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सियासत

IDBI बैंक अपने ही पैसे से खुद को बेचेगा, इधर देश वोट चोरी में उलझा है, उधर एक और बैंक लुट गया!

Front view of a storefront with orange and teal IDBI Bank signs in English and Hindi signage.

कृष्ण कांत-

लगातार फायदे में चलने वाला IDBI बैंक एक विदेशी कंपनी Fairfax को 52,878 करोड़ रुपये में बेच दिया गया। मजे की बात तो यह है कि Fairfax कंपनी IDBI बैंक के पैसे ही IDBI को खरीदेगी।

ऐसा कहां होता है कि आप कुछ खरीदने गए तो दुकान वाला पहले आपसे कुछ खरीदे, फिर उसी पैसे से आप वह खरीदें जो लेने गए हैं?

अपने बिकने का आधे से ज़्यादा पैसा खुद IDBI बैंक देगा। सौदा ये हुआ है कि IDBI बैंक Fairfax ग्रुप की कंपनियों में उसकी हिस्सेदारियाँ खरीद लेगा। जो कंपनी बैंक को खरीद रही है, वह बैंक को अपनी हिस्सेदारी बेच रही है।

दूसरा घोटाला ये है कि इस विदेशी कंपनी में कई ऐसे लोग ऊंचे पदों पर हैं जो यहां सरकार में भी ऊंचे पदों पर रहे हैं। इससे शक होता है कि यह कोई विनिवेश नहीं, बल्कि संगठित लूट है।


शीतल पी सिंह-

अपने बिकने का आधे से ज़्यादा पैसा खुद IDBI बैंक मोदीजी के दोस्त को देगा ! कमाल का सौदा हुआ है! जिस बैंक को खरीदना है, उसी बैंक से खरीद की आधी से ज्यादा रकम वापस मिल जाए—IDBI बैंक के प्रस्तावित सौदे में ऐसी ही योजना सामने आई है।

कनाडा के Fairfax समूह को सरकार और LIC की IDBI बैंक में 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदने के लिए चुना गया है। कीमत लगभग 52,878 करोड़ रुपये यानी 5.6 अरब डॉलर है।

Hindi infographic listing former and current public-sector officials connected to the matter, showing their roles (CEO, director, chairman) and organizations.

इसके साथ IDBI को ख़रीद रहे Fairfax की योजना है कि उसके ग्रुप की Go Digit की दो बीमा कंपनियों और IIFL Capital में उसकी हिस्सेदारियाँ IDBI बैंक खरीद ले।

निवेशकों के साथ बातचीत में Fairfax के अधिकारियों ने इन हिस्सेदारियों की अनुमानित कीमत करीब तीन अरब डॉलर बताई। यह बैंक खरीदने की कुल रकम का लगभग 54 प्रतिशत है।

IDBI इसके लिए पैसा कहाँ से लाएगा? इसी सवाल पर Fairfax के प्रमुख प्रेम वत्स ने कहा कि IDBI बैंक के पास अतिरिक्त पूँजी है और बैंक नकद भुगतान करेगा।

यानी प्रस्ताव यह है कि Fairfax बैंक का नियंत्रण खरीदे और बैंक Fairfax की दूसरी कंपनियों में उसकी हिस्सेदारियाँ खरीदकर उसे रकम दे। Fairfax समूह हिस्सेदारियाँ बेचने वाला भी होगा और खरीदने वाले बैंक का नियंत्रक मालिक भी।

क्या कमाल का सौदा है न !

यहीं निष्पक्ष कीमत और हितों के टकराव का सवाल खड़ा होता है। कौन तय करेगा कि बैंक इन हिस्सेदारियों के लिए कितना भुगतान करे? क्या कीमत का स्वतंत्र मूल्यांकन होगा? क्या खरीद बैंक और उसके सभी शेयरधारकों के हित में होगी?

अभी यह योजना अंतिम नहीं है। Fairfax की 14 अक्टूबर की घोषणा के अनुसार बाध्यकारी समझौतों पर हस्ताक्षर नहीं हुए थे। RBI, SEBI और बीमा नियामक IRDAI की जरूरी मंजूरियाँ भी मिलनी हैं।

फिलहाल इतना स्पष्ट है: बैंक खरीदने की बोली की कीमत घोषित है। बैंक से अपनी हिस्सेदारियाँ खरिदवाकर Fairfax कितनी रकम लेगा, वह अभी तय नहीं है। इस प्रस्ताव की शर्तें और मूल्यांकन सार्वजनिक होने चाहिए।

फ़ेयरफैक्स के मालिक प्रेम वत्स का मोदी प्रेम विश्वविख्यात है और उन्हें 2020 में मोदीजी की सरकार की तरफ से पद्मश्री पुरस्कार मिल चुका है!

