हिन्दी के लेखकों को छापेंगे नहीं और अंग्रेजी वालों का अनुवाद करने की कुव्वत नहीं है!


Sanjaya Kumar Singh

अनुवाद की गलती हिन्दी में पढ़ने का मजा खराब कर देती हैं… इंडियन एक्सप्रेस में हर इतवार को प्रकाशित होने वाले पी चिदंबरम के आज के आलेख का शीर्षक है – फर्स्ट एनार्की, नाऊ ऑटार्की (First anarchy, now autarky)। यह आलेख केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार पर है। इंट्रो के एक पैरा ग्राफ से स्पष्ट है कि भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के काम-काज और आर्थिक नीतियों पर टिप्पणी है। Continue reading

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मैं कोलकाता के The Telegraph का फैन हूं… काश, हिन्दी में कोई ऐसा अखबार होता!

Sanjaya Kumar Singh : ऐसे कितने दिन और किसलिए चलेंगे ये अखबार? मैं कोलकाता के अंग्रेजी दैनिक दि टेलीग्राफ का फैन हूं। शुरू से। भाजपा सांसद एमजे अकबर इसके संस्थापक संपादक हैं और मैं स्थापना के समय से पढ़ रहा हूं। वो कांग्रेस होते हुए भाजपा में पहुंचे हैं। दिल्ली आने के बाद यह अखबार नहीं मिलता था पर जब भी मौका मिला पुरानी फाइलें भी पढ़ता रहा।

द टेलीग्राफ का आज (विश्वासमत के ठीक अगले दिन) का पहला पन्ना… गले लगने से 56 ईंची सीना चूर हो गया और प्रतिक्रिया गुस्से व घृणा की थी… तूफानी गले लगना (या पड़ना)… और हां, सरकार सरकार 325-126 से जीत गई (कोष्ठक में)

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अमर उजाला पढ़ना, ”मेरे लिए ‘टॉरपिडो’ की तरह है”

Sanjaya Kumar Singh : अमर उजाला पढ़ना, ”मेरे लिए ‘टॉरपिडो’ की तरह है”. अमर उजाला हिन्दी के अच्छे, बड़े और पुराने अखबारों में है। आज शर्मिष्ठा (और राष्ट्रपति प्रणब) मुखर्जी की खबर दिलचस्प है। देख रहा था कि हिन्दी के अखबारों में कहां कैसे छपी है तो पता चला अमर उजाला में भी छपी है। Continue reading

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आज तक के संपादक रोहित को इतना जहर बोने क्यों दे रहे हैं?

Sanjaya Kumar Singh : एक मशहूर टेलीविजन एंकर के बारे में Dilip Mandal की यह पोस्ट पढ़ने लायक है।

“जिस संपादक ने रोहित सरदाना को टीवी में पहली नौकरी दी थी, उन”के दर्द को कौन समझ सकता है. उन्हें क्या मालूम था कि रोहित में इतना जहर भरा है. रोहित तब बेहद मासूम बनकर उनके पास आया होगा. चूंकि मैं उस संपादक को जानता हूं, इसलिए उस दर्द को महसूस कर सकता हूं. अगर उन्हें पता होता कि रोहित की हरकतों से आगे चलकर समाज टूटेगा, तो रोहित को वह नौकरी कतई न मिलती. रोहित की हरकतों से लोगों के मन में नफरत भर रही है. इस दुष्कर्म का बोझ लेकर रोहित पता नहीं क्या बनना चाहता है. वह एक सम्मानित पत्रकार तो कभी नहीं बन पाएगा. हद से हद उसकी हैसियत उस बंदर की होगी, जिसके बनाए पुल पर चढ़कर सेना ने लंका की ओर प्रस्थान किया था. इतिहास तो राजा का होता है, बंदरों का इतिहास नहीं होता. रोहितों का इतिहास में कोई जिक्र नहीं होता. रोहित पत्रकारिता का तोगड़िया बनेगा और आखिर में रोएगा. लेकिन यह होने तक समाज को इसकी कीमत चुकानी होगी. इतनी कड़वाहट क्यों बो रहे हो रोहित? हो सकता है कि निजी जीवन में तुम या तुम्हारे परिवार का कोई दर्द हो. कोई शिकायत हो. लेकिन मासूमों के घर जलाकर उसकी कीमत वसूलोगे क्या? आज तक के संपादक रोहित को इतना जहर बोने क्यों दे रहे हैं? उन्हें ही क्या हासिल हो जाएगा? गाड़ी की लंबाई चार इंच बढ़ भी गई तो क्या? कौन देखता है, कौन जानता है, कौन पूछता है? टीआरपी की वासना में लोगों की जान चली जाएगी. अब तो रुक जाओ. पत्रकारिता नहीं तो इंसानियत की खातिर ही सही.”

दिलीप मंडल की इस पोस्ट के बाद हिन्दी टेलीविजन पत्रकारिता में नियुक्तियों पर यह लेख पढ़िए। इसे मैंने अपनी पुस्तक, ”पत्रकारिता : जो मैंने देखा, जाना, समझा”  www.goo.gl/xBHcEx में भी साभार उद्धृत किया है। इस आलेख की सिफारिश इसलिए कर रहा हूं कि इसके बारे में एक पाठक ने लिखा है, “जितेंद्र जी, आपने जो बयां किया उसे पोस्टर बनाकर दीवारों पर चिपकाना चाहिए”। लिंक यह रहा…

http://old1.bhadas4media.com/article-comment/12842-2013-07-07-08-49-31.html

आलेख जिसकी सिफारिश कर रहा हूं

http://old1.bhadas4media.com/print/12808-2013-07-05-13-58-10.html

हिन्दी पत्रकारिता के पतन को समझना हो तो काम आएगा। खासकर उदारीकरण के बाद के भारत में पत्रकारिता के क्षेत्र में आए लोगों के लिए।

