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साहित्य

पति का हाथ पकड़ कर उसकी प्रेमिका को सौंप आई एक पत्नी (Kavita)

नितिन त्रिपाठी-

प्रस्तुत है जोशना बैनर्जी की हिन्दी कविता और उसका अंग्रेजी अनुवाद। कविता में पत्नी जिस तरह से अपने पति को उसकी प्रेमिका को सौंपते समय व्यंग्यात्मक भाषा का उपयोग करती है, वह यह दर्शाता है कि अब महिलाएँ अपने पीड़ित होने की भूमिका से निकल रही हैं और एक नए प्रकार के विरोध का चयन कर रही हैं। वह रोना, पीटना, मन्नत या धागों का सहारा लेने की बजाय सीधे प्रेमिका को पति सौंप रही है, मानो वह अब इस संघर्ष में उलझने के बजाय उसे समाप्त कर रही हो। यह पितृसत्ता की आलोचना का एक नया रूप है, जहाँ महिलाएँ अब अपने लिए आत्मसम्मान और अधिकार की मांग कर रही हैं और पितृसत्ता की जकड़न से बाहर निकलने के रास्ते ढूँढ़ रही हैं।

यह कविता पितृसत्ता की उस संरचना को उघाड़ती है, जहाँ पुरुषों के व्यवहार को सामाजिक मान्यता और महिलाओं के शोषण को स्वीकृति मिली हुई है। व्यंग्य और कटाक्ष के माध्यम से, यह कविता महिलाओं की पारंपरिक भूमिकाओं पर सवाल उठाती है और पितृसत्ता के उस ढांचे की आलोचना करती है, जहाँ पुरुषों की हिंसा और अधिकारप्रियता को सहन किया जाता है, और महिलाओं को अपनी इच्छाओं और अधिकारों से वंचित रखा जाता है।

— Joshnaa Banerjee —

पति का हाथ पकड़ कर उसकी प्रेमिका को सौंप आई एक पत्नी
बोली पकड़ो, संभालो, यह अब तुम्हारा हुआ
इसे गैस, बीपी, कोलेस्ट्रॉल, डॉयबिटीज़ और बावासीर है
फलां फलां दवाईयाँ है, समय से देना
खाने में नमक ज़्यादा हो तो थाली फ़ेक देता है, तुम ख़्याल रखना
हर रात पीठ दिखाकर सोता है,
पूरी रात खर्राटे भरता है और गैस छोड़ता है,
सुबह उठते ही फोन पे लगता है और रात मे सोने से पहले तक फोन नहीं छोड़ता
तुमसे ही तो प्रेम प्रेम खेलता है
थककर फोन ही इसे छोड़कर बिस्तर पर गिर जाता है
तुम एडजस्ट कर लेना
कर ही लोगी
तुम्हारी वॉट्सऐप चैट पढ़ी मैंने
तुमने लिखा था आई लव यू
तो लव शव में तो क्या खर्राटे, क्या गैस

नाक के बाल जिस ट्रिमर से काटता है, उसे समय पर चार्ज करती रहना
तलवों की मालिश रोज़ करना, वरना नींद नहीं आयेगी इसे

गाली देने में पीएचडी की है इसने
तुम्हें शायद न बके दोएक महीने
पर जब बके तो गर्दन नीचे करके सुन लेना वरना तो तुम्हें मार भी सकता है

ले जाओ इसे
इसे तुम जीत चुकी हो
परंतु सेक्स करने से पहले प्रोटेक्शन रख लेना, तीन बार अलग अलग औरतों के साथ अलग अलग होटलों में पाया गया है
बहादुर हो तुम, ठीक आदमी चुना तुमने

तुम्हें जो हार तोहफे में दिया है, उसे मेरे पिता ने कर्ज़ लेकर बनवाया था, तुम पहनना, बेच न देना, पिता स्वर्ग से तुम्हें भी आशीष देंगे

पत्नियाँ अब क्लेश नहीं कर रहीं
रोना, पीटना, मन्नत, धागे कुछ नहीं कर रहीं
एक्सट्रा मैरिटल अफेयर के पता चलते ही प्रेमिकाओं को सौंप कर आ रही हैं

कोई कह रहा था “वैसी” औरतों को प्रेमिका नहीं कहते, उनके लिए कुछ और शब्द है।
क्या शब्द है वो? उसका पहले पुल्लिंग वर्ज़न तो बनाओ

बनाओ पहले पुल्लिंग वर्ज़न और बताओ “वैसे” यानि उस तरह के पुरूष को क्या कहते हैं?


A wife once held her husband’s hand,
And to his lover gave him free,
She said, “Now take him, he’s your man,
No longer shall he belong to me.

He’s plagued with ills, both great and small,
With gas and aches and ailments sore,
These pills and potions heed the call,
And give them to him evermore.

If in his meal too much salt lies,
He’ll toss the plate and storm away,
And every night he turns and sighs,
And snores and farts till break of day.

His waking hours, the phone’s his friend,
From morning light till evening’s fall,
With you his love games never end,
But wearied, by his phone he’ll stall.

