
दि एशियन एज और टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर है। इंडियन एक्सप्रेस ने बताया है कि धन देने वाला आईसीएसएसआर सीएसडीएस को नोटिस जारी करेगा। यह सब खबर बनाने और फैलाने की चाल यानी हेडलाइन मैनेजमेंट है। इसके अलावा, इंडियन एक्सप्रेस में सीबीआई और टाइम्स ऑफ इंडिया में केंद्र सरकार के ‘कारनामे’ छपे हैं। यहां पढ़िये केंद्र की भाजपा सरकार की राजनीति, राज्यपालों के कारनामे और उनकी पदोन्नति का संयोग। नेताओं को जमानत नहीं मिलना और प्रचारक पत्रकार के लिए कानून का उपयोग!
संजय कुमार सिंह
केंद्र सरकार एक ऐसा कानून बनाने जा रही है जिसका मकसद विपक्षी मुख्यमंत्रियों को जेल भेजकर उनकी कुर्सी छीनना है। आज छपी खबरों के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह आज ससंद में एक विधेयक पेश करेंगे जिसके पास होने के बाद 30 दिनों तक हिरासत में रहने वाले पीएम, सीएम या मंत्री को इस्तीफा देना होगा। अमर उजाला की खबर के अनुसार, यह संविधान संशोधन विधेयक दागी नेताओं पर शिकंजे के लिये है। इन खबरों के जरिये सरकार ने जनता को यह समझाने की कोशिश की है कि अब जेल से सरकार नहीं चलेगी। खबर के अनुसार, इस बिल में ऐसा प्रावधान है कि कोई भी मंत्री, मुख्यमंत्री या यहां तक कि प्रधानमंत्री भी अगर किसी अपराध में गिरफ्तार होकर लगातार 30 दिन तक हिरासत में रहता है तो उसे पद से हटना पड़ेगा। ये प्रस्तावित कानून केवल राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों पर ही नहीं, बल्कि केंद्र के मंत्रियों और प्रधानमंत्री पर भी लागू होगा। आप जानते हैं कि केंद्र सरकार ने पिछले दिनों दिल्ली और झारखंड के मुख्यमंत्रियों को भिन्न मामलों में जेल भेज दिया था। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। राजनीतिक कारणों से झारखंड के मुख्यमंत्री ने इस्तीफा दे दिया था पर दिल्ली के मुख्यमंत्री ने इस्तीफा नहीं दिया और सरकार की नीयत पर सवाल उठाते रहे। केंद्र की भाजपा सरकार ने दिल्ली की सरकार और उसके मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले बनाकर, उन्हें लंबे समय तक जेल में रखने की व्यवस्था की और इस तरह बदनाम करके और अपने अन्य राजनीतिक उपायों से दिल्ली में आम आदमी पार्टी को चुनाव हराने में कामयाब रही। बाद में पता चला कि उसके मंत्रियों में एक, सत्येन्द्र जैन के खिलाफ सरकारी एजेंसी, सीबीआई मामला साबित नहीं कर सकी और कोर्ट ने कार्रवाई बंद कर दी। मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के खिलाफ भी मामले हैं पर कोई ठोस सबूत नहीं हैं। फिर भी उन्हें परेशान तो किया ही गया, जेल में भी रहना पड़ा और बदनामी के कारण वे चुनाव भी हार गये। पर मुख्यमंत्री ने इस्तीफा नहीं दिया तो अब यह विधेयक लाया गया है।
विपक्ष विरोधी सरकार
इस विधेयक का संबंध केंद्र सरकार की राजनीति और कार्यशैली से भी है। अखबारों में खबरों के साथ यह सब बताने का रिवाज नहीं है। इसके अलावा, खबरें आमतौर पर विचारों से मुक्त होनी चाहिये लेकिन हम देख रहे हैं कि खबर पर विचार का असर खास मामलों में ही होता है। मैं इसे रेखांकित करता रहता हूं पर वह अलग मामला है। फिर भी यह तथ्य है कि झारंखड के मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन के खिलाफ भूमि घोटाले का मामला है और इसमें मनी‑लॉन्ड्रिंग का भी एंगल था इसलिए जमानत मिलने में