अकबर के खिलाफ गवाही की पेशकश की खबर फिर पी गए कई अखबार

भारत में मीटू अभियान के दूसरे दौर के ज्यादातर हमले झेलते हुए केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर पूरी मजबूती से राज्य मंत्री की कुर्सी संभाले हुए हैं। उन्होंने सबसे पहले आरोप लगाने वाली सिर्फ एक पत्रकार के खिलाफ मानहानि का मुकदमा किया है। समझा जा रहा था कि यह बाकी पत्रकारों को डराने धमकाने के लिए है। पर कल दो और मामले सामने आए। यही नहीं, टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि 20 महिलाओं ने अकबर के खिलाफ गवाही देने की पेशकश की है। ये महिलाएं 1990 के दशक में अकबर के साथ काम कर चुकी हैं और अदालत से अपील की है कि अकबर के खिलाफ उनकी भी गवाही ली जाए। टीओआई में पहले पेज पर प्रकाशित खबर के मुताबिक, “हम अवमानना के मामले की सुनवाई कर रही माननीय अदालत से अपील करते हैं कि (याचिकाकर्ता के हाथों यौन उत्पीड़न के हमारे मामलों में भी) हमारी गवाही भी सुनी जाए जो इस उत्पीड़न की गवाह हैं और 1990 के दशक में अकबर के साथ दि एशियन एज में काम किया है।” कई पत्रकारों ने मंत्री और पूर्व संपादक पर यौन उत्पीड़न तथा अनुचित व्यवहार का आरोप लगाया है

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पत्रकार तुशिता पटेल की आपबीती : चड्ढी पहने खड़ा था अकबर, जबरन जकड़ कर चूम लिया!

पत्रकार तुशिता पटेल बोलीं- तुझसे अदालत में भी निपट लेंगे अकबर! प्रिया रमानी ने लिखा है कि अकबर ने कुछ “किया” नहीं। इसी आधार पर अकबर कह रहे हैं कि कुछ किया नहीं तो यह सब (मीटू) काहे का। अवमानना हो गई। प्रिया रमानी के खिलाफ अदालत में अवमानना का मामला दाखिल किए जाने से नया मामला सामने आना नहीं रुका है। अब तुशिता पटेल ने अपनी आपबीती लिखी है।

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‘गोदी मीडिया’ छाप अखबारों ने अकबर के बचाव में लिखना जारी रखा, देखें आज का कवरेज

मोदी सरकार के लिए छवि निर्माण और ‘ब्रांडिंग’ में हिन्दी अखबारों की भूमिका… मीटू अभियान के तहत लगाए जाने वाले आरोपों पर कई दिनों तक चुप रहने वाले हिन्दी अखबारों ने विदेश मंत्री एमजे अकबर के स्वदेश लौटने पर उनके बचाव और उनकी कार्रवाइयों को प्रमुखता से छापना शुरू कर दिया है। कल अदालत जाने की अखबार की घोषणा को लीड बनाने वाले हिन्दी के अखबारों ने आज फिर इस खबर को लीड बनाया है।

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अकबर असल में अवमानना कानून का दुरुपयोग कर रहे हैं!

केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री का खंडन पढ़ रहा था और यह समझने की कोशिश कर रहा हूं कि 97 वकीलों की लॉ-फर्म की ताकत एक महिला पर क्यों? या बाकी पर क्यों नहीं? हिन्दी अखबारों में छपा नहीं और शिकायत अंग्रेजी में है तो शायद आपने पढ़ा न हो या ध्यान नहीं दिया हो – मूल पोस्ट में ‘अपराधी’ का नाम नहीं था और पोस्ट पुरानी है। मुकदमा अब हुआ है।

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अकबर पर लगे आरोप न बताने वाले अखबारों ने उनका जवाब छाप ‘गोदी मीडिया’ का धर्म निभाया

केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर के खिलाफ आरोप नहीं छापने वाले हिन्दी अखबारों ने आज उनका जवाब पूरे विस्तार से और पूरी प्रमुखता से छापा है। नवभारत टाइम्स में आज पहला पेज पूरा विज्ञापन है पर मास्टहेड के बगल में ईयर पैनल में अकबर की फोटो के साथ लिखा है, दरबार में बने रहेंगे अकबर, जवाब में दागे सवाल देखें अंदर। अंदर खबरों का पहला पेज है और यह खबर आज के अखबार की लीड है।

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विनोद दुआ पर मीटू के आरोप से मैं सहमत नहीं हूं

यह लड़की से ठीक से बात न करने, अश्लील चुटकुला सुनाने, चेहरा देखकर लार टपकाने का मामला हो सकता है। यौन शोषण का भी माना जा सकता है पर बार-बार कोशिश नहीं की गई है और ना बार-बार जबरदस्ती गई है इसलिए मीटू नहीं है। मीटू बहुत गंभीर है और भयंकर किस्म का यौन शोषण है। यह एक मामला हो सकता है, आदर्श व्यवहार नहीं है पर इतना गंभीर नहीं है कि इसे मीटू की श्रेणी में रखा जाए।

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अन्नपूर्णा देवी की खबर गायब, प्रधानमंत्री की हत्या की धमकी चार कॉलम में !!

