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भाजपा और संघ को समझना हो तो पहले पेशवाओं का इतिहास पढ़िए!

सत्ता अडानी-अंबानी के प्रभाव में सिमट गई, और आर्थिक व विदेशी नीतियाँ असफल सिद्ध हुईं!

अनेहस शाश्वत-

सन 1761 में हुई पानीपत की तीसरी लड़ाई भारतीय इतिहास की एक निर्णायक घटना थी। यह वह समय था जब अहमद शाह अब्दाली की विशाल सेना से लड़ने के लिए मराठा पेशवा की सेनाएं उत्तर भारत पहुँचीं। परंतु, दुखद यह रहा कि अधिकांश हिन्दू राजाओं ने पेशवा की सहायता करने से साफ़ इंकार कर दिया।

मराठा पेशवा मुग़लों को हटाकर भारत में हिन्दू सत्ता पुनः स्थापित करने के संकल्प से निकले थे और देश के बड़े हिस्से पर उनका नियंत्रण भी था। फिर ऐसा क्या हुआ कि पानीपत की तीसरी लड़ाई तक पहुँचते-पहुँचते हिन्दू राजा ही पेशवा के विरोधी बन बैठे? यही कहानी दिलचस्प भी है और शिक्षाप्रद भी।

पेशवा कौन थे?

शिवाजी महाराज ने 1674 में “हिंदवी स्वराज” की संकल्पना के साथ अपना राज्य स्थापित किया और एक मंत्रिमंडल बनाया, जिसका प्रधान पेशवा कहलाया — फ़ारसी शब्द ‘पेशवा’ का अर्थ है प्रधानमंत्री।

शिवाजी और उनके पुत्र शंभुराजे के समय तक यह व्यवस्था सुचारु रही। लेकिन शंभुराजे की हत्या के बाद औरंगज़ेब ने उनके पुत्र शाहू को कैद कर लिया और लगभग बीस वर्षों तक मराठा राज्य को नष्ट करने का प्रयास किया। इस दौरान मराठों में उत्तराधिकार को लेकर भी संघर्ष चलता रहा, जिससे राज्य लगभग समाप्तप्राय हो गया और पेशवा का पद भी महत्वहीन हो गया।

1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद जब बहादुर शाह प्रथम ने शाहू को मुक्त किया, तो उन्होंने सतारा जाकर बचे-खुचे मराठा राज्य की बागडोर संभाली। शाहू का संघर्ष प्रारंभ में उनकी चाची ताराबाई से हुआ, परंतु अंततः समझौता हुआ और शाहू पुनः छत्रपति बने। उन्होंने पेशवा पद को फिर से सशक्त किया और इसी काल में बाजीराव प्रथम (1720–1740) सबसे प्रभावशाली पेशवा बने।

बाजीराव के वंशजों ने 1820 तक पेशवाई को आगे बढ़ाया। अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय को अंग्रेज़ों ने पराजित कर पूना से हटाकर बिठूर भेज दिया और उन्हें आठ लाख रुपये वार्षिक पेंशन दी। एक अन्य पेशवा नारायणराव को भी अंग्रेज़ों ने सात लाख की पेंशन पर चित्रकूट भेजा, जहाँ उन्होंने एक नया शनिवार वाड़ा बनवाया जो आज भी मौजूद है।

पेशवाओं की नीतियाँ और परिणाम

1720 से 1820 तक पेशवाओं का प्रभाव बढ़ता गया। शाहूजी की मृत्यु के बाद छत्रपति केवल नाममात्र के शासक रह गए और वास्तविक शक्ति पूना में बैठे पेशवा के हाथ में केंद्रित हो गई। 1760 में एक संधि के माध्यम से छत्रपति ने अपनी शेष शक्तियाँ भी पेशवा को सौंप दीं।

अब पेशवाओं के अधीन चार प्रमुख सामंत राज्य थे — गायकवाड़, सिंधिया, होलकर और भोंसले। पेशवा ब्राह्मण थे, जबकि ये चारों सामंत खेतीहर (अर्थात पिछड़ी जातियों) से आए हुए योद्धा थे। इस प्रकार, एक ब्राह्मण सर्वोच्चता वाला गठबंधन पूरे भारत में सत्ता के लिए संघर्षरत था।

यह संघर्ष अब धर्म या “हिंदवी स्वराज” का नहीं, बल्कि सत्ता का संघर्ष बन गया था। पेशवा अपने विरोधियों से भारी कर (चौथ) वसूलते, जुर्माने लगाते, और राजाओं को अपमानित करते। जयपुर के राजा ईश्वरी सिंह ने पेशवा के अत्याचारों से तंग आकर आत्महत्या तक कर ली थी। मराठों के निरंतर हमलों से देश के अनेक क्षेत्र त्रस्त हो उठे। समाजिक अस्थिरता और धार्मिक-जातिगत अत्याचार बढ़ते गए — विशेषकर दलितों पर अत्याचारों में वृद्धि हुई।

पानीपत की तीसरी लड़ाई और पेशवाई का पतन

इसी समय 1761 में अहमद शाह अब्दाली ने भारत पर आक्रमण किया। देश की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति होने के नाते पेशवा को उसका सामना करना पड़ा। लेकिन पेशवा के पूर्व अत्याचारों के कारण न तो हिन्दू राजा, न ही कोई नवाब उनकी सहायता को तैयार हुआ। परिणामस्वरूप मराठों को पानीपत की तीसरी लड़ाई में भीषण पराजय झेलनी पड़ी। पेशवा के पुत्र और अनेक सेनानायक मारे गए, और स्वयं बालाजी बाजीराव सदमे से शीघ्र ही चल बसे।

इसके बाद पेशवा वंश आंतरिक संघर्षों में उलझ गया, जिसका लाभ अंग्रेज़ों ने उठाया और अंततः 1820 में पेशवाई समाप्त कर दी।

पेशवाओं से संघ और भाजपा की तुलना

पेशवा हिंदू राज्य की स्थापना के स्वप्न के प्रतीक माने जाते हैं — यही कारण है कि आज के संघ और भाजपा उन्हें अपने आदर्श के रूप में प्रस्तुत करते हैं। परंतु इतिहास बताता है कि पेशवा काल में हिंदू एकता नहीं, बल्कि सत्ता का केंद्रीकरण और सामाजिक विभाजन बढ़ा।

उस समय अंग्रेज़ों के पास स्पष्ट अर्थनीति, विदेश नीति और नौसेना थी, जबकि पेशवाओं के पास इन क्षेत्रों में कोई ठोस दृष्टि नहीं थी। यही कारण रहा कि अंततः अंग्रेज़ विजयी हुए और भारत के अधिपति बने।

आज, जब संघ के प्रचारक रहे प्रधानमंत्री मोदी जी ने “हिंदू राज्य” की अवधारणा के साथ सत्ता संभाली, तो इतिहास मानो फिर दोहराया गया। सत्ता अडानी-अंबानी के प्रभाव में सिमट गई, और आर्थिक व विदेशी नीतियाँ असफल सिद्ध हुईं।

एक और समानता यह है कि पेशवाओं का काल लगभग सौ वर्ष चला, और अपने सौ वर्ष पूरे करते-करते संघ भी अब शक्ति-क्षय की ओर बढ़ता दिख रहा है।

दोनों ही — न पेशवा, न संघ — “हिंदू राज्य” की स्थायी स्थापना कर पाए।

यह क्यों हुआ, इस पर चिंतन करना रोचक भी है और आवश्यक भी।

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