देरी हुई। नया विधेयक पीएम, सीएम और मंत्रियों के गंभीर आपराधिक आरोपों में गिरफ्तार किये जाने पर पद से हटाने का प्रावधान करने के लिए है। सवाल उठता है कि ऐसे कितने मामले हुए हैं और इसकी जरूरत क्या है। जिन दो मामलों का जिक्र मैंने किया वो पीएमएलए के थे। इसलिए जमानत नहीं मिली। तथ्य यह है कि पीएमएलए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाले मामले सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। इसके अलावा हमारे कानून में जमानत मिलने के प्रावधान हैं। विपक्षी सरकारों या उनके समर्थकों द्वारा निर्वाचित मंत्रियों – मुख्यमंत्रियों को हिरासत में रखने की जरूरत नहीं है और किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि को विपक्षी सरकार के मातहत काम करने वाली एजेंसी के आरोप या सबूत पर भी जेल में रखने का कोई मतलब नहीं है।
प्रचारक पत्रकार ने रिकार्ड बनाया
ठीक है कि इन दोनों मुख्यमंत्रियों को जमानत नहीं मिली थी और 30 दिन से ज्यादा जेल में रहना पड़ा था लेकिन अदालत को यह बताये जाने या यकीन होने पर कि आम आदमी पार्टी के नेता और उस समय के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल का जेल में रखने का मकसद उन्हें चुनाव प्रचार से रोकना है तो देश की सर्वोच्च अदालत ने उन्हें जमानत दे दी थी। मुख्यमंत्री के राजनीतिक विरोधियों ने इसपर टीका टिप्पणी की थी और अदालत ने भले कार्रवाई नहीं की पर यह अदालत की अवमानना जैसा मामला था। दूसरी ओर, सरकार समर्थक एक पत्रकार को हफ्ते भर में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई थी जबकि सरकार के खिलाफ हो सकने वाले पत्रकार को यूएपीए के मामले में लपेट लिया गया और एक साल से ज्यादा समय तक जमानत नहीं मिली। सरकार समर्थक प्रचारक पत्रकार को जमानत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा था, “Deprivation of liberty even for one day is one day too many” यानी व्यक्ति को उसकी आज़ादी से वंचित करना, चाहे एक दिन के लिए ही हो, भी न्यायसंगत नहीं है। यही नहीं, सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय (बांबे हाईकोर्ट) की उस देरी को भी निशाने पर लिया था जिसमें उसने अंतरिम जमानत देने से इनकार किया था। कोर्ट के अनुसार “स्वतंत्रता की रक्षा” का उल्लंघन था। मुख्यमंत्रियों के मामले में यह सब नहीं हुआ। एक बार निचली अदालत से जमानत हो भी गई तो तुरंत ऊपर की अदालत में अपील कर जमानत रुकवा दी गई। ऐसी जल्दी इस सरकार ने आंतकवाद के मामलों में नहीं की है। हालांकि तब अभियुक्त खास थे।
विरोधियों की कुर्सी छीनने वाला
यह सरकार अभी तक विरोधी मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों को जेल में रखने की व्यवस्था कर रही थी अब उनकी कुर्सी छीनने का कानून बना रही है और इसे भी अदालतों में चुनौती दी ही जायेगी। यह स्थिति तब है जब कल ही कोलकाता के दैनिक द टेलीग्राफ ने एक खबर छापी थी जिसका शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, जब कुत्तों की मौज रही (और कुत्तों के लिए समय मिल गया)। इसमें बताया गया था कि सुप्रीम कोर्ट में 87064 मामले लंबित हैं। इसमें आपराधिक मामलों की संख्या 18574 और सिविल मामलों की संख्या 68490 है। 