सुशोभित-
राम मन्दिर में चढ़ावा चोरी के मामले पर सोचते हुए अकसर मुझे विचार आता है कि क्या इस आपराधिक कृत्य में लिप्त लोग नास्तिक थे? यानी वैसे नास्तिक, जैसा कि मैं हूँ? किन्तु मैंने तो आज तक एक भी पैसे की चोरी नहीं की, जबकि नास्तिकों के बारे में माना जाता है कि वो धर्म-आधारित नैतिक संहिताओं से मुक्त होने के कारण उच्छृंखल और स्वेच्छाचारी होते हैं! इस घटना के पीछे चाहे जो राजनीति हो, उसकी चाहे जैसी आपराधिक जाँच चल रही हो, उसके नैतिक और दार्शनिक महत्त्व के प्रश्न मेरे लिए अधिक मायने रखते हैं।
यही कि वर्तमान में हिन्दू धर्म का सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय मन्दिर- जिसकी पुनर्स्थापना के लिए प्रचारित रूप से 500 वर्षों से प्रतीक्षा की जा रही थी- में उसकी स्थापना के मात्र दो ही साल बाद करोड़ों की चढ़ावा-चोरी कैसे हो गई? मन्दिर के प्रबंधन से जुड़े सभी व्यक्ति हिन्दू थे। यक़ीनन, वो आस्थावान हिन्दू भी होंगे। भला नास्तिकों को ऐसे पदों पर और ऐसे न्यास में क्यों कर नियुक्ति मिलने लगी? वे राम नाम का जयघोष भी करते होंगे। इस जयघोष के पीछे यह भावना रही होगी कि हम भी अपना चरित्र मर्यादा पुरुषोत्तम के जैसा बनावें। फिर यह काण्ड कैसे हो गया?
क्या राम मन्दिर में चढ़ावे की चोरी करने वालों को कर्म-सिद्धांत में विश्वास नहीं था? क्या उन्हें भय न था कि इस पाप का फल मिलेगा? प्रकट में तो होगा, पर क्या भीतर से नहीं था? और इससे भी बढ़कर क्या उन्हें ईश्वर के ही अस्तित्व में विश्वास नहीं था? अगर सच में उन्हें विश्वास होता कि ईश्वर का अस्तित्व है और कर्म-सिद्धांत अटल है, तो यह चोरी करते समय उनके हाथ काँप जाते। बात एक कमज़ोर कड़ी की नहीं है, सैकड़ों लोग इस मामले से जुड़े थे, विश्व हिन्दू परिषद् के बड़े पदाधिकारी थे। क्या वो सभी ऊपर से आस्थावान किन्तु भीतर से धर्मविमुख थे?



ये प्रश्न केवल राम मन्दिर तक सीमित नहीं, ये मेरे मन में बारम्बार उठते रहे हैं, जब मैं कथित धार्मिक लोगों के कृत्यों को देखता हूँ। तब मैं सोचता हूँ कि आखिर धर्म का प्रयोजन क्या है? यही ना कि मनुष्यों के जीवन में एक नैतिक-भावना आए, वे नेकी पर चलें, पाप से बचें, दुष्कृत्य ना करें- और नर्क के डर से ही सही, ईश्वर के दण्ड के भय से ही सही, किन्तु भलाई के रास्ते पर चलें? किन्तु क्या हमें अपने समाज में ऐसे लोग दिखलाई देते हैं? धार्मिक लोग तो हमारे समाज में भरे पड़े हैं, फिर समाज अनैतिक क्यों है? धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों का हीन-चरित्र और आचरण ही देख लें। वे न तो सत्यनिष्ठ हैं, न नैतिक हैं, न ईमानदार हैं, न सात्विक हैं, ना अनुकरणीय चरित्र वाले हैं। उनके पास तो भाषा का भी संयम नहीं है। फिर धर्म उनके जीवन में क्या परिवर्तन लाया?
क्या धर्म केवल मटकी फोड़ने, पटाखे चलाने, डांडिया-रास रचाने, पकवान खाने, नए कपड़े पहनने और उत्सव मनाने का नाम है? क्या धर्म केवल नगाड़े बजाने, जुलूस निकालने, लड़ाइयाँ करने और भगवान के नाम पर चुनाव लड़ने के लिए है? क्या धर्म का मनुष्य के नैतिक-उन्नयन में कोई योगदान नहीं?
जितने भी लोग ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हैं, उनसे मैं यही कहूँगा कि अपने भीतर झाँककर देखिये कि क्या सच में ही आपके विश्वास का कोई नैतिक-आधार है और क्या वह आपके जीवन में कोई गुणात्मक-परिवर्तन लाता है? अगर नहीं तो बेहतर होगा अज्ञेयवादी या अनीश्वरवादी बन जाएँ और कह दें कि हमें नहीं मालूम ईश्वर है या नहीं। कम से कम उसमें ईमानदारी और सच्चाई तो होगी, झूठ और पाखण्ड तो न होगा। अलबत्ता ईश्वर की परिकल्पना के बिना भी समाज में नैतिकता क़ायम हो सकती है। इमैन्युएल कांट ने तो माना ही था कि नैतिकता का स्रोत ईश्वर नहीं, बल्कि मनुष्य की विवेक-बुद्धि है।
अपने हृदय में अपनी विवेक-बुद्धि की ही मूर्ति बिठाकर अगर उसकी उपासना करेंगे तो कम से कम ऐसे झूठे तो ना बनेंगे कि मुँह में राम और हाथ में तिजोरी का ताला तोड़ने वाली हथौड़ी!



