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धार्मिक आयोजनों में आस्था की ऐसी-तैसी कर रहे पत्रकारों को FSSAI जैसे लाइसेंस की जरूरत है!

संजय सिन्हा

संजय सिन्हा-

मारे गांव के बहुत से लोग तालाब पर नहाने जाते थे। तालाब किनारे काली मां का मंदिर था। स्त्री-पुरुष दोनों वहां देवी के दर्शन करने जाते थे। कुछ लोग वहीं तालाब पर स्नान करते थे। महिलाओं के लिए अलग घाट होता था, पुरुषों के लिए अलग। दोनों में बहुत दूरी नहीं थी, पर पर्दा था। कपड़े का पर्दा नहीं, आंखों का पर्दा।

मैं छोटा बच्चा था। मां छठ करती थी। हजारों स्त्री-पुरुष छठ के घाट पर (पटना में गंगा किनारे) शाम की पूजा के लिए और सुबह की पूजा के लिए जाते थे। स्त्री-पुरुष दोनों एक वस्त्र में गंगा में घुटने तक पानी में खड़े होकर सूरज भगवान को अर्ग (अर्ध्य) देते, पूजा करते थे। हल्की सर्दी शुरू हो चुकी होती थी, लेकिन वो पूजा एक वस्त्र में भीगे बदन के साथ पूरी होती थी। कुछ लोग पूजा करते थे, बहुत से लोग श्रद्धा भाव से वहां जाते थे।

कैमरे का अविष्कार हो चुका था। हमारे घर में भी कैमरा था। लेकिन हम कैमरा लेकर वहां घाट पर नहीं जाते थे। हमें सिखाया गया था कि वो धर्म की जगह है, वहां लोग उपासना करने जाते हैं, स्नान करने जाते हैं, वहां तस्वीर नहीं उतारी जाती।

मुझे नहीं पता कि कानून क्या था, मां की नज़र में वो ‘नैतिकता’ थी। बस।

मैं गलत भी हो सकता हूं लेकिन मैंने आजतक में नौकरी के दौरान पहली बार (सबसे पहले) ये देखा था कि छठ पूजा को ‘इवेंट’ बनाने की शुरुआत हुई थी। एंकर को छठ का व्रत करने और उसके लाइव का प्रदर्शन शुरू किया गया। एक एंकर, जिसे आप कोट-पैंट में एंकरिंग करते देखते रहे हों, उसे साड़ी में (हालांकि वो एक वस्त्र में नहीं दिखती थी, जैसे मेरी मां दिखती थी) पूजा को ग्लैमराइज करके प्रस्तुत करने की परंपरा शुरू हुई।

क्यों? क्या टीवी वाले बहुत धार्मिक हो गए थे?

नहीं। आप समझते हैं कि हमें क्या दिखलाना था, क्या बेचना था, कैसे टीआरपी लानी थी।

पूजा का स्थान पूजा का होता है। हज़ारों साल से पूजा हो रही है, किसे दिखलाना था, किसे बतलाना था? एक समय था जब छठ के गीत भी ऐसे-वैसे कहीं भी नहीं गाते थे। वो त्योहार संजीदगी का त्योहार था। सुपर आस्था का त्योहार था। उसमें नियमों का कठोर पालन होता था। किसी की नज़र कैसी भी हो सकती है, लेकिन माना जाता था कि स्नान करती स्त्री (और पुरुष भी) को सार्वजनिक रूप से नहीं देखा जाता है ( दिखलाया जाता है)। वो उनकी निजता का उल्लंघन था, है।

अब अधिक नहीं लिखूंगा। उचित नहीं है।

लेकिन कुछ लोगों ने मुझसे गुजारिश की है कि संजय सिन्हा जी, आप कुंभ पर लिखें।

संजय सिन्हा ने कई बार मीडिया मैन के रूप में कुंभ कवर किया है। इलाहाबाद, उज्जैन गए हैं। कभी रिपोर्टिंग नहीं की। की तो बस यही कि इतने लोग आए हैं, ये इंतज़ाम है, वो बदहाली है। मंशा इतनी ही थी कि लोग वहां की गतिविधियों से रुबरु रहें। अब नागा साधु कुंभ में आए हैं, उन्हें क्या दिखलाना? अगर वो दिखलाने के लिए होते तो समाज में रहते। उन्होंने समाज का परित्याग किया है। वो निर्वस्त्र हैं तो समाज से दूर भी हैं। उन्हें क्यों टीवी पर दिखलाना? क्यों खुद को हैरान करना?