2025 में दाखिल मामलों की संख्या 45786 है जबकि 2025 में निपटाये गये मामलों की संख्या 40,778 है। जाहिर है, कि जितने मामले दर्ज हो रहे हैं उससे कम निपटाये जा रहे हैं और ऐसे में पुराने मामले कैसे निपटाये जायेंगे उसकी चिन्ता की बजाय सरकार नये कानून बना रही है। वह भी तब जब विपक्ष के नेता केंद्र सरकार पर यह आरोप लगा रहे हैं कि नरेन्द्र मोदी चोरी के वोट से प्रधानमंत्री बने हैं। हाल में बैंगलोर सेंट्रल लोकसभा क्षेत्र के तहत महादेवपुरा की मतदाता सूची से उन्होंने इसे साबित करने का दावा किया है और कहा है कि उन्हें दूसरे क्षेत्रों की मशीन से पढ़ने योग्य मतदाता सूची उपलब्ध करा दी जाये तो वे यह साबित कर देंगे कि बहुमत के लिए आवश्यक 25 सीटें भाजपा ने चोरी के वोटों से जीते हैं। चुनाव आयोग न तो आरोपो का जवाब दे पाया है न मतदाता सूची नहीं देने का कोई संतोषजनक कारण बता रहा है। यह सब तब जब पांच बजे के बाद बड़ी संख्या में पड़ने वाले वोटों के मद्देनजर मतदान केंद्रों के वीडियो मांगे जा रहे हैं तो वह भी नहीं दिया जा रहा है। इस तरह लगता है कि चोरी के वोटों से चुनाव जीतने वाली सरकार सत्ता में बने रहने के लिए कानून और सरकारी एजेंसियों के दुरुपयोग के बाद अब अनुकूल कानून भी बना रही है। ऐसे में इस खबर को आज जो महत्व मिला चाहिये था और इसपर जो प्रतिक्रिया होनी चाहिये थी वह नहीं दिख रही है।
पीएमएलए कानून की समीक्षा लंबित
दूसरी ओर, तथ्य है कि पीएमएलए पर कार्ति चिदंबरम की पुनरीक्षण याचिका लंबित है। कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने सुप्रीम कोर्ट के जुलाई 2022 के निर्णय की समीक्षा के लिए याचिका दायर की है। इसमें पीएमएलए की संवैधानिक वैधता और ईडी को दी गई व्यापक शक्तियाँ — गिरफ्तारी, जांच, जमानत की कड़ी शर्तें आदि पर विचार होना है। कोर्ट ने कहा है कि यह मामला अब तीन-न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाएगा। अभी तक सुनवाई की नयी तारीख तय नहीं है। पीएमएल की धारा 50 (ईडी की समन जारी करने की शक्ति) और धारा 63 (झूठे प्रमाण के लिए दंड) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली कई याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई हैं। इसके अलावा, मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता विपक्ष गोविंद सिंह की याचिका — जो धारा 50 और 63 पर आधारित है — अभी भी तीन-न्यायाधीशों की पीठ की समीक्षा के लिए लंबित है। पीएमएलए में संशोधनों को मनी बिल के रूप में लाने की संवैधानिक वैधता पर भी सवाल हैं। इस मुद्दे की सुनवाई लंबित है। इस आधार पर कार्ति चिदंबरम की याचिका में कहा गया है कि यदि वह फैसला पीएमएलए संशोधनों के खिलाफ आता है, तो यह निर्णय पीएमएलए की कई धाराओं को निरस्त कर सकता है। ऐसे पीएमएलए कानून के तहत सरकारी एजेंसी (जो केंद्र सरकार के तहत काम करती है) ईडी के द्वारा झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को गिरफ्तार किये जाने की स्थितियां बनी तो उन्होंने राज्यपाल को इस्तीफा देने का निर्णय किया और उसके बाद 31 जनवरी 2024 को गिरफ्तार कर लिये गये। कुल मिलाकर, वे लगभग 150 दिन जेल में रहे। अरविन्द केजरीवाल दो बार में इससे कुछ ज्यादा समय जेल में रहे।
सीबीआई का कारनामा
