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आयोजन

राजेंद्र माथुर, एसपी सिंह और उदयन शर्मा भी बड़े पत्रकार थे; फिर प्रभाष जोशी में क्या खासियत थी जो उनके जन्मदिन पर वर्षों से इतना बड़ा आयोजन हो रहा है!

अमरेंद्र राय-

सिद्ध को साधक पुजवाता है…

रविवार को राजघाट जाना हुआ। अवसर था जनसत्ता के यशस्वी संपादक प्रभाष जोशी के जन्म दिन पर आयोजित एक कार्यक्रम में शिरकत करने का। कार्यक्रम राजघाट के सामने सत्याग्रह मंडप में था। यह कार्यक्रम प्रभाष परंपरा न्यास की ओर से आयोजित किया जाता है।

प्रभाष जी का जन्म 15 जुलाई 1937 को हुआ था और मृत्यु 5 नवंबर 2009 को

जन्म संबंधी कार्यक्रम 15 जुलाई के पास पड़ने वाले किसी इतवार को आयोजित किया जाता है ताकि अवकाश होने के कारण प्रभाष जी से जुड़े ज्यादा से ज्यादा लोग कार्यक्रम में शिरकत कर सकें। ऐसा होता भी है। लेकिन इस बार के कार्यक्रम में पिछले कार्यक्रमों की तुलना में लोगों की उपस्थिति भी कम थी और बहुत सारे चर्चित चेहरे भी इस बार नहीं दिखे।

प्रभाष जी के जन्म दिन पर आयोजित होने वाला यह लगातार 17वां कार्यक्रम था। शायद ही ऐसा कोई पत्रकार हो जिसके जन्म दिन पर इतना बड़ा आयोजन इतने वर्षों से हो रहा हो। इस कार्यक्रम को देखकर मेरे मन में ये विचार बार-बार उठता है कि ऐसा प्रभाष जी के साथ क्यों संभव हो पा रहा? क्या बड़े पत्रकार, संपादक थे इसलिए? बड़े पत्रकार संपादक तो राजेंद्र माथुर भी थे। उनके जन्म दिन पर तो ऐसा कार्यक्रम नहीं होता? जबकि दोनों एक समय में ही दिल्ली के आईटीओ के पास बहादुर शाह जफर मार्ग की दो इमारतों में आसपास ही बैठते थे।

जनसत्ता का प्रधान संपादक होने के नाते प्रभाष जी इंडियन एक्सप्रेस बिल्डिंग में बैठते थे तो नवभारत टाइम्स का प्रधान संपादक होने के नाते राजेंद्र माथुर टाइम्स ऑफ इंडिया बिल्डिंग में बैठते थे। कई बार यह चर्चा भी होती थी कि दोनों में बड़ा संपादक कौन है। दोनों के प्रशंसक अपने-अपने संपादकों को बड़ा बताते थे और उनके पक्ष में तर्क देते थे। बावजूद इसके राजेंद्र माथुर कहीं से उन्नीस नहीं बैठते थे। दोनों ही इंदौर के रहने वाले भी थे। राजेंद्र माथुर ही नहीं सुरेंद्र प्रताप सिंह और उदयन शर्मा जैसे चर्चित पत्रकारों के भी जन्म दिन पर इस तरह के आयोजन नहीं होते। फिर प्रभाष जोशी में ऐसी क्या अलग और खास बात है कि इनके जन्म दिन पर इतने वर्षों से इतना बड़ा आयोजन हो रहा है?

ये खास बात है राम बहादुर राय का होना। प्रभाष जोशी के पास राम बहादुर राय हैं। बाकियों के पास कोई राम बहादुर राय नहीं। यह राम बहादुर राय ही हैं जो प्रभाष जोशी को यश के सातवें आसमान पर आज भी बैठाए हुए हैं। वरना जैसे बाकी संपादकों के कुछ साल कार्यक्रम आयोजित हुए वैसे ही प्रभाष जोशी के साथ भी होता। राम बहादुर राय ने प्रभाष जोशी के नाम पर प्रभाष परंपरा न्यास बनाया है। यह न्यास ही प्रति वर्ष प्रभाष जी के जन्म दिन पर कार्यक्रम आयोजित करता है। इस न्यास के पहले अध्यक्ष हिंदी जगत के नामवर, नामवर सिंह थे और वर्तमान, जनसत्ता के पूर्व संपादक बनवारी। बाकी संपादकों में उदयन शर्मा का जन्म दिन कुछ वर्षों तक धूमधाम से मनाया जाता रहा। क्योंकि उदयन जी के पास भी संतोष नाम के व्यक्ति के रूप में एक राम बहादुर राय था।