पुनःश्च

आपकी मान्यता (जो भी है, जैसी भी है) का विस्तार होगा अगर आप उस टिप्पणी को पढ़ेंगे। मैंने दिलीप की पोस्ट को बतौर संदर्भ लिया है। लिखा भी है कि इसके बाद इस टिप्पणी को पढ़िए। – किसी ने पढ़कर कमेंट लिखा हो ऐसा नहीं लगता है। सबकी दिलीप (और रोहित के बारे में) एक तय राय है जिसपर बात करने, सुनने के लिए कोई तैयार नहीं है। चूंकि जो राय बनी है वह ऐसे ही, सुनी-सुनाई बातों पर, ऊपरी जानकारी के आधार पर है इसलिए कोई और जानना नहीं चाहता – शायद पढ़ने लिखने का रिवाज ही नहीं रह गया है। या हर कोई समझता है कि ज्यादा जानने की जरूरत नहीं है। जितेन्द्र जी को पढ़िए तो सही। यह पोस्ट दिलीप की पोस्ट पढ़वाने के लिए नहीं है। हिन्दी (टेलीविजन) पत्रकारिता पर आपकी जानकारी बढ़ाने के लिए है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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अंग्रेजी अखबार भी खबर की जगह लोरी छापते हैं!

Sanjaya Kumar Singh : कानपुर में पकड़े गए 92 करोड़ रुपए के पुराने नोट वाली खबर का फॉलो अप आज हिन्दुस्तान टाइम्स में भी छपा है। मैं अंग्रेजी अखबारों को हिन्दी वालों के मुकाबले थोड़ा गंभीर मानता हूं और दिल्ली में टाइम्स ऑफ इंडिया के मुकाबले हिन्दुस्तान टाइम्स को। पर ये भी सरकार के भोंपू का ही काम करते हैं।

मूल खबर थी कि कोई व्यक्ति पुराने नोट को बदलवाने का दावा कर रहा था और उसके इस आश्वासन पर देश के भिन्न शहरों से कई लोग आए थे और मूल खबर पर यकीन किया जाए तो यह पैसा किसी एक व्यक्ति का नहीं, कई लोगों का है। इसीलिए 16 लोग गिरफ्तार किए गए हैं। मूल खबर में यह नहीं बताया गया था कि पुराने नोट इस समय तक कैसे बदले जा सकते थे – जबकि रिपोर्टिंग के लिहाज से और मेरे जैसे पाठक के लिए भी यही सवाल सबसे महत्वपूर्ण है।

अभी तक उसकी कोई चर्चा नहीं है जबकि इतना पैसा अगर कई लोगों से इकट्ठा किया गया था तो कोई भरोसेमंद कहानी जरूर बनाई गई होगी और यह कोई बहुत गोपनीय नहीं रहा होगा। वैसे भी कहा जाता है कि जिस बात को तीन लोग जान जाएं वह गोपनीय नहीं रह सकता है। यहां तो 16 लोग जानते ही थे। फिर भी उसपर कोई रोशनी नहीं है।

मूल खबर के फॉलो अप में आज हिन्दुस्तान टाइम्स में छपा है कि इस राशि पर इतना टैक्स बनेगा और चूंकि एक व्यक्ति के घर से पकड़ा गया है इसलिए वही जिम्मेदार होगा, दूसरों से पूछताछ की जाएगी और अगर बाकी लोगों ने अपना स्वीकार नहीं किया तो जिसके घर से बरामद हुआ है उसी का माना जाएगा।

देखना है कि जांच एजेंसियां पुराने नोट रखने से संबंधित नया कानून लागू करती हैं कि नहीं आदि। खास बात यह है कि आज की खबर का शीर्षक यही बनाया गया है कि पकड़े गए दलाल को 483 करोड़ रुपया जुर्माना देना हो सकता है – उसके पास इतने पैसे हैं कि नहीं और नहीं हैं तो सरकार क्या करेगी आदि ज्यादा दिलचस्प और चिन्ताजनक मामलों पर खबर लगभग मौन है।

खबर में बहुत सारी बातें हैं पर यह नहीं है कि नोट बदले कैसे जाते या लोग बदले जाने के झांसे में कैसे आ गए। मजे की बात यह है कि खबर मूल मुद्दे पर तो शांत है अधिकारियों के (यानी ईमानदार सरकार) के दावे को प्रमुखता से छाप रहा है। जैसे कि नए कानून से जिसके यहां पुराने नोट बरामद हुए उसे पांच गुना जुर्माना देना होगा। ये अखबार वाले भी सरकार की तरफ से लोरी गाने और जनता को मीठी नीन्द सुलाने का ही काम कर रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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क्या अमित शाह का इस्तीफा नहीं होना चाहिए?

Sanjay Kumar Singh : सीबीआई जज बीएच लोया की मौत के मामले की स्वतंत्र जांच कराने की याचिका पर जब सुनवाई हो रही है तो क्या भारतीय जनता पार्टी का यह नैतिक दायित्व नहीं है कि वह अपने अध्यक्ष अमित शाह से इस्तीफा मांग ले। जैसा कि कहा जाता है न्याय होना ही नहीं चाहिए, होता हुआ दिखना भी चाहिए। इसी तरह जनता की सेवा का दावा करने वाली पार्टी को क्या न्यूनतम आदर्शों का पालन नहीं करना चाहिए उसपर अमल करते हुए नजर भी आना चाहिए।

मंत्री होना और सरकारी नौकरी में रहना एक बात है और सत्तारूढ़ राजनीतिक दल का अध्यक्ष होना बिल्कुल अलग बात है। पूर्व भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण खुफिया कैमरे में एक फर्जी हथियार डीलर से पैसे लेते पकड़े गए थे तो उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। अबके अध्यक्ष पर हत्या कराने के आरोप हैं, गवाहों को डराने-धमकाने के परिस्थिति जन्य साक्ष्य हैं और सुप्रीम कोर्ट के पांच वरिष्ठतम जजों में से चार ने तकरीबन इसी मामले में ऐसी कार्रवाई की जो देश में अभी तक अनूठा और अकेला है।