जो सब छोड़ कर संत बना है, उसे संत रहने दीजिए। बहुत से संत तरसते हैं टीवी पर दिखने के लिए? सोचिए, जिसमें थोड़ी भी तरस (चाहत) बाकी है, वो संत कैसे? और अब कई लोग मुझसे कहते हैं कि प्रयागराज चलिए संजय सिन्हा जी, वहां कमाल की चीजें दिखेंगी।

मेरा प्रश्न है, क्या दिखेगा? मैं अगर प्रयागराज जाऊंगा तो मेरी आंखें बंद होंगी, चित्त शांत होगा, और वहां कुछ दिखेगा ही नहीं। दिखेंगे तो बस प्रभु। इतनी आस्था होगी तो मैं प्रयागराज जाऊंगा नहीं तो अपनी दिल्ली भली, अपना जबलपुर भला।

वहां बहुत से लोग सुंदरियों की पड़ताल, आईआईटी बाबा की खोज, महान लिंगधारी बाबा के दर्शन से लाभ कमाने नहीं गए हैं, वो गए हैं अपनी पोस्ट चमकाने। कहीं जाने का एक मकसद होता है, उसी मकसद से वहां जाना चाहिए। वहां सरकार की ओर से ‘मान्यता प्राप्त’ पत्रकार गए हैं, उन्हें रिपोर्टिंग करने दीजिए। आप पत्रकार नहीं हैं। आपके हाथ में कैमरा है, मुंह में जुबान है इसका अर्थ ये नहीं कि आप वहां से रिपोर्टिंग करने लगें। हर आदमी का एक काम होता है। उसे वो करने दीजिए। आप भक्त हैं तो भक्ति भाव से जाएं। पत्रकार हैं तो पत्रकारीय भाव से जाएं। साधु हैं तो साधु भाव से जाएं। और जो मन में कोई और भाव है, तो प्लीज़ वहां न जाएं। आप वहां से लाइव ठोक रहे हैं, इंटरव्यू कर रहे हैं, ये आपका काम नहीं। आप संतों के संसार में दखल देकर वहां गंदगी फैला रहे हैं।

आदमी रोड पर समोसा भी बेचता है तो उसे सरकार से लाइसेंस (FSSAI) की दरकार होती है और आप वहां फोन लेकर (कैमरा) खुद को चमका रहे हैं? अंड-बंड लोगों को हीरो, हीरोइन बना रहे हैं? कमाल है। ये धर्म स्थल का अपमान है। वहां लोग जिस मंशा से आते हैं, उन्हें उसी मंशा से जीने दीजिए। मत बनिए (बनाइए) हीरो, मत बनिए (बनाइए) हीरोइन।

कुछ स्थान सार्वजनिक होते हुए भी निजी होते हैं। कुछ विषय भी सार्वजनिक होते हुए निजी होते हैं।

धर्म वही विषय है। सार्वजनिक होते हुए भी निजी आस्था का विषय। निजी मान्यता का विषय। वहां तलाशिए जीवन का अर्थ, व्यर्थ की तलाश मत कीजिए। बेवजह आप वहां भीड़ मत बनिए। जो जिस भाव से गया है, उसे वो प्राप्त करने दीजिए।

आपके पास विषय कम हो गए हैं क्या? आप तो इसमें दिलचस्पी लीजिए कि सैफ अली पर हमला करने वाला उनके घर में घुसा कैसे? और जो उनके घर में घुस गया तो आप कितने सुरक्षित हैं? आप इसमें दिलचस्पी लीजिए कि अगर वो सच में छह महीना पहले बांग्लादेश पार करके बंबई (मुंबई) पहुंचा है तो फिर आपकी सुरक्षा व्यवस्था कहां सो रही थी, जिन्हें आपकी गाढ़ी कमाई के टैक्स से सैलरी दी जाती है?

जिन दिनों कसाब मुंबई में पाकिस्तान से समंदर के रास्ते घुसा था, सारी दुनिया चिल्ला रही थी पाकिस्तान से दुश्मन आया, उस दिन भी मेरा प्रश्न यही था कि वो आया कैसे? हमारे पहरेदार सो रहे थे? हमने कसाब को फांसी दे दी। क्या एक भी अपने पहरेदार को फांसी दी कि तुम जो इतने पैसे लेते हो, क्यों उन्हें आने दिया तुमने?

प्रश्न कीजिए। माला बेचने वाली लड़की क्यों माला बेच रही है ये नहीं? आईआईटी छात्र बाबा बन गया ये भी नहीं। प्रश्न कीजिए कि आप वहां क्या करने गए हैं? ईश्वर की तलाश में, पुण्य की तलाश में, या फिर…

समझ गए न? गंगा मैया की जय।

नोट- FSSAI का फुल फार्म है ‘फ़ूड सेफ़्टी ऐंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया’ और इस लाइसेंस के बिना खाने का कुछ सामान नहीं बेच सकते है, सड़क पर भी नहीं।

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