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उत्तर प्रदेश

अंसल प्रबंधन के खिलाफ FIR है या एलडीए अफसरों के नकारेपन का हलफनामा?

रणविजय सिंह-

अंसल प्रबंधन के खिलाफ मंगलवार को दर्ज करायी गई एफआईआर एक विभाग के तौर पर एलडीए की काहीलियत, कामचोरी और नाकारेपन का शपथपत्र है। जाहिर से इसमें भ्रष्टाचार की सड़ांध तो आ ही रही है। एफआईआर पढ़ने के बाद समझ नहीं आ रहा कि एलडीए के अफसरों को अब जो ज्ञान हुआ वो पिछले 20 साल से क्यों नहीं मिल सका?

पहला बिंदु : इस एफआईआर के मुताबिक ‘योजना की 411 एकड़ जमीन एलडीए के पास बंधक थी लेकिन यह जमीन बिल्डर ने बेच दिया।’ अब इसे सच माना जाए तो सवाल उठता है कि एलडीए के जिन अफसरों को शासन ने 6465 एकड़ की टाउनशिप की निगरानी का काम सौंपा था वो अपने पास बंधक रखी हुई 411 एकड़ जमीन तक न बचा पाए। बचाना तो दूर बिल्डर ने उसे बेच दिया और अफसरों को इसकी जानकारी तक नहीं हुई। बिल्डर दिवालिया न होता और खुद सीएम इस मामले की जांच और कार्रवाई के आदेश न देते तो अफसरों की नींद अब तक जारी रहती।

दूसरा बिंदु : एफआईआर के मुताबिक ‘अंसल ने ग्राम समाज, सीलिंग, तालाब, राज्य सरकार के नाम दर्ज, चक मार्ग, नवीन परती, बंजर, नहर और नाली की जमीनों का अधिग्रहण कर लिया।’ ऐसे में सवाल उठता है कि इन जमीनों को बचाने की जिम्मेदारी जिन अफसरों पर थी वो पिछले 20 साल से कर क्या रहे थे? अब तक इसे लेकर एफआईआर क्यों नहीं करायी गई?

तीसरा बिंदु : अंसल द्वारा पुनग्रहित जमीन का बिना पैसा जमा कराए, बिना लीज डीड कराए सीलिंग की जमीनों पर भी अवैध कब्जा कर प्लॉट काटकर बेच दिया गया। एफआईआर की यह लाइन भी अफसरों के नकारेपन की गवाही दे रही है।

चौथा बिंदु : यूपी रेरा में 2268 आवंटियों ने शिकायत दर्ज करायी। इसपर 235 करोड़ रुपये की आरसी तो काटी गई लेकिन यह पूरी रकम कभी भी वसूली नहीं जा सकी। एफआईआर की इस लाइन को पढ़कर समझ नहीं आ रहा कि आरसी कटने पर झोपड़ी तक पर बुलडोजर चला देने वाले अफसर इतनी बड़ी रकम की वसूली क्यों नहीं कर सके।

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