दूसरी ओर अमित शाह से संबंधित मामले में राहत देने वाले जज को रिटायरमेंट के बाद राज्यपाल बनाने से लेकर जज लोया से पहले के आदेश और बाद की स्थितियां तथा इतना बड़ा बवाल होने के बाद जज लोया के बेटे का प्रेस कांफ्रेंस कर कहना कि उसे हत्या के मामले में कोई शक नहीं है अमित शाह की ताकत भी बताता है। यही नहीं, जज लोया के बेटे ने पहले भी बांबे हाईकोर्ट में यह बात कही थी फिर प्रेस कांफ्रेंस की जरूरत और उसका समय बहुत कुछ कहता है।

इस मामले में कारवां की खबर जज लोया की बहन और पिता के बयान पर आधारित है। उनकी सुरक्षा का भी सवाल है। इन सारी परिस्थितियों में अगर अमित शाह का कानूनन इस्तीफा देना जरूरी न हो तो क्या नैतिकता का तकाजा नहीं है कि वे स्वयं इस्तीफा दें। और अगर नहीं देते हैं तो क्या पार्टी को पार्टी के आम कार्यकर्ता को यह मांग नहीं करना चाहिए कि निष्पक्ष और बाहरी प्रभाव तथा गवाहों की सुरक्षा के लिए उनका सत्तारूढ़ दल के अध्यक्ष पद से अलग होना जरूरी है।

अमित शाह का अध्यक्ष बने रहना इस समय उनके लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। पार्टी के लिए नहीं है। दूसरी तरफ अगर पार्टी कानून और देश की न्याय व्यवस्था पर विश्वास करती है तो उसे चाहिए कि वह अपने अध्यक्ष को अपने ऊपर लगे आरोपों से मुक्त होने के लिए कहे।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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नौकरी दिलाने वाले एक नामी पोर्टल ने प्रोफाइल बनाने के लिए इस वरिष्ठ पत्रकार से 5,000 रुपए लिए..

Sanjaya Kumar Singh : चपरासी की नौकरी और विधायक के बेटे की सफलता…  70 साल कुछ नहीं हुआ बनाम चार साल खूब काम हुआ… 2002 में जनसत्ता की नौकरी छोड़ने के बाद मुझ नौकरी ढूंढ़ने या करने की जरूरत ही नहीं महसूस हुई। 2011 में साथी Yashwant Singh ने bhadas4media के लिए बीता साल कैसे गुजरा पर लिखने की अपील की थी। तब मैंने लिखा था, “मेरे लिए बीता साल इस लिहाज से महत्त्वपूर्ण है कि इस साल एक ज्ञान हुआ और मुझे सबसे ज्यादा खुशी इसी से हुई। अभी तक मैं मानता था कि जितना खर्च हो उतना कमाया जा सकता है। 1987 में नौकरी शुरू करने के बाद से इसी फार्मूले पर चल रहा था। खर्च पहले करता था कमाने की बाद में सोचता था। संयोग से गाड़ी ठीक-ठाक चलती रही। …. पर गुजरे साल लगा कि खर्च बढ़ गया है या पैसे कम आ रहे हैं। हो सकता है ऐसा दुनिया भर में चली मंदी के खत्म होते-होते भी हुआ हो।

हालांकि, मई 2002 में जनसत्ता की नौकरी छोड़ते समय मैंने यह नहीं सोचा था कि नौकरी नहीं करूंगा या बगैर नौकरी के काम चल जाएगा। पर सात साल कोई दिक्कत नहीं आई। आठवें साल आई तो और भी काफी कुछ सीखने-जानने को मिला पर वह ज्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं है। …. अनुवाद के अपने धंधे से खर्च नहीं चला तो नौकरी के बाजार को टटोलना शुरू किया और पाया कि बहुत खराब स्थिति में भी मैं बगैर नौकरी के घर बैठे जितना कमा ले रहा था उतने की नौकरी आसानी से उपलब्ध नहीं थी (मन लायक तो बिल्कुल नहीं) और जिन साथियों से बात हुई उनसे पता चला कि मैं जो अपेक्षा कर रहा हूं वह ज्यादा है और मुझ जैसी योग्यता वाले के लिए उतने पैसे मिलना संभव नहीं है।”

अब आता हूं 2017 पर और यह पोस्ट लिखने की प्रेरणा पर। इससे पहले आप पढ़ चुके हैं कि चपरासी की नौकरी के लिए कितने और कैसे लोगों के आवेदन आए और आखिरकार वह नौकरी एक विधायक के शाहजादे को मिली। अब इसमें यह महत्वपूर्ण नहीं है कि नौकरी विधायक की सिफारिश से मिली या विधायक का बेटा ही सर्वश्रेष्ठ था। दोनों ही स्थिति अच्छी नहीं है। एक स्थिति पिछले 70 साल के कारण है और दूसरी पिछले लगभग चार साल के कारण। असल में हमारी सरकारें ऐसी ही रही हैं। आप कह सकते हैं कि हम भी ऐसे ही हैं। पर फिलहाल वह मुद्दा नहीं है।

मैं बता चुका हूं कि 2014 में देश में आई ईमानदार सरकार ने एक जुलाई 2017 से जीएसटी लागू किया जो छोटा-मोटा धंधा करने वालों को मार डालने का पुख्ता इंतजाम है। मैंने अपना काम छोड़कर यही बताने की कोशिश की कि मेरे जैसा सामान्य पढ़ा-लिखा, वर्षों से कंप्यूटर पर काम कर रहा व्यक्ति जो ठीक-ठाक कमा भी लेता है, जीएसटी की शर्तें पूरी नहीं कर सकता है तो आम आदमी कैसे करेंगे। सरकारी नियमों के कारण बैंक ने मेरा चालू खाता ब्लॉक कर दिया है क्योंकि 21 साल से चल रही मेरी फर्म की ऐसी कोई पहचान नहीं है जो बैंक की केवाईसी जरूरतें पूरी करे और नया मैं बनवाऊंगा नहीं। जाहिर है उसका असर काम-धंधे और कमाई पर भी पड़ा है। और यह सिर्फ मेरे साथ नहीं हुआ होगा।

