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बिहार में दैनिक जागरण के ढाई दशक : सच कहूं तो मुझे यहीं से पहचान मिली!

अरविंद शर्मा-

बिहार में दैनिक जागरण का सफर ढाई दशक से जीवंत जारी है। पटना से प्रकाशन के 25 वर्ष 12 अप्रैल को पूरे हो गए। मेरे लिए यह अत्यंत गौरव का क्षण है कि 28 सितंबर 2022 को पटना से दिल्ली नेशनल ब्यूरो में स्थानांतरण से पहले तक लगभग पौने आठ वर्ष मैं भी दैनिक जागरण का बिहार में सहयात्री रहा। मेरी पत्रकारिता के 27 वर्षों के सफर में लगभग 20 वर्ष विभिन्न राज्यों में इसी अखबार में गुजरे हैं। जागरण मेरी रगो में है और मैं इसकी रगो में। भगवान से प्रार्थना है कि जब मैं रिटायर हो जाऊं तो भी जागरण वाले अरविंद शर्मा के रूप में ही मेरी पहचान होती रहे।

सच कहूं तो दैनिक जागरण से ही मुझे पहचान मिली है। आज जो कुछ भी हूं–जहां भी हूं–सब इसी भंडार से प्राप्त किया है। दैनिक जागरण से अलग जिन अन्य अखबारों में मेरे सात वर्ष गुजरे हैं, उनमें हिंदी के शीर्ष तीन अखबार हैं, लेकिन मैं दावे के साथ कहता हूं कि जागरण जैसा कोई नहीं। इसलिए 24 जनवरी 2015 को मैं हिंदुस्तान मेरठ में संपादकीय प्रभारी के पद से इस्तीफा देकर जब तीसरी बार दैनिक जागरण पटना से जुड़ा तो तय कर लिया कि अब इस पहचान को अपनी पत्रकारिता के अंतिम सफर तक बनाए रखना है।

पटना में दैनिक जागरण के साथ काम करते हुए मैंने कोरोना के उस दौर को भी देखा, जब तथाकथित कई बड़े मीडिया संस्थानों ने अपनों का ख्याल नहीं किया। सैंकड़ों लोगों की नौकरियां चली गईं। चारों तरफ हाहाकार मचा था, लेकिन जो जागरण के साथ जुड़े थे-सबके सब पूरी तरह महफूज थे। मीडिया जगत में उदाहरण दिया जाने लगा था कि दैनिक जागरण एक संस्थान से आगे बढ़कर एक परिवार है। काम और कार्य-संस्कृति के मामले में भी इसका जोड़ नहीं। मैंने देखा है-महसूस किया है कि कलम चलाने की जितनी आजादी यहां है, शायद ही किसी अन्य अखबारों में होगी।

दैनिक जागरण से पहली बार जालंधर में जनवरी 2001 को जुड़ा। अमर उजाला से इस्तीफा देकर निशिकांत ठाकुर जी के सानिध्य में सफर शुरू किया। उन्होंने आश्वासन दिया था कि जागरण का जब रांची से प्रकाशन शुरू होगा तो ट्रांसफर कर दूंगा। मगर ऐसा नहीं हुआ। रांची जाने के लिए मैं व्यग्र था। उसी क्रम में मैंने बिहार-झारखंड के तत्कालीन एडिटर शैलेंद्र दीक्षित जी से संपर्क किया। मुझे बताया गया कि मेरा ट्रांसफर नहीं हो सकता है। इस्तीफा देकर दो-तीन महीने के इंतजार के बाद विचार किया जा सकता है। यह प्रस्ताव मेरे लिए संभव नहीं था, क्योंकि तब मीडिया में नौकरी बहुत मुश्किल से मिलती थी।

आशंका थी कि अगर मैंने जालंधर की नौकरी छोड़ दी और रांची में नहीं रखा गया तो मैं रोड पर आ सकता हूं। मेरे मित्र आनंद सिंह ने मेरे लिए रास्ता निकाला। उन्होंने नागपुर में नवभारत के संपादक एसएन विनोद जी से मेरे लिए आग्रह किया। विनोद जी का महाराष्ट्र की हिंदी पत्रकारिता में बड़ा नाम था। उन्होंने यथाशीघ्र आकर ज्वाइन करने के लिए कहा। मैंने अगले ही दिन नागपुर की ट्रेन पकड़ ली।

