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लोकतंत्र में मीडिया वालों ने भी खूब कर ली है तरक्की, पत्रकार से बन गए हैं पक्षकार!

Sanjay Tiwari : लोकतंत्र में पत्रकारों ने भी खूब तरक्की कर ली है। पत्रकार से अब वे पूरी तरह से पक्षकार हो गये हैं। संघी पक्षकार। कम्युनिस्ट पक्षकार। कांग्रेसी पक्षकार। प्रिंट में भी ऐसा रहा है लेकिन तब एक्सपोज होने में वक्त लगता था लेकिन अब तो टीवी का जमाना है। एक्सपोज होने में वक्त नहीं लगता। पेशे के लिहाज से देखें तो यह डिजास्टर है। पत्रकार को हमेशा अनप्रिडेक्टिबल होना चाहिए और यह तभी हो सकता है जब वह खुद विचारधाराओं के मकड़जाल से मुक्त हो। निष्पक्ष हो। लेकिन अभी के दौर में ऐसा नहीं रह गया है। टीवी के बड़े पत्रकारों में अर्णब गोस्वामी को छोड़ दें तो सारे बड़े नाम अब प्रिडेक्टिबल हो गये हैं। अब आप टीवी पर चेहरा देखकर बता सकते हैं कि सामने वाला बंदा किसका पक्ष लेगा। जिस दिन कोई पत्रकार इतना प्रिडेक्टिबल हो जाए कि उसको देखकर आपको अंदाज लग जाए कि यह क्या बोलनेवाला है, उस दिन उसके पत्रकारिता के मौत की मुनादी बज जाती है।

Sanjay Tiwari : लोकतंत्र में पत्रकारों ने भी खूब तरक्की कर ली है। पत्रकार से अब वे पूरी तरह से पक्षकार हो गये हैं। संघी पक्षकार। कम्युनिस्ट पक्षकार। कांग्रेसी पक्षकार। प्रिंट में भी ऐसा रहा है लेकिन तब एक्सपोज होने में वक्त लगता था लेकिन अब तो टीवी का जमाना है। एक्सपोज होने में वक्त नहीं लगता। पेशे के लिहाज से देखें तो यह डिजास्टर है। पत्रकार को हमेशा अनप्रिडेक्टिबल होना चाहिए और यह तभी हो सकता है जब वह खुद विचारधाराओं के मकड़जाल से मुक्त हो। निष्पक्ष हो। लेकिन अभी के दौर में ऐसा नहीं रह गया है। टीवी के बड़े पत्रकारों में अर्णब गोस्वामी को छोड़ दें तो सारे बड़े नाम अब प्रिडेक्टिबल हो गये हैं। अब आप टीवी पर चेहरा देखकर बता सकते हैं कि सामने वाला बंदा किसका पक्ष लेगा। जिस दिन कोई पत्रकार इतना प्रिडेक्टिबल हो जाए कि उसको देखकर आपको अंदाज लग जाए कि यह क्या बोलनेवाला है, उस दिन उसके पत्रकारिता के मौत की मुनादी बज जाती है।

Pankaj Jha : पिछले कुछ दिनों में जो सबसे पॉजिटिव बदलाव हुआ है, वह है मीडिया का विभाजन। आज एक चैनल, दूसरे चैनल का नाम लेकर आलोचना करने लगे हैं। यह बिलकुल नई और अनोखी बात है। हाल तक इस मामले में ऐसी गिरोहबंदी थी कि किसी समाचार कम्पनी द्वारा कोई बड़ा अपराध कर लेने के बावज़ूद उसका प्रतियोगी संस्थान तक उसके खिलाफ कोई खबर प्रकाशित/प्रसारित नही करता था। यह एक अलिखित नियम सा था कि ‘नाई से न नाई लेत, धोबी से न धोबी लेत।’ लेकिन क्या आप विपक्ष विहीन ‘राजनीति’ की कल्पना कर सकते हैं? यानी लोकतन्त्र के सबसे प्रमुख स्तम्भ विधायिका को आप निर्विरोध देख सकते हैं? ऐसे किसी ध्रुवीकरण के बारे में सोच कर ही रूह कांप जाती है। तो बताइये भला, कथित चौथा स्तम्भ क्यूं बिना ‘विपक्ष’ के रहे। हमें जम कर एक दुसरे का विरोध करने वाले, प्रतिस्पर्धी मीडिया समूहों की ज़रूरत है। स्वस्थ लोकतन्त्र के लिए यह बेहद ज़रूरी है।

वेब जर्नलिस्ट संजय तिवारी और पंकज झा के फेसबुक वॉल से.

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