आज के अखबारों में शीर्षक से आगे क्या पढ़ना

वैसे तो चुनाव नतीजों पर टिप्पणी करना जनता की कार्रवाई के बारे में जनता को ही बताना है। असल में यह अखबारों द्वारा राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली पर जनता को वर्षों – महीनों तक दी गई (या नहीं दी गई) सूचनाओं पर प्रतिक्रिया होती है लेकिन अखबारों में उसपर अटकल लगाने का काम भी खूब होता है। आज के अखबारों में शीर्षक देखना ही दिलचस्प है। कई शीर्षक तो ऐसे लगते हैं जैसे अपने परीक्षा परिणाम पर टिप्पणी हों।

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बिना शीर्षक के अखबार और खबर

आज चुनाव परिणाम का दिन है। रिवाज रहा है शीर्षक में जीत और हार के कारण बताने का। ईमानदारी से कहूं तो उत्तर प्रदेश की जीत अगर नोटबंदी की ‘सफलता’ थी और बिहार में अंतरात्मा की आवाज पर सरकार बदल गई और बहुमत मिलने का मतलब नोटबंदी तथा जीएसटी है तो पाठकों या मतदाताओं को जीत हार का कारण बताने की जरूरत नहीं है। जो हराता है या सत्ता सौंपता है वो जानता है। ऐसे में अखबारों के शीर्षक किसके लिए?

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सरकार आरएसएस का एजंडा लागू कर रही है, सामाजिक न्याय का नहीं

आज के अखबारों में आपको क्या कहीं ऐसा कोई शीर्षक मिला? केंद्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाह ने इस्तीफा दे दिया है। इस खबर का शीर्षक यही हो सकता है और दूसरा यह भी कि केंद्रीय मंत्री ने आरोप लगाया कि सरकार आरएसएस का एजंडा लागू कर रही है, इस्तीफा दिया या सरकार सामाजिक न्याय के एजंडे की अनदेखी कर रही है, इस्तीफा। इसी खबर का एक और शीर्षक हो सकता है, साढ़े चार साल मंत्रीमंडल में रहने के बाद कुशवाह का इस्तीफा। आप समझ सकते हैं कि एक ही मामले को अखबारों में कई तरह से परोसा जा सकता है और उससे आपको एक ही खबर अच्छी-बुरी या महत्वपूर्ण अथवा बेमतलब लग सकती है। आज के अखबारों में राजनैतिक महत्व की तीन बड़ी खबरें हैं। तीनों के अपने महत्व हैं। मैं भिन्न अखबारों में प्रकाशित खबरों के आधार पर तीनों से जुड़ी खास सूचनाएं आपको बता रहा हूं।

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क्या आपके अखबार ने आपको नोटबंदी पर जानकारों की राय बताई?

आज के अखबारों में विश्व हिन्दू परिषद की रैली छाई हुई है। मेरा मानना है कि खबर छपती है इसलिए रैली होती है और रैली होती है इसलिए खबर छपती है। और पहले खबर छपवाने वालों का स्वार्थ होता था अब छापने वालों का भी होता है तो ऐसी खबरें प्रमुखता से छपती हैं। आज गिनती के अखबारों को छोड़कर ज्यादातर में यही खबर लीड है। इसलिए मैं इसकी चर्चा नहीं कर रहा। आज एक अलग खबर दिखी कि नोटबंदी के खिलाफ सरकार के समर्थक लोग भी बोलने लगे हैं और लागू करने ते तरीके को ही गलत बताया जा रहा है। मैं यहां अंग्रेजी दैनिक द टेलीग्राफ की खबर का अनुवाद (संपादित) पेश कर रहा हूं। देखिए, आपके अखबार ने यह खबर आज या पहले के जिन मौकों का जिक्र है तब आपको दी क्या? नोटबंदी की खबरें वैसे तो पहले पेज पर छपती रही हैं पर अब संभव है आर्थिक खबरों के पेज पर हो। इसलिए वहां भी देख लीजिए और जानिए कि आपका अखबार आपको कैसी खबरें देता है। क्या नहीं देता है, वह भी।

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हर चुनाव के बाद थोड़ा सा संविधान नष्ट कर दिया जाता है !!

पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस नेता पी चिदंबरम अपने साप्ताहिक कॉलम में इस बार चुनाव जीतने के लिए संवैधानिक मूल्यों से समझौता करने और मीडिया की हालत बताने के साथ यह सवाल उठाया है कि क्या चुनावों के बाद संवैधानिक मूल्य बचे रहेंगे? इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि हमें अपने आप से पूछना चाहिए कि अगर हर चुनाव के बाद थोड़ा-सा भी संविधान नष्ट कर दिया जाता है, तो इन चुनावों का औचित्य क्या रह जाता है? मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा जाने वाला चिदंबरम का यह कॉलम जनसत्ता में हिन्दी में छपता है। एक्सप्रेस की तमाम अच्छी खबरें नहीं छापने वाला जनसत्ता चिदंबरम का यह कॉलम छापता है। आइए इसका लाभ उठाया जाए।

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आपके अखबार ने सर्जिकल स्ट्राइक करने वाले फौजी की राय आपको बताई?

उन्होंने कहा है, “सर्जिकल स्ट्राइक गोपनीय तरीके से हुआ था, इसे राज ही रखते तो बेहतर होता”

सर्जिकल स्ट्राइक याद है? संभवतः पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने उस पर अपना 56 ईंची सीना ठोंका था और इसका राजनीतिक उपयोग किया था। उस समय इस चर्चा के पक्ष-विपक्ष में जो कहा गया और अखबारों में जो छपा वह तब की बात थी। अब उस स्ट्राइक में मुख्य भूमिका निभाने वाले लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हूडा रिटायर हो गए हैं। मिलिट्री लिटरेचर फेस्टिवल में शुक्रवार को एक पैनल चर्चा में भाग लेते हुए उन्होंने कहा था कि हमने इसे गोपनीय तरीके से ही अंजाम दिया था। पत्रकारों से चर्चा के दौरान उन्होंने कहा कि पीओके में घुसकर आतंकियों पर सर्जिकल स्ट्राइक की सफलता पर शुरुआती उत्साह स्वाभाविक था। सर्जिकल स्ट्राइक का राजनीतिकरण किए जाने से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा कि यह सवाल राजनेताओं से पूछा जाना चाहिए। भाजपा ने इस पर चुप्पी साध रखी है।

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गोमूत्र पीकर डायबिटीज ‘ठीक’ कर चुके गडकरी बेहोश क्यों हुए?