नवभारत में दो सप्ताह के ट्रायल के बाद विनोद जी ने मुझे असिस्टेंट एडिटर का पद दिया। वेतन भी लगभग डेढ़ गुना। बहुत कम उम्र में बहुत ज्यादा मिल गया था मुझे। नागपुर में मैंने नवंबर 2002 से जुलाई 2003 तक काम किया, लेकिन इसी दौरान रांची दैनिक जागरण से मुझे बुलावा आने लगा। मुझे रांची जाना था परंतु विनोद जी छोड़ने को तैयार नहीं थे। फिर जैसे-तैसे रोनी सूरत बनाकर मैंने उनकी सहमति प्राप्त कर रांची की राह पकड़ ली।

उस समय जागरण रांची के संपादकीय प्रभारी ज्ञानेश्वर जी थे। उनके सानिध्य में जागरण की मेरी दूसरी पारी शुरू हुई। कुछ दिन बाद ही ज्ञानेश्वर जी का पटना ट्रांसफर हो गया। उनकी जगह पर जमशेदपुर से संतशरण अवस्थी (संतू भैया) जी रांची आ गए। संतू भैया अब इस दुनिया में नहीं हैं, मगर उन्होंने जितना मुझपर भरोसा किया–जितना दिया, उसके लिए आभारी हूं-ताउम्र रहूंगा। संतू भैया के नेतृत्व में काम करते हुए जब मुझे रांची छोटी लगने लगी और मेरा फलक बड़ा दिखने लगा तो मैंने दिल्ली की राह पकड़ी। मेरी चाहत दिल्ली नेशनल ब्यूरो में रिपोर्टिंग करने की थी।

अमर उजाला में बात बनी और तत्कालीन एडिटर इन चीफ शशि शेखर जी ने मुझे फरवरी 2008 में न्यूज एडिटर बना दिया। मैंने मांगा था रिपोर्टिंग मगर मिल गया एडिटिंग। इच्छा नहीं थी, फिर भी मैंने मना नहीं किया। नोएडा अमर उजाला ज्वाइन कर लिया। कुछ महीने बाद ही लखनऊ ट्रांसफर कर दिया गया, जहां मैं जल्दी ऊब गया।

फिर 2010 अप्रैल में हिंदुस्तान ज्वाइन किया, किंतु सच बताऊं तो अमर उजाला एवं हिंदुस्तान की नौकरी करते हुए भी मैं हर पल जागरण में बिताए गए पल को ही जीता रहा। मेरे पद और पैसे तो बढ़ गए थे, लेकिन काम करने की संस्कृति जागरण जैसी कहीं नहीं मिली। लिहाजा 24 जनवरी 2015 को बिहार के तत्कालीन संपादक सदगुरु शरण अवस्थी भैया ने जागरण में तीसरी बार मेरे लिए द्वार खोला। इंटरव्यू प्रशांत मिश्रा जी ने दिल्ली में लिया। अबकी मैंने तय कर लिया था कि अब कहीं नहीं जाना। जीना यहां–मरना यहां। तब से मैं यहीं हूं। जागरण में–पटना के बाद दिल्ली।

जब मैंने पत्रकारिता शुरू की थी तब छोटा सा ख्वाब था कि विधानसभा की रिपोर्टिंग करना है। रांची जागरण में रहते हुए पहली बार 2003 में झारखंड विधानसभा की रिपोर्टिंग मिली। प्रेस एडवाइजरी कमेटी का सदस्य भी बनाया गया। दूसरी बार जब पटना आया तो जागरण ने मेरी झोली फिर भर दी। स्टेट ब्यूरो चीफ बनाया गया और बिहार विधानसभा प्रेस एडवाइजरी कमेटी का सदस्य भी रहा। अब जब ढाई वर्ष से दिल्ली में हूं तो जागरण की पहचान लेकर ही पार्लियामेंट जाता हूं। रिपोर्टिंग करता हूं। खुलकर लिखता हूं। खुलकर जीता हूं। आभार जागरण। और किसी को क्या चाहिए।

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