यहां यह दिलचस्प है कि 31 जनवरी 2024 को हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया तो सीपी राधाकृष्णन राज्यपाल थे। वे इस पद पर 18 फरवरी 2023 से 30 जुलाई 2024 तक रहे। अब वे 2025 के उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए एनडीए के उम्मीदवार हैं। इनसे पहले के उपराष्ट्रपति भी एक विपक्षी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को परेशान करके इस पद पर पहुंचे थे। दोनों के संबंध बेहद तनावपूर्ण हो गये थे। जगदीप धनखड़ 2019 से 2022 तक पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहे। उसी वर्ष, यानी 2022 में उन्हें एनडीए ने उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया और वे निर्विरोध या भारी मतों से निर्वाचित हुए थे और अचानक स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा दे दिया तो अब फिर चुनाव हो रहे हैं। ऐसी और इस तरह चल रही सरकार जब नया कानून बना रही है तो आज यह खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड है। संयोग से आज ही इंडियन एक्सप्रेस में एक खबर है जो बताती है कि सीबीआई ने एक दशक पहले दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के पूर्व सहायक राजेन्द्र कुमार के खिलाफ मामला बनाया था। इस मामले में एक अभियुक्त एके दुग्गल भी थे। सीबीआई ने बाद में इन्हें सरकारी गवाह बना लिया था। मामले की जांच के दौरान सीबीआई के छापों में दुग्गल के लॉकर की भी जांच हुई थी। बाकी लोगों के लॉकर में क्या मिला यह आखिरकार अभियुक्तों और कोर्ट की जानकारी में था। लेकिन दुग्गल के लॉकर में क्या मिला अभी भी रहस्य है। जाहिर है, सरकारी गवाह बना लिये गये अभियुक्त के लॉकर में क्या मिला यह रहस्य है। करीब 10 साल बाद इस 22 जुलाई को अदालत ने सीबीआई से पूछा कि लॉकर में क्या मिला था तो सीबीआई के वकील ने कहा, हमें नहीं मालूम। दलील यह दी गई है कि लॉकर ऑपरेशन मेमो का पता नहीं चल रहा है। खबर के अनुसार, सीबीआई ने अदालत में कहा है कि दुग्गल के लॉकर में कुछ नहीं मिला है। यह भी कि मामले की जांच कर रहे लोग रिटायर हो गये, सीबीआई छोड़ गये आदि। इस तरह यह भी कि दस्तावेजों में लॉकर ऑपरेशन मेमो है ही नहीं। जो भी हो, केजरीवाल के सहायक के अधिवक्ता ने कहा है कि लॉकर में क्या था यह नहीं बताने का एक ही कारण हो सकता है कि अगर बता दिया जाता तो कोई कोर्ट उन्हें सरकारी गवाह बनाकर माफी नहीं देता। दूसरी ओर, एक ईमानदार अधिकारी को आरोपी बनाया दिया गया जिनके पास कुछ भी आपत्तिजनक नहीं मिला है। यह केंद्र सरकार की कार्यशैली या कार्रवाई का एक उदाहरण है जो संयोग से आज ही छपा है और यह मामला केजरीवाल के सहायकों के खिलाफ भ्रष्टाचार के शुरुआती आरोपों में एक है।
मामला महाराष्ट्र का जो है
दूसरी ओर, प्रचारक पत्रकार अर्नब गोस्वामी को नवंबर 2020 में आईपीसी की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत गिरफ्तार किया गया था। यह केस 2018 की एक घटना से जुड़ा था। खबरों के अनुसार, यह एक आर्किटेक्ट और उसकी मां की आत्महत्या का मामला है , जिसमें आर्किटेक्ट ने अपने सुसाइड नोट में गोस्वामी समेत तीन अन्य पर बकाया भुगतान न करने का आरोप लगाया था। यह मामला मूलतः बंद हो चुका था, लेकिन बाद में परिवार की याचिका पर पुनः जांच की गई और केस फिर से खोला गया। अर्नब गोस्वामी को 4 नवंबर 2020 को गिरफ्तार किया गया था और उसी दिन न्यायिक हिरासत (जेल) में भेज दिया गया था। 