दिल्ली के पुलिस आयुक्त के ई-मेल पर एक लाइन की यह “धमकी” सितंबर में यानी 15 दिन पहले आई थी

दिल्ली में हिन्दी के ज्यादातर अखबारों में आज अन्नपूर्णा देवी के निधन की खबर पहले पेज पर नहीं है। लेकिन एक खबर प्रमुखता से छपी है, “प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जान से मारने की धमकी”। दैनिक जागरण में खबरों के पहले पन्ने पर आज लगभग आधा पेज विज्ञापन है फिर भी तीन कॉलम में प्रधानमंत्री की फोटो के साथ छपी है। अमर उजाला में विज्ञापन एक ही है पर यह खबर अन्य सूचनाओं के साथ पहले पेज पर चार कॉलम में टॉप पर है। नवभारत टाइम्स में यह खबर पहले पेज पर नहीं है पर  अंदर की खबरों की सूची में इसकी सूचना है और यह खबर “क्राइम-कानून” के पेज पर सिंगल कॉलम है। नवोदय टाइम्स में खबरों के पहले पन्ने पर आधे से ज्यादा विज्ञापन है। और इन विज्ञापनों के बीच फोटो के साथ सिंगल कॉलम में यह खबर छपी है। “कमिशनर के ई-मेल पर मोदी को मारने की आई धमकी” शीर्षक वाली यह खबर अंदर के पेज पर जारी है।

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हत्या की यह खबर जितना बताती है उससे ज्यादा छिपाती है

आज के ‘नवोदय टाइम्स’ में पहले पेज पर प्रमुखता से एक खबर छपी है, “गर्भपात से मना करने पर डॉक्टर की हत्या”। दो कॉलम, दो लाइन के शीर्षक के बाद दो लाइन में दो उपशीर्षक भी हैं। इनमें पहला है, “गर्भवती किशोरी के दोस्तों पर हत्या का शक” और दूसरा, “हत्या की जांच में जुटी पुलिस”। इसमें तीसरा या अंतिम शीर्षक बेकार है। वह तो पुलिस को करना ही है। अगर पुलिस ने कहा होता कि जांच नहीं करेगी तो खबर होती। इस खबर के विस्तार में जाने और उसपर चर्चा करने से पहले यह बताना लाजमी है कि इस मामले की रिपोर्टिंग पूरी पुलिसिया शैली में की गई है और ना तो रिपोर्टर ने अपना दिमाग लगाया है ना प्रकाशन से पहले संपादकों ने इसपर विचार किया है। इसीलिए मेरे निशाने पर है।

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…और मानसी सोनी नरेंद्र मोदी के लिए #metoo लिखने लायक बनने से चूक गईं!

एमजे अकबर का पाप ज्यादा है या कम यह कैसे तय होगा… या इस्तीफा देना ही हो तो कौन किसे दे?

आईएएस अधिकारी प्रदीप शर्मा भुज में काम कर रहे थे। उन्होंने 2004 में आर्किटेक्ट मानसी सोनी से एक गार्डन की लैंडस्केपिंग कराई। इस गार्डन का उद्घाटन नरेंद्र मोदी ने किया। इस समारोह के दौरान शर्मा ने मानसी सोनी का परिचय मुख्यमंत्री से कराया। दोनों ने ईमेल आईडी का आदान-प्रदान किया। महिला प्रदीप शर्मा के करीब थी इसलिए उसने उनके साथ यह जानकारी साझा की।

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गुड़गांव में नवरात्र के दौरान मांस न बेचने देने की खबर और मीडिया

हिन्दुस्तान टाइम्स में आज प्रकाशित खबर के अनुसार गुरुग्राम के हिन्दू संगठन मांस दुकानें जबरदस्ती नहीं बंद कराएंगे। इससे पहले छह लोगों को गिरफ्तार कर सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी गई थी। कुछ ही घंटों के बाद 22 हिन्दू संगठनों के प्रतिनिधियों ने एलान कर दिया कि वे जबरन बंद नहीं कराएंगे। गुरुवार को अखबारों में खबर थी कि गुरुग्राम में हिंदू संगठनों ने धमकी दी है कि नवरात्र के दौरान वे जिले में मांस नहीं बेचने देंगे। आज खबर है कि इस संबंध में गुरुवार को ज्ञापन सौंपने पहुंचे संयुक्त हिंदू संघर्ष समिति के प्रतिनिधियों को उपायुक्त विनय प्रताप सिंह ने फटकार लगाई। उन्होंने साफ कहा कि यह 100 प्रतिशत गैरकानूनी है। अगर भविष्य में संगठनों की तरफ से जबरन दुकानें बंद कराई गईं तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

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इसे हिन्दी अखबारों की बेशर्मी मानें या नालायकी?

