अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित सियांग बांध के विरोध की ख़बरें करने वाले पत्रकारों पर दबाव बढ़ता दिख रहा है। ऑल्ट न्यूज़ की 4 नवंबर की पड़ताल के मुताबिक़ राज्य में सेंसरशिप, गिरफ़्तारियों, इंटरनेट बंदी और PR अभियान के ज़रिए बांध से जुड़ी कहानी पर क़ाबू पाने की कोशिश हो रही है, और इसकी चपेट में स्थानीय पत्रकार भी आए हैं।
सबसे बड़ा नाम ‘द अरुणाचल टाइम्स’ की डिप्टी एडिटर टोंगम रीना का है। रिपोर्ट के अनुसार अरुणाचल पुलिस ने 23 अक्टूबर को पासीघाट में हुई हिंसा के सिलसिले में उनके ख़िलाफ़ सर्च वारंट मांगा। अर्ज़ी में उन्हें “आरोपी” कहा गया है, पर यह नहीं बताया गया कि हिंसा से उनका संबंध क्या है। उनके वकील सनी तायेंग का नाम भी एक वारंट अर्ज़ी में है। रीना ने कहा है कि वे अपनी पत्रकारिता और सक्रियता जारी रखेंगी।
स्थानीय डिजिटल मीडिया पर भी मार पड़ी है। ‘अपर सियांग न्यूज़ 24*7’ का फ़ेसबुक पेज बंद कर दिया गया; ‘द अरुणाचल टाइम्स’ ने 5 अक्टूबर को बताया था कि पेज सरकारी आदेश से ब्लॉक हुआ। चैनल के एमडी शान जिजोंग का कहना है कि वे इस मुद्दे पर रिपोर्टिंग जारी रखेंगे। ‘अरुणभूमि न्यूज़’ की दो ख़बरें भारत में देखने लायक़ नहीं रहीं; उसकी एडिटर-इन-चीफ़ ताकम सोनिया ने वीडियो बयान जारी कर इसकी निंदा की।
पत्रकारों के अलावा मानवाधिकार वकील एबो मिली समेत कई कार्यकर्ताओं के फ़ेसबुक खाते भी प्रतिबंधित हुए। रिपोर्ट के मुताबिक़ 23 अक्टूबर की हिंसा के बाद 69 लोग गिरफ़्तार हुए और चार और हिरासत में लिए गए, जबकि कुछ लोगों को APUAPA के तहत पकड़ा गया। 31 अक्टूबर को दिल्ली में अरुणाचल भवन के बाहर क़रीब 40 प्रदर्शनकारी हिरासत में लिए गए, जिन्हें बाद में छोड़ दिया गया।
प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया इससे पहले 30 अक्टूबर को X पर बयान जारी कर टोंगम रीना का नाम वारंट अर्ज़ी में डाले जाने पर हैरानी जता चुका है। क्लब ने पुलिस से मांग की थी कि रीना और दूसरे पत्रकारों को उनके पेशेवर काम के लिए परेशान न किया जाए, और कहा था कि हिंसा की जांच को आंदोलन की ख़बर करने वाले पत्रकारों को डराने का बहाना नहीं बनाया जा सकता।
हिंसा और तोड़फोड़ की जांच ज़रूरी है, लेकिन जब जांच की फ़ाइल में सबसे पहले उन लोगों के नाम आने लगें जो ख़बर लिख रहे थे, तो डर सिर्फ़ अरुणाचल के पत्रकारों तक सीमित नहीं रहता।

