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द हिंदू की आपत्ति के बाद झुका इंडियन एक्सप्रेस, डिजिटल सीईओ ने मानी गलती

एक्सप्रेस का खेद सिर्फ़ फोटो के लिए है, इंटरव्यू के हिस्सों पर उसने गलती नहीं मानी, इसलिए “माफ़ी” की जगह “गलती मानी” कहना ज़्यादा सटीक रहेगा!

The Hindu publishes a statement condemning another paper for reproducing an interview and photos, notes copyright and lack of credit.

एक्सक्लूसिव इंटरव्यू और फोटो के इस्तेमाल को लेकर द हिंदू और इंडियन एक्सप्रेस के बीच छिड़े विवाद में आखिरकार इंडियन एक्सप्रेस को गलती माननी पड़ी है। इंडियन एक्सप्रेस डिजिटल के सीईओ नंदगोपाल राजन ने स्वीकार किया कि एक्सप्रेस के एंटरटेनमेंट वर्टिकल ‘स्क्रीन’ में छपे लेख में तमिल अभिनेता ऋषिकांत की तस्वीर के इस्तेमाल में चूक हुई।

मामला 3 नवंबर का है। द हिंदू के पत्रकार श्रीनिवास रामानुजम ने अखबार के चेन्नई दफ्तर में ऋषिकांत का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू किया था, जो 3 नवंबर 2026 को प्रकाशित हुआ। इस लेख में अभिनेता के तमिल सिनेमा में 15 साल के संघर्ष, ‘डोरोथी’ और ‘मोधा रात्रि’ से मिली सफलता और चेन्नई के छोटे कमरे से नए घर में जाने की योजना का ज़िक्र था।

इसके बाद इंडियन एक्सप्रेस ने ‘डोरोथी एक्टर ऋषिकांत फेस्ड इनॉर्मस फेल्योर्स, फाउंड सक्सेस आफ्टर 15 इयर्स’ शीर्षक से लेख छापा, जिस पर द हिंदू का आरोप था कि उसमें मूल इंटरव्यू के बड़े हिस्से को दोबारा लिखकर इस्तेमाल किया गया। द हिंदू ने 5 नवंबर को एक्स पर पोस्ट करके नाराज़गी जताई। अखबार ने लिखा कि किसी एक्सक्लूसिव इंटरव्यू को कोट करना सामान्य पत्रकारीय परंपरा है, लेकिन पूरी स्टोरी को शब्द बदलकर दोबारा छाप देना नहीं। द हिंदू ने यह भी कहा कि मूल पत्रकार और फोटोग्राफर के काम को श्रेय देना पत्रकारिता का बुनियादी सिद्धांत है।

हालांकि इंडियन एक्सप्रेस ने ऋषिकांत के एक कोट को पेश करते समय द हिंदू का नाम लिया था, लेकिन आगे के लेख में अभिनेता के अनुभवों का लंबा ब्योरा और कई और उद्धरण थे। फोटो को लेकर विवाद अलग से था, क्योंकि एक्सप्रेस ने तस्वीर का श्रेय ऋषिकांत के इंस्टाग्राम अकाउंट को दिया था।

राजन का कहना है कि कोट्स का श्रेय द हिंदू को दिया गया था, लेकिन द हिंदू के फोटोग्राफर थामोधरन द्वारा खींची गई ऋषिकांत की तस्वीर इस्तेमाल करने पर उन्हें खेद है, यह एक चूक थी जिसे अब सुधार लिया गया है।

बड़े मीडिया घरानों के बीच इस तरह की सार्वजनिक तनातनी कम ही देखने को मिलती है। यह प्रकरण बताता है कि डिजिटल की होड़ में दूसरों की मेहनत उठाने का चलन कितना आम हो चला है।

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