जब विदेशी शक्तियों के प्रधानमंत्री होने का आरोप है, सीधी चुनौती से घिरे हुए हैं तो आरएसएस और दैनिक भास्कर देश को ‘अराजक शक्तियों’ का भूत दिखा रहे हैं।
संजय कुमार सिंह
अंग्रेजी के मेरे छह में से पांच अखबारों में ट्रम्प की हार की खबर लीड है।यह खबर अलग-अलग शीर्षक से लीड है। इससे भारत के लिए ट्रम्प की हार का महत्व समझा जा सकता है। यह ऐसे समय में हुआ है जब प्रधानमंत्री राहुल गांधी के कथित विदेशी संबंधों को प्रचारित कर रहे थे और किसी भी विरोधी को देश विरोधी कहते रहे हैं। राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर नरेन्द्र मोदी को अच्छे से घेर लिया है पर अभी वह मुद्दा नहीं है।
आज देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, चुनाव आयुक्तों को आजीवन कानूनी छूट क्यों? मुझे याद है, सरकार इस सवाल का सार्वजनिक जवाब दे चुकी है। अगर सरकारी जवाब मान ही लेना है तो सवाल पूछने की औपचारिकता या दिखावा – जो भी कहें, खबर क्यों है? वह भी इतनी बड़ी कि देशबन्धु ने सात कॉलम की लीड बनाया है। चुनाव आयोग गलत कर रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने नहीं माना। मनमानी होती रही, कोई सुनवाई नहीं, कोई कार्रवाई नहीं। मोटा-मोटी कहा कि उसे अपने हिसाब से काम करने का अधिकार है। बाद में पता चला तीन सदस्यीय आयोग को मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले चला रहे थे। अब चुनाव आयोग लगातार यू-टर्न ले रहा है।
दैनिक भास्कर की सात कॉलम की लीड का शीर्षक है, अग्निपथ अब पक्का पथ; हरेक स्थायी हो सकेगा। अमर उजाला में यह सेकेंड लीड है। शीर्षक है, अग्निवीरों की दीवाली : रिटायरमेंट से दो माह पहले दो साल बढ़ी नौकरी। आप जानते हैं कि अग्निपथ योजना शुरू से संदिग्ध और विवादास्पद रही है। पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ में अग्निपथ / अग्निवीर योजना को लेकर बड़े खुलासे किए गए हैं। जनरल नरवणे के अनुसार, वर्ष 2020 की शुरुआत में उन्होंने सेना के लिए ‘टूर ऑफ ड्यूटी’ (अल्पकालिक भर्ती) का प्रस्ताव रखा था, लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) द्वारा इसमें बदलाव कर इसे ‘अग्निपथ योजना’ के रूप में थल सेना, वायुसेना और नौसेना तीनों के लिए लागू कर दिया गया। इससे सशस्त्र बल हैरान रह गए थे। वेतन भी कम रखा गया। प्रधानमंत्री की मनमानी और यू टर्न का यह एक उदाहरण है।
नवोदय टाइम्स में आज हाईलाइट किए अंश के अनुसार रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है, “यह कदम सशस्त्र बलों में किए जा रहे दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधारों का हिस्सा है जिसका उद्देश्य युवा तकनीकी रूप से सक्षम और भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार सेना का निर्माण करना है।” आप जानते हैं कि जनरल नरवणे की किताब के बारे में राजनाथ सिंह आश्वस्त थे कि किताब छपी ही नहीं है और ऐसा इसलिए भी हो सकता है कि मंत्रालय ने अनुमति नहीं दी हो। इसलिए उन्हें यकीन होगा कि बिना अनुमति किताब नहीं छपी होगी। लेकिन किताब के लिए अनुमति लेने या नहीं मिलने का कोई पुराना उदाहरण नहीं था। इसलिए किताब छप चुकी थी उसका औपचारिक लोकार्पण नहीं हुआ था। अमर उजाला की आज की लीड का शीर्षक है, दुनिया जीतने चले ट्रंप को अमेरिका ने ही ठुकराया। फ्लैग शीर्षक है – टैरिफ, ईरान युद्ध व महंगाई से त्रस्त लोगों ने पर कतरे। हमारे यहां इसी को एंटी इनकमबेंसी कहा जाता है। सरकार के कामों से जनता की नाराजगी जो चुनावों में निकलती है।
मोदी सरकार की मनमानी के उपरोक्त दो उदाहरणों के अलावा और भी कई उदाहरण हैं और इनमें नोटबंदी व जीएसटी प्रमुख है। तरीका इनका भी एसआईआर वाला ही था। लेकिन मोदी सरकार की लोकप्रियता कम नहीं हो रही है। दल बदल कराने से लेकर जन प्रतिनिधियों को खरीदने, फंसाने और डराने के उदाहरणों के बावजूद चुनाव में लोकप्रियता कम होने पर विपक्ष को शक है। शिकायत की कोई गुंजाइश नहीं बनी। मॉक पार्लियामेंट का आयोजन करना पड़ा। राहुल गांधी ने कहा है यह एक हथियार है लेकिन भाजपा इसका भी मजाक उड़ा रही है। इसमें इस बात की भी चिन्ता नहीं है कि मॉक पार्लियामेंट और मूट कोर्ट बच्चों को समझाने-बताने के लिए पढ़ाई का हिस्सा होता है।