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी शुक्रवार को एक दीक्षांत समारोह के दौरान मंच पर बेहोश हो गए। हालांकि वे जल्दी ही ठीक हो गए। और बाद में सब कुछ ठीक होने का दावा किया। लेकिन किसी मंत्री का मंच पर बेहोश हो जाना स्वास्थ्य संबंधी महत्वपूर्ण घटना है और मंत्री के साथ ऐसा हो सकता है तो आम आदमी की क्या औकात? सार्वजनिक रूप से सबसे ज्यादा बीमार मंत्रियों वाली केंद्र सरकार देश में चिकित्सा और समान्य जांच पड़ताल की पर्याप्त और उपयुक्त व्यवस्था किए जाने की बजाय लोगों का बीमा करा रही है और यह बीमा अस्पताल में दाखिल होने वालों के लिए ही है। इस क्षेत्र में काम करने वालों का अनुमान है कि सिर्फ चार प्रतिशत लोगों को अस्पताल में दाखिल होने की जरूरत होती है, तब भी।

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उपेन्द्र राय मामले में सीबीआई को उड्डयन मंत्रालय ने अपने अधिकारी पर मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दी

नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने सीबीआई को ब्यूरो ऑफ सिविल एविएशन सिक्यूरिटी (बीसीएएस) के एक कर्मचारी के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति देने से मना कर दिया है। केंद्रीय जांच ब्यूरो के लिए यह एक झटका है। जांच एजेंसी ने इस कर्मचारी को गिरफ्तार कर चार्जशीट किया था। इस पर पत्रकार उपेन्द्र राय को एयरपोर्ट एंट्री पास (एईपी) जारी करने की मंजूरी देने का आरोप है। जानकार सूत्रों ने जानकारी दी।

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सुप्रीम कोर्ट के बहाने सरकार को तेवर दिखाते हिन्दी अखबार

बुलंदशहर की घटना अखबारों में खूब छपने के बाद अब कम छप रही है। आज अंग्रेजी अखबारों में घटना से संबंधित कई खबरें हैं पर हिन्दी में मुख्य रूप से सरकारी खबर है या कुछ नहीं है। दूसरी ओर, सीबीआई विवाद आज हिन्दी के कई अखबारों में लीड है। मैंने पहले भी लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट की कोई भी खबर हो, पहले पेज पर रखना आसान और सुरक्षित है। इसलिए कोई कायदे की खबर ढूंढ़ने की बजाय सुप्रीम कोर्ट की खबर को लीड बनाकर काम चला लेना हिन्दी अखबारों में आदत जैसा है। कल इस मामले में जो भी बात हुई वह चाहे जितनी महत्वपूर्ण हो, दिलचस्पी मुख्य फैसले या आदेश में है। पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। फिर भी यह खबर आज कई अखबारों में पहले पन्ने पर लीड है। सूचना देने के लिए यह तो खबर पहले पन्ने के लायक हो सकती है पर लीड कोई दूसरी खबर नहीं हो तभी बन सकती है। और आज के अखबारों को हाल ऐसा ही है।

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बुलंदशहर की इन खबरों से अपने अखबार की निष्पक्षता जांचिए, नापिए

बुलंदशहर हिंसा का मामला उलझ रहा है। साजिश की बू आने लगी है। कल मैंने लिखा था कि ऐसा कुछ हिन्दी अखबारों में नहीं है और फालतू की बेमतलब सूचनाएं दी गई थीं। आज यह घटना ज्यादातर हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने से हट गई है या छोटी हो गई है। इसलिए, आज मैं अखबारों में यहां-वहां छपी खबरें बताउंगा ताकि आप जान सकें कि आपका अखबार आपको कितनी निष्पक्षता से खबरें दे रहा है। आप जानते हैं कि कल आपके अखबारों ने नहीं बताया कि बुलंदशहर कांड साजिश लग रही है। अब यह खबर और पुष्ट हुई है तो नजर आनी मुश्किल हो गई है।

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बुलंदशहर : लीड फॉलो करने की बजाय बेमतलब सूचनाओं की भरमार

आज के अखबारों में भी बुलंदशहर की घटना ही छाई हुई है। आइए देखें कि सांप्रदायिक तनाव और उच्च राजनीतिक तापमान की स्थिति में यह फॉलो अप कैसा है। सबसे पहले द टेलीग्राफ। खबर पहले पेज पर लीड है। शीर्षक का अनुवाद मोटे तौर पर इस तरह होगा, “साजिश का आरोप मजबूत हुआ, भूमि मालिक ने कहा कि बरामद पशु अवशेष खेत में दफन नहीं करने दिया गया”। अखबार ने उस खेत के मालिक राजकुमार चौधरी की पत्नी के हवाले से लिखा है कि वे बरामद अवशेष को वहीं दफन कर देना चाहते थे पर बाहरी लोगों ने हमें ऐसा नहीं करने दिया। यह पूरा मामला अलग है जो किसी अखबार में प्रमुखता से नहीं दिखा। हिन्दी अखबारों में स्थानीय खबर या सूचना के नाम पर ऊल-जलूल विस्तार और अनावश्यक जानकारी है पर इस लीड को फॉलो नहीं किया गया है। इस सूचना के बावजूद की मारे गए इंस्पेक्टर की पत्नी ने कहा कि उन्हें धमकी आती थी। जाहिर है, धमकी आती थी तो भाजपा के करीबी लोगों की होगी। पुलिस उस लीड के अनुसार जांच कर पाएगी कि नहीं – ऐसे में खबर तो यह है। पर …

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दिल्ली में किसान मार्च का गुस्सा ऐसे निकला… ‘मोदीज नोज इन नेहरूज रोज’

आपको अपने अखबार में ये खबर दिखी क्या? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोमवार को जोधपुर में एक रैली में कहा, “ये गुलाब का फूल लगा करके घूमने वाले लोगों को बगीचे का ध्यान था, उनको खेतों का कोई ज्ञान नहीं था, उनको किसान के पसीने का ज्ञान नहीं था।” Continue reading

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देखिए, आपका अखबार आपको भड़का तो नहीं रहा है

आज के अखबारों में कल बुलंदशहर में हिंसा और पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह तथा एक ग्रामीण युवक की मौत की खबर ही सबसे प्रमुख होनी थी। अखबारों ने इस खबर को जो प्रमुखता दी है उससे भी मानना पड़ेगा कि सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली खबर यही है। मेंने कई अखबारों की खबरें पढ़कर करीब पौने चार सौ शब्दों में यह खबर लिखी है और मेरा मानना है कि इससे ज्यादा की जरूरत नहीं थी। अखबारों में फोटो भी खूब छपी है और यह भी लिखा है कि लोगों ने वीडियो बनाए। पर मेरे ख्याल से यह सब खबर नहीं है और मारे गए पुलिस इंस्पेक्टर की फोटो के अलावा आज किसी और फोटो की जरूरत नहीं थी।

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काश, आज ऐसी एक-एक खबर हर अखबार में होती !!

आज इंडियन एक्सप्रेस की एक्सक्लूसिव खबर। यह खबर किसी और अखबार में होनी नहीं है। इसलिए आज दूसरे अखबारों की कोई चर्चा नहीं। इस खबर के बहाने एक्सक्लूसिव खबरें कैसे होती हैं और अखबारो में आमतौर पर कैसी खबरें छपती हैं उसकी चर्चा। इंडियन एक्सप्रेस ने आज पांच कॉलम में नीरव मोदी घोटाले से जुड़ी एक खबर को लीड बनाया है। शीर्षक है, “नीरव मोदी घोटाला : आईटी रिपोर्ट में आठ महीने पहले गड़बड़ी के संकेत मिल गए थे, साझा नहीं किया गया”। फ्लैग शीर्षक है, “रिपोर्ट में फर्जी खरीद और स्टॉक की कीमत बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने पर प्रकाश डाला गया था। कहने की जरूरत नहीं है कि यह पुरानी खबर है और इस मामले से जुड़े कई लोगों की जानकारी में होगी। पर आज छप रही है तो इसीलिए कि अभी तक किसी ने छापी नहीं।

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ईवीएम की शिकायत नभाटा ने विज्ञापनों के बीच ऐसे छापी है

