विदेशी रिपोर्ट के भरोसे अपनी पीठ खुद थपथपाना और अनुकूल है तो रिपोर्ट की प्रशंसा। महत्वपूर्ण है कि यह रिपोर्ट डॉलर में आय की बात कर रही है। क्या इसमें रुपए के मुकाबले डॉलर की कीमत का ख्याल रखा गया है? अगर यह लाभ मुफ्त राशन से है तो खास क्या है?
संजय कुमार सिंह
आज की खबरों में विचारधारा का मामला दिख रहा है। इसके अलावा, हमेशा चुनावी मोड में रहने और राजनीतिक भाषण देने वाले प्रधानमंत्री तथ्यों के मामले में चुप्पी साध लेते हैं। इस पर आज कुछ नहीं है। कुल मिलाकर, सरकार की विचारधारा का असर अदालत में तो दिखता ही था, खबरों में भी दिख रहा है। प्रधानमंत्री का चुनावी प्रचार दि एशियन एज की लीड है। प्रधानमंत्री ने कहा है कि 10-12 वर्षों में 50 करोड़ लोग गरीबी से बाहर हो गए हैं। इसके लिए प्रधानमंत्री ने विश्व बैंक की हाल की एक रिपोर्ट का हवाला दिया है और हाल में वित्त मंत्री की प्रशंसा के साथ उसकी खबर द हिन्दू में छपी थी। यह दिलचस्प है कि रिपोर्ट अनुकूल है तो वित्त मंत्री ने विदेशी रिपोर्ट की प्रशंसा की और प्रधानमंत्री उसके आधार पर अपनी पीठ खुद थपथपा रहे हैं। दूसरी ओर, कुछ भी विदेशी हो तो उसकी आलोचना करते हैं।
राहुल गांधी पर विदेशी सहायता लेने का आरोप पुराना है। उनकी विदेश यात्राओं पर सवाल होते रहे हैं। अब वे इसपर बात करने की चुनौती दे रहे हैं तो विदेशी रिपोर्ट के हवाले से चुनावी भाषण चल रहा है। तथ्य यह है कि विदेशी रिपोर्ट तो भारत सरकार द्वारा दिए गए आंकड़े और विवरण पर ही आधारित होगी। ऐसे में सवाल है कि स्थिति इतनी बेहतर हुई है तो मुफ्त राशन लेने वालों की संख्या कम क्यों नहीं हो रही है। इनकी स्थिति बेहतर हुई तो कैसे? सरकार ने कोई प्रयास किया था या किसी विदेशी योजना का लाभ है। सरकार ने यह सब नहीं बताया है और अपनी तारीफ खुद कर रही है। सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था होने के बावजूद 5 ट्रिलियन का लक्ष्य हासिल नहीं हुआ है। इसपर प्रधानमंत्री अब नहीं बोलते। राहुल गांधी ने इस पर भी बात करने की जरूरत बताई है और आज इससे संबंधित कोई खबर पहले पन्ने पर नहीं है।
इसके अलावा, राहुल गांधी कई बार कह चुके हैं कि मोदी सरकार ने खास विचारधारा के लोगों को प्रमुख जगहों पर बैठा दिया है। इसका नतीजा यह होता है कि ऐसे लोग जनता की आवाज उठाने या निष्पक्ष रूप से काम करने के बजाय सरकार के एजेंडे को आगे बढ़ाते हैं। इससे देश का लोकतंत्र और संविधान कमजोर होता है। इसके लिए सबसे पहले मीडिया को नियंत्रण में ले लिया गया है। मैं उसी का असर देखने-दिखाने की कोशिश करता हूं। आज अमर उजाला की लीड के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि विरोध का अधिकार सबको है। इसलिए विरोध का समय और अवधि तय हो। प्रदर्शन के नाम पर किसी स्थान पर बेमियादी कब्जा नहीं कर सकते हैं। निश्चित रूप से यह विचार धारा का मामला है। इसलिए इसे प्रचार देने की जरूरत है तो यह इसका समय भी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है इसलिए यह खबर तो है ही। दि इंडियन एक्सप्रेस और कई अन्य अखबारों में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है।

इस खबर में ‘हर समय‘ की व्याख्या ज्यादा महत्वपूर्ण है। समय से मतलब प्रदर्शन का समय हो तो कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। ऐसा ही नौकरी का समय होता है। जब तक नौकरी रहती है वेतन-भत्ते मिलते हैं। नौकरी खत्म होने पर कुर्सी या पद तथा मकान मिला हो तो उससे कब्जा खत्म हो जाता है। नौकरी लंबी-छोटी हो सकती है। वैसे ही है जैसे प्रदर्शन। कोई शौक से नहीं करता है और तब तक करता है जब तक संभव हो या फिर जरूरत रहे। अगर ज्यादा प्रदर्शन स्थल की जरूरत है तो इसकी व्यवस्था होनी चाहिए।
इसपर दूसरे विचार भी हो सकते हैं और विचार चर्चा के लिए तो ठीक है। खबर के लिए नहीं। आज खबर बांबे हाईकोर्ट वाली है जो विचार के कारण है। और यह तथ्य कि हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद देर रात तक वीडियो अपलोड नहीं हुआ। जहां तक प्रदर्शन के समय और ज्यादा होने से परेशानी की बात है – आपको याद होगा कि आम लोगों के प्रदर्शन की सीमा और जगह पर कब्जे की बात हो रही है तो यह याद दिला दूं कि राज्यपालों द्वारा राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों को मंजूरी देने में देरी और उसके लिए एक निश्चित समय सीमा तय करने का विवाद रहा है। केंद्र और गैर-भाजपा शासित राज्यों के बीच यह एक बड़ा कानूनी और राजनीतिक मुद्दा रहा है। संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के पास राज्य विधानसभा द्वारा पास किए गए विधेयक पर मंजूरी देने, उसे रोकने या राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखने का अधिकार है।
विपक्षी दलों की सरकारों का आरोप था कि राज्यपाल विधेयकों पर महीनों या सालों तक कोई निर्णय नहीं लेते, रोककर रखते हैं। इससे राज्य में विधाई और प्रशासनिक कामकाज ठप हो जाता है। इस कानूनी और संवैधानिक खींचतान के दौरान केंद्र सरकार और राज्यपालों की ओर से तर्क था कि संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 200 या 201 में राज्यपाल या राष्ट्रपति के लिए कोई कठोर समय-सीमा जानबूझकर तय नहीं की थी। केंद्र का यह भी कहना था कि राज्यपाल का पद एक संवैधानिक संस्था है और उन्हें यह विचार करने के लिए पर्याप्त (अनंत यानी कार्यकाल तक ही ना) समय मिलना चाहिए कि कोई विधेयक संवैधानिक प्रावधानों या जनहित के अनुकूल है या नहीं।
बांबे हाईकोर्ट ने सवाल किया है – क्या भारत धर्मनिरपेक्ष नहीं है? और बीएमसी से कहा है, दीया मिर्जा के वीडियो क्लिप को फिर से अपलोड किया जाए। मुंबई हाईकोर्ट की यह खबर अमर उजाला में पहले पन्ने पर नहीं है लेकिन सुप्रीम कोर्ट वाली खबर के साथ बताया गया है : सरकार ने कहा – अनुमति एक दिन की कब्जा 17 दिन तक। मुझे लगता है कि खबरों का ऐसा चयन भी विचारधारा से प्रभावित होता है। यह अखबार या मीडिया संस्थान की संपादकीय नीति और उसमें काम करने वालों की विचारधारा का प्रभाव हो सकता है। हालांकि वह अलग मुद्दा है। मुंबई हाईकोर्ट की खबर दिल्ली के इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर है और सुप्रीम कोर्ट की खबर पहले पन्ने पर नहीं है तो यह भी विचारधारा और संपादकीय नीति से प्रभावित हो सकता है।
दैनिक भास्कर में सुप्रीम कोर्ट वाली खबर तो पहले पन्ने पर है लेकिन मुंबई हाईकोर्ट वाली खबर दूसरे पहले पन्ने पर भी नहीं है। खबरों पर विचारधारा के प्रभाव की बात कर रहा हूं तो यह बताना जरूरी है कि दैनिक भास्कर में पहले पन्ने पर भास्कर सीरीज; 7 दिन… 7 रामायण अपनी-अपनी राम कथा भाग-3 एकंर है और दूसरे पहले पन्ने पर टॉप बॉक्स है राम वन गमन पथ यात्रा, भाग-3 चित्रकूट। मुंबई हाईकोर्ट वाली खबर दैनिक भास्कर में तीसरे (पहले) पन्ने पर है।
इस तरह पहले पन्ने को आप राष्ट्रीय खबरों का पन्ना मान सकते हैं लेकिन ठीक से समझने के लिए आपको कुछ दिन अखबार देखना चाहिए। इस खबर का शीर्षक है – दीया के वीडियो पर हाईकोर्ट बोला – पर्यावरण के मुद्दे को दूसरा रंग न दें। अखबार का फ्लैग शीर्षक है, नेताओं को फटकार; वीडियो फिर अपलोड करने का निर्देश। इसके साथ एक दिलचस्प खबर है – दिल्ली हाईकोर्ट में केंद्र ने कहा, कृषि भवन में मस्जिद सरकारी संपत्ति के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के अनुकूल नहीं। यह भी विचारधारा का मामला है। अगर मस्जिद होना धर्मनिरपेक्ष छवि के अनुकूल नहीं है तो मंदिर भी नहीं होना चाहिए। लेकिन उसकी चर्चा ही नहीं होती है।
सहारनपुर का हाल का मामला उल्लेखनीय है। खबरों के अनुसार, डबल इंजन वाले उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में कलेक्ट्रेट परिसर के भीतर एक पुरानी मस्जिद थी। प्रशासन और जिला अदालत के आदेश के बाद इसे ध्वस्त कर दिया गया। अधिकारियों का कहना था कि सिटी मजिस्ट्रेट और जिला अदालत की कानूनी प्रक्रिया के तहत यह निर्माण सरकारी/कलेक्ट्रेट की जमीन पर अतिक्रमण के दायरे में पाया गया था। मस्जिद कमेटी की तरफ से जिला अदालत में जो अपील दायर की गई थी, वह खारिज हो चुकी थी, इसके बाद यह कार्रवाई की गई। स्थानीय लोगों और पक्षकारों का दावा था कि यह मस्जिद कई दशक पुरानी थी और कलेक्टर कार्यालय बाद में मस्जिद परिसर में या उसके करीब बना था। पर तोड़ दिया गया क्योंकि तोड़ना ही था।
देशबन्धु में सुप्रीम कोर्ट वाली खबर तो है लेकिन हाईकोर्ट वाली पहले पन्ने पर नहीं है। नवोदय टाइम्स में दिल्ली या मुंबई – दोनों ही खबरें पहले पन्ने पर नहीं हैं। ना लीड ना सेकेंड लीड। पहले पन्ने पर विज्ञापन है इसलिए खबरें ज्यादा हैं। मुझे लगता है कि खबरों की प्रकृति के आधार पर दोनों को पहले पन्ने पर रखा जा सकता था। अदालती फैसले में धर्म निरपेक्षता के सवाल पर इतनी स्पष्टता वाली खबर काफी दिन बाद आई है जबकि सुप्रीम कोर्ट से जनहित, आंदोलन, विरोध आदि के खिलाफ विचार आते रहे हैं। यह भी इसी क्रम में है लेकिन मेरी टिप्पणी फैसले या विचार पर नहीं, उसकी खबर और प्रस्तुति पर है। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, अमित शाह की राहुल को चुनौती संसद में कर लीजिए ‘दो-दो हाथ’। प्रदर्शनस्थल पर कब्जे की खबर नवोदय टाइम्स में प्रमुखता से है। भारत के मुख्य न्यायाधीश की फोटो के साथ अखबार के दूसरे पहले पन्ने के बीच के दो कॉलम में टॉप बॉक्स है।
अंग्रेजी अखबारों में दीया मिर्जा का वीडियो फिर से अपलोड करने के बांबे हाईकोर्ट के आदेश की खबर कलकत्ता के दैनिक, द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर है और विज्ञापन यहां भी आधे पन्ने का है। जाहिर है, यह खबरों को प्राथमिकता देने का मामला है और विचारधारा से तय होता दिख रहा है। प्रदर्शनस्थल पर कब्जे से संबंधित खबर टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर नहीं है। द हिन्दू में आधे पन्ने का विज्ञापन है और दिल्ली या मुंबई की दोनों खबरें पहले पन्ने पर नहीं है। सुप्रीम कोर्ट वाली खबर अंदर होने की सूचना है लेकिन खबर का मुख्य बिन्दु प्रदर्शन स्थल पर कब्जा नहीं है बल्कि यह विचार कि आंदोलनों से भी एक अर्थव्यवस्था तैयार होती है। अगर आप पूरी खबर पढ़ेंगे तो मामला समझ में आएगा लेकिन मुझे लगता है कि यह खबर सोच या विचार धारा बताने के लिए तो ठीक है लेकिन खबर महत्वपूर्ण नहीं है शायद इसीलिए प्रमुखता कम मिली है।
टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर दोनों खबरें हैं, दो कॉलम में, ऊपर-नीचे। हिन्दुस्तान टाइम्स में दोनों खबरें एक साथ हैं। पहले मुंबई हाईकोर्ट की सिंगल कॉलम में और फिर सुप्रीम कोर्ट की दो कॉलम में। हालांकि दीया मिर्जा की फोटो के साथ इस खबर के ऊपर और सुप्रीम कोर्ट की खबर के बराबर में एक खबर बिहार के मुख्यमंत्री के सुविचार हैं। उन्होंने कहा है कि बिहार में क्राइम हो सकता है लेकिन ‘अपराध’ नहीं है। इन खबरों को देखकर पत्रकारिता के नियम की याद आई, एक जैसी खबरें एक साथ हों तो बेहतर। इस लिहाज से सुप्रीम कोर्ट और बिहार के मुख्य मंत्री का कहा एक साथ है तो सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की खबरें भी एक साथ हैं।
आज की इन दोनों खबरों के विचारधारा से जुड़े होने का ही नतीजा है कि मंगलवार को देर रात तक वीडियो को बीएमसी के सोशल मीडिया हैंडल से दोबारा अपलोड नहीं किया गया था। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, अदालत ने कहा – मामले को एक अलग रंग दे दिया गया है। अदालत ने कुछ लोगों खासकर उनकी ‘क्षुद्र मानसिकता’ पर अपनी नाराजगी जताई जो आम लोगों के प्रतिनिधि हैं। अदालत ने भारत की धर्म निरपेक्ष परंपराओं को संरक्षित करने की जरूरत को रेखांकित किया। दीया मिर्जा के वीडियो को लेकर सोमवार को राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया था। बीएमसी ने सोशल मीडिया से उनके वीडियो चुनकर हटाए। इससे पहले मुंबई भाजपा प्रमुख अमीत सतम ने एतराज किया था और मेयर ऋतु तावडे ने अपने कमेंट में इसे हिन्दू विरोधी करार दिया। बीएमसी का संचालन महायुति गठजोड़ करती है। इसमें भाजपा का बोलबाला है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

