रसिक द्विवेदी-
फोटो देखिए…अंदाजा लगाइए। पदनाम जानिए और हैसियत समझिए। औलादों को देखिए और निश्चिंतिता आंकइए। नोएडा के आलीशान फ्लैट में सुख-सुविधाओं की शायद ही कोई कमी रही होगी।…लेकिन, जीएसटी के डिप्टी कमिश्नर ने चौदहवीं मंजिल से छलांग लगाकर दर्दनाक मौत चुन ली। क्यों, कैसे, कब, कहां और कौन…का कोई मतलब नहीं बचा। कहानी खत्म।
बात वही कि क्या पैसे से सुख-चैन मिल जाता है? नहीं…कतई नहीं। अगर पैसा सब मर्जों की दवा होती तो कमिश्नर साहब मरते क्यों? संसार नश्वर है…बड़े-बड़े संत-महंत यही बताते क्यों घूमते हैं? सोचिए जरा। इसीलिए कि लालच बढ़ते-बढ़ते बहशी न बना दे। शायद इसलिए भी कि लोग तनिक परमार्थी भी बने। खुद के लिए कमाना, निगलना और उसे बाहर करना…पशुवृत्ति में आता है। संत, स्वाध्यायी, परमार्थी, सच्चे समाजसेवकों को क्या आए दिन आत्महत्या करते देखा है किसी ने…। नहीं।
हां, कमिश्नर साहब के बारे बताया जा रहा है कि वह कैंसर से पीड़ित थे…उनके पास बेहतर इलाज के तमाम अवसर और तरीके थे। देश-विदेश में कहीं भी कभी भी दवा-इलाज करा सकते थे। लेकिन उन्होंने इलाज पानी की जगह मौत को गले लगा लिया। हो सकता है मौत के पीछे और भी कई कारण हो…। लेकिन जो सूचना अभी तक है उसके मुताबिक उन्होंने बीमारी से तंग आकर जान दी है। अगर यही सही है तो…सच से भागिए नहीं।
ईश्वर ने यदि अवसर दिए हैं तो उनका सदुपयोग करिए। ईमानदारी भरा जीवन जीने की कोशिश करिए। सच में बहुत सुकून मिलेगा। जीने की ललक बढ़ेगी। नकारत्मकता से दूरी बनाएं। यह तभी संभव होगा जब आप किसी का कुछ हड़पने या छीनने या फिर लूटने का जतन नहीं करेंगे। किसी को दुख देकर कोई सुखी नहीं रह सकता। सकारात्मक भाव रखिए।
हंसिए..हंसाइए। सेवाभाव रखिए। नहीं तो टाटा-बिलड़ा तो केवल गिने जाते हैं…सिकंदर भी खाली हाथ गया था। कुछ भी नहीं जाएगा। आपके बाद आपके सद्कर्म, सतसंग, सेवाकार्य, लोगों की मदद को ही संसार याद रखेगा। बाकी सब राख में 24 घंटे के भीतर ही नदी, पोखरों में बह जाएगा।
लोग कहेंगे रसिक द्विवेदी ज्ञान दे रहा है…सच यह ज्ञान नहीं आंख खोलने की कोशिशभर है। आंख खोले रहेंगे तो कुछ हाथ आएगा…नहीं तो देश में प्रतिदिन करीब 27000 लोग कच्ची मौत मरते हैं। उनमें से शायद ही किसी को देश-दुनिया, समाज याद करता हो।
यशवन्त सिंह-
चमचमाता घर, हँसता-गाता परिवार। सब झूठ। बाहरी दिखावे की असली सच्चाई जब सामने आती है तो लोग दंग रह जाते हैं। लाल घेरे में संजय सिंह हैं। जीएसटी में डिप्टी कमिश्नर। नोएडा में चौदहवें मंजिल से कूदकर खुद को खत्म कर लिया। बहुत सी बातें कहीं जा रही हैं। विभागीय दबाव था। कैंसर सर्वाइवर थे।
पर सवाल वही है। जब ठीकठाक पैसा, रुतबा, घर-बंगला, बीवी-बच्चे हैं तो फिर दुख कहाँ से आ गया? ऐसा दुख जो ख़ुद को ख़त्म करने पर मजबूर कर दे? मतलब पैसा दुख हरण संकट मोचक नहीं है! बाहरी दिखावा तामझाम तड़क भड़क सब एवें ही है। सुख-शांति हमारे भीतर है। दिमाग़ में। दिल में। विपश्यना जादू है। ख़ुद के भीतर प्रवेश करने का मार्ग है। जाइए हो आइए।