“मैं देश नहीं बिकने दूँगा “


दिलीप ख़ान-

मोदी की OLX सरकार। पढ़िए IDBI की लूट की कहानी।

NDA-1 के दौर में वाजपेयी सरकार ने दिसंबर 2003 में संसद में एक वादा किया था। तब देश के उद्योगों को क़र्ज़ देने वाली सरकारी विकास संस्था के तौर पर काम करने वाले IDBI को कंपनी में बदला जा रहा था। तत्कालीन वित्त मंत्री जसवंत सिंह ने भरोसा दिलाया था कि सरकार इसमें कम से कम 51 फ़ीसदी हिस्सा अपने पास रखेगी। यानी बैंक की कमान हमेशा देश के हाथ में रहेगी।

2019 में NDA-3 के दौर में मोदी सरकार ने यह वादा पहली बार तोड़ा। तब सरकार की सीधी हिस्सेदारी पहली बार 51 फ़ीसदी से नीचे गई और LIC इसमें घुसी। फिर भी, आप कह सकते हैं कि LIC भी सरकारी है, इसलिए बैंक तब भी जनता का ही रहा। अब 14 अक्टूबर 2026 को उस वादे को नरेन्द्र मोदी की तीसरी सरकार ने तश्तरी में रखकर एक निजी कंपनी को बेच दिया।

उस दिन आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति ने IDBI की 60.72 फ़ीसदी हिस्सेदारी कनाडा की कंपनी फ़ेयरफ़ैक्स फ़ाइनेंशियल होल्डिंग्स को बेचने पर मुहर लगाई।

सरकार ने अपनी 30.48 फ़ीसदी और LIC ने 30.24 फ़ीसदी हिस्सेदारी बेची। क़ीमत ₹81 प्रति शेयर तय हुई, यानी कुल ₹52,878 करोड़ की डील हुई। सरकार और LIC के पास अब सिर्फ़ 34 फ़ीसदी हिस्सा बचेगा, लेकिन चूंकि बड़ा शेयरधारक अब फ़ेयरफ़ैक्स है, इसलिए बैंक चलाने का अधिकार उसके पास होगा। बेशर्मी यह है कि सरकार ने इसे उपलब्धि की तरह पेश किया है।

पहला सवाल यह कि क़ीमत तय कैसे हुई। सरकार कहती है कि पूरी प्रक्रिया ‘डबल ब्लाइंड’ थी। इसका मतलब समझने के लिए एक सीधी मिसाल लीजिए। आप अपना घर बेच रहे हैं। उससे पहले आप एक मूल्यांकन करने वाले से घर की क़ीमत आंकने को कहते हैं। मान लेते हैं कि उसने यह क़ीमत ₹1 करोड़ तय की और उस आंकड़े को एक बंद लिफ़ाफ़े में उसने रख दिया। ख़रीदार अपनी बोलियां अलग बंद लिफ़ाफ़ों में देते हैं। दोनों लिफ़ाफ़े एक साथ खुलते हैं। अगर बोली आपकी न्यूनतम क़ीमत से ऊपर है, तो सौदा होता है, वरना नहीं। ‘डबल ब्लाइंड’ का अर्थ यही है कि न ख़रीदार को आपकी न्यूनतम क़ीमत पता हो, न आपको ख़रीदार की बोली देखकर अपनी क़ीमत बदलने का मौक़ा मिले। इसी से सौदा ईमानदार रहता है।

IDBI में क्या हुआ? 2025-26 में पहली बार बोलियां मंगाई गईं, तो सरकार ने न्यूनतम क़ीमत ₹94.42 प्रति शेयर रखी थी। कोई बोली उस तक नहीं पहुंची और सब ख़ारिज कर दी गईं। फिर बिज़नेसवर्ल्ड ने विनिवेश विभाग (दीपम) के 13 अगस्त के एक अंदरूनी नोट के हवाले से बताया कि दूसरी बार अफ़सरों ने पहले फ़ेयरफ़ैक्स का लिफ़ाफ़ा खोला, पुरानी न्यूनतम क़ीमत को किनारे रखा और उसके बाद नए मूल्यांकन का आदेश दिया। नया मूल्यांकन ₹75.99 पर आया, जो फ़ेयरफ़ैक्स की ₹81 की बोली से ठीक नीचे था। अगर यह क्रम सही है, तो पहले ख़रीदार की बोली देखी गई और फिर घर की क़ीमत आंकी गई। ‘डबल ब्लाइंड’ का पूरा मक़सद इसी को रोकना होता है। जिन दो रिपोर्टों के आधार पर नई क़ीमत तय हुई, वे आज तक सार्वजनिक नहीं हुई हैं।