देश में तमाम संवैधानिक संस्थाओं की साख जब लगातार खराब हो रही है तब इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन बहुत मामूली चीज है। यह अकेली भी नहीं है। इसकी साख चुनाव आयोग से जुड़ी हुई है। लेकिन करीब आते लोकसभा चुनावों और उसके सेमी फाइनल कहे गए मध्य प्रदेश चुनाव में ईवीएम पर उठे सवालों को गंभीरता से न लेना अपने अधिकारों के प्रति सतर्क नहीं होना है। इसमें कोई शक नहीं है कि ईवीएम को शक से मुक्त होना चाहिए। हमारा काम है शक करना और संबंधित लोगों को उसे दूर करना चाहिए। लेकिन हम शक भी न करें तो उन्हें दूर करने की परवाह कौन करेगा।

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किसान नहीं, विपक्षी एकजुटता की खबर अखबारों में पहले पन्ने पर पहुंची

किसानों के मंच पर विपक्षी नेताओं के जुटने से ही सही, उनकी खबर अंग्रेजी अखबारों में तो पहले पन्ने पर आ गई। लेकिन हिन्दी अखबारों में कई अभी भी इसे दिल्ली की स्थानीय खबर ही मान रहे हैं। किसानों की मांग और किसान नेता पहले पन्ने पर नहीं के बराबर है। कुल मिलाकर, किसानों का चौथी बार दिल्ली आना भी एक ऐसी खबर की तरह परोसा गया जिससे दिल्ली की ट्रैफिक व्यवस्था खराब हो जाती है। रैली या मार्च के मुद्दों से ज्यादा जोर ट्रैफिक और ट्रैफिक संभालने के लिए की गई तैयारियों पर दिखा। दैनिक भास्कर में यह खबर आज भी दिल्ली की स्थानीय खबरों के पेज पर है। दो-दो फ्रंट पेज होने के बावजूद भास्कर ने किसान रैली की खबर अपने दिल्ली फ्रंट पेज यानी पांचवें पन्ने पर छापी है। मुख्य शीर्षक, “माफ कीजिएगा हमारे मार्च से आपको परेशानी हुई होगी” और दूसरा प्रमुख शीर्षक, “दिल्ली में इस साल चौथी बार जुटे किसान” – पुराना है। और किसानों का दुख या उनकी मांग नही बताता है।

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दिल्ली में किसानों की चौथी दस्तक, मांगें अभी पहले पन्ने पर नहीं पहुंचीं

दिल्ली में आज किसानों की रैली है और देश भर के किसान दिल्ली पहुंच गए हैं। आज संसद मार्च करेंगे। उनकी मांग है कि संसद का एक विशेष सत्र बुलाकर उनका मांग पूरी की जाए। इसमें फसल का वाजिब मूल्य, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार लागत का डेढ़ गुना करना, कर्जे माफ करना और फसल बीमा योजना से लाभ की बजाय ठगी होने की शिकायत मुख्य है। एक साल में यह दिल्ली में किसानों की चौथी दस्तक है। वे मोदी सरकार के आश्वासनों और घोषणाओं के कारण उम्मीद में थे और मांगे पूरी न होने के कारण अब परेशान लग रहे हैं। लेकिन मीडिया में उनकी मांग ठीक से नहीं आ रही है। इसलिए उनलोगों ने एक पर्चा भी बांटा है। भिन्न किसान संगठनों की यह साझी रैली है और इसमें लाल, पीला, हरा सब रंग प्रमुखता से दिख रहा है। पर खबर अभी पहले पन्ने पर नहीं पहुंची है। Continue reading

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ईवीएम में गड़बड़ी की शिकायतों को महत्व नहीं दिया अखबारों ने

मध्य प्रदेश विधानसभा की 230 सीटों के लिए राज्य के 52 जिलों में बुधवार को मतदान हुआ। मतदान मिजोरम में भी हुआ। वहां की खबर वैसे ही कम है। लेकिन मध्यप्रदेश में के कई मतदान केंद्रों पर सुबह से ही ईवीएम में गड़बड़ी की शिकायत थी। कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ और प्रचार अभियान के प्रमुख ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इस मामले में चुनाव आयोग से शिकायत कर मतदान का समय बढ़ाने की मांग की थी। हालत यह रही कि ईवीएम में गड़बड़ी के कारण कई मतदान केंद्रों पर वोटिंग दो घंटे तक देर से शुरू हुई। राज्य के 107 मतदान केंद्रों पर 40 मिनट से लेकर दो घंटे तक की देरी से मतदान शुरू हुआ। इसकी वजह बैलेट यूनिट, कंट्रोल यूनिट और वीपीपैट मशीनों में तकनीकी गड़बड़ी होना थी। इनमें सबसे ज्यादा 26 मतदान केंद्र भोपाल मध्य सीट के हैं। ईवीएम में खराबी और मतदान शुरू होने में देरी की ये खबरें साधारण नहीं हैं। लेकिन ज्यादातर अखबारों में खबर पहले पन्ने पर नहीं है। आइए देखें।

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बयान एक, शीर्षक परस्पर विरोधी : फंस गए, सब कुछ बता दिया

ग्वालियर के आईटीएम यूनिवर्सिटी में पिछले शनिवार यानी 24 नवंबर को जम्मू व कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने जो कहा वह आज बुधवार यानी 28 नवंबर के कई अखबारों में पहले पन्ने पर है। शनिवार को क्यों नहीं छपा यह अलग मुद्दा है। वह भी शायद बाद में मालूम हो। पर फिलहाल तो आज का मुद्दा। राज्यपाल ने जो कहा उसके लिए नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी (पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी) ने राज्यपाल की तारीफ की है। इंडियन एक्सप्रेस, अमर उजाला और राजस्थान पत्रिका ने इस खबर को लीड बनाया है। एक्सप्रेस का शीर्षक है, “जम्मू और कश्मीर में केंद्र क्या चाहता : मलिक ने इसे जान जाने दिया”। उपशीर्षक है, “अगर मैंने दिल्ली से उम्मीद की होती तो (सजाद) लोन की सरकार बनवानी पड़ती …. इतिहास में मैं एक गैर ईमानदार व्यक्ति के रूप में दर्ज हो जाता”। लोन पीपुल्स कांफ्रेंस के प्रमुख हैं और भाजपा का समर्थन करते रहे हैं।

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राहुल गांधी का गोत्र बताने वाली खबर पहले पन्ने पर!!

मंदिर और धर्म की घटिया राजनीति करने वाले सत्ता में आए तो मंदिर बनाना भूल गए और जनेऊ व गोत्र पर उतर आए। इसका विरोध करने की बजाय मीडिया ने ऐसे सवालों को हवा दी और जिसे राजनीति करनी है वो तो जवाब देगा ही। लिजाहा जनेऊ, मानसरोवर के बाद राहुल गांधी ने अपना गोत्र भी बता दिया है और अखबार वाले इसे पहले पन्ने पर छापने का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं। मेरे ख्याल से राहुल गांधी गलत कर रहे हैं। राहुल गांधी को कहना चाहिए कि पिता की तरफ से मैं पारसी हूं और पारसियों में जो होता हो सो है। मां और दादी की तरफ से भी जो हूं सो हूं। या फिर मेरा गोत्र वही है जो वरुण गांधी का है। अगर वरुण का गोत्र मुद्दा नहीं है तो राहुल का क्यों होना चाहिए? Continue reading

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मंदिर का बवाल, प्रधानमंत्री का आरोप – बन गया शीर्षक !!