2011 के आस-पास जब मैंने नौकरी का बाजार टटोलना शुरू किया था कि नौकरी दिलाने वाले एक नामी पोर्टल ने उस समय 5,000 रुपए में मेरा प्रोफाइल बनाने की पेशकश की थी। प्रोफाइल क्या बनाना था, जो डिग्री और अनुभव होगा वही ना? उसमें बेल-बूटे और फूल-पत्ती आदि तो लगने नहीं थे। पर मैंने ठगी सीखने के लिए बेवकूफ बनना स्वीकार किया और 5000 रुपए खर्च करके प्रोफाइल बनवाया। उस समय मैंने यही सोचा था कि एक इंटरव्यू कॉल भी आ गया (हिन्दी में काम करने के लिए किसी अहिन्दी क्षेत्र यथा कोलकाता, बंगलौर, चेन्नई या हैदराबाद) तो विमान किराए में अपना 5000 रुपया निकल जाएगा। मैं इससे ज्यादा की उम्मीद नहीं कर रहा था। पर आज सात साल में उस प्रोफाइल पर एक इंटरव्यू कॉल भी नहीं आया। आप कह सकते हैं मैंने आवेदन ही नहीं किया होगा। यह आंशिक रूप से सही है पर मुझे नौकरी दे सकने वाले को मेरी सिफारिश करने का काम भी उस 5000 में शामिल था। वैसे भी ये कंपनी तो सही उम्मीदवार ढूंढ़कर कंपनी से कमीशन लेगी ही। तो मैंने भले कोशिश नहीं की, उस कंपनी ने तो की ही होगी। खैर।

उसी कंपनी का एक मेल आज आया। जी हां, सात साल में एक इटरव्यू नहीं करा पाने के बावजूद कंपनी मुझे छोड़ नहीं रही है (उसे लगता होगा मैं 5000 रुपए दे सकने वाला बेवकूफ हूं) और मेल आते रहते हैं। पेशकशें भी। एक बड़े हिन्दी दैनिक के स्थानीय संपादक के लिए भी फोन आया था। मैंने न्यूनतम अपेक्षा बताई और बात खत्म हो गई। फिर भी संपर्क (एकतरफा) बना हुआ है। कंपनी अब (काफी समय से) कह रही है कि मैं कोई कोर्स कर लूं (इस समय, साढ़े 53 साल की उम्र में) तो मुझे नौकरी मिलने की संभावना बढ़ जाएगी। हंसी आती है मैं मेल पढ़ता भी नहीं हूं। क्योंकि जमशेदपुर के एक्सएलआरआई में नौकरी करने वालों की तरक्की के लिए पार्ट टाइम कोर्स हुआ करता था (जो मैं कर सकता था) नहीं करने का अफसोस है और उसकी भरपाई के लिए 2010-11 के दौरान ही एक कोर्स के बारे में पता किया तो कुल खर्च था 17 लाख रुपए। जी हां, 17 लाख रुपए। मैंने तय किया कि बेटे पर इतने पैसे खर्च किए जाएं तो लाभ जल्दी और पक्का होगा। और हुआ। हो रहा है।

सच यही है कि दूरदृष्टि ना हो परिवार छोड़कर शिखर पर पहुंच जाइए या फिर बेटे को चपरासी बनवाइए – अपने लिए तो सब ठीक है पर देश के लिए तो कोई कोर्स कर लीजिए। कब तक हार्ड वर्क का तबला बजवाकर लोगों को ठंड से बचाइएगा।

संजय कुमार सिंह जनसत्ता अखबार में कार्य करने के बाद से अनुवाद की अपनी कंपनी का संचालन कर रहे हैं. उनसे संपर्क https://www.facebook.com/sanjaya.kumarsingh के जरिए किया जा सकता है.

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जीएसटी के खिलाफ लगातार लिखने वाले पत्रकार संजय कुमार सिंह की फर्म का चालू खाता बैंक ने ब्लॉक किया

जीएसटी की प्रयोगशाला की अपनी अंतिम किस्त लिख चुका हैं. यह 100 वीं किस्त है. इसी दरम्यान पता चला कि एचडीएफसी बैंक ने केवाईसी के चक्कर में (मतलब, जीएसटी जैसा कोई पंजीकरण हो) मेरी फर्म का चालू खाता ब्लॉक कर दिया है जबकि नियमतः मुझे किसी पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है। लेकिन अब आयकर रिटर्न व टीडीएस चालू खाता चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है। फिर भी हमें डिजिटल लेन-देन करना है। अभी उससे निपटना है।

जीएसटी पर लिखना मैंने 50 किस्त के बाद ही बंद करना सोचा था पर इतना मसाला था कि 100 किस्तें हो गईं। कुछ और व्यस्तताओं के कारण मैंने जीएसटी की प्रयोगशाला बंद कर दी पर जीएसटी की ही सख्ती में मेरा अकाउंट ब्लॉक हो गया है। मैंने पहले भी कई बार लिखा है कि जीएसटी में छूट का अपेक्षित लाभ नहीं मिलेगा उल्टे इसका दुरुपयोग हो सकता है और छूट देने के अधिकारों का चुनावी लाभ के लिए दुरुपयोग किया जा रहा है। असल में अंतिम लाभार्थी तक कोई लाभ नहीं पहुंच रहा है।

जीएसटी से मेरी शिकायत यही है कि पहले 10 और अब 20 लाख रुपए प्रतिवर्ष तक के कारोबार को जब जीएसटी से मुक्त रखा गया है तो कंप्यूटर पर काम करने के कारण या राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) दिल्ली के गाजियाबाद में रह कर दिल्ली और गुड़गांव के काम कंप्यूटर से करके ई-मेल से भेजने के कारण मुझपर जीएसटी की बाध्यता क्यों हो। यह तकनीक का उपयोग नहीं करने देना है। तकनीकी रूप से इसका कोई मतलब नहीं है। व्यावहारिक तौर पर यह संभव ही नहीं है और पहले भी ऐसी कई कोशिशें नाकाम होती रही हैं पर अभी उस विस्तार में नहीं जाउंगा। फिलहाल राहत की बात यही है कि सरकार ने इन पर छूट दे दी है और अब मेरे जैसे मामलों में जीएसटी पंजीकरण की कोई तकनीकी बाध्यता नहीं है। लेकिन बैंक वालों को यह कौन समझाएगा? लकीर के फकीरों ने मेरा (असल में मेरी पत्नी की फर्म का) खाता ब्लॉक कर दिया है।

