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रामायण (भाग-1) फिल्म रिव्यू : भव्यता में बेजोड़, मर्यादा में कहीं-कहीं चूक

नितेश तिवारी की ‘रामायण’ : आंखों को भाती है, पर मन को पूरी तरह नहीं छूती

Man in a beige blazer and black shirt posing in a modern office lounge setting.

लक्ष्मी नारायण शुक्ला-

फिल्म : रामायण (भाग 1)
निर्देशक : नितेश तिवारी
कलाकार : रणबीर कपूर (श्रीराम), साई पल्लवी (सीता), यश (रावण), रवि दुबे (लक्ष्मण), सनी देओल (हनुमान)
रेटिंग : ★★★★☆ (5 में से 4)

Three warriors in orange robes stand on rocky terrain at sunset, each armed, as a Ramayana film poster looms above.

नितेश तिवारी की बहुप्रतीक्षित ‘रामायण’ बड़े पर्दे पर आ चुकी है। रामायण सिर्फ एक कथा नहीं, करोड़ों भारतीयों की आस्था है। ऐसे विषय को आधुनिक सिनेमा की भाषा में कहना अपने आप में बड़ी चुनौती है, और फिल्म इसे काफी हद तक साहस और भव्यता के साथ निभाती है। फिर भी कुछ बातें हैं, जो रामायण को मन से जानने वाले दर्शक को खटकती हैं।

जहां फिल्म बाजी मारती है

फिल्म का फिल्मांकन भव्य और आज के दौर के अनुरूप है। हर दृश्य जैसे बड़े पर्दे के लिए ही रचा गया हो। VFX और CGI के मामले में यह भारतीय सिनेमा के लिए बड़ा कदम है, तकनीकी रूप से फिल्म अंतरराष्ट्रीय स्तर को छूती है। संगीत और बैकग्राउंड स्कोर शानदार है, कई दृश्यों को संगीत ही नई ऊंचाई देता है। कहानी को एक नए नजरिए से दिखाया गया है, जो आज की पीढ़ी को रामायण से जोड़ने का काम करता है।

जहां मन अटकता है

सबसे पहली कमी श्रीराम के बचपन की गैरमौजूदगी है। गुरुकुल, गुरु वशिष्ठ से शिक्षा और बाल्यकाल के प्रसंग फिल्म में नहीं हैं, जबकि मर्यादा पुरुषोत्तम के चरित्र की नींव इन्हीं से बनती है। इसी तरह रावण के पिता ऋषि विश्रवा का कोई दृश्य नहीं है, जिससे रावण का चरित्र अधूरा सा लगता है।

विवाह से पहले राम-सीता की भेंट का दृश्य जिस ढंग से फिल्माया गया है, वह परंपरागत भावना से मेल नहीं खाता। सीता जी का श्रीराम को ‘राम’ कहकर पुकारना भी अटपटा लगता है, क्योंकि भारतीय संस्कारों में पत्नी पति को नाम से नहीं पुकारती, और यही मर्यादा रामायण की पहचान है।

लक्ष्मण जी के चित्रण में भी चूक दिखती है। मान्यता है कि उन्होंने कभी माता सीता का मुख नहीं देखा, केवल चरणों के दर्शन किए, पर फिल्म में यह भाव नहीं दिखता। ऊपर से उन्हें थोड़ा कॉमिक अंदाज में दिखाना उनके तेजस्वी और गंभीर चरित्र का असर कम करता है।

राक्षस कार्टून जैसे लगते हैं और उन पर मार्वल के थानोस जैसे हॉलीवुड किरदारों की छाप साफ झलकती है। भारतीय पौराणिक स्वरूप ज्यादा असरदार होता। वन में सीता जी का राक्षस से युद्ध प्रचलित रामायण ग्रंथों में कहीं नहीं मिलता। रचनात्मक छूट समझी जा सकती है, पर मूल कथा से यह हटाव खटकता है।

रामायण की आत्मा उसकी भावनाएं हैं, पर कई दृश्य मन को उतनी गहराई से नहीं छू पाते। संवाद भी और प्रभावशाली हो सकते थे। यहां तुलना स्वाभाविक रूप से रामानंद सागर के ‘रामायण’ धारावाहिक से होगी, जिसके संवाद आज भी लोगों के मन में बसे हैं।

साहस को सलाम

इतने विशाल और आस्था से जुड़े विषय को बड़े पर्दे पर उतारना बड़े साहस का काम है। किसी भी निर्माता के लिए इतना बड़ा जोखिम उठाना आसान नहीं होता। यह प्रयास पूरे सम्मान का हकदार है।

देखें या नहीं?

कुछ कमियों के बावजूद ‘रामायण’ एक शानदार फिल्म है, जो सपरिवार देखने लायक है और निराश नहीं करती। ऊपर बताई कमियां मुख्य रूप से उन परिवारों को खटकेंगी, जिन्होंने रामानंद सागर का धारावाहिक देखा है और जिनके मन में उसकी छवि गहराई से बसी है। लेकिन दुनियाभर के दर्शकों और धारावाहिक न देखने वालों के लिए यह फिल्म एक अद्भुत अनुभव होगी। युवाओं और बच्चों समेत हर वर्ग को यह फिल्म पसंद आएगी।

रामायण इतनी विशाल कथा है कि सब कुछ एक फिल्म में समेटना संभव नहीं। अगर अगले भाग में इन कमियों पर ध्यान दिया गया, तो फिल्म दर्शकों की उम्मीदों से कहीं आगे निकल जाएगी।

जय श्री राम।

(लेखक लक्ष्मी नारायण शुक्ला एक पारंपरिक ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते हैं। वे रिलीजियस फिल्म्स के एक्सपर्ट हैं। उनसे संपर्क +91 96519 96633 के द्वारा किया जा सकता है।)

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