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बनारस में डूबने लगी जनसंदेश टाइम्‍स की नाव, नहीं छपे कई संस्‍करण

बनारस से मीडिया जगत के लिए बुरी खबर है। जिस तेजी से जनसंदेश टाइम्‍स उभरा उसी तेजी से अब अपने अंत की तरफ भी बढ़ रहा है। कानपुर, गोरखपुर, इलाहाबाद में शटर गिरने के बाद अब अगली बारी बनारस की है, जहां चार महीने से कर्मचारियों को वेतन नसीब नहीं हुआ है। इसके लिए कर्मचारी आंदोलन की राह पकड़ रहे हैं, लेकिन मालिकान इससे बेपरवाह हैं। हालत ये हो गयी है कि पैसे के अभाव में कागज न होने तो किसी दिन कर्मचारियों के विरोध के चलते अपवाद स्‍वरूप ही कभी-कभी सभी संस्‍करण छप पा रहे हैं।

15 सितंबर को मशीन के कर्मियों ने अपने कई महीने से बकाये वेतन के लिए काम-काज ठप कर दिया। देर रात काफी मान-मनौव्‍वल के बाद शीघ्र वेतन भुगतान के आश्‍वासन पर वे काम करने को राजी हुए। इसके चलते कई संस्‍करण नहीं छप सके। लिहाजा अगले दिन सोनभद्र, मीरजापुर, भदोही, बलिया, गाजीपुर, मऊ आदि जिलों में अखबार नहीं पहुंचा। दस दिन पूर्व भी मशीनकर्मियों ने काम-काज ठप कर दिया था, जिससे उस दिन अखबार पूरी तरह नहीं छप सका। समस्‍या सिर्फ वेतन की नहीं है। मालिकानों ने एनआरएचएम घोटाले की तरह यहां भी हर काम में खेल किया।

कागज की आपूर्ति करने वालों का भुगतान नहीं किया। एक ही आपूर्तिकर्ता का लगभग पचास लाख बकाया हो गया है। इसके चलते कोई क्रेडिट पर कागज देने को तैयार नहीं है। महीनों से प्रतिदिन की खरीद के आधार पर अखबार छप रहा है। पैसा भी इतना नहीं हो पाता कि जरूरत के हिसाब से कागज खरीदा जा सके। इसके चलते सामान्‍यतया कम छपाई के साथ ही कोई न कोई संस्‍करण पूरी तरह बंद कर दिया जाता है। भदोही संस्‍करण तो पूरे एक सप्‍ताह तक नहीं छपा। कोई ऐसा संस्‍करण नहीं जो कहा जा सके कि लगातार छपा। टैक्‍सी संचालकों का भी बकाया लाखों में है। वे अखबार से अपना पिंड छुड़ाना चाहते हैं, लेकिन अपने बकाये के चक्‍कर में फंसे हुए हैं। इसके बावजूद आयेदिन उनका गुबार निकल ही जाता है, जिसका खामियाजा छपने के बावजूद जिलों में पहुंचने की बजाय अखबार रद्दी बन जाता है।

सबसे बुरी हालत संपादकीय विभाग की है। संपादक आशीष बागची को तो छह माह से वेतन नसीब नहीं हुआ है। इससे खिन्‍न होकर एक सप्‍ताह पूर्व वे घर बैठ गये। काफी जद्दोजहद के बाद उन्‍हें दस हजार रुपये पकड़ाये गये, इस पर वे कई दिनों के विश्राम के बाद काम पर लौटे। मालिकानों की जाति के होने के चलते बिना ताज के बादशाह और पल-पल रंग बदलने वाले विजय विनीत को भी अब दिन में तारे दिखायी देने लगे हैं। उन्‍हें भी पांच माह से वेतन नसीब नहीं हुआ है। हाल ही में एक मुकदमे के सिलसिले में बनारस आये मध्‍य प्रदेश के एक अखबार के संपादक जो पहले हिन्‍दुस्‍तान बनारस के संपादक रह चुके हैं की खुशामद में ये जनाब दिन-रात एक कर दिये। हालांकि उम्‍मीद कम ही है कि वहां उनकी दाल गले, क्‍योंकि इनकी काबिलियत और व्‍यवहार से वे संपादक जी भलीभांति परिचित हैं।

अंदरखाने से मिली खबरों के मुताबिक मालिकान अब अखबार चलाने के मूड में बिल्‍कुल नहीं हैं। उनकी मंशा सिर्फ मार्केट में फंसे धन को निकालने की है। इसलिए सिर्फ अखबार की औपचारिकता निभायी जा रही है। इसके साथ ही यह कोशिश है कि कर्मी उबकर चले जायें और उन्‍हें बकाया भी नहीं देना पड़े। इसी कवायद के तहत कई लोगों को स्‍थानांतरण का फरमान भी सुनाया गया है। जिन कर्मचारियों को महीनों से वेतन नहीं मिला, जाहिर सी बात है वे नये शहर में अपनी गृहस्‍थी कैसे बसायेंगे। लेकिन बकाया हड़पने की मंशा पर शायद पानी फिर जाये, क्‍यों कि कई पीडि़त कर्मियों ने इसकी शिकायत शासन के उच्‍चाधिकारियों के साथ ही लेबर कमिश्‍्नर से कर दी है, जिसकी जांच भी शुरू हो गयी है।

श्रम कानून के अनुसार किसी का वेतन रोकना जुर्म है और उसे दिलाने की जिम्‍मेदारी श्रमआयुक्‍त की है। जनसंदेश गोरखपुर के कर्मियों ने यही प्रक्रिया अपनायी, जिसके बाद वेतन वसूली के लिए मालिकानों के खिलाफ आरसी जारी हो गयी है। बनारस के भी कर्मचारी कुछ ऐसे ही रास्‍ते की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। आखिर करें भी क्‍या, अब रास्‍ता कौन सा शेष है? दूसरी तरफ लखनऊ एडिशन के भी ऐसे ही हालात हैं। वहां भी कर्मचारियों की कई महीनों की सैलरी बकाया है। जबकि संपादक और उनके एक पूर्व सहयोगी वेतन को लेकर फेसबुक पर एक दूसरे के खिलाफ अपना अभियान चलाए हुए हैं।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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