आज मेरे अंग्रेजी अखबारों में दि एशियन एज अकेला है जिसने अग्निपथ की खबर को लीड बनाया है। यही नहीं, पंजाब में कांग्रेस के लिए प्रचार करते हुए राहुल गांधी ने नरेन्द्र मोदी को देश-विरोधी कहा। दि एशियन एज ने इस खबर को भी पहले पन्ने पर रखा है। माना जा सकता है कि देश की राजनीति बदल रही है, रणनीति भी पलटती दिख रही है। अभी तक जो नरेन्द्र मोदी राहुल गांधी के लिए करते थे वही राहुल गांधी नरेन्द्र मोदी के लिए कर रहे हैं। प्रेस कांफ्रेंस नहीं करने वाले नरेन्द्र मोदी को सीधी चुनौती दी है और कहा है कि जो चाहे मंच चुन लीजिए, जिसे चाहिए उसे जज बना दीजिए। मुझपर मानहानि के 45 मामले हैं लेकिन वोट चोरी और विदेशी सहायता वाले मामले में कोई मुकदमा नहीं है। उन्होंने इसपर मुकदमा करने की चुनौती दी है। राहुल गांधी की इस चुनौती का सरकार ने अभी तक कोई कायदे का आधिकारिक या राजनीतिक जवाब नहीं दिया है।
इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार सरकार सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स के लिए कानूनी प्रतिरक्षण खत्म करने पर विचार कर रही है। इसका मतलब है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अगर कोई यूजर आपत्तिजनक या गैरकानूनी सामग्री पोस्ट करता है, तो कंपनियों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता। यह सुरक्षा खत्म होने के बाद इन कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म पर पोस्ट होने वाले वीडियो, कमेंट और मैसेज की निगरानी और जवाबदेही के लिए सख्त व्यवस्था करनी होगी। सरकार इस सुरक्षा को केवल इंटरनेट, टेलीकॉम और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स तक सीमित करने पर भी विचार कर रही है। सरकार का मानना है कि ये प्लेटफॉर्म अब केवल जानकारी साझा करने का जरिया नहीं रहे हैं, बल्कि अपने एल्गोरिदम के जरिए यह तय करते हैं कि यूजर्स को क्या दिखाई देगा। आप समझ सकते हैं कि संचार की सुविधा से सरकार को कितनी परेशानी है।
ऐसी हालत में आज दैनिक भास्कर के पहले पन्ने पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक सघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले का कहा छपा है कि अराजक शक्तियां युवाओं को भड़का रही हैं, देशहित में एसआईआर जरूरी। कहने की जरूरत नहीं है कि यह शीर्षक भ्रामक है और सत्य तो नहीं ही है। एसआईआर जरूरी है या होगा – लेकिन इस बात का जवाब नहीं है कि एसआईआर करने का निर्णय किसने लिया। ऐसे तमाम मुद्दे हैं, सुप्रीम कोर्ट की जानकारी में हैं और इसके बावजूद एसआईआर के नाम पर मनमानी हुई, विरोध हो रहा है तो उसे ठीक किया जा रहा है लेकिन आरोप अराजक शक्तियों द्वारा युवाओं को भड़काने का है जबकि तथ्य यह है कि अचानक नोटबंदी की घोषणा करना, 1000 के नोट बंद करके 2000 के शुरू करना और फिर उसे बंद कर देना। इस बीच जो सब हुआ उसपर स्पष्टीकरण नहीं होना, तमाम आरोपों के जवाब नहीं देना सरकारी अराजकता है। देश को इसका कोई लाभ नहीं हुआ। मीडिया को इसपर खबर करनी चाहिए थी लेकिन वह नहीं के बराबर हुआ। फिर भी जायज मुद्दे उठाने को अराजक कहा जा रहा है। पहले पन्ने की खबर है।
आज हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने की लीड अग्निवीर की खबर है। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है, सभी अग्निवीरों को सशस्त्र सेना में बने रहने का विकल्प दिया गया। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, सरकार ने सभी अग्निवीरों को सेना में बनाए रखने का रास्ता खोला। खबर का इंट्रो है – यह निर्णय तब आया है जब पहले बैच का चार साल का कार्यकाल 31 दिसंबर को पूरा हो रहा है। सरकार का यह निर्णय अपने आप में अराजकता नहीं होगा लेकिन जिस ढंग से सरकारी निर्णय लागू किए गए और बदले गए वैसे भारत में पहले नहीं होता था और यह स्थिति अराजकता जैसी ही है। मीडिया में खबरें छप रही होतीं, उस पर प्रतिक्रिया चर्चा होती और कुछ खास मामलों पर किताब आती तो उसे सामान्य माना जा सकता था लेकिन किताबों की कहानी अलग है। किताबों में क्या लिखा जाए वह भी सरकार तय करना चाहती है और सोनिया गांधी की किताब के मामले में पहले तो ऐसा ही लगा। अब उनकी किताब आने वाली है – आ जाये तो पता चलेगा कि इस मामले में क्या हुआ या होने वाला था।
द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, ट्रम्प को एक बड़े झटके में डेमोक्रेट्स ने कांग्रेस पर कब्जा जमाया। विपक्षी पार्टियों ने लंबे समय से रिपब्लिकन के कब्जे वाली सीटें छीन लीं हैं और प्रतिनिधि सभा तथा सीनेट दोनों में बहुमत हासिल कर लिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि परिणाम से ‘उनका कुछ नहीं बिगड़ा है’ और महाभियोग चलाने के किसी भी प्रयास के खिलाफ चेतावनी दी। द टेलीग्राफ ने पहले पन्ने की एक खबर से बताया है कि ट्रम्प की इस हार का भारतीय व्यापार करार के लिए क्या मतलब है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