धर्मसभा की खबर बहुत हुई। चुनाव से पहले ऐसे आयोजन का मकसद आप जानते हैं। खबरों से यह दिखाई पड़ रहा है कि सरकार और प्रधानमंत्री पर मंदिर बनवाने के लिए दबाव है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अलवर की एक रैली में कल (रविवार, 25 नवंबर 2018) को इस मामले में अपना पक्ष रखा और कहा कि इस साल के शुरू में सुप्रीम कोर्ट के जजों ने जब अयोध्या विवाद पर सुनवाई करनी चाही तो कांग्रेस ने महाभियोग की धमकी दी थी। किसी का नाम लिए बगैर मोदी ने दावा किया कि कांग्रेस के कुछ राज्य सभा सदस्य जो वकील भी हैं, ने यह सुनिश्चित करने के लिए कि सुनवाई आम चुनाव के बाद तक के लिए टल जाए, जजों को डराने की कोशिश की थी।

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‘भैयों’ ने अयोध्या में शिवसैनिकों का कैसा स्वागत किया, इस पर शांत हैं अखबार

आज कोई समस्या नहीं रही। 2019 के लोकसभा चुनाव या पूर्ण बहुमत वाली देश की पहली भाजपा सरकार का कार्यकाल खत्म होने से पहले अयोध्या में राम मंदिर बनाने की वर्षों पुरानी मांग (1992 में विवादित ढांचा गिरा दिए जाने के बाद से राम लल्ला तंबू में हैं) को फिर से गर्माने की कोशिशों में विश्व हिन्दू परिषद द्वारा आयोध्या में आयोजित धर्म सभा आज है। अखबारों में माहौल बनाना कल ही शुरू हो गया था तो आज कैसी परेशानी। आज के अखबारों में मुझे एक बात और देखनी है। मुंबई में भैया और बिहारियों को खदड़ने वाली शिवसेना के प्रमुख का अयोध्या में कैसा स्वागत हुआ। भाजपा का विरोध करने वाली शिवसेना अयोध्या में मंदिर बनवाने की मांग का समर्थन किसके लिए कर रही है। अक्सर लगता है कि खबरें पाठकों को सूचना देने के लिए नहीं, माहौल बनाने के लिए की जाती हैं।

शिवसेना प्रमुख वैसे तो भाजपा के खिलाफ बोलते रहते हैं और कल भी प्रधानमंत्री मोदी पर तंज कसा ही पर मंदिर मुद्दे को गर्माने ही आए हैं। हालांकि, उन्होंने कहा कि उन्हें श्रेय नहीं लेना है पर क्या वे इससे अलग रह सकते थे? इसपर अखबारों में क्या है। उद्धव ठाकरे हिन्दी सीखकर पहली बार अयोध्या आए थे। क्या अयोध्या में उनका विरोध नहीं हुआ या उन्हें डर नहीं था। प्रशासन को इसका अंदेशा था कि नहीं, इसकी तैयारियां थीं कि नहीं। एक पाठक के रूप में मेरी दिलचस्पी इन चीजों में है पर मुझे ऐसा कुछ प्रमुखता से तो नहीं दिखा जबकि कल सोशल मीडिया पर इस आशय का वीडियो था।

टेलीग्राफ की खबर में लिखा है, “सेना नेताओं ने अयोध्या में सप्ताह भर से डेरा डाले दर्जन भर साधुओं को सक्रिय कर उद्धव को माला पहनाया। सेना सांसद संजय राउत के नेतृत्व में महाराष्ट्र से सेना के कई मंत्री और सांसद साधुओं से मिले थे और उनसे कार्यक्रम में हिस्सा लेने तथा उद्धव को सम्मानित करने का आग्रह किया। 2000 से ज्यादा सेना सदस्य अयोध्या आए हैं। लक्ष्मण किला के आयोजन में स्थानीय भागीदारी नगण्य थी।” ऐसी रिपोर्टिंग हिन्दी अखबारों में कम होती है। इसलिए भी, आज धर्म सभा की खबर को ही लेता हूं।

इंडियन एक्सप्रेस में पहले पेज पर दो कॉलम की छोटी सी खबर के साथ भगवा झंडे लगी एक सड़क की तस्वीर है जिसका कैप्शन है , “शनिवार को अयोध्या स्थित विवादास्पद धर्मस्थल को जाने वाली सड़क पर सुरक्षा कर्मचारी”। खबर का शीर्षक है, “विहिप की बैठक आज, अयोध्या में सुरक्षा”। पहले पेज पर यह भी बताया गया कि अंदर और भी रिपोर्ट हैं तथा यह खबर अगले पन्ने पर जारी है।

हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर चार कॉलम में लीड है। इसके साथ तीन कॉलम में तलवार लहराते उद्धव ठाकरे और समर्थकों की फोटो है जिसका कैप्शन इस प्रकार होगा, “शनिवार को अयोध्या में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे। मौजूद लोगों को उन्होंने हिन्दी में संबोधित किया और राम मंदिर निर्माण शुरू होने में देरी के लिए सरकार को निशाना बनाया।” मुख्य खबर का शीर्षक है, “राम मंदिर का सुर तेज हुआ सो अयोध्या तनावग्रस्त”। इसके साथ अंदर और भी खबरें होने की सूचना है और इनमें एक का शीर्षक भी है, आरएसएस के सहयोगियों के एजंडा में राम मंदिर सबसे ऊपर।

टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर पहले पेज पर टॉप के तीन कॉलम में है। शीर्षक है, “तनावग्रस्त अयोध्या में उद्धव ने भाजपा को राम मंदिर पर चुनौती दी”, और इंट्रो है, “कहा, नोटबंदी के लिए कोर्ट आदेश की जरूरत नहीं थी”। खबर के साथ दो कॉलम में उनकी फोटो है जो उन्हें एक तस्वीर सौंपे जाने की है और कैप्शन है, “सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे शनिवार को अयोध्या में”। यहां भी पूरा कवरेज पेज पांच और 13 पर होने की सूचना है। एक खबर अतिरिक्त सूचना की भी है। असल में सभी अखबारों ने कई-कई रिपोर्टर और फोटोग्राफर तैनात कर रखे हैं तो खबरें होंगी ही।

कोलकाता के द टेलीग्राफ में भी यह खबर लीड है। पर यहां शीर्षक अलग है। हिन्दी में लिखूं तो कुछ इस तरह होगा, “राम को लेकर मोदी पर सहयोगी का ‘कुंभकरण’ तंज”। इसके साथ दो कॉलम में एक छोटा बॉक्स है, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की फोटो के साथ। इसका शीर्षक है, “मंदिर कानून की मांग”। पेज चार पर। टेलीग्राफ की खबर के साथ पहले पेज पर फोटो नहीं है और खबर लखनऊ संवाददाता पीयूष श्रीवास्तव की लखनऊ डेटलाइन से ही है। जबकि दूसरे अखबारों की खबरों में दो-तीन नाम हैं और इससे धर्म संसद को कवर करने की तैयारियों का अंदाजा लगता है।