You’ll have to bend, you’ll have to bear,
For love, you said, could conquer all,
I read your words of tender care,
So snore and gas shall not appall.

Remember well to charge the blade,
He trims his nose hair every week,
And every night, your hands must aid,
His feet you’ll rub, or sleep he’ll seek.

His tongue’s a dagger, sharp and cruel,
In curses, he’s well-versed and trained,
Two months, you’ll think him kind and cool,
But when he snaps, keep calm, restrained.

For if you dare to answer back,
His anger fierce, may harm you too,
Take him now, your bags you pack,
You’ve won him, brave and true.

But mind you well, and heed this word,
When love you share, take caution fair,
For he’s been found, as I have heard,
With three fair maids in inns elsewhere.

The necklace that I gave to thee,
Was bought with loans my father took,
Wear it, but sell it not to be,
His blessing from above you’ll brook.

Wives now no longer raise a storm,
Nor cry, nor plead, nor beg for grace,
When love’s betrayed and hearts are torn,
They hand their husbands to your embrace.

But tell me, what’s the name they give,
To women who in shadows dwell?
And what of men, what names we live,
To those whose deeds we cannot tell?

— Translated by Nitin Tripathi


कृष्ण कल्पित-

दिल्ली की फेमिनिस्टों ने आगरा की कवयित्री की उस कविता को ख़ारिज़ कर दिया है, जिसने हंगामा बरपा रखा है । उनका कहना है कि ये पितृसत्तात्मक सोच की स्त्रीविरोधी कविता है । यह कविता नहीं, कथित कविता है ।

यह प्रसंग प्रसिद्ध है कि कबीर अपनी पत्नी को मूसलाधार बारिश की अंधेरी रात में उसके प्रेमी तक छोड़कर आते हैं । इतने समय बाद अब एक अधेड़ पत्नी अपने जर्जर, कामुक और विलासी पति को उसकी प्रेमिका के पास छोड़कर आती है ।

कितनी शताब्दियों बाद एक हिन्दी कवयित्री ने काशी के जुलाहे का कर्ज़ चुकाया है !

यह कथित कविता प्रकाशित होते ही वायरल हो गई । जैसे फेसबुक की सताई हुई स्त्रियों को अपनी मुक्ति का नया मार्ग मिल गया हो । स्त्रियां ही नहीं लंपट पुरुष भी इस कविता पर टूट पड़े । शेयर करने लगे, पाठ करने लगे ।

यह विषय नया नहीं है । कई फ़िल्में इस पर बन चुकी हैं । बांग्ला में पुनश्च और बॉलीवुड में गृहप्रवेश और बीवी नंबर वन इत्यादि । हमारे मित्र और लेखक अनुवादक नीलाभ की मृत्यु पर भी गुस्से में इसी तरह की एक कथित फूहड़ कविता लिखी गई थी ।

क्या यह कविता है ? कविता गुस्से में नहीं लिखी जा सकती, नफ़रत से भी नहीं लिखी जा सकती । कविता विद्रूप की रचना कर सकती, पर स्वयं विद्रूप नहीं हो सकती । फूहड़ता का विरोध सलीके से किया जाता है । ख़ुद फूहड़ बन कर नहीं । कविता और गाली में फ़र्क होता है । कविता क्रोध से नहीं, करुणा से बनती है । करुणा साहितसार !

जोशना बनर्जी अच्छी कवयित्री हैं । उनकी तत्समयुक्त छायावादी भाषा का मैं कायल हूं । यह शायद बांग्ला भाषा की देन है । उनका पहला कविता संग्रह सुधानपूर्ण पढ़ कर मैं हैरान रह गया था । स्वतंत्र स्त्री की अनेक छवियां यहां झिलमिलाती हैं । उनका दूसरा संग्रह अंबुधि में पसरा है आकाश की कविताएं भी मेरी बात की ताईद ही करती हैं ।

इस कथित कविता की भाषा जोशना बनर्जी की नहीं लगती । जैसे किसी पनघट पर पनिहारनें एक दूसरे को गालियों से नवाज़ रही हों । कविता में गालियों का उपयोग वर्जित नहीं है लेकिन इसे बहुत संतुलन से साधना पड़ता है ।

बेअसर है फ़िराक़ की गाली
उसकी गाली फ़कीर की गाली !

एक कवयित्री नताशा का कहना है कि इतने बिगड़े हुए विषयभ्रष्ट पति को प्रेमिका को नहीं, पुलिस को सौंपना चाहिए । यह भी ज्यादती है । उस बीमार पति को पुलिस थाने नहीं, किसी अच्छे अस्पताल ले जाने की ज़रूरत है ।

और ऐसी सहनशील और क्रूर पत्नी को किसी मनोचिकित्सक के पास ले जाने की ज़रूरत है !

[ इस कथित वायरल कविता का केवल एक ही लाभ दिखाई दे रहा है कि अब पाठक जोशना बनर्जी की उन कविताओं तक शायद पहुंच सकें, जो हिन्दी कविता के परिसर में एक नया सुगंधित झौंका है । जोशना निसंदेह हिन्दी कविता की नई विश्वसनीय आवाज़ है । ]

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