कारण यह है कि हमलोग घर से काम करते हैं और घर हमारा अपना है। अगर किराए का होता तो हम मकान मालिक से किराए का करार अपनी फर्म के नाम से करते और बैंक उस करार के आधार पर मान लेता कि मैं अपने किराए के घर से ही अपना कारोबार करता हूं। पर चूंकि घर मेरा अपना है इसलिए ऐसा कोई करार नहीं कर सकता और जरूरत नहीं है तो किराए पर ऑफिस के लिए जगह क्यों लूं? इसी तरह, अगर मैं घर से दुकान चला रहा होता (जो गलत है पर देश भर में खुलेआम चल ही रहे हैं) तो नगर निगम से दुकान और प्रतिष्ठान प्रमाणपत्र या व्यापार लाइसेंस ले लेता – अभी भी ले सकता हूं पर नहीं है इसलिए खाता ब्लॉक है क्योंकि उस पर पैसे (रिश्वत कहिए) खर्च नहीं किए हैं।

बैंक ने ऐसे तमाम दस्तावेजों की सूची दी है जो तीन समूहों में है और मौखिक रूप से कहा गया है कि हरेक समूह का एक दस्तावेज चाहिए। समस्या हमारी इकाई की पहचान और पते को लेकर है क्योंकि हमारे मामले में ऐसे किसी दस्तावेज (दरअसल पंजीकरण) की आवश्यकता नहीं है और हम पर दबाव डाला जा रहा है कि हम कोई पंजीकरण कराएं और उसके नियमों में बंधें। लालफीताशाही के नियंत्रण में आएं। ऊपर मैंने कुछ उदाहरण दिए हैं और जो बाकी विकल्प हैं उनकी चर्चा करें तो आप पाएंगे कि देश में (दरअसल बैंक में) छोटा-मोटा प्रोपराइटरशिप कंसर्न चलाने से आसान है एचयूएफ चलाना। एचयूएफ यानी हिन्दू अविभाजित परिवार। कुछ लोग कहते हैं कि यह सुविधा हिन्दुओं के तुष्टिकरण के लिए है। यहां मैं उस विस्तार में नहीं जाउंगा पर इसकी तुलना प्रोपराइटरशिप कंसर्न से करके बताउंगा कि बाप-दादा के धन पर ऐश करना तो वैसे ही आसान है एचयूएफ की सुविधाएं उसे भोगने की पूरी व्यवस्था करता है और बैंकों ने प्रोपराइटरशिप कंसर्न को उसी के मुकाबले रखकर काम करके पैसा कमाना मुश्किल बना दिया है या बना रहे हैं।

एंटाइटी यानी इकाई के सबूत के रूप में सोल प्रोपराइटरशिप कंसर्न या एचयूएफ से एक ही दस्तावेज मांगे जाते हैं जैसे बिजली, पानी, लैंडलाइन फोन का बिल जो इकाई के नाम पर हो। एचयूएफ के मामले में यह कर्ता यानी परिवार के मुखिया के नाम पर ही होगा और यही पर्याप्त है पर प्रोपराइटरशिप कंसर्न के मामले में यह कंसर्न के नाम से चाहिए। कंसर्न के मुखिया के नाम से नहीं चलेगा। इसी तरह जो भी दस्तावेज बताए गए हैं वे मेरे मामले में आवश्यक नहीं हैं इसलिए नहीं हैं और खाता ब्लॉक है (हालांकि उसमें बहुत पैसा नहीं है)। खास बात यह है कि बैंक इस बात की जांच खुद नहीं करेगा और उसकी चिट्ठियां इस पते पर डिलीवर हो रही हैं पर वह पर्याप्त नहीं है। बैंक वाले आकर भी जांच नहीं करेंगे और ना यह कहने या लिखकर देने से मानेगें कि हम जहां रहेते हैं वहीं से अपना काम भी कर लेते हैं। इसलिए जय जय।

लेखक संजय कुमार सिंह ने जनसत्ता अखबार की नौकरी के बाद 1995 में अनुवाद कम्युनिकेशन AnuvaadCommunication.com की स्थापना की. बहुराष्ट्रीय निगमों और देसी कॉरपोरेट्स के साथ देश भर की तमाम जनसंपर्क व विज्ञापन एजेंसियों के लिए काम करते हुए संजय काफी समय से सोशल मीडिया पर ज्वलंत मुद्दों को लेकर बेबाक लेखन भी करते हैं. संजय से संपर्क sanjaya_singh@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

पूरे प्रकरण को जानने-समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें…

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मौन व्रत वाले सांसद ने अपना पत्र विज्ञापन के रूप में छपवाया है

Sanjaya Kumar Singh : प्रेस की स्वतंत्रता का भाजपाई अर्थ… अमित शाह के बेटे के खिलाफ खबर छपने पर 100 करोड़ का दावा और स्टे। हालांकि बहाल नहीं रह पाया। भाजपा के सबसे पैसे वाले सदस्यों में एक माने जाने वाले राजस्यसभा सदस्य का नाम पैराडाइज पेपर में आने पर एक सप्ताह का मौनव्रत और अगले ही दिन अखबारों के लिए विज्ञापन तैयार हो जाना – बताता है कि भाजपा के नेताओं के लिए प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी का अलग मतलब है। और इसे रोकने के लिए 40 साल पुराना मामला भी अचानक निकल सकता है। आइए, फिलहाल आरके सिन्हा का मामला देखें।

