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उत्तराखंड

उत्तराखंड सरकार के खिलाफ खबर दिखाई तो पत्रकार पर टूटा पुलिसिया कहर! रूपेश कुमार की पिटाई, रातभर थाने में रखने और फर्जी मुकदमे में फंसाने के आरोप

ऊधम सिंह नगर में ‘अनसुनी आवाज’ से जुड़े पत्रकार रूपेश कुमार के साथ कथित मारपीट, पुलिस उत्पीड़न और फर्जी मुकदमे में फंसाने की कोशिश का आरोप। अदालत ने रिमांड खारिज कर जमानत दी। न्यायिक जांच की मांग को लेकर देशभर के पत्रकारों से अपील।

रुद्रपुर/ऊधम सिंह नगर। उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर जिले में पत्रकार रूपेश कुमार के साथ कथित मारपीट, पुलिस उत्पीड़न और फर्जी मुकदमे में फंसाने की कोशिश का गंभीर मामला सामने आया है। सोशल मीडिया न्यूज पोर्टल ‘अनसुनी आवाज’ से जुड़े रूपेश कुमार के समर्थन में जारी एक अपील में राज्य सरकार और स्थानीय पुलिस प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। अपील जारी करने वालों ने पूरे घटनाक्रम की न्यायिक जांच कराने, दोषी पुलिसकर्मियों और हमलावरों के खिलाफ कार्रवाई करने तथा पत्रकार को न्याय दिलाने के लिए पत्रकारों, सामाजिक संगठनों और लोकतंत्र समर्थक नागरिकों से सहयोग मांगा है।

अपील के मुताबिक, रूपेश कुमार पिछले 24 वर्षों से जनपक्षीय पत्रकारिता कर रहे हैं। उनके पिता स्वर्गीय प्रताप सिंह भी जन आंदोलनों से जुड़े रहे थे और उन्हें भी अपने सामाजिक-राजनीतिक कार्यों के चलते सरकारी उत्पीड़न का सामना करना पड़ा था। रूपेश कुमार अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाते हुए सरकार की नीतियों और स्थानीय प्रशासन से जुड़े मुद्दों पर लगातार सवाल उठाते रहे हैं।

3 नवंबर की रात का घटनाक्रम

अपील में बताया गया है कि 3 नवंबर 2026 की रात करीब 11:30 बजे रूपेश कुमार रुद्रपुर स्थित अपने कार्यालय से कार द्वारा दिनेशपुर स्थित घर लौट रहे थे। रास्ते में एक बोलेरो (UK06AZ9846) ने उनकी मारुति डिजायर (UK06AZ5934) को पीछे से टक्कर मारी। आरोप है कि बोलेरो सवारों ने दोबारा उनकी कार को टक्कर मारी और आगे निकल गए।

इसके बाद जब रूपेश कुमार ने पुलिस को सूचना देने के लिए गाड़ी रोकी तो बोलेरो वापस आई। अपील के अनुसार, उसमें से पांच लोग उतरे और रूपेश कुमार के साथ गाली-गलौज और मारपीट शुरू कर दी। हमलावरों ने कथित तौर पर उनसे कहा कि वे सरकार के खिलाफ बोलते हैं और उन्हें पत्रकारिता सिखाई जाएगी। आरोप है कि हमलावर उनका मोबाइल फोन और पर्स भी छीन ले गए। करीब 10-15 मिनट तक मारपीट के कारण रूपेश कुमार बेहोशी की स्थिति में पहुंच गए और उनके चेहरे, हाथ-पैरों पर चोटें आईं।

हमलावरों पर कार्रवाई के बजाय पत्रकार को थाने ले जाने का आरोप

अपील में पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। दावा किया गया है कि घटनास्थल पर पुलिस की दो गाड़ियां पहुंचीं, लेकिन कथित हमलावरों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय पुलिस रूपेश कुमार को उनकी गाड़ी सहित रुद्रपुर कोतवाली ले गई। आरोप है कि रूपेश कुमार के बार-बार कहने के बावजूद बोलेरो और उसमें सवार लोगों को थाने नहीं लाया गया।

इसके बाद पुलिस उन्हें जिला चिकित्सालय ले गई, जहां मेडिकल परीक्षण कराया गया। अपील में मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि उसमें एल्कोहल की गंध आने का उल्लेख तो है, लेकिन रूपेश कुमार को एल्कोहल के प्रभाव में नहीं बताया गया। उनका आरोप है कि बार-बार अनुरोध करने के बावजूद ब्लड सैंपल लेकर एल्कोहल की जांच नहीं कराई गई।

यह भी आरोप लगाया गया है कि पुलिस ने घटनास्थल से लेकर मेडिकल परीक्षण और कोतवाली वापसी तक उनके परिजनों को सूचना नहीं दी। उनका मोबाइल फोन, जिसे हमलावरों द्वारा छीने जाने की बात कही गई है, बाद में रात करीब तीन बजे किसी व्यक्ति द्वारा कोतवाली में जमा कराया गया।

पत्रकार पर ही दर्ज कराया गया गंभीर मुकदमा

अपील के अनुसार, 4 नवंबर की रात करीब तीन बजे एक युवक कोतवाली पहुंचा और उसने एक लिखित तहरीर दी। इसमें आरोप लगाया गया कि रूपेश कुमार नशे की हालत में गाड़ी चला रहे थे, उन्होंने बोलेरो को टक्कर मारी और बाद में बोलेरो सवार लोगों के साथ मारपीट की। तहरीर में यह भी आरोप था कि रूपेश कुमार ने कार से धारदार हथियार निकालकर एक नाबालिग युवक के सिर पर जानलेवा हमला किया।