लगता है हिन्दी अखबार इस मुगालते में रहते हैं कि वे खबर नहीं छापेंगे तो दुनिया को पता ही नहीं चलेगा। गोदी मीडिया और मीडिया पर सरकारी दबाव के इस जमाने में हिन्दी वालों के कमजोर सूचना तंत्र और साधन संपन्नता की कमजोरी भी खुलकर सामने आ रही है। राफेल मामले में सुप्रीम कोर्ट का कल का फैसला बिल्कुल अलग और अनूठा है तथा पूरा मामला एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। इसके साथ ही मीडिया पार्ट ने कल ही एक नया खुलासा किया। दोनों मिलाकर बड़ी खबर बनती है पर मैंने हिन्दी के जो भी अखबार देखे किसी में मीडिया पार्ट के खुलासे की खबर नहीं है। यह सोशल मीडिया पर सक्रिय नहीं रहने का भी नतीजा हो सकता है। पर सच यही है कि सरकार विरोधी एक बड़ी खबर हिन्दी अखबारों में नहीं है। अंग्रेजी अखबार इस लिहाज से बहुत सही हैं।

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हिन्दी अखबारों को राफेल मामले में मीडियापार्ट के नए खुलासे की खबर ही नहीं!!

राफेल पर मीडिया पार्ट का नया खुलासा सरकार को परेशान करने वाला है और सरकार तथा समर्थकों की अब तक की दलीलों को धो देता है। कल रात साढ़े 11 बजे तक इसपर कई खबरें और ट्वीट थे पर आज के हिन्दी अखबारों में तो कहीं उसकी चर्चा नहीं मिली जबकि अंग्रेजी अखबारों में द टेलीग्राफ ने हमेशा की तरह इस खबर को शानदार डिसप्ले दिया है। सुप्रीम कोर्ट के कल के आदेश को मिलाकर दोनों खबरें सात कॉलम में छपी हैं। दोनों खबरों को एक साथ दो शीर्षक से छापकर एक साझा और मुख्य शीर्षक लगाया है, कोर्ट स्कैनर ऑन राफेल प्रोसेस (राफेल प्रक्रिया पर कोर्ट की नजर)। सुप्रीम कोर्ट वाली खबर के हिस्से का शीर्षक है, अदालत मूल्य और उपयुक्तता पर विचार नहीं करेगी। मीडिया पार्ट वाले हिस्से का शीर्षक है, फ्रेंच रिडल इन लेटेस्ट सैल्वो (फ्रेंच पहेली नवीनतम मुसीबत)।

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ब्रेकिंग न्यूज वालों – ये खबर नहीं मिली? या दिखानी नहीं है?

फ्रेंच जर्नल “मीडिया पार्ट” ने खबर दी है कि नए मिले दसॉल्ट के दस्तावेजों से पता चलता है कि राफेल जेट करार के लिए रिलायंस के साथ संयुक्त उपक्रम बनाना आवश्यक था। यह खबर एनडीटीवी डॉट कॉम ने सुबह साढ़े नौ बजे दे दी थी और रात 10.55 पर इसका पूरा विवरण नवजीवन इंडिया डॉट कॉम पर हिन्दी में हैं। टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज दिखाने की जल्दबाजी और इस मारे तमाम गलतियां करने वाले मीडिया संस्थानों को ऐसी खबरों के मामले में कोई जल्दबाजी नहीं रहती है। रात 11.15 बजे “राफेल सौदे में नए दस्तावेज़” गूगल करने पर ऊपर की खबरों में नवजीवन की ही खबर है। नीचे राफेल की पुरानी खबरें। नए शुरू हुए एक दो समाचार पोर्टल पर यह खबर है पर विज्ञापनों से भरे रहने वाले और चुनाव में पैसे लेकर खबर छापने वाले अखबारों में से किसी में यह खबर नहीं दिखी। इसे विस्तार से सुबह देखेंगे।

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मीटू के शोर में राज्यपाल की शिकायत पर पत्रकार गिरफ्तार, रिहा

प्रेस कांफ्रेंस में महिला रिपोर्टर के गाल सहलाने वाले राज्यपाल

मीटू के शोर-शराबे में तमिलनाडु के राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित की शिकायत पर कल तमिल साप्ताहिक “नक्कीरण” के संपादक आर गोपाल को गिरफ्तार कर लिया गया। यह खबर “द टेलीग्राफ” और “राजस्थान पत्रिका” में दिखी। पत्रिका ने तो इसे पहले पन्ने पर छापा है। गोपाल पर आरोप है कि उन्होंने अपनी पत्रिका “नक्कीरण” में एक कॉलेज की असिस्टेंट प्रोफेसर (सुश्री) निर्मला देवी से संबंधित सेक्स स्कैंडल पर अप्रैल से लेकर अभी तक कई आलेख प्रकाशित किए हैं जो राज्यपाल की छवि को नुकसान पहुंचाने वाले हैं। महिला शिक्षक पहले से पुलिस हिरासत में हैं। उनपर आरोप है कि उन्होंने कई छात्राओं से कहा था कि वे अच्छे अंकों के लिए अधिकारियों को यौन लाभ दें (एडजस्ट करें)।

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राजनीति के गुजरात मॉडल को अखबारों की खबरों से समझना

