संगीत कुमार रागी-
आज एबीवीपी न्यूज़ पर मनोज काका जो समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता हैं उन्होंने गाली देते हुए मुझे संबोधित किया । ये पहली बार नहीं है । वे कई बार मुझ पर निजी टिप्पणी करते है जिसमे बेहूदा , गधा ऐसे शब्दों का प्रयोग रहता है । आज जब इस शब्द का प्रयोग किया तो मैंने जवाब में कहा कि ऐसे लोगों के लिए ही हम गवाँर और राड शब्द का प्रयोग करते हैं । उसमें अहीर शब्द का प्रयोग सहचर के तरह हो गया । यह किसी समुदाय पूरे के लिए नहीं था बल्कि उन जैसे गालीबाज़ों के लिए था । कुछ लोगों की भावना आहत हो सकती है इस लिए मैं माफ़ी माँगता हूँ , मेरा ऐसा उद्देश्य नहीं था ।
TV पर समस्त ओबीसी जाति को सुअर की औलाद, कुत्ता, गधा बोलने वाले संगीत रागी को भी पता है एबीपी न्यूज असल में एबीवीपी न्यूज है और त्रिपाठी मैडम BJP। ऐसे नीच लोगों का बहिष्कार होना चाहिए। आपको क्या लगता है चैनल, एंकर या प्रवक्ताओं में से कोई करेगा? यह डिबेट नहीं गन्दी नाली में लोटना है। -नवीन कुमार (वरिष्ठ पत्रकार)
डॉ कंचना यादव-
माफ़ीवीर की औलादों, माफ़ी माँगना बंद करो। बस, बहुत हुआ!
पिछड़ों को अनपढ़ कहना, गंवार कहना, जातिसूचक गालियाँ देना, दलितों की संस्थागत हत्या पर उनका चरित्र हनन करना यही सब काम है संघियों का।
मैं आज उस डिबेट में थी। कोई भी शब्द गलती से नहीं निकला था। जातिवादी अहंकार और गालियाँ अंदर से सोच-समझकर बोल रहे थे।
गलती कोई एक बार करता है, बार-बार नहीं दोहराता।
“अहीर”, “गंवार” बार-बार दोहराकर तुमने अपनी मानसिकता को उजागर किया है। भाजपा और संघ की मानसिकता को उजागर किया है।

देखें संबंधित वीडियो- https://x.com/sanjayazadsln/status/2117656504530808846?a=Ac3pXT0hJFuG4WbM6kE&s=46
RSS के लोगों के पास क्या है लिखने के लिए, सिवाय घृणा के!
अनिल-
क्या सही में हमारे विश्वविद्यालयों में संगीत रागी जैसे प्रोफेसर हैं?
मैंने मेरी जिंदगी में एक बार NET का एग्जाम दिया था, और उसी में क्वालीफाई कर गया था,
किसी के कहने पर ऐसा कर दिया था समझ नहीं थी, उसके बाद मैने कभी विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर बनने की नहीं सोची,
शायद मेरा डिसीजन सही था, मैं ह्यूमैनिटीज के विश्वविद्यालयों में पढ़ाई के विरुद्ध नहीं हूं, बहुत सारे प्रोफेसर अच्छे भी हैं, ये मेरा निजी फैसला था, पर्सनल चॉइस थी कि मुझे विश्वविद्यालय में प्रोफेसर नहीं बनना है, मुझे UPSC की तैयारी ही करवानी है बच्चो को, ये बहुत बड़ा domain है,
खैर मेरी बात अलग है, लेकिन संगीत रागी जैसे लोगों को विश्विद्यालय में पढ़ाते हुए देखता हूं मुझे बहुत ताज्जुब होता है कि ये किस प्रकार के article लिखते हैं, आपको heading से ही कूड़ा नजर आयेगा,
RSS के लोगों के पास क्या है लिखने के लिए, सिवाय घृणा के।
इसके आर्टिकल्स के citations देखिए, इतने साल का अनुभवclaim करने के बाद ये हाल है।
आर्टिकल्स की हेडिंग देखेंगे तो आपको पता चल जाएगा कि ये कूड़ा है, आपको अंदर पढ़ने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी।
कुछ दैनिक जागरण जैसे कूड़ा लिखते होंगे, क्या ही है इसमें ऐसा जो वैचारिकी हो, कुछ शोध जैसा हो, कुछ भी नहीं आपको विशुद्ध घृणा से भरे RSS के विचार मिलेंगे।
संतोष यादव-
संगीत रागी 1994 में एमफ़िल किया और 1995 में सीधे एसोसिएट प्रोफेसर बन गया। इसने पीएचडी भी 2005 में किया। 31 साल के अकादमिक करियर में कुछ दोयम दर्जे की पत्रिकाओं में लेख छपवाए। कल टीवी बहस में अपने प्रकाशनों की ऐसी डींगें हाँक रहा था, मानो अकादमिक दुनिया में झंडे गाड़ दिए हों। हकीकत यह है कि इसके लेखों को कुल 19 साइटेशन मिले हैं, जो इसने खुद अपने ही आर्टिकल में साइट किया है।

2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आते ही प्रोफेसर बन गया अब चापलूसी में लगा कि कहीं कुलपति बन जाये। सोचिए इस इंसान के अंदर इतनी नफ़रत दलित पिछड़ों के प्रति भरी है ये अपने क्लास में छात्रो से कैसा व्यवहार करता होगा। इस जैसे जातिवादी मानसिकता के प्रोफेसरों से निपटने ही यूजीसी क़ानून लाया गया था।