दैनिक भास्कर का पहला पेज आज इतवार को उसकी अपनी एक्सक्लूसिव खबरों का है। रूटीन खबरें पेज तीन पर पहले पेज जैसे पन्ने पर हैं और यहां यह खबर लीड है। पांच कॉलम में फ्लैग हेडिंग है, “मंदिर की मांग को लेकर अयोध्या में धर्म सभा आज”। मुख्य खबर का शीर्षक है, “उद्धव का सरकार पर तंज – कुंभकर्ण चार साल से सो रहा है, जगाने आया हूं।” अखबार में किसी सभा में मौजूद श्रोताओं की भीड़ की फोटो है जिसका कोई कैप्शन नहीं है। इसके साथ एएमयू छात्र संघ ने कहा – “धर्म सभा के जमाावड़े से बिगड़ेगी कानून व्यवस्था, सुप्रीम कोर्ट दे दखल” – खबर भी है। अखबार में उद्धव, पत्नी और बेटे की तस्वीर एक कॉलम में है जिसका कैप्शन है, “उद्धव ने पहले लक्ष्मण किला में आशीर्वाद सम्मेलन में पत्नी और बेटे सहित पूजा की”। बाद में सरयू तट पर आरती में शामिल हुए।

नवभारत में यह खबर चार कॉलम में लीड है। शीर्षक है, “वीएचपी से पहले उद्धव की हुंकार, मंदिर कब बनवाएंगे सरकार”। आज मैं दैनिक जागरण नहीं देख पाया। (स्क्रीन शॉट देखें)

नवोदय टाइम्स में यह खबर छह कॉलम में है। शीर्षक है, “अयोध्या छावनी में तब्दील”। उपशीर्षक है, तनाव के बीच विहिप की धर्मसभा आज। इसके साथ एक सिंगल कॉलम बॉक्स है, “उद्धव बोले, चार साल से सोए कुम्भकर्ण को आया हूं जगाने”। एक और खबर है, “भागवत बोले संत मंदिर बनाने को तैयार, हम उनके साथ।”

अमर उजाला में यह खबर छह कॉलम में लीड है, फ्लैग शीर्षक है, “अयोध्या में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने महज 6 मिनट के भाषण में 34 साल पुरानी सहयोगी भाजपा को ललकारा”। मुख्य शीर्षक है, “कुंभकर्ण को जगाने आया हूं … राम मंदिर के निर्माण की तारीख बताएं या अध्यादेश लाएं”। उपशीर्षक है, “विहिप की धर्मसभा आज”। दो कॉलम में फोटो है, जिसका कैप्शन है, अयोध्या में शनिवार शाम पत्नी रश्मि व बेटे आदित्य के साथ सरयू की आरती करते शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे। और दूसरी खबरें भी हैं।

राजस्थान पत्रिका में भी यह खबर लीड है। फ्लैग शीर्षक है, “राम मंदिर निर्माण पर सियासत : विहिप की धर्मसभा आज”। मुख्य शीर्षक है, “अनजान खौफ में अयोध्या”। तीन कॉलम में लगी फोटो का कैप्शन है, “अयोध्या में जगह-जगह बैरिकेड लगा दिए गए हैं। दोपहिया वाहनों पर रोक है। लोगों को पैदल ही जाना पड़ रहा है”। मुख्य खबर के साथ तीन कॉलम में एक और खबर है जिसका शीर्षक है, “मुद्दा गरमाने के पीछे क्या है रणनीति”। इसके नीचे एक कॉलम में, “शिवसेना : असली मुकाबला भाजपा से” और दो कॉलम में, “संघ विहिप : ताकि अध्यादेश में आसानी हो” शीर्षक खबरें हैं। इसे नीचे ऐसी ही एक और खबर है, “भाजपा सरकार : फिलहाल दूरी बनाई”। और सबसे नीचे मायावती का बयान, ध्यान भटका रही है भाजपा और साथ में उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री ओपी राजभर का बयान, भीड़ जमा होने के लिए योगी जिम्मेदार।

वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की रिपोर्ट। संपर्क : anuvaad@hotmail.com

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खबर वही जो शीर्षक से खींचे और आज इसमें दैनिक जागरण का जवाब नहीं

आज कौन सी खबर की चर्चा की जाए यह तय करना थोड़ा मुश्किल रहा। मैंने सबसे पहले हिन्दुस्तान टाइम्स देखा फिर इंडियन एक्सप्रेस और उसके बाद द टेलीग्राफ। तीनों के पहले पेज पर ऐसी कोई खबर नहीं दिखी जो सभी अखबारों में हो और शीर्षक व प्रस्तुति के लिहाज से अलग। अमूमन टेलीग्राफ की लीड अच्छी होती है और लिखने का अंदाज भी। पर उसमें स्थानीय खबर लीड बन जाए तो मेरे लिए ऐसी खबर तय करना मुश्किल हो जाता है। आज टेलीग्राफ ने कोलकाता में रात सवा दो बजे फिल्म देखकर पैदल लौट रहे जोड़े को लूटने और पिस्तौल दिखाकर धमकाने की खबर को लीड बनाया है। और बताया है कि संदिग्ध रात में ही पकड़ लिए गए। दिल्ली, एनसीआर समेत देश के कई दूसरे शहरों में ऐसी घटनाएं या तो रिपोर्ट ही नहीं की जाती हैं और की जाती हैं तो तुरंत कार्रवाई शायद ही हुई हो और अखबारों में पहले पेज पर लीड – मुझे तो याद नहीं है।

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आज तो दैनिक भास्कर बाजी मार ले गया !!

दैनिक भास्कर ने भाजपा सांसद मनोज तिवारी को अवमानना के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट से बरी किए जाने लेकिन कड़ी फटकार लगाने की खबर को आज चार कॉलम में लीड बनाया है। मैं लिखता रहा हूं कि सुप्रीम कोर्ट से जुड़ी कई बड़ी खबरें आम तौर पर अखबारों में पहले पन्ने पर जगह पा जाती हैं और प्रमुखता से छपती हैं। पर आज यह खबर कुछ अलग है और अंग्रेजी के अखबारों, हिन्दुस्तान टाइम्स, इंडियन एक्सप्रेस तथा टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पेज पर नहीं है। पर कोलकाता के द टेलीग्राफ ने इसे पहले पेज पर छापा है। कोलकाता हाईकोर्ट के एक अन्य मामले की खबर के साथ। टेलीग्राफ का शीर्षक हिन्दी में लिखा जाए तो कुछ इस प्रकार होगा, “अवज्ञा के दिनों में, सीना ठोंकने वालों के लिए क्या दया दवा है?” अखबार ने इसके साथ मनोज तिवारी की एक फोटो छापी है जिसमें वे दो उंगलियों से अंग्रेजी का वी अक्षर बनाए हुए दिख रहे हैं। अखबार का कैप्शन है, “विजयी? सुप्रीम कोर्ट ने कार्रवाई नहीं की और इसे उनकी पार्टी, भाजपा पर छोड़ दिया उसके बाद विजयी संकेत दिखाते मनोज तिवारी।”

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विधानसभा भंग करने की खबर : नवभारत टाइम्स में सबसे लचर शीर्षक और डिसप्ले

पांच महीने से निलंबित अवस्था (ससपेंडेड एनिमेशन) में चल रही जम्मू कश्मीर विधानसभा को कल राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने अचानक भंग कर दिया। दिन भर के घटनाक्रम से यह लगने लगा था कि भाजपा के समर्थन से सरकार चला चुकी महबूबा मुफ्ती पीडीपी-कांग्रेस के समर्थन से सरकार बना सकती हैं तो 1980 के दशक में राज्य में आतंकवाद की शुरुआत के बाद पहली बार राजनीतिक राज्यपाल बनाए गए सत्यपाल मलिक ने विधानसभा ही भंग कर दी। यह विपक्ष की सरकार न बनने देने की पुरानी रणनीति ही है पर साफ-सुथरी और ईमानदार राजनीति का दावा कर सत्ता में आई पार्टी भी वही करे तो खबर कुछ अलग होनी चाहिए।

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सुषमा के एलान ने चौंकाया पर खबर छोटी सी!!