यह हिन्दी भाषियों के खिलाफ गुजराती भाजपाइयों और कांग्रेसियों की मिलीभगत क्यों नहीं है? गुजरात से गैर गुजराती गरीबों को खदेड़ने के बाद अब जानिए गुजरात सरकार की योजना। 25 सितंबर की खबर है और हाल में जो हुआ उसकी तैयारी या उसका कार्यान्वयन उसके बाद के इन्हीं दिनों में हुआ होगा। इकनोमिक टाइम्स की एक खबर के मुताबिक गुजरात सरकार कानून बनाकर निर्माण और सेवा क्षेत्र के उद्यमियों के लिए यह जरूरी बनाएगी कि अपने कुल कर्मचारियों में 80 प्रतिशत स्थानीय रखें। मुख्यमंत्री ने यह बात मंगलवार यानी 25 सितंबर 2018 को कही थी। मुख्यमंत्री युवाओं को कांट्रैक्ट लेटर बांटने के लिए आयोजित समारोह में बोल रहे थे। यह समारोह मुख्यमंत्री अप्रेनटिसशिप योजना के तहत आयोजित था।

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‘टेलीग्राफ’ ने अपने संस्थापक संपादक एमजे अकबर पर यौन शोषण के आरोपों को प्रमुखता से छापा

मीटू का असर मुंबई, मीडिया से मंत्रिमंडल तक… मीटू के तहत केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर पर उंगली उठने के बाद सवाल था कि अंग्रेजी दैनिक दि टेलीग्राफ इस खबर को कैसे पेश करेगा। आम अखबारों की तरह प्रतिकूल खबर को पी जाएगा या एक अच्छे मीडिया संस्थान के रूप में पूरी खबर विस्तार से देगा। टेलीग्राफ एक अच्छा मीडिया संस्थान साबित हुआ है।

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पत्रकारीय असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा है यह शीर्षक

नवभारत टाइम्स में आज प्रकाशित इस खबर का यह शीर्षक घोर आपत्तिजनक है। “कुछ दिन भी नहीं गुजार सकते हैं गुजरात में?” शीर्षक “अपने देश में भी पराया होने का अहसास, सोमवार को भी पलायन” फ्लैग के साथ छापा गया है। इस शीर्षक में प्रश्नवाचक चिन्ह नहीं होता तो इसका मतलब बिल्कुल अलग होता। और तब यह माना जा सकता था कि विज्ञापन के प्रभाव में यह चूक हो गई है।

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टेलीग्राफ ने ‘गोदी’ हो चुके फेसबुक की हरकतों को लीड खबर बनाकर छापा, पढें

बड़े फौन्ट के शीर्षक और दो-चार बॉक्स वाली ‘बड़ी खबरें’! आज के सभी अखबारों में कोई एक सी बड़ी खबर नहीं है। लिहाजा सभी अखबारों ने अपनी खबरों में से किसी एक को प्रमुखता से बड़े फौन्ट के शीर्षक लगाकर बड़ी खबर बना दिया है। किस अखबार ने किस खबर को प्रमुखता दी है यह जानना दिलचस्प रहता है और अगर आपकी दिलचस्पी यह जानने में है कि अखबार ने किसी खबर को क्यों प्रमुखता दी होगी तो मामला और दिलचस्प हो जाता है।

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चिदंबरम ने बताए रफाल सौदे की जांच के 10 कारण

पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम के आज के साप्ताहिक कॉलम “अक्रॉस दि आइल” (उस पार से) का शीर्षक है, “वे कारण चाहती थीं, पेश हैं 10”। हिन्दी दैनिक जनसत्ता ने इसे, “दूसरी नजरः ये हैं दस कारण, अब कराइए जांच” शीर्षक से छापा है। इसमें पी चिदंबरम ने लिखा है, रक्षामंत्री एक निर्दोष महिला हैं। 3 सितंबर 2017 को रक्षामंत्री का पद संभालने से पहले रफाल सौदे के संबंध में जो कुछ हुआ था उनमें से बहुत सारी चीजों की जानकारी उन्हें नहीं है। लगता है कि उन्होंने अपने रोजाना के कार्यक्रमों और दिनचर्या को भी नजरअंदाज कर दिया है। भारत और फ्रांस की सरकारों के बीच रफाल विमान के सौदे की घोषणा प्रधानमंत्री ने पेरिस में 10 अप्रैल 2015 को की थी और इस संबंध में करार पर दस्तखत 23 सितंबर, 2016 को हुए थे। इस पर विवाद शुरू हो गया है और जांच की मांग की जा रही है। हाल में, रक्षामंत्री ने पूछा, “मैं जांच के आदेश क्यों दूं?” हमलोग हमेशा निर्दोष लोगों संदेह का लाभ देते हैं और ऐसा करते हुए मैं समझता हूं कि उन्हें कारण बता देना वाजिब होगा। भड़ास के पाठकों के लिए चिदंबरम का यह लेख हिन्दी में पेश है। आगे उन्होंने लिखा है – पेश हैं, दस कारण (आप भी पढ़िए) : Continue reading

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विधानसभा चुनाव की घोषणा और अखबारों के रंग

पांच राज्यों में विधान सभा चुनाव की खबर वैसे तो सभी अखबारों में है। इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स सबमें यह पहले पेज पर प्रमुखता से है। पर जो बात कोलकाता के ‘द टेलीग्राफ’ के शीर्षक में है वह किसी और में नहीं है। इस खबर के साथ खास बात यह रही, और शायद पहली बार, कि प्रेस कांफ्रेंस का समय बदला गया। वैसे तो यह सूचना भी अखबारों में है ही और सोशल मीडिया पर कल से ही है। पर प्रस्तुति की बात करें तो टेलीग्राफ हमेशा बाजी मार ले जाता है। सूचना तो कल मिल गई थी – पर आज अखबार में कुछ नया अनोखा न हो तो अखबार किसलिए खरीदा जाए?