अब बाज़ार भाव देखिए। जिस दिन कैबिनेट ने मंज़ूरी दी, उस दिन IBDI का शेयर बाज़ार में ₹90.39 पर बिका, जबकि फ़ेयरफ़ैक्स को वह ₹81 में मिला। ऐसा तब है, जब बीते कई महीनों से IDBI समेत तमाम कंपनियों के शेयर गिरे हुए हैं। आम तौर पर होता उल्टा है। जब कोई किसी कंपनी पर पूरा नियंत्रण ख़रीदता है, तो वह बाज़ार भाव से ज़्यादा क़ीमत चुकाता है, क्योंकि उसे सिर्फ़ शेयर नहीं, फ़ैसले लेने की ताक़त भी मिल रही होती है। इसे ‘कंट्रोल प्रीमियम’ कहते हैं। यहां ख़रीदार को नियंत्रण भी मिला और छूट भी। बेचे गए 652.8 करोड़ शेयरों पर यह छूट क़रीब ₹6,100 करोड़ बैठती है।

अब दो और किरदारों पर आते हैं। ये किरदार हैं कोटक महिंद्रा बैंक और एमिरेट्स NBD. किसी भी नीलामी में बेचने वाले की असली ताक़त प्रतिस्पर्धा होती है। जब दो-तीन ख़रीदार होड़ में होते हैं, तो एक-दूसरे को पछाड़ने के चक्कर में क़ीमत ऊपर जाती है। यह सौदा शुरू हुआ था तो कई नाम चर्चा में थे। लेकिन कोटक ने कहा कि उसने कभी कोई वित्तीय बोली लगाई ही नहीं, और रॉयटर्स ने जुलाई में बताया कि एमिरेट्स NBD इसमें कोई दिलचस्पी नहीं ले रहा। जब मैदान में अकेला ख़रीदार बचे, तो बेचने वाले के पास सिर्फ़ एक हथियार रह जाता है और वह है अपनी न्यूनतम क़ीमत पर अड़े रहना। IDBI में ठीक उसी हथियार का इस्तेमाल किया और ₹94.42 की न्यूनतम क़ीमत को सरकार को और नीचे करने पर मजबूर कर दिया।

बेचने के लिए किस बात की हड़बड़ी थी सरकार को?

मामला और दिलचस्प है। 15 अक्टूबर को निवेशकों के साथ बातचीत में फ़ेयरफ़ैक्स के चेयरमैन प्रेम वत्स ने बताया कि वे अपनी तीन कंपनियों की हिस्सेदारी IDBI में डालेंगे। ये तीनों कंपनिया हैं बीमा सेक्टर की गो डिजिट जनरल और गो डिजिट लाइफ़ और वित्तीय सेवा कंपनी IIFL कैपिटल। उन्होंने यह भी कहा कि यह सब ‘बाज़ार भाव पर’ होगा और IDBI इसका भुगतान नक़द में करेगा। फ़ेयरफ़ैक्स के प्रेसिडेंट पीटर क्लार्क के मुताबिक़ पूरी ख़रीद के लिए 5.6 अरब डॉलर चाहिए थे और इन तीन कंपनियों की क़ीमत क़रीब 3 अरब डॉलर है। यानी आधे से ज़्यादा।

‘बाज़ार भाव’ सुनने में ईमानदार लगता है, लेकिन यहां तीन दिक़्क़तें हैं। पहली दिक़्क़त यह कि गो डिजिट लाइफ़ शेयर बाज़ार में लिस्टेड ही नहीं है। इसलिए उसका कोई पारदर्शी बाज़ार भाव नहीं है। यानी, उसकी क़ीमत कोई न कोई अपने हिसाब से आंकेगा। दूसरी दिक़्क़त यह कि शेयर बाज़ार का भाव रोज़ ऊपर-नीचे होता है और जो पक्ष तारीख़ चुनता है, वह क़ीमत भी चुन लेता है।