मैं लिख चुका हूं कि सुप्रीम कोर्ट की खबर हमारे हमारे यहां अखबारों में लीड ही बनती है। इस लिहाज से सीबीआई के डीआईजी मनीष कुमार सिन्हा ने अपनी याचिका में जो आरोप लगाए वह मीडिया को नहीं दिए जाने चाहिए थे पर मिल गए तो ‘खबर’ पहले पेज की ही थी। और कल मैं इसपर चर्चा कर चुका हूं। संयोग से आज भी सुप्रीम कोर्ट की एक खबर है और पुराने नियम से उसे लीड ही बनना है। इसमें यह देखा जा सकता है कि कल की खबर को कम महत्व देने वालों ने आज की खबर को कितना महत्व दिया है। पर वह एक जैसी खबर पर दोबारा चर्चा करना होगा जबकि आज हमारे पास एक अलग राजनीतिक खबर चर्चा योग्य है।

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ठीकरा डोभाल पर; पीएमओ, प्रधानमंत्री, गुजरात की भी कोई चर्चा नहीं

सीबीआई के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के खिलाफ जांच से हटाकर टांसफर किए गए डीआईजी मनीष सिन्हा के सुप्रीम कोर्ट में पहुंचने और उनके आरोपों को जानने के बाद ही मुझे लग गया था कि आज अखबार में देखने लायक खबर यही होनी है। मैं यह भी सोच रहा था कि दि टेलीग्राफ में इस खबर का शीर्षक क्या होगा। सुबह उठा तो अखबार नहीं आए थे (मैं भी यही चाहता था इसलिए जल्दी नीन्द खुल गई थी)। कंप्यूटर पर द टेलीग्राफ ने इस खबर को जिस विस्तार से छापा है उसे देखकर मजा आया।

शीर्षक से थोड़ी देर जूझने के बाद दूसरे अखबार देखने शुरू किए तो हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर पहले पेज पर तो है लेकिन फोल्ड के नीचे तीन कॉलम में। शीर्षक है, “सीबीआई अधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील में अपने वरिष्ठों, सरकारी अधिकारियों, मंत्री के नाम लिए”। छह लाइनें हाईलाइट की गई हैं उसमें भी कोई नाम नहीं है। यह आरोप लगाने वाले अधिकारी मनीष कुमार सिन्हा के बारे में है और यह भी कि उनका तबादला 24 अक्तूबर को कर दिया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कदम मनमाना और (किसी मकसद से) प्रेरित (मोटिवेटेड) था।

इंडियन एक्सप्रेस ने इसे पहले पेज पर दो कॉलम में छापा है। फ्लैग शीर्षक है, “स्थानांतरण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका”। मुख्य शीर्षक है, “अस्थाना के खिलाफ जांच में एनएसए का हस्तक्षेप रहा : सीबीआई डीआईजी”। उपशीर्षक है, “अस्थाना मामले में शिकायतकर्ता ने दावा किया कि राज्यमंत्री ने कुछ करोड़ रुपए लिए : सिन्हा” टाइम्स ऑफ इंडिया में आज पहले पेज पर आठ कॉलम में आधे पेज का विज्ञापन है। फिर भी यह खबर पहले पेज पर है। शीर्षक है, “मंत्री एनएसए ने अस्थाना की जांच बाधित की। शंट किए गए सीबीआई डीआईजी सुप्रीम कोर्ट में”। अंग्रेजी के चारो अखबारों में रिश्वत लेने के आरोपी मंत्री की फोटो नहीं है। नाम भी प्रमुखता से तो नहीं है। बॉडी में हो तो नहीं कह सकता पर सरसरी निगाह से पढ़ने में नहीं मिला।

हिन्दी अखबारों में आज सबसे पहले दैनिक भास्कर लेता हूं। अखबार में यह खबर छह कॉलम में लीड है और फोटो के साथ घटना के चार प्रमुख किरदारों से संबंधित बॉक्स हैं। ये हैं, मनीष सिन्हा, राकेश अस्थाना, अजीत डोभाल और केंद्रीय मंत्री हरिभाई पार्थीभाई चौधरी जिनपर नकद लेने का आरोप है। फ्लैग शीर्षक है, “सीबीआई रिश्वत कांड”। और फिर, “सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के खिलाफ जांच से हटाकर ट्रांसफर किए गए डीआईजी मनीष सिन्हा सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, एनएसए और मंत्री पर अस्थाना को बचाने का आरोप”। अखबार का मुख्य शीर्षक है, “डोभाल ने अस्थाना के घर की तलाशी रुकवाई, मंत्री हरिभाई ने पैसे लिए सीबीआई डीआईजी”। इंट्रो है, “डीआईजी ने जल्द सुनवाई की मांग करते हुए कहा – मेरे पास ऐसे सबूत कि आप चकित हो जाएंगे”।

नवोदय टाइम्स में भी यह खबर पहले पेज पर है और भले फोल्ड पर है लेकिन लीड कह सकते हैं। फ्लैग शीर्षक है, “सीबीआई के डीआईजी का सनसनीखेज आरोप। डोभाल ने नीरव, अस्थाना की जांच अटकाई”। अखबार ने, “डीआईजी सिन्हा के आरोप” शीर्षक से एक बॉक्स बनाया है जिसमें पांच आरोप गिनाए गए हैं। इसके साथ एक और बॉक्स है, केंद्रीय मंत्री चौधरी पर लगाए आरोप। खबर में पहले पेज पर मंत्री का नाम तो है पर मंत्री की फोटो नहीं है। हो सकता है मंत्री जी की फोटो कम छपती रही है इसलिए उपलब्ध ना हो क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की है।

नवभारत टाइम्स में यह खबर तीन कॉलम में तीन लाइन के शीर्षक के साथ लीड है, “सीबीआई अफसर ने कोर्ट में डोभाल और मंत्री को आरोपो में लपेटा” शीर्षक के साथ। उपशीर्षक है, “तबादले पर कोर्ट पहुंचा अस्थाना की जांच कर रहा डीआईजी”। इसके साथ एक बॉक्स का शीर्षक है, “एनएसए पर दो बार दखल का आरोप”। इस बॉक्स में तीन फोटो हैं। एक एनएसए अजीत डोभाल की, दूसरी मनीष सिन्हा की और तीसरी रिश्वत लेने के आरोपी केंद्रीय मंत्री की। मंत्री जी की फोटो छोटी है। जगह की कमी रही होगी।

अमर उजाला में यह खबर पहले पेज पर नहीं है। ऐसी खबर पहले पेज पर नहीं होने के दो मतलब होते हैं – खबर मिली नहीं और छापने की हिम्मत नहीं हुई (या खबर, खबर जैसी लगी ही नहीं)। अमर उजाला में यह खबर अंदर पेज 13 पर चार कॉलम में है। मतलब देश-विदेश की खबरों के पेज पर भी लीड नहीं है। यहां जो खबर लीड है उसका शीर्षक है, “आईएसआई ने स्थानीय सेल की मदद से किया हमला : अमरिन्दर”। इस खबर को महत्व नहीं देने का कारण यह हो सकता है कि इसे सुप्रीम कोर्ट में सूचीबद्ध नहीं किया गया है। अखबार ने मनीष सिन्हा की फोटो के साथ लिखा भी है, सुप्रीम कोर्ट ने सिन्हा की याचिका पर सुनवाई से किया इनकार। अखबार ने पेज 13 पर खबर को पूरे विस्तार से छापा है और इसमें केंद्रीय मंत्री पर रिश्वत लेने का आरोप और उनका नाम भी है पर फोटो नहीं है लेकिन उनका पक्ष है। उन्होंने कहा है कि वे किसी सतीश बाबू सना को नहीं जानते। सीबीआई अधिकारी का आरोप आधारहीन और दुर्भावनापूर्ण है।