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पूरे पन्ने के विज्ञापन में सबसे जरूरी सवाल का जवाब नहीं

भारत में ईवीएम का उपयोग पहली बार 2009 के चुनाव में किया गया था। असल में, ईवीएम से चुनाव के बाद जब शिकायतें आईं तो इसकी जांच की जरूरत समझी गई पर मशीन उपलब्ध नहीं थी। इसलिए उपलब्ध सूचना के आधार पर लोगों ने पहले मशीन बनाई गई और फिर उससे छेड़छाड़ कर दिखाया गया। तकनीक समझाया गया। इससे एक तरफ तो आम लोगों के मन में ईवीएम के प्रति शंका बैठ गई दूसरी ओऱ, चुनाव आयोग कहता रहा कि उसकी मशीन से छेड़छाड़ संभव नहीं है। साथ ही, वह मशीन देने से मना करता रहा। आखिरकार, नेटइंडिया कंपनी समूह के उस समय के प्रबंध निदेशक हरि के प्रसाद ने दिखा दिया कि ईवीएम आसानी से हैक किए जा सकते हैं। हरि प्रसाद ने इसके लिए मांगी हुई मशीन का उपयोग किया था। मशीन चुनाव आयोग की थी पर उसने दी नहीं थी। इसलिए पहले चोरी की एफआईआर कराई गई और फिर हरि के प्रसाद को गिरफ्तार कर लिया गया। उनपर मशीन का स्रोत बताने के लिए दबाव डाला गया। परेशान किया गया, यातनाएं दी गईं जबकि छेड़छाड़ साबित होने के बाद इसका कोई मतलब नहीं था। हालांकि, इस समय गिरफ्तारी अलग मुद्दा है।

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फर्जी सूचना पर यकीन करने का नतीजा !!

आज गाजियाबाद के एक स्कूल के बच्चों के अभिभावकों को सुबह-सुबह एसएमएस से सूचना मिली कि स्कूल बंद है। जाहिर है, बच्चों में यह सूचना सबसे पहले फैली। एक बच्चे ने अपने पिता को सूचना दी तो पिता ने बच्चे से कहा कि अपने क्लास के ग्रुप में देखो। व्हाट्सऐप्प का यह ग्रुप अभिभावकों के लिए है और स्कूल के सभी कक्षाओं के लिए अलग। अभिभावक ही उस ग्रुप में होते हैं। इस बच्चे के पिता ने उसे अपना फोन देखने के लिए कहा, बच्चे के पास उसका अलग फोन है। उसके उसके क्लास के साथी ने फोन करके एसएमएस की सूचना दी थी।
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पेट्रोल की कीमत कम करने की राजनीति और उसकी रिपोर्टिंग का खेल

केंद्र सरकार ने महीनों तक लाचारी दिखाने के बाद कल अचानक पेट्रोल के दाम कम कर दिए और भाजपा शासित राज्यों से भी कीमत कम करने के लिए कहा लिहाजा राज्यों ने भी ढाई रुपए प्रति लीटर कम कर दिए। खुद डेढ़ रुपए, तेल कंपनियों से कहकर एक रुपए औऱ राज्यों से कहकर ढाई रुपए – कुल पांच रुपए प्रति लीटर की कमी हुई है जो पर्याप्त न भी हो तो कम नहीं है। इसमें खास बात यह है कि दिल्ली में भाजपा की सरकार नहीं है तो दिल्ली में कीमत 2.50 रुपए ही कम हुए। दूसरी प्रमुख बात यह है कि राज्यों में चुनाव की घोषणा होने वाली है और उससे पहले यह एक महत्वपूर्ण लोक लुभावन फैसला है। इसमें केंद्र सरकार ने अपनी उस घोषणा का भी ख्याल नहीं रखा जिसका अभी एक महीना भी पूरा नहीं हुआ है। Continue reading

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कोबरा पोस्ट का सनसनीखेज खुलासा : 29 दलों के 194 नेताओं ने चुनाव आयोग को दिए हैं गलत पैन नंबर!