तीसरी और सबसे बड़ी दिक़्क़त यह कि इस सौदे में बेचने वाला भी फ़ेयरफ़ैक्स है और ख़रीदने वाले बैंक का मालिक भी फ़ेयरफ़ैक्स।

यह ऐसा है जैसे कोई दुकानदार अपनी ही दुकान के गल्ले से अपने ही गोदाम का माल ख़रीदे और भाव भी ख़ुद तय करे। ग़ौर करने की बात यह भी है कि दीपम ने जिस नोट में फ़ेयरफ़ैक्स को चुनने की सिफ़ारिश की, उसमें इस योजना का कोई ज़िक्र नहीं है।

अब सवाल उठता है कि IDBI के पास इतना नक़द आया कहां से। इसे समझने के लिए बैंक की ‘पूंजी’ को कुशन के उदाहरण से समझिए। बैंक लोगों को क़र्ज़ देता है और कुछ क़र्ज़ डूब भी जाते हैं। उस नुक़सान को झेलने के लिए बैंक को अपने पास एक कुशन रखना पड़ता है। रिज़र्व बैंक कहता है कि यह कुशन कम से कम 11.5 फ़ीसदी होना चाहिए। IDBI का कुशन आज 27.10 फ़ीसदी है, यानी ज़रूरत से दोगुने से भी ज़्यादा।

यह कुशन बना कैसे? मोदी की पहली सरकार के दौरान 2016 से 2020 के बीच IDBI क़रीब 6.4 अरब डॉलर के घाटे में डूबा रहा। उस वक़्त सरकार और LIC ने बार-बार पैसा डालकर उसे बचाया।

अकेले 2019 में ₹9,300 करोड़ डालने की मंज़ूरी दी गई।

यह बात वत्स ने ख़ुद मानी है। यानी यह कुशन करदाताओं और LIC के करोड़ों पॉलिसीधारकों के पैसे से बना। आम तौर पर बैंक की अतिरिक्त पूंजी या तो नए क़र्ज़ देने में लगती है या डिविडेंड के रूप में सभी शेयरधारकों में बराबर बंटती है।
यहां स्कीम यह निकाली कि उसी पूंजी से एक शेयरधारक यानी फ़ेयरफ़ैक्स अपनी कंपनियों की क़ीमत वसूल ले।

रिज़र्व बैंक का नियम है कि कोई बैंक किसी एक वित्तीय कंपनी में अपनी पूंजी के 10 फ़ीसदी से ज़्यादा निवेश नहीं कर सकता। यह योजना उस नियम में कैसे फ़िट होगी, इसका जवाब कोई आर्थिक मामलों का जानकार दे सकता है। मुझे नहीं पता।

जिन महीनों में यह सौदा तय हो रहा था, उनमें से सात महीने LIC की निवेश समिति का एक निदेशक थॉमस कुक इंडिया के बोर्ड में भी बैठा था। LIC इस सौदे में बेचने वाला पक्ष था और थॉमस कुक इंडिया को फ़ेयरफ़ैक्स चलाता है। LIC ने अब तक नहीं बताया कि उस निदेशक ने यह रिश्ता ज़ाहिर किया था या फ़ैसले से ख़ुद को अलग रखा था।

फ़ेयरफ़ैक्स भारत में नया भी नहीं है। बेंगलुरु एयरपोर्ट, CSB बैंक, और थॉमस कुक कई जगह उसकी गहरी पैठ है। नवंबर 2014 में प्रेम वत्स प्रधानमंत्री मोदी से मिले थे और कुछ ही समय बाद फ़ेयरफ़ैक्स इंडिया की शुरुआत हुई।

अब पूरी तस्वीर साथ रखिए। ख़रीदार की बोली देखकर क़ीमत घटाई गई। सौदा बाज़ार भाव से सस्ता हुआ। मैदान में कोई और ख़रीदार नहीं था। जनता के पैसे से बना कुशन नए मालिक की कंपनियों का भुगतान करने के काम आया। और बेचने वाले के बोर्ड में ख़रीदार से जुड़ा एक व्यक्ति बैठा था।

अभी हाल ही में मोदी-अदाणी पर बनी जिस डॉक्यूमेंट्री को बिजली के रफ़्तार से सरकार बैन करवा रही है, उसके लहज़े में कहूं तो इन सबको महज़ इत्तेफ़ाक़ ही मान लेना बेहतर होगा।

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