगे कम ही बढ़ पाती हैं। हंस इकलौती पत्रिका है जिसके ज़रिए राजेंद्र यादव ने अपने संपादकीय से हिंदी साहित्य को एक व्यापकता में चेतनशील, मानुषिक और समतामूलक बनाने का रास्ता तैयार किया। व्यक्तिगत संबंधों और संपादकीय विचारशीलता में उन्होंने कभी कोई घालमेल नहीं किया। हर दूसरे दिन राजेंद्र जी के साथ गप करने वाले भी हंस में छपने के लिए तरसते रहे। इसके लिए छुटभैयेपन से ख़ुद को जिस तरीके से उठाने की ज़रूरत होती है, उसी ने हंस को हंस बनाया है।
संजय सहाय ने इस परंपरा को बिना किसी शोर के आगे बढ़ाया है। वह खांटी संपादक हैं। बिना किसी मिलावट के। लेखन को वह केवल लेखन से जानते हैं, व्यक्ति से नहीं। संपादकीय कसौटी को लेकर वह निर्मम और खड़ूस हैं, लेकिन इस दायरे से बाहर निकलते ही संबंधों को निभाने वाले एक उस्ताद। हिंदी ही नहीं, हर संपादक को संजय सहाय की तरह होना चाहिए।
मैं तो कहूंगा कि अच्छा होगा, हंस को ख़रीदकर पढ़िए। इसी महीने नहीं, हर महीने। आज के ज़माने में आप में से ज़्यादातर लोगों के लिए 75 रुपये कोई बड़ी रकम नहीं होगी। हालांकि बड़ी रकम होगी, तभी तो बड़े-बड़े लेखक, अध्यापक, आलोचक, कवि, हिंदी सेवी, संपादक भी ख़रीदकर नहीं पढ़ते। अगर अकेले हिंदी के परमानेंट प्रोफेसरों की 5 प्रतिशत जमात भी ख़रीदकर पढ़ने लगे तो कोई भी पत्रिका संसार की सबसे बड़ी साहित्यिक पत्रिका बन सकती है।
इस पर फिर कभी, लेकिन अभी तो हंस में संजय सहाय का संपादकीय तसल्ली से पढ़िए। उनकी बलाएं लीजिए या लानतें भेजिए। आपके लिए दोनों के भरपूर सूत्र हैं। फ़िलहाल संजय जी को इस चैतन्य वैचारिकी के लिए बधाई और हंस परिवार को शुभकामनाएं। आपके लिए संजय सहाय के विकल्प की खोज मुश्किल होने वाली है। बहुत मुश्किल।
दीपावली की शुभकामनाएं।