कोबरा पोस्ट ने अपने एक सनसनीखेज खुलासे में दावा किया है कि देश के 194 नेताओं ने चुनाव आयोग को चुनाव लड़ने के लिए दी गई जानकारी में गलत पैन नंबर दिया है। पैन मतलब पर्मानेंट अकाउंट नंबर या स्थायी खाता संख्या। यह आयकर विभाग द्वारा जारी किया जाता है और आपके तमाम आय, व्यय और संपत्ति आदि की खरीद बिक्री सब इससे जुड़े रहते हैं या जुड़े रहने चाहिए ताकि जरूरत पड़ने पर उनकी जांच या मिलान हो सके। आय छिपाना और बेनामी संपत्ति को रोकने के लिए पैन नंबर जरूरी है। और तो और बैंक में 50 हजार रुपए से ज्यादा नकद जमा करने पर भी पैन नंबर देना अनिवार्य है। ऐसे में इसकी महत्ता समझी जा सकती है। Continue reading

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मुख्य न्यायाधीश की खबर में दैनिक भास्कर ने सबसे ज्यादा मेहनत की है

बुधवार (03 अक्तूबर) की घटनाओं और आज के अखबारों में छपी खबरों के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण खबर है – मुख्य न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति रंजन गोगोई का शपथ लेना और शाम में उनके सम्मान में आयोजित समारोह में कही उनकी बातें। एक और खबर, बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती द्वारा इस साल के आखिर में राजस्थान और मध्य प्रदेश में होने वाले चुनावों के सिलसिले में कांग्रेस को कथित रूप से झटका दिए जाने की खबर का राजनीतिक महत्व है। और यह सभी अखबारों में पहले पेज पर है। ज्यादातर लीड। Continue reading

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मोदी सरकार का मीडिया मैनेजमेंट बहुत कमजोर पड़ गया… जानें ताजा हाल!

प्रचार से पुरस्कार और पुरस्कार का प्रचार

आज के अखबारों में पूरे पन्ने का एक विज्ञापन है जिसमें भारत सरकार के पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, नवीन और नवीनकरणीय ऊर्जा मंत्रालय तथा पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को समस्त भारत की ओर से बधाई दी है। यह बधाई प्रधानमंत्री को संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम द्वारा संयुक्त राष्ट्र का सर्वोच्च पर्यावरण पुरस्कार “चैम्पियन ऑफ दि अर्थ” से सम्मानित किए जाने के लिए दी गई है। विज्ञापन कहता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पर्यावरण संरक्षण तथा जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम (पर) अंकुश लगाने के प्रयासों में सराहनीय नेतृत्व प्रदान करने के लिए पॉलिसी लीडरशिप श्रेणी में पुरस्कृत किया गया है। विज्ञापन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पर्यावरण संरक्षण : विजन, कार्य एवं मिशन का भी जिक्र है।

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नवलखा को जमानत और मोदी के गुरूजी के लिए सरकारी कृपा

आज के अखबारों में भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में गौतम नवलखा को दिल्ली हाईकोर्ट से जमानत मिल जाने की खबर प्रमुखता से छपी है तो द टेलीग्राफ ने इस खबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गुरूजी, संभाजी भिडे के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार द्वारा छह मामले वापस लिए जाने की खबर के साथ प्रमुखता से छापा है। महाराष्ट्र ने भिडे के खिलाफ छह मामले खत्म किए – फ्लैग शीर्षक है और मोदी के गुरूजी के लिए सरकारी कृपा शीर्षक से अखबार ने इस खबर को बॉटम बनाया है। खबर के बीच में गौतम नवलखा की छोटी सी खबर फोटो के साथ है जिसका शीर्षक है, जमानत मिली।

खबर के मुताबिक भीमा कोरेगांव हिंसा के शुरुआती प्रमुख आरोपी, संघ परिवार के सहयोगी, भिडे का नाम एक जनवरी की जातीय हिंसा के बाद दाखिल कराई गई एफआईआर में था। जबकि एक साल बाद इस मामले में गिरफ्तार किए गए 10 वाम झुकाव वाले ऐक्टिविस्ट्स में से सिर्फ एक का नाम इसमें था। अखबार ने लिखा है कि आरटीआई के तहत हासिल जवाब के मुताबिक भाजपा नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार ने जून में भिडे के खिलाफ मामले वापस ले लिए थे। इससे पहले राज्य मंत्रिमंडल की एक उपसमिति ने इस संबंध में निर्णय लिया था। अखबार ने लिखा है कि 2014 का अपना चुनाव अभियान शुरू करने से पहले नरेन्द्र मोदी सांगली स्थित भिडे के घर गए थे और एक जनसभा में कहा था, मैं स्वयं सांगली नहीं आया हूं। मुझे भिडे गुरूजी ने आपके शहर में आने का आदेश दिया था और मैं यहां हूं।

अखबार ने आगे लिखा है, पुणे के एक वकील ने पूछा, क्या पुलिस के लिए एक ऐसे व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करना संभव है जिसके पांव प्रधानमंत्री छूते हैं। बुजुर्ग भिडे श्री शिव प्रतिष्ठान के संस्थापक हैं और अपना रास्ता अलग चुनने से पहले सतारा-सांगली-कोल्हापुर के क्षेत्र में आरएसएस के प्रचारक थे। कोल्हापुर रेंज के विशेष इंस्पेक्टर जनरल, विश्वास नांगरे पाटिल ने कहा, उन्हें 2008 से लेकर अब तक के सभी मामलों से मुक्त कर दिया गया है। अखबार के मुताबिक मुंबई के एक आरटीआई कार्यकर्ता शकील अहमद शेख ने मार्च में एक आरटीआई के जरिए जानना चाहा था कि 2008 से अब तक राजनीतिकों के खिलाफ कितने मामले वापस लिए गए हैं। दो अपीलों के बाद उन्हें शनिवार को जवाब मिला।