अंदर झांकने के इस प्राइमरी पाठशाले की पढ़ाई अनिवार्य की जानी चाहिए। अन्यथा विकास और सुख के पश्चिमी मॉडल यूँ ही आत्महंता मोड में ले जाकर हम सबको खड़े करते रहेंगे। सब नश्वर है। अनित्य है। ध्यान से देखो। निर्लिप्त भाव से। और ख़ुद के खोल में समा जाओ। अपने भीतर प्रवेश कर जाओ। अभी मैं हरिद्वार का प्लान कर रहा हूँ। फीडबैक है कि वहाँ काँच की तरफ़ एकदम साफ़ है पानी। कोई चलना चाहे तो चले। कुछ दिन गंगा नहाते हैं, माँग कर खाते हैं और घाट पर दोपहरी शाम बिताते हैं। रात की नींद आश्रम / होटल में ली जाएगी।
ग़ज़ब सुख है सब छोड़कर कुछ दिन नितांत अकेले और अनजान जीवन जीने में। जब सब एक दिन छूटना है ही तो क्यों न धीरे धीरे छोड़ने का ही अभ्यास शुरू किया जाए। इसी सूत्र में है सुख शांति का मंत्र! #lifestyle #haridwar #vipassana
मूल खबर-
गोलेश स्वामी-
यही जीवन की सच्चाई है। कहते हैं कि स्वर्ग-नरक सब यहीं है। क्योंकि मरने के बाद जब शरीर जलकर भस्म हो जाता है तो आत्मा का क्या है वो तो अजर-अमर है। एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश करती है। यह भी कहा जाता है कि इस जन्म में आपने भले ही अच्छे कर्म किए हों, लेकिन कुछ पूर्व जन्म के ऐसे कर्म होते हैं जिनके एवज में हमें कैंसर आदि बीमारियों और अन्य हादसों के रुप में कष्ट झेलने पड़ते हैं।
तभी तो यह सुना जाता है कि भलां तो शराब तो दूर पान, मसाला, बीडी, सिगरेट तक को हाथ नहीं लगाता था, लेकिन उसे लिवर सिरोसिस हो गया। ऐसे किसी अन्य को कैंसर हो गया। आखिर यह सब क्या है? यानी कोई तो शक्ति है जो इस दुनियां को चला रही है अन्यथा यह कैसे संभव है कि कोई जरा सी ठोकर से मर जाता है और कोई नौ मंजिल से गिरकर भी बच जाता है।
कोई अच्छा भला होते हुए भी सोते-सोते चला जाता और कोई पूरी ट्रेन गुजरने पर भी बच जाता है। देखा गया है कि अनेक सच्ची आत्माओं को यह पूर्वाभास हो जाता है कि उनके अंतिम दिन आ गए हैं। इसका वे बाकायदा बयान कर देते हैं। यह सही है कि कैंसर का लास्ट स्टेज बहुत ही कष्टदायक होता है। इसमें असहनीय दर्द होता है।
कोई दवा काम नहीं करती। मैं ने अपने पिता को कैंसर के लास्ट स्टेज पर रात-रातभर कराहते हुए देखा है। लास्ट स्टेज कैंसर के असहनीय दर्द में कीमो, पेन किलर और अफीम के पैच भी काम नहीं करते। ऐसे में मरीज को जहां दर्द सहन नहीं होता है, वहीं परिवारजनों से भी अपने प्रिय परिजन का कष्ट देखा नहीं जाता। ऐसे में वे भी अपने परिजन की जल्द से जल्द मुक्ति ही चाहते हैं।
मैं ने तो स्वयं मंदिर जाकर अपने पिताजी की मुक्ति के लिए प्रार्थना की थी। क्योंकि मुझसे उनका कष्ट देखा नहीं जाता था। हालांकि संजय सिंह जी ने जिस तरह स्वयं को समाप्त किया, वह वाकई बहुत ही दुःखद हैं। अब यह तो वही अच्छी तरह से बता सकते थे कि उन्होंने क्यों इस तरह अपनी जीवन लीला समाप्त करने का फैसला किया। इसका कारण कैंसर का असहनीय दर्द था या कुछ और?
वैसे इस समय जिस तरह से कैंसर की बीमारी देश में फैल रही है, वह बहुत चिंतनीय है। जहां तक वैज्ञानिक दृष्टिकोण का सवाल है तो शोध बताते हैं कि देश में कैंसर सहित अन्य गंभीर बीमारियों का सबसे बड़ा कारण कैमिकल वाली खाद, आक्सीटोसिन इंजेक्शन वाला और कैमिकल से बनने वाला दूध और दूध से बने दही, पनीर व मिठाइयां तथा अन्य मिलावटी खाद्य पदार्थ हैं। इसलिए कैमिकल खाद के उपयोग पर पाबंदी जरुरी है। साथ ही मिलावट के लिए फांसी जैसा सख्त कानून होना चाहिए। यह मेरी निजी सोच है। मेरा मानना है इससे बीमारियों में निश्चित कमी आएगी। अभी इतना ही। शेष फिर कभी।