11 नवंबर 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अंतरिम जमानत दे दी। बाद में महाराष्ट्र की सरकार बदल गई और बड़े-बड़े मामले हवा हो गये तो यह साधारण सा मामला था। एक गरीब का पैसा मार लेने और इस कारण आत्महत्या का। दूसरी ओर, महाराष्ट्र सरकार गिराने तथा विधानसभा चुनावों में भारी गड़बड़ी कर फिर से जीतने का मामला भाजपा के लिए इतना महत्वपूर्ण है कि सीएसडीएस के संजय कुमार के एक ट्वीट को गलत स्वीकार कर डिलीट कर देने का इतना प्रचार किया जा रहा है जैसे राहुल गांधी के सारे आरोप इसी पर निर्भर थे। इसमें लोग भूल गये हैं कि राहुल गांधी ने कहा था कि चुनाव आयोग ने मांगने पर भी डिजिटल कॉपी नहीं दी और कागजों का जो जखीरा दिया वह सात फीट ऊंचा था। इस कारण उन्हें एक विधानसभा चुनाव से संबंधित जानकारी का विश्लेषण करने में छह महीने लगे। उसे संजय कुमार के ट्वीट डिलीट करने और गलती स्वीकार कर लेने से खारिज नहीं किया जा सकता है फिर भी उसका इतना प्रचार किया जा रहा है जैसे वोट चोरी के आरोप उसी से छिप जायेंगे।
सरकारी संस्था सीएसडीएस और राहुल गांधी
मामला यह है कि सरकारी सहायता से चलने वाली संस्था सीएसडीएस के संजय कुमार ने 17 अगस्त 2025 को एक ट्वीट किया था जिसमें उन्होंने दावा किया कि महाराष्ट्र की कुछ विधानसभा सीटों—जैसे रामटेक और देवलाली—में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच मतदाता संख्या में भारी गिरावट (36–38%) देखी गई थी, जबकि अन्य सीटों (नासिक वेस्ट, हिंगना) पर बढ़ोतरी हुई थी। यह डेटा उन्होंने विधानसभा चुनाव में ‘वोट चोरी’ के समर्थन में साझा किया था। 19 अगस्त को उन्होंने ट्वीट को डिलीट करते हुए सार्वजनिक रूप से माफी मांगी कि डेटा टीम द्वारा आंकड़ों की ग़लत व्याख्या हुई थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी तरह की गलत जानकारी फैलाना नहीं था। इससे कहीं नहीं लगता है कि राहुल गांधी के आरोप संजय कुमार के रिसर्च या ट्वीट या आरोप से संबंधित हैं। फिर भी ऐसा प्रचार किया जा रहा है। राहुल गांधी के आरोप महाराष्ट् के अलावा, बैंगलोर और बिहार के एसआईआर के साथ हरियाणा से भी संबंधित रहे हैं। राहुल गांधी ने यह भी कहा है कि 2023 में एक कानून पास किया गया ताकि चुनाव आयुक्त को रिटायरमेंट के बाद जवाबदेही से बचाया जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि महाराष्ट्र – बिहार दोनों में वोटर लिस्ट में गड़बड़ी चुनाव आयोग और भाजपा गठबंधन के इशारे पर हुई है। यह कहने का कोई मतलब नहीं है कि संजय कुमार की माफी के बाद राहुल गांधी के आरोप निराधार हो गए हैं। सीएसडीएस की गलती एक डेटा स्रोत के गलत होने की है। लेकिन राहुल गांधी के आरोपों की पुष्टि सिर्फ उस स्रोत से नहीं हो रही थी; वह अन्य कई संदर्भों और आंकड़ों पर आधारित थे।
इस पूरी कहानी से समझा जा सकता है कि केंद्र की भाजपा सरकार औऱ देश की मीडिया का एक बड़ा वर्ग कैसे नैरेटिव बना रहा है और कितना परेशान है। इसके बावजूद वह भविष्य के उपयोग के लिए नया अध्यादेश पास करवाना चाहता है जबकि उसकी कोई जरूरत नहीं है। और पीएमएलए कानून पर फैसला आ गया तो संभव है इसका उपयोग कर पाने की नौबत ही न आये। फिर भी सरकार मन की बात कर रही है और जनहित का सिर्फ दिखावा है। इसमें जीएसटी संशोधन का प्रचार जबरदस्त है। नये कानून की खबर आज अमर उजाला, नवोदय टाइम्स, इंडियन एक्सप्रेस और द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का भी अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