भिडे के खिलाफ कुछ मामले 2008 के हैं जब वे और उनके समर्थकों ने आशुतोष गोवारीकर की फिल्म जोधा अकबर के प्रदर्शन के खिलाफ ऐतिहासिक गलतियों का आरोप लगाते हुए थिएटर में तोड़-फोड़ की थी। कुछ महीनों बाद उन्होंने सांगली में भी भारी हंगामा किया था। सरकार द्वारा मामला वापस लिए जाने के छह महीने बाद भिडे का नाम एक जातीय हिन्सा में आया। इसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई थी। एफआईआर में भिडे और भाजपा पार्षद तथा हिन्दू एकता मंच के संस्थापक, मिलिन्द एकबोटे का नाम था। एकबोटे जमानत पर हैं लेकिन भिडे को कभी गिरफ्तार ही नहीं किया गया। पुणे के एसपी ग्रामीण संदीप पाटिल ने भिडे के मामले में कहा कि उनके शामिल होने का कोई सबूत नहीं है। हमारे पास एकबोटे के खिलाफ सबूत है और जल्दी ही चार्जशीट दाखिल की जाएगी।

पुणे पुलिस ने मामले से संबंध में इस साल जून में पांच ऐक्टिविस्ट्स को गिरफ्तार किया और पांच अन्य को अगस्त में पकड़ा। इसके लिए देश भर में कई जगह छापे मारे गए। उनपर माओवादियों से संपर्क रखने और मोदी की हत्या और सरकार गिराने की साजिश में शामिल होने का आरोप लगाया गया है।

Source: Navbharat Times/Internet.

पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की रिपोर्ट। संपर्क : anuvaad@hotmail.com

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केंद्र सरकार बीमा करा रही है, दिल्ली सरकार अस्पतालों में आरक्षण

आज के हिन्दुस्तान टाइम्स में मुझे एक परेशान करने वाली खबर दिखी। खबर यह है कि दिल्ली के जीटीबी अस्पताल में दिल्ली वालों के लिए 80 प्रतिशत सीटें आरक्षित कर दी गई हैं और इससे अस्पताल के ओपीडी में भीड़ आधी रह गई है। जाहिर है, इससे दिल्ली वालों को लाभ होगा पर जो आधे लोग दिल्ली के नहीं थे और इस अस्पताल में इलाज कराते थे वे कहां जाएं? उनके लिए क्या कोई व्यवस्था हुई? कोई विकल्प है? मेरे ख्याल से नहीं। कहने की जरूरत नहीं है कि ये सब लोग दिल्ली से सटे गाजियाबाद में रहने वाले हैं और यहां मेरठ से भी लोग इलाज कराने आते थे। गाजियाबाद, नोएडा नए बसे इलाके हैं और यहां इलाज की सरकारी सुविधा नहीं के बराबर है। इसीलिए निजी अस्पताल तो खूब हैं पर यहां इलाज कराना सबके वश का नहीं है। इसीलिए ये लोग दिल्ली के अस्पतालों में जाते हैं।

अमर उजाला के अनुसार, “दिल्ली सरकार का कहना है कि दिल्ली के अस्पतालों में मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इसके कारण कई बार राजधानी के लोगों को ही समय पर उपचार नहीं मिल पाता है। इसलिए सरकार अभी जीटीबी अस्पताल में इस योजना की शुरुआत की है। इस अस्पताल में 17 में से 13 काउंटर सिर्फ दिल्ली वालों के लिए आरक्षित होंगे। इलाज कराने के लिए अस्पताल पहुंचने पर मरीज को अपना वोटर आईडी कार्ड दिखाना होगा। दिल्ली और बाहरी राज्यों के मरीज के बाकायदा अलग-अलग रंग के कार्ड भी बनाए जाएंगे। योजना सफल रही तो दिल्ली सरकार अपने अन्य अस्पतालों में भी इस योजना को लागू करेगी।”दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने से सरकारी अस्पतालों की स्थिति काफी बेहतर हुई है और पहले भी बिहार यूपी के अस्पतालों से बेहतर थी। दिल्ली का एम्स बिहार यूपी वालों से ही भरा रहता है। अब जब दूसरे अस्पताल ठीक हुए हैं तो बाहर से यहां आने वालों की संख्या भी बढ़ी थी। दिल्ली सरकार ने हालांकि दिल्ली से बाहर वालों के लिए रोक नहीं लगाई है पर दिल्ली वालों के लिए 80 प्रतिशत बिस्तर आरक्षित कर दिए हैं और इसी से काफी फर्क पड़ा है। देखना है केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार दिल्ली के आस-पास रहने वालों के लिए क्या व्यवस्था करती है और कब तक।