मौन व्रत वाले सांसद ने अपना पत्र विज्ञापन के रूप में छपवाया है। हालांकि, यह विज्ञापन इंडियन एक्सप्रेस में नहीं है। पता नहीं एक्सप्रेस ने छापा नहीं या उसे दिया ही नहीं गया। भाजपा राज में विज्ञापनों का अपना खेल चल रहा है और वह अलग मुद्दा है। विज्ञापन के रूप में छपा आरके सिन्हा का स्पष्टीकरण उनके सांसद के लेटरहेड पर है और राज्यसभा के सभापति व उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू को संबोधित है। इसमें उन्होंने विदेशी कंपनी में शेयर होने के आरोप तो स्वीकार कर लिए हैं पर बताया है कि वह क्यों है और कैसे हुआ तथा कैसे गलत नहीं है। चुनाव के समय की जाने वाली घोषणा में इसका विवरण न होने के बारे में सफाई दी है और कारण बताया है कि नियमतः यह जरूरी नहीं है। श्री सिन्हा का यह स्पष्टीकरण अंग्रेजी और हिन्दी दोनों भाषाओं में प्रकाशित हुआ है।

विज्ञापन के रूप में छपे लेडर हेड पर उन्हें कानून व न्याय मंत्रालय और दूरसंचार मंत्रालय की हिन्दी सलाहकार समिति का सदस्य भी बताया गया है। विकीपीडिया के मुताबिक वे एक भारतीय पत्रकार, राजनीतिज्ञ, सामाजिक उद्यमी हैं और सिक्यूरिटी एंड इंटेलीजेंस सर्विसेज के संस्थापक हैं। अपने पत्र में श्री सिन्हा ने इंडियन एक्सप्रेस पर अनैतिक पत्रकारिता का आरोप लगाते हुए कहा है कि इस अखबार ने दशकों से बरकरार उनकी छवि को निहित स्वार्थों से धूमिल करने की कोशिश की है। श्री सिन्हा ने इंडियन एक्सप्रेस के अध्यक्ष विवेक गोयनका, मुख्य संपादक राजकमल झा और संपादकीय कर्मी रितु सरीन और श्याम लाल यादव के खिलाफ विशेषाधिकार हनन की कार्रवाई शुरू करने का आग्रह किया है।

एक्सप्रेस ने यह खुलासा 6 नवंबर को छापा था और उसी दिन उन्होंने लिखकर बताया था कि वे मौनव्रत पर हैं पर आज (09 नवंबर) छपा जवाब अगले ही दिन यानी 7 नवंबर की तारीख का है। इसमें उन्होंने लिखा है कि इंडियन एक्सप्रेस में रिपोर्ट प्रकाशित होने से पहले पत्र में दिए गए तथ्य “पारदर्शितापूर्ण तरीके से” इंडियन एक्सप्रेस टीम के साथ साझा किए गए थे। इसके बावजूद एक्सप्रेस ने बगैर तथ्यों के भ्रम पैदा करने वाली खबर फैलाई है और निहित स्वार्थों के लिए छवि खराब करने का काम किया है। खास बात यह है कि इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी खबर के साथ बॉक्स में इनका पक्ष भी छापा था और यह सूचना भी लगाई थी कि पूरी प्रतिक्रिया के लिए एक्सप्रेस की साइट देखें। मैंने उनकी प्रतिक्रिया एक्सप्रेस की साइट पर नहीं देखी (मुझे देखने की जरूरत नहीं लगी)।

सिन्हा साब पत्रकार हैं, मुझसे भी पुराने और सीनियर पर मुझे लगता है कि एक्सप्रेस ने जो खबर छापी है वह तथ्यों पर आधारित है और जो छापा है उससे संबंधित उनके पारदर्शी जवाब का अंश भी छाप दिया है। बाकी वेबसाइट पर है। और यह तथ्य वे मान रहे हैं कि विदेशी कंपनी में शेयर है और उसकी जानकारी राज्य सभा चुनाव में नहीं दी गई थी। यही एक्सप्रेस की खबर है फिर भी वे एक्सप्रेस पर प्रेस की आजादी के दुरुपयोग का आरोप लगा रहे हैं। साथ ही कांग्रेस के नेताओं के नाम लेकर कहा है कि दूसरे लोगों को लक्ष्य क्यों नहीं किया जा रहा है। जबकि एक्सप्रेस ने पहले ही दिन लिखा था कि करोड़ों पेज के ये मामले 10 महीने की पड़ताल के बाद छापे जा रहे हैं औऱ अगले 40 दिनों तक छपेंगे। भाजपा की प्रेस की स्वतंत्रता के मायने बिल्कुल अलग लगते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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पैराडाइज पेपर्स ने फोर्टिस-एस्कॉर्ट्स के चेयरमैन डॉ अशोक सेठ की अनैतिकता और लालच का किया खुलासा

सिंगापुर की स्टेंट बनाने वाली कंपनी ने डा. अशोक सेठ को अपने शेयर दिए और डॉ. सेठ ने अपने मरीजों को यही स्टेंट लगवाने की सिफारिश की.. इस तरह प्राप्त शेयरों से लाभ कमाया.. कंपनी का नाम बायोसेंसर्स इंटरनेशनल ग्रुप है… यह मामला चिकित्सा पेशे में शीर्ष स्तर की अनैतिकता और लालच को दर्शाता है जहां मरीज का हित प्रमुख नहीं बल्कि डाक्टर और अस्पताल का लाभ सर्वोच्च हो गया है…

-संजय कुमार सिंह-

इंडियन एक्सप्रेस ने विदेशी कंपनियों में धन जमा करने के मामलों का अब तक का सबसे बड़ा खुलासा किया है। खोजी पत्रकारों के अंतरराष्ट्रीय संघटन की इस खोज में 714 भारतीय लिंक मिले हैं और ऐसी फर्में भी हैं जिनकी जांच सीबीआई कर रही है। अखबार इससे पहले पनामा पेपर छाप चुका है। इसे पैराडाइज पेपर नाम दिया गया है। अखबार का दावा है कि इस जांच में उसने 10 महीने लगाए हैं और 13.4 मिलियन (एक करोड़ 34 लाख) दस्तावेजों की जांच की है। इसके लिए 195 समाचार संगठनों के साथ मिलकर काम किया है। इनमें दि गार्जियन, बीबीसी (यूके), दि न्यूयॉर्क टाइम्स (अमेरिका), ओसीसीआरपी (रूस), ली मोन्डे (फ्रांस) , ईआई कांफिडेंशियल (स्पेन), एबीसी फोर कॉर्नर्स (ऑस्ट्रेलिया), सीबीसी/रेडियो (कनाडा), ला नैसियॉन (अर्जेन्टीना) शामिल हैं।