संतोष वैसे तो उदयन जी का कुछ नहीं लगता था। उदयन जी आगरा के रहने वाले थे और संतोष केरल के। लेकिन कुछ समय साथ काम करने के दौरान दोनों में इतनी आत्मीयता पनपी की संतोष उदयन जी को पापा कहते थे और उनकी पत्नी को अभी भी मम्मी कहते हैं। उदयन जी के दोनों पुत्रों को वे अपना छोटा भाई कहते हैं। संतोष ने पूरी लगन से उदयन जी के जन्म दिन पर कई वर्षों तक कार्यक्रम आयोजित किये। लेकिन वे भी कुछ व्यस्तताओं और जीवन के संषर्षों के चलते अब कार्यक्रम को आयोजित नहीं कर पा रहे हैं।

कई बार तो लगता है कि हम भारतीय अपने पुर्वजों को सम्मान नहीं दे पाते। जबकि हिंदू समाज में तो प्रति वर्ष पितृ विसर्जन का पखवारा होता है। हम उसी समय बस उन्हें याद करते हैं। जिस जगह राजघाट पर प्रभाष जी का कार्यक्रम आयोजित हुआ वह जगह भी महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू और दूसरे राजनेताओं के समाधि स्थल के लिए ही जाना जाता है। यहां बहुत सारे राजनेता मृत्यु के बाद चिर निद्रा में सो रहे हैं। इस राजघाट की चर्चा भी हम तभी सुनते हैं जब इनके जन्म दिन या किसी दूसरे अवसर पर कोई गणमान्य पुष्पांजलि अर्पित करता है।

इनमें भी जिन लोगों के नाम सरकारी कार्यक्रमों के लिए शामिल कर लिये गये हैं, उन्हें ही उनके जन्म दिन पर या विशेष अवसरों पर सम्मान मिलता है। बाकियों को तो हम भुला ही चुके हैं। हम कहां किसी को याद करते हैं? इतने राष्ट्रपति हुए, इतने प्रधानमंत्री हुए, इतने मुख्यमंत्री हुए, हम कहां सबको याद करते हैं?

कोई दसेक साल पहले हमने एक खबर पढ़ी। लखनऊ में जय प्रकाश नारायण का जन्म दिन मनाया गया। उस कार्यक्रम में गिनती के कुछ लोग थे। उसमें भी ज्यादातर लोग उनकी जाति वाले थे। तब मुझे पहली बार पता चला कि जय प्रकाश जी किस जाति से थे। जिस रिपोर्टर ने खबर छापी वह भी जय प्रकाश जी की ही जाति का था। राम बहादुर राय जय प्रकाश नारायण के आंदोलन में भी काफी सक्रिय रहे हैं। उस दौरान मीसा के तहत जेल में भी रहे। मीसा के तहत जो कुछ शुरुआती गिरफ्तारियां हुईं उनमें राम बहादुर राय भी शामिल थे। राम बहादुर राय जय प्रकाश जी का आज भी बहुत सम्मान करते हैं। लेकिन उनके जन्म दिन पर भी इतना शानदार कार्यक्रम नहीं आयोजित होता जितना प्रभाष जोशी के जन्म दिन पर। फर्क वही राम बहादुर राय का।

करीब सप्ताह भर पहले एक पारिवारिक कार्यक्रम में राय साहब (राम बहादुर राय) से मुलाकात हुई। उनके साथ जनसत्ता के पूर्व मुख्य संवाददाता मनोज मिश्र भी थे। उसी कार्यक्रम में मनोज जी ने 12 तारीख के प्रभाष जी के इस कार्यक्रम के बारे में मुझे जानकारी दी और आने का आग्रह किया। तब भी मैंने राय साहब से यही बात कही थी। मैंने उन्हें बताया था कि हमारे एक मित्र थे। वे कहा करते थे कि सिद्ध को साधक पुजवाता है। उनका कहना था कि अगर कोई बताये ही न कि अमुक व्यक्ति बहुत बड़ा सिद्ध है तो उसे कोई कैसे जानेगा । इस तरह साधक की भूमिका सिद्ध की पहचान कराने में बड़ी हो जाती है। राम बहादुर राय प्रभाष जोशी के साधक हैं। जो उनकी मृत्यु के बाद भी पिछले सत्रह वर्षों से लगातार लोगों को बताते चल रहे हैं कि प्रभाष जोशी कितने बड़े सिद्ध पत्रकार, संपादक थे।

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