वैसे, यह खबर दूसरे अखबारों में भी है और जब यह योजना लागू करने की बात चल रही थी तबकी खबरें भी नेट पर मिलीं। वैसे तो मुझे इसका अनुमान भी था पर आयुष्मान भारत के शोर में इस खबर का अलग महत्व है। आप जानते हैं कि सरकार ने चुनाव पूर्व प्रचार के लिए आयुष्मान भारत योजना की घोषणा की है इसके तहत 10 करोड़ लोगों का पांच व्यक्ति के परिवार के हिसाब से प्रति परिवार पांच लाख रुपए का बीमा किया जाना है। अभी इस योजना मद में 2000 करोड़ रुपए रखे गए हैं और इस हिसाब से प्रति व्यक्ति बीमा का खर्च बैठता है 200 रुपए।

आपको याद होगा कि सत्ता में आने के बाद नरेन्द्र मोदी सरकार जनधन बीमा योजना शुरू की थी और तमाम लोगों के खाते खुलवाए थे। शून्य जमा राशि वाले। इसमें भी बीमा की योजना थी। एक 12 रुपए के करीब की औऱ दूसरी 300 रुपए के करीब की। इस तरह यह सरकार शुरू से बीमा कराने में यकीन करती रही है। पारदर्शिता का तकाजा है कि इस बीमा से कितने लोगों को फायदा हुआ इसका विवरण सार्वजनिक किया जाता और संबंधित जानकारी आमतौर पर उपलब्ध होती। अब जाते-जाते सरकार ने बीमा कराने का काम और बढ़ा दिया है जबकि जरूरत सुविधाएं उपलब्ध कराने की ज्यादा है और सरकार जिन सुविधाओं के लिए बीमा करा रही है वह उसकी जिम्मेदारी है।

2000 करोड़ रुपए के बीमा का लाभ पता नहीं कितने लोग उठा पाएंगे और भले ही बीमा 10 करोड़ लोगों का हो जाए पर लाभान्वित वही होगा जिसे इलाज के पैसे मिल ही न जाएं समय पर मिल जाएं। पर इसकी संभावना कितनी है इसका कोई भी अनुमान लगा सकता है। खासकर तब जब प्रति व्यक्ति बीमा एक लाख रुपए का ही है और अलग-अलग बीमारियों के लिए अधिकतम राशि निश्चत है। वैसे भी यह सुविधा अस्पताल में दाखिल होने वालों के लिए है और अनुमान है कि चार प्रतिशत लोगों को ही अस्पताल में दाखिल होकर इलाज कराने की जरूरत होती है। आजकल अखबारों में सिर्फ सूचनाएं छपती हैं। उनका विश्लेषण कम होता है इसलिए आम पाठक को यह सब पता ही नहीं चलता है वह समझ रहा है कि उसका बीमा है। उसे नहीं पता कि इलाज कहां कराना है।

आम जनता को यह भी नहीं पता है कि देश भर में आयुष्मान योजना चलाने वाली सरकार (दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार इसमें शामिल नहीं है) कश्मीर में (वहां राष्ट्रपति सरकार है) सरकारी कर्मचारियों से कहा है कि वे अपने परिवार के लिए आयुष्मान जैसी ही छह लाख रुपए की बीमा योजना 8770 रुपए के करीब में खरीदें और इसके लिए वहां की सरकार ने बाकायदा निजी क्षेत्र की रिलायंस समूह की कंपनी से करार किया है। यह स्थिति तब है जब आप हम पढ़ते रहते हैं कि कश्मीर में घायल होने वाले सेना के जवानों को भी इलाज के लिए दिल्ली लाया जाता रहा है। जाहिर है वहां इलाज की सुविधा अपर्याप्त है पर सरकार वहां के सरकारी कर्मचारियों से भी कह रही है कि वे बीमा करा लें। सिर्फ छह लाख रुपए प्रति परिवार जिसमें दिल्ली आकर इलाज कराना कतई संभव नहीं होगा।

पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की रिपोर्ट। संपर्क anuvaad@hotmail.com

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इमेज बनाने में जुटे शिवराज की छवि का सरकारी विज्ञापन कहीं सत्यानाश तो नहीं कर रहे?

दिल्ली के हिन्दुस्तान टाइम्स में मध्य प्रदेश सरकार का दो पेज का विज्ञापन है। पहले और दूसरे पेज पर टाटा स्टील का विज्ञापन है जबकि तीसरे और चौथे पेज पर मध्य प्रदेश सरकार का यह विज्ञापन है। इस कारण अखबार का पहला पेज आज पांचवा (असल में सातवां) पेज है। जाहिर है अतिरिक्त पैसे देकर छपवाया गया है। Continue reading

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इस ‘ईमानदार’ सरकार से अच्छी तो वो ‘भ्रष्ट’ सरकार ही थी!

Sanjaya Kumar Singh : असली विकास तो महंगाई का हुआ है… इस सरकार ने असली विकास महंगाई बढ़ाने में किया है। पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत पर कोई नियंत्रण नहीं है। गैस की सबसिडी छुड़ा दी और जिसे दी उसके लिए इतनी महंगी है कि पूरा प्रयास ही बेकार गया। रेलों का किराया वैसे ही बढ़ा दिया है। Continue reading

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