अखबार ने पहले पन्ने पर अपनी इस खबर को पूरे आठ कॉलम में बैनर बनाया है और उन्नी का कार्टून, “बिजनेस ऐड यूजुअल” भी लीड के साथ आ गया है. सिंगल कालम का यह छोटा सा कार्टून आज मारक है। इसमें 8 नवंबर को नोटबंदी दिवस के रूप में याद किया गया है और कहा गया है, “गुड मॉर्निंग! प्रकाश ध्वनि से थोड़ा पहले पहुंच गया है”। इसका मतलब बहुत गहरा है और समझने की जरूरत है, इसे समझाया नहीं जा सकता है। खासकर तब जब नोटबंदी का कोई फायदा दिखा नहीं सिर्फ बताया जाता रहा है और उसमें यह भी कि करोड़ों लोगों की जांच चल रही है। दो सौ लोगों को मारकर साल भर से जांच चल रही है और जैसा कि एक्सप्रेस के कार्टून में कहा गया है प्रकाश की किरण वहां से आ रही है, आवाज कहीं और से बाद में आएगी – यह विज्ञान है। लेकिन इसी को काबिलयत बना कर पेश करने का भी एक अंदाज है। संयोग से, आज इंडियन एक्सप्रेस के शुरू के पन्नों में विज्ञापनों का जैकेट नहीं है। इसलिए पढ़ना भी सुविधाजनक है और देखने में भी आज इंडियन एक्सप्रेस अपने पुराने तेवर में लग रहा है। एक्सप्रेस का यह खुलासा अभी जारी है। अखबार के कई पन्ने रंगने के बाद अभी आगे भी मसाला आएगा।    

इंडियन एक्सप्रेस ने अपने खुलासे में पहले पेज पर फोर्टिस के डॉक्टर अशोक सेठ का मामला भी छापा है। शीर्षक में ही कहा गया है कि डॉ. सेठ अपने मरीजों के लिए जिस कंपनी के स्टेंट का उपयोग करते थे उन्हें उसके शेयर मिले थे। इस खबर के साथ डॉ अशोक सेठ की फोटो है और कैप्शन लगा है नो रांग डुइंग, क्लेम्स कार्डियोलॉजिस्ट अशोक सेठ। यानी कोई गलत काम नहीं, हृदय रोग विशेषज्ञ अशोक सेठ ने दावा किया। ऋतु सरीन की इस खबर के मुताबिक जांचे गए दस्तावेजों के एक सेट में यह हितों के संभावित टकराव के रूप में सामने आता है। इंडियन एक्सप्रेस ने रिकार्ड की जांच के बाद लिखा है कि पद्मभूषण और पद्मश्री से सम्मानित, फोर्टिस-एस्कॉर्ट्स के चेयरमैन डॉ अशोक सेठ को 2004 में सिंगापुर आधार वाली एक कंपनी जो स्टेंट बनाती है, ने पूंजी बाजार में जाने से पहले अपने शेयर दिए थे। बाद में डॉ. सेठ ने अपने मरीजों को यही स्टेंट लगवाने की सिफारिश की और प्राप्त शेयरों से लाभ कमाया। कंपनी का नाम बायोसेंसर्स इंटरनेशनल ग्रुप है। यह इंटरवेंशन कार्डियोलॉजी और क्रिटिकल केयर प्रक्रियाओं के लिए चिकित्सा उपकरणों का निर्माण और उनका विपणन करती है। कंपनी की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक,  बायोसेंसर्स इंटरनेशनल ग्रुप लिमिटेड का निगमन बरमुडा में 28 मई 1998 को हुआ था और यह सिंगापुर में पंजीकृत है।

इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि संपर्क करने पर डॉ.सेठ ने बताया कि उन्होंने तीन साल तक बायोसेंसर्स के शेयर अपने पास रखे और 54 लाख रुपए का मुनाफा कमाकर बेच दिया। डॉ. सेठ का दावा है कि जब तक कंपनी के शेयर उनके पास रहे उन्होंने इसका उपयोग उनका दावा है कि अपने टैक्स रिटर्न में उन्होंने इसकी घोषणा की है। अखबार की खबर में हितों के टकराव आदि का विस्तार से विवरण है। जब मेरे पास कंपनी के शेयर थे (कंपनी ने आवंटित 2004 में किए थे पर इन्होंने लिया अप्रैल 2013 में पर उसी कीमत में, ठीक से समझने के लिए एक्सप्रेस की पूरी खबर देखें) तब मैंने सिर्फ सिर्फ सात बायोमेट्रिक्स स्टेंट लगाए। डॉ. सेठ का कहना है कि उनके पास कंपनी के शेयरों की संख्या बहुत मामूली थी पर इसे हितों का टकराव माना जा सकता है इसलिए जब मेरे पास शेयर थे तब मैंने बायोसेंसर्स के उत्पादों का उपयोग नहीं किया।

इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी मूल खबर में लिखा है, तेजी से अंतरराष्ट्रीय हो रही दुनिया में कॉरपोरेट पुनर्गठन या विस्तार के लिए विदेशी इकाई की स्थापना भले ही अवैध न हो पर एक अहम मुद्दा तो है ही कि कैसे कुछ विदेशी फर्में (यहां ऐप्पलबाई का जिक्र है) बहुराष्ट्रीय निगमों को कानून में गड़बड़ियों या चूक का लाभ उठाने का मौका देती हैं जिससे वे अपने देश में जायज टैक्स देने से बच जाती हैं। इसलिए पैराडाइज पेपर्स नियामक एजेंसियों के लिए जांच के दरवाजे खोलती हैं ताकि वे तय करें कि ये सौदे अथवा लेन-देन संबंधित देश के कायदे कानूनों के मुताबिक वैधानिक और विधिवत हैं कि नहीं। यहां सवाल उठता है कि एक्सप्रेस ने जब पनामा पेपर्स की रिपोर्ट छापी थी उसकी ही कौन सी जांच हुई और क्या फर्क पड़ा।