अपील जारी करने वालों का दावा है कि पुलिस ने बिना निष्पक्ष जांच के भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 109 के तहत मुकदमा दर्ज करने की कार्रवाई शुरू कर दी। उनका आरोप है कि जिस युवक को चोटिल बताकर मेडिकल कराया गया, वह कथित घटना के समय वहां मौजूद ही नहीं था।

कोतवाली के बाहर पत्रकारों और नागरिकों का विरोध

अपील के मुताबिक, 4 नवंबर की सुबह करीब चार बजे पुलिस रूपेश कुमार को लेकर कहीं जाने लगी। इस पर कोतवाली में मौजूद पत्रकारों और स्थानीय लोगों ने सवाल उठाए और उन्हें कहीं ले जाने का विरोध किया। काफी देर तक विरोध के बाद पुलिस को उन्हें वापस कोतवाली में बैठाना पड़ा।

इस दौरान बड़ी संख्या में पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक कार्यकर्ता कोतवाली पहुंचने लगे। पुलिस पर रूपेश कुमार से मुलाकात नहीं करने देने का भी आरोप लगाया गया है। यहां तक कि अधिवक्ताओं को भी उनसे मिलने से रोके जाने की बात कही गई है। पुलिस की कार्यप्रणाली के विरोध में कोतवाली के बाहर धरना भी दिया गया।

इसी घटनाक्रम के बीच 4 नवंबर की सुबह करीब नौ बजे रूपेश कुमार के सोशल मीडिया न्यूज पोर्टल ‘अनसुनी आवाज’ के पेज को भारत में प्रतिबंधित किए जाने का दावा भी अपील में किया गया है। अपीलकर्ताओं ने सवाल उठाया है कि एक पत्रकार के खिलाफ चल रही कार्रवाई के बीच उसके न्यूज पोर्टल को प्रतिबंधित करने की जरूरत क्यों पड़ी।

अदालत में पुलिस की रिमांड अर्जी खारिज, धारा 109 हटाने का दावा

4 नवंबर को दोपहर करीब 12 बजे पुलिस ने रूपेश कुमार को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) जयेन्द्र सिंह की अदालत में पेश किया। अपील के मुताबिक, अदालत में अधिवक्ताओं ने पुलिस की कहानी और उपलब्ध साक्ष्यों पर सवाल उठाए तथा रिमांड खारिज करने और BNS की धारा 109 हटाने की मांग की।

अपील में दावा किया गया है कि सुनवाई के दौरान पुलिस के पक्ष में पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए जा सके। इसके बाद न्यायालय ने पुलिस को फटकार लगाते हुए धारा 109 हटाने और रूपेश कुमार को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया।

मुख्यमंत्री की रैली की रिपोर्टिंग को बताया कार्रवाई की वजह

अपील जारी करने वालों ने इस पूरे घटनाक्रम के पीछे 3 नवंबर को दिन में हुई मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ‘अराजकता हटाओ, लोकतंत्र बचाओ’ रैली की रिपोर्टिंग को तात्कालिक कारण बताया है।

उनका दावा है कि रैली में बड़ी संख्या में कुर्सियां खाली थीं और कार्यक्रम के बीच ही खाली कुर्सियां हटाई जाने लगी थीं। रूपेश कुमार की टीम ने अपने पोर्टल ‘अनसुनी आवाज’ पर इससे संबंधित समाचार और वीडियो फुटेज प्रसारित किए थे। आरोप है कि इस खबर से स्थानीय भाजपा नेताओं में नाराजगी पैदा हुई और शाम तक आईटी नियमों का हवाला देते हुए पोर्टल के पेज को प्रतिबंधित करा दिया गया।

अपील के अनुसार, इसके बाद रूपेश कुमार ने रात करीब नौ बजे सोशल मीडिया पर लाइव आकर सवाल उठाया था कि सच दिखाने से सरकार को डर क्यों लग रहा है। अपीलकर्ताओं का आरोप है कि इसी के बाद उनके खिलाफ पुलिस कार्रवाई की गई। हालांकि, इन आरोपों और कथित घटनाक्रम की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है।

न्यायिक जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग

इस पूरे मामले को लेकर प्रेरणा-अंशु और ‘अनसुनी आवाज’ की ओर से जारी अपील में कहा गया है कि पत्रकारिता का दायित्व सत्ता और प्रशासन से सवाल करना है। यदि किसी पत्रकार की रिपोर्टिंग से किसी को आपत्ति है तो उसका जवाब कानूनी और लोकतांत्रिक तरीके से दिया जाना चाहिए, न कि कथित मारपीट, पुलिस उत्पीड़न या मुकदमों के जरिए।

अपीलकर्ताओं ने मांग की है कि रूपेश कुमार के साथ हुई कथित मारपीट की न्यायिक जांच कराई जाए, घटनास्थल पर मौजूद लोगों और पुलिसकर्मियों की भूमिका की जांच हो, मोबाइल फोन छीने जाने और बाद में थाने में जमा कराए जाने के पूरे घटनाक्रम की पड़ताल की जाए तथा यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।

उन्होंने देशभर के पत्रकारों, सामाजिक संगठनों, अधिवक्ताओं और इंसाफ पसंद नागरिकों से इस मामले में आवाज उठाने और रूपेश कुमार को न्याय दिलाने की मुहिम में शामिल होने की अपील की है।

नोट: यह खबर प्रेरणा-अंशु/अनसुनी आवाज की ओर से जारी अपील में लगाए गए आरोपों और दावों पर आधारित है। पुलिस का पक्ष, प्राथमिकी, मेडिकल रिपोर्ट और न्यायालय के आदेश की स्वतंत्र पुष्टि तथा संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया इस अपील में उपलब्ध नहीं है।

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