दैनिक हिन्दुस्तान ने इसे पहले पेज पर छोटे से डबल कॉलम में छापा है। अमृतसर में धार्मिक सत्संग पर हमले में तीन घायल की खबर कल इस अखबार में सात कॉलम में थी। आज की खबर का शीर्षक है, “सीबीआई डीआईजी ने मंत्री अफसरों पर आरोप लगाए”। “सनसनीखेज” के तहत दो आरोप हैं। अंदर के पेज पर “बनाया गया दबाव” खबर की सूचना है। अंदर छह कॉलम में छपी खबर का शीर्षक है, “जांच प्रभावित करने को शीर्ष स्तर से दबाव : सिन्हा।” इसके साथ और भी कई खबरें। इनमें ज्यादातर की चर्चा पहले हो चुकी है।

दैनिक जागरण ने दिल्ली संस्करण में इसे लीड बनाया है। “शीर्ष अफसरों पर भी उछला सीबीआई का कीचड़” शीर्षक से यह खबर पहले पेज पर तीन कॉलम में है। उपशीर्षक है, “डीआईजी ने मंत्री और एनएसए पर भी लगाए संगीन आरोप”। इसमें एक कॉलम में एक लाइन के शीर्षक, “चंद्रा ने सिन्हा के दावे को फर्जी बताया” के तहत चार बिन्दु हैं। इससे पता चलता है कि सिन्हा ने विधि सचिव सुरेश चंद्रा का भी नाम लिया है। इसमें चंद्रा ने यह भी कहा बताया गया है कि मुझे कैबिनेट सचिव से कोई निर्देश नहीं मिला। इस तरह, यह खबर और भी बहुत कुछ बता रही है। और मामला सिर्फ कीचड़ उछलने का नहीं है। जागरण की इस खबर में डोभाल ने रुकवाई थी तलाशी, कैबिनेट सचिव, विधि सचिव, सीबीआई के शीर्ष अधिकारी एक केंद्रीय मंत्री सबका नाम हवाला तो है ही फिर भी प्रधानमंत्री या उनके करीबी या उनके कार्यालय और यहां तक कि गुजरात जैसा कुछ शीर्षक में या बोल्ड में नहीं है। फोटो यहां सिर्फ सुप्रीम कोर्ट की है।

राजस्थान पत्रिका में यह खबर चार कॉलम में लीड है। फ्लैग शीर्षक है, “सीबीआई संकट : एक और अफसर पहुंचा कोर्ट, सरकार पर लगाए आरोप”। मुख्य शीर्षक है, “जांच में डोभाल का दखल, केंद्रीय मंत्री ने ली थी करोड़ों की रिश्वत”। अखबार में मुख्य खबर के साथ एक छोटी खबर, “विधि सचिव पर भी लगाया आरोप” भी है। अजीत डोभाल और रिश्वत लेने के आरोपी केंद्रीय मंत्री हरिभाई पार्थीभाई चौधरी की फोटो है। इसके ठीक नीचे दो कॉलम में खबर है, “हमें कोई चीज चौंका नहीं सकती : सीजेआई”। यह दैनिक भास्कर के इंट्रो से संबंधित है। इसके मुताबिक, “इस मामले में कोर्ट ने तुरंत सुनवाई से इनकार करते हुए कहा कि हमें कोई चीज अब चौंका नहीं सकती। सीजेआई रंजन गोगोई ने कहा है कि आपकी याचिका सूचीबद्ध नहीं होगी लेकिन मंगलवार की सुनवाई में आप मौजूद रहें। एक सिंगल कॉलम की खबर और है, जिसका शीर्षक है, “कांग्रेस बोली घूस के आरोपी मंत्री को बचा रहा है पीएमओ”।

वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की रिपोर्ट। संपर्क : anuvaad@hotmail.com

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वॉर्म का मतलब नीच / कमीना भी होता है, हिन्दी में ऐसा शीर्षक सुझाइए

सीबीआई के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के खिलाफ जांच से हटाकर टांसफर किए गए डीआईजी मनीष सिन्हा के सुप्रीम कोर्ट में पहुंचने और उनके आरोपों को जानने के बाद मैं इंतजार कर रहा था कि दि टेलीग्राफ में इस खबर का शीर्षक क्या होगा। खबर सात कॉलम में बैनर बनेगी यह अंदाजा तो था पर शीर्षक का अंदाजा लगाना मुश्किल था। इसलिए उत्सुकता बनी रही।

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धार्मिक सत्संग पर हमले की खबर – देखें, अखबारों ने कैसे एक से लेकर सात कॉलम तक में परोसा

ऊपर प्रकाशित पीटीआई की खबर और शीर्षक का अनुवाद इस प्रकार होगा।
पंजाब में विस्फोट से तीन मरे

अमृतसर : शहर की सीमा पर इतवार को एक धार्मिक सत्संग के दौरान ग्रेनेड फटने से तीन लोगों की मौत हो गई और 20 जने जख्मी हो गए। पुलिस इसे “आंतकवादी कार्रवाई” मान रही है। पुलिस ने कहा कि अमृतसर के राजा सांसी हवाई अड्डे के पास अदलीवाल गांव में चेहरा ढंके दो मोटरसाइकिल सवारों ने एक निरंकारी भवन पर ग्रेनेड फेंका था। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिन्दर सिंह ने आईएसआई समर्थित खालिस्तानी या कश्मीरी आतंकवादियों का हाथ होने का संदेह जताया है। उन्होंने कहा कि वे आंतक की ताकतों को राज्य को मुश्किल से मिली शांति नहीं भंग करने देंगे। इसके साथ एएफपी की एक फोटो का कैप्शन है, अमृतसर शहर की सीमा पर स्थित निरंकारी भवन में ग्रेनेड हमले के शिकार के रिश्तेदार।

द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर प्रकाशित इस खबर के साथ सूचना है, रिपोर्ट्स पेज चार पर। अंदर सात कॉलम में छपी खबरों का फ्लैग शीर्षक है, “अमृतसर के पास निरंकारियों की सभा में मोटरसाइकिल सवारों के ग्रेनेड हमले के बाद पुलिस आंतकवादी कोण की जांच कर रही है”। दो कॉलम में ऊपर लिखी गई खबर इसी शीर्षक के साथ विस्तार से है। तीन कॉलम में ऊपर नीचे दो फोटो और बाकी दो कॉलम में पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिन्दर सिंह की फोटो के साथ खबर का शीर्षक है, “मुख्यमंत्री को पाकिस्तानी हाथ का शक”। एक फोटो निरंकारी भवन की है जिसके बाहर पुलिस वाले खड़े हैं। दूसरी फोटो का कैप्शन है, “ग्रेनेड हमले के शिकार एक व्यक्ति के रिश्तेदार”। कुल मिलाकर, धार्मिक तनाव फैला सकने वाली एक घटना की विस्तृत सूचना और विवरण के साथ संतुलित या आदर्श ढंग से जानकारी दी गई है। आइए देखें, बाकी अखबारों ने इसे कैसे छापा है।

हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर फोटो के साथ चार कॉलम में लीड है। शीर्षक है, “ग्रेनेड हमले में पंजाब की प्रार्थना सभा में तीन मरे”। उपशीर्षक है, “आतकवादी हाथ? मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने अमृतसर में निरंकारी सभा को निशाना बनाया”। रायटर की वही फोटो है जो टेलीग्राफ ने छापा है और कैप्शन है, “अमृतसर के राजासांसी क्षेत्र में रविवार को प्रार्थना सभा वाली जगह को गार्ड करती पुलिस”।

टाइम्स ऑफ इंडिया में भी यह खबर फोटो के साथ चार कॉलम में छपी है। मुख्य शीर्षक है, “निरंकारी सत्संग पर ग्रेनेड हमले में तीन मारे गए”। एक कॉलम तीन लाइन में उपशीर्षक है, “19 जख्मी, आईएसआई लिंक से इनकार नहीं : पंजाब मुख्य़मंत्री”। फोटो विलाप करते परिजनों की है।

इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर सेकेंड लीड है। दो कॉलम की लीड के साथ चार कॉलम में निरंकारी भवन के बाहर तैनात पुलिस वालों की फोटो के नीचे चार कॉलम में इस खबर का शीर्षक है, “मुख्यमंत्री ने कहा, आईएसआई समर्थिक खालिस्तानी/कश्मीरी आतंकवादी समूह की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता”। दूसरी फोटो दो कॉलम में विलाप करते परिजनों की है। कैप्शन है, “हमले में मारे गए एक पीड़ित के रिश्तेदार”।

दैनिक हिन्दुस्तान में यह खबर सात कॉलम में है। फ्लैग शीर्षक है, “आतंकी वारदात से दहशत, बाइक से आए दो हमलावरों ने सत्संग में ग्रेनेड फेंका, सेनाध्यक्ष खुफिया एजेंसियों ने पहले ही किया था आगाह”। मुख्य शीर्षक है, “अमृतसर में निरंकारियों पर हमला, तीन मरे”। तीन कॉलम में विलाप करते परिजनों की फोटो है।

नवोदय टाइम्स में यह छह कॉलम में है पर “अमृतसर में ग्रेनेड हमला” शीर्षक छोटा होने के कारण फौन्ट बड़ा है। उपशीर्षक है, “निरंकारी भवन पर निशाना; 3 मरे, 22 घायल”। दो कॉलम में फोटो के ऊपर लिखा है, “पंजाब सहित पड़ोसी राज्य में हाई अलर्ट”। अखबार ने पहले पेज पर इस खबर को काफी जगह दी है और सभी पहलुओं व दूसरे संबंधित खबरों को भी पहले पेज पर ही रखा है। हालांकि बिलखते परिजन या घायल की तस्वीर पहले पेज पर नहीं है। ग्रेनेड हमले से बने गड्डे की तस्वीर जरूर है।

नवभारत टाइम्स में भी यह खबर छह कॉलम में है और दो लाइन की काली रिवर्स हेडिंग, “अमृतसर में आतंकी हमला, 250 निरंकारी श्रद्धालुओं की भीड़ पर ग्रेनेड फेंका, 3 मौतें”, डरावनी है। डेढ़-डेढ़ कॉलम में दो लाइन में चार प्रमुख सूचनाएं शीर्षक के साथ रीवर्स में हैं। पुलवामा में सीआरपीएफ कैम्प पर आतंकवादी हमले की खबर भी इसी के साथ छपी है। अखबार ने पहले पन्ने पर डेढ़ कॉलम में स्ट्रेचर पर लेटे एक घायल की तस्वीर भी छापी है। कैप्शन है, “मुख्यमंत्री अमरिन्दर सिंह ने हमले में घायल हुए लोगों के मुफ्त इलाज किए जाने का ऐलान किया है”।

राजस्थान पत्रिका में यह खबर पहले पेज पर तीन कॉलम में है। फ्लैग शीर्षक है, “पंजाब : पुलिस ने कहा आतंकी साजिश का शक, एनआईए करेगी जांच”। मुख्य शीर्षक है, “चार दिन से आतंकी हमले के अलर्ट के बीच धार्मिक डेरे पर ग्रेनेड हमला , 3 की मौत।” दो कॉलम में फोटो का कैप्शन है, आदलिवाल गांव में हमले के बाद घटनास्थल के बाहर खौफ का मौहल।”

अमर उजाला में यह खबर दो लाइन के शीर्षक के साथ छह कॉलम में लीड है। शीर्षक है, “अमृतसर में निरंकारी भवन में सत्संग के दौरान आतंकी हमला, तीन की मौत”। उपशीर्षक है, “हाई अलर्ट के बावजूद वारदात : बाइक से आए थे दहशतगर्द, सीएम ने कहा – खालिस्तानी-कश्मीरी आतंकियों का हाथ”। अखबार ने बिलखते परिजनों की फोटो के साथ “पांच-पांच लाख मुआवजे की घोषणा” और “हमले के बाद दहशत में परिजन और श्रद्धालुओं को सुरक्षित डेरे के बाहर निकालते पुलिसकर्मी” कैप्शन वाले फोटो के नीचे खबर छापी है, “निरंकारियों से टकराव के बाद फैला था उग्रवाद”।

दैनिक भास्कर आज नो निगेटिव खबरों वाला अखबार होता है। पर उसमें भी यह खबर लीड है। निगेटिव न्यूज के ठप्पे के साथ। इसके साथ बताया गया है, सिर्फ वही नकारात्मक खबर जो आपको जानना जरूरी है। आप भी जानिए, ये रही फोटो।

वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की रिपोर्ट। संपर्क : anuvaad@hotmail.com

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अंग्रेजी अखबारों में खबर वित्त मंत्रालय की है, वित्त मंत्री ही स्रोत हैं!

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जीएसटी के ‘पोस्टर ब्वाय’ हसमुख अधिया के लिए एक असामान्य और समयपूर्व विदाई संदेश लिखा

आज टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पेज पर सिंगल कॉलम में टॉप पर छोटी सी खबर है, “अधिया ने महत्वपूर्ण पदों की पेशकश ठुकरा दी : वित्त मंत्री”। इस खबर में यह सूचना भी है कि यूआईडीएआई के प्रमुख अजय भूषण पांडे अगले राजस्व सचिव होंगे। सरकार का कोई दुलारा अधिकारी महत्वपूर्ण पदों की पेशकश ठुकरा दे – यह साधारण बात नहीं है। पर खबर इतनी ही है। खबर के आखिर में अंदर एक खबर होने की सूचना है, सरकार ने विकल्पों पर विचार किया। इस खबर का शीर्षक है, सरकार ने अधिया को सीएजी ये मंत्रिमंडल सचिव बनाने के विकल्पों पर विचार किया। पर अधिया ने नवंबर के बाद काम करने से मना कर दिया इसलिए दोनों ही विकल्पों को छोड़ दिया गया। लेकिन अधिया ने मना क्यों किया? एक तो सेवा विस्तार और उसपर भी महत्वपूर्ण पद। वित्त सचिव हसमुख अधिया को 30 नवंबर के बाद पद पर बनाए रखने की उत्सुक सरकार उन्हें कैबिनेट सेक्रेट्री बनाना चाहती थी। यह एक ऐसा पद है जिससे उनके लिए दो साल का कार्यकाल सुनिश्चित होता।

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