मनीष दुबे-
वेनेजुएला में गजब हाल है, लेकिन भारत जैसा भी नहीं है. यहां के न्यूज एंकर्स और तमाम पत्रकार एआई तकनीक को ढाल बनाकर सरकार पर हमलावर हैं. वहीं भारत में एआई-पेआई का इस्तेमाल तो दूर की कौड़ी है, पत्रकार लोग पहले ही थाली लोटा जमा किए बैठे हैं.
पहले वेनेजुएला का रायता समझिए, इस देश में निकोलस मादुरो लगातार तीसरी बार सत्ता में आए हैं. सत्ता में आए तो चुनाव नतीजों की धांधली के आरोप साथ लाए. नतीजतन पत्रकारों ने दबाकर खबरें छापी. राष्ट्रपति का सिस्टम हिला. सिस्टम हिला तो उन्होंने ताबड़तोड़ कई पत्रकारों को जेल की हवा खाने भिजवा दिया.
एनालिटिक्स इनसाइट की एक रिपोर्ट के अनुसार, वेनेजुएला में डायरेक्ट राष्ट्रपति के आदेश से आतंकवाद और अन्य गंभीर आरोपों में मुकदमे ठोके जा रहे हैं. ऐसे में पत्रकारों ने तिकड़म निकाली की वे एआई के जरिए सरकार विरोधी खबरें जनता तक पहुंचाएंगे.
खबरें पढ़ने से लेकर ऑपरेशन रिट्वीट का हिस्सा हैं एआई एंकर
खबर में, दो एआई एंकर एल पाना (मेल) और ला तामा (फी मेल) का उदाहरण देकर बताया गया है कि, ये दोनों खबरें सुनाते हैं. दोनों को कोलंबिया स्थित संगठन कनेक्टास ने ऑपरेशन रिट्वीट के तहत बनाया है. इनका नेतृत्व निदेशक कार्लोस ह्यूटर्स कर रहे हैं. दोनों एआई एंकरों को लाने का साफ कारण बताया गया है कि इनका उद्देश्य देश के दर्जनभर स्वतंत्र मीडिया आउटलेट्स से न्यूज पब्लिश करना है और पत्रकारों की सुरक्षा करना है.
इस मामले में कार्लोस कहते हैं पत्रकारों काी काम वैसे भी जोखिम भरा रहता है. हमारे सहकर्मियों को सरकार जेल में डाल रही है, ऐसे में उन्हें बचाने के लिए एआई एंकर्स का इस्तेमाल किया जा रहा है, सरकार इन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकती.
इस बारे में विदेशी समाचार एजेंसी रॉयटर्स लिखता है कि, हमने इस मुद्दे पर वेनेजुएला के संचार मंत्रालय से जवाब मांगा तो उनकी तरफ से कोई उत्तर नहीं आया.
जून में भेजा गया 10 पत्रकारों को जेल
वेनेजुएला की स्थानीय मीडिया में छप रही खबरों की माने तो जून महीने में 10 पत्रकारों को सरकार ने जेल में डाला. उन पर आतंकवाद और दूसरे गंभीर आरोप में केस दर्ज किए गए. विपक्ष के नेताओं पर भी ऐसे ही कार्रवाई किए जाने की बातें सामने आई हैं.
भारत में क्या?
हमारे देश के पत्रकारों के विषय में आप सबको ज्यादा बताने की जरूरत नहीं है. खाँ-म-खाँ पन्ना पोतना ही होगा. यहां जिसकी रीढ़ ज्यादा लचकती है वही लंबी रेस का घोड़ा साबित हो रहा है. भाजपा के अलावा किसी दूसरी पार्टी के किसी नेता के राज्य में कोई किसी के उंगली भर कर दे तो हमारे देश का मीडिया सरकारी मुलाजिमों की तरह कंधे पर हल उठा लेता है. बावजूद इसके सत्ता धारी किसी राज्य में कितनी भी बड़ा लेंटर टपकने लगे ये लोग कंबल ओढ़कर घी पीना शुरू कर देते होंगे शायद.
भारतीय पत्रकारिता का हाल बताती कुछ खबरें…
मीडिया में आरएसएस को लेकर चली यह ख़बर कौन डिलीट करा रहा है?
अडानी के थर्मल प्लांट में अवैध निर्माण पर एनजीटी की नोटिस वाली ख़बर ‘द न्यू इण्डियन एक्सप्रेस’ की वेबसाइट से ग़ायब!