उल्टे, नोटबंदी की बरसी पर सरकार बता रही है कि एक साल से (नोटबंदी से मिले) कितने लोगों की जांच चल रही है और नोटो की गिनती की तरह जारी है। कार्रवाई करने में कितना समय लगेगा या कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है समझा जा सकता है। अखबार की खबर के मुताबक, लीक हुए डाटा में 180 देशों का प्रतिनिधित्व है उसमें भारत का स्थान, नामों की संख्या के लिहाज से 19वां हैं (इसका ईज ऑफ बिजनेस से संबंध है कि नहीं, राम जाने)। कुल मिलाकर 714 भारतीयों के नाम हैं। यह दिलचस्प है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐप्पलबाई के दूसरे सबसे बड़े क्लाइंट होने का श्रेय एक भारतीय कंपनी सन ग्रुप को है जिसकी स्थापना नंद लाल खेमका ने की है। इस कंपनी की 118 इकाइयां अलग-अलग देशों में हैं।

ऐप्पलबाई के भारतीय ग्राहकों में कई प्रमुख कॉरपोरेट और कंपनियां हैं जिनकी बाद में सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसी जांच भी कर रही है। और इस जांच का आलम यह है कि सीबीआई का भेजा एक लेटर रोगेटरी ऐप्पलबाई के पास पहुंच चुका है। कॉरपोरेट के अलावा जो नाम हैं उनमें अमिताभ बच्चन, नीरा राडिया और फिल्म स्टार संजय दत्त की पत्नी शामिल हैं। एक नया नाम जो मुझे चौंकाने वाला लगा वह सिक्यूरिटी एंड इंटेलीजेंस सर्विसेज (एसआईएस) के संस्थापक और भाजपा के राज्य सभा सदस्य आरके सिन्हा से जुड़ी है। नाम तो जयंत सिन्हा, सचिन पायलट और कार्ति चिदंबरम के भी हैं पर मेरे लिए ताज्जुब वाला नाम आरके सिन्हा का ही है।  

लेखक संजय कुमार सिंह ने जनसत्ता अखबार की नौकरी के बाद 1995 में अनुवाद कम्युनिकेशन AnuvaadCommunication.com की स्थापना की. बहुराष्ट्रीय निगमों और देसी कॉरपोरेट्स के साथ देश भर की तमाम जनसंपर्क व विज्ञापन एजेंसियों के लिए काम करते हुए संजय काफी समय से सोशल मीडिया पर ज्वलंत मुद्दों को लेकर बेबाक लेखन भी करते हैं. संजय से संपर्क sanjaya_singh@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.


ओमिडयार नेटवर्क को लेकर पांडो डॉट कॉम पर प्रकाशित खबर के जयंत सिन्हा वाले हिस्से का पूरा हिंदी अनुवाद, संजय कुमार सिंह के सौजन्य से, पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें : 

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जयंत सिन्हा, ईबे, पियरे ओमिडयार, नरेंद्र मोदी और बाहरी पूंजी का भारतीय चुनाव में खुला खेल!

ओमिडयार नेटवर्क को लेकर पांडो डॉट कॉम पर प्रकाशित खबर के जयंत सिन्हा वाले हिस्से का पूरा हिंदी अनुवाद वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह के सौजन्य से पढ़ें…

केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद pando.com पर Mark Ames ने 26 मई 2014 को लिखा था- “भारत में चुनाव के बाद एक कट्टरपंथी हिन्दू सुपरमैसिस्ट (हिन्दुत्व की सर्वोच्चता चाहने वाले) जिसका नाम नरेन्द्र मोदी है, को सत्ता मिल गई है। इसके साथ ही व्हाइट हाउस के प्रवक्ता जय कारने (यहां भी जय) ने कहा है कि ओबामा प्रशासन एक ऐसे व्यक्ति के साथ “मिलकर काम करने का इंतजार कर रहा है” जो अल्पसंख्यक मुसलमानों (और अल्पसंख्यक ईसाइयों) के घिनौने जनसंहार में भूमिका के लिए 2005 से अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट (विदेश विभाग) के वीजा ब्लैकलिस्ट में है।

इस शुरुआती पैरा ग्राफ से आपको लेखक, पांडो डॉट कॉम के तेवर और लेख का अंदाजा हो जाएगा। इसमें केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल पूर्व वित्त मंत्री और भाजपा नेता यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा के बारे में लिखा था, पांडो के पाठक जानते हैं कि ओमिडयार (Omidyar Network) नेटवर्क ईबे के अरबपति पियरे ओमिडयार की लोकोपकारी शाखा है। 2009 से ओमिडयार नेटवर्क ने भारत में अपने पोर्टफोलियो के किसी अन्य देश की तुलना में ज्यादा निवेश किया है। ये निवेश मुख्य रूप से जयंत सिन्हा की बदौलत हैं जो मैकिन्जी के पूर्व साझेदार और हावर्ड के एमबीए हैं जिसे अक्तूबर 2009 में ओमिडयार नेटवर्क इंडिया एडवाइजर्स को चलाने के लिए नौकरी पर रखा गया था।

सिन्हा के कार्यकाल में ओमिडयार नेटवर्क ने अपने निवेश का बड़ा हिस्सा भारत की ओर घुमा दिया। इस तरह 2013 तक भारत में निवेश ओमिडयार नेटवर्क के प्रतिबद्ध कोष का 18 प्रतिशत जो 600 मिलियन डॉलर से ज्यादा था हो चुका था। इसमें इसके पोर्टफोलियो की कुल कंपनियों का 36 प्रतिशत शामिल था। इस साल श्री सिन्हा ने ओमिडयार नेटवर्क की नौकरी छोड़ दी ताकि मोदी के चुनाव अभियान में सलाह दे सकें और भाजपा के टिकट पर एक संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ सकें। सिन्हा के पिता यशवंत सिन्हा ने 1998 से 2002 तक पिछली भाजपा सरकार में वित्त मंत्री के रूप में काम किया था जब उनकी सरकार ने परमाