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सुख-दुख

मुफ्त की आदत: Blinkit एम्बुलेंस के गलत इस्तेमाल से नॉन-इमरजेंसी ट्रिप पर लगा ₹2500 चार्ज

Blinkit की मुफ्त एम्बुलेंस का लोग रेगुलर चेकअप के लिए इस्तेमाल करने लगे, जिसके बाद नॉन-इमरजेंसी ट्रिप पर ₹2500 चार्ज लगाना पड़ा।

Bright green and yellow ambulance van with red 'AMBULANCE' lettering driving on a road. N/A branding visible on side.

पप्पू पासवान-

भारत में अच्छी सुविधाएं इसलिए नहीं टिक पातीं, क्योंकि यहां बेशर्मों की कमी नहीं है।

Blinkit ने कुछ समय पहले एम्बुलेंस सर्विस शुरू की थी। यह 10 मिनट में ज़रूरतमंद के घर पहुंच जाती थी, और वो भी बिल्कुल फ्री।

सोचिए, कितना बड़ा कदम था। किसी को हार्ट अटैक हो, किसी का एक्सीडेंट हो जाए या अचानक किसी की हालत खराब हो जाए, तो 10 मिनट में एम्बुलेंस दरवाज़े पर खड़ी हो। इतना आसान और वो भी मुफ्त में।

पैसे बचाने के लिए एम्बुलेंस

लेकिन भारत के कुछ लोगों ने इसका भी गलत फायदा उठाना शुरू कर दिया।

अगर किसी को रेगुलर हेल्थ चेकअप के लिए अस्पताल जाना होता, तो वो कैब या ऑटो बुक करने की बजाय Blinkit एम्बुलेंस बुक कर लेता।

वजह साफ थी कि 100-200 रुपये बच जाएं। मतलब इमरजेंसी नहीं, सिर्फ पैसे बचाने के लिए मुफ्त एम्बुलेंस का इस्तेमाल।

धीरे-धीरे ये प्रैक्टिस बढ़ने लगी। लोग समझ गए कि जब एम्बुलेंस मुफ्त में मिल रही है, तो कैब पर पैसा क्यों खर्च करें।

नॉन-इमरजेंसी केस पर ₹2500 चार्ज

नतीजा ये निकला कि Zomato के फाउंडर दीपिंदर गोयल को मजबूर होकर Blinkit एम्बुलेंस के नॉन-इमरजेंसी केसों पर ₹2500 प्रति ट्रिप चार्ज लगाना पड़ा।

इमरजेंसी केस अब भी पूरी तरह फ्री हैं, लेकिन जो लोग सिर्फ पैसे बचाने के लिए एम्बुलेंस बुक करेंगे, उनसे अब पैसे लिए जाएंगे।

मुफ्त की आदत खराब कर देती है। जब तक चीज़ मुफ्त रहती है, लोग उसका सही इस्तेमाल नहीं करते। और जब तक गलत इस्तेमाल करने वाले हैं, तब तक अच्छी सुविधाएं टिक नहीं पातीं।

दीपिंदर गोयल ने सही किया, वरना भारत में हर अच्छी चीज़ का यही हाल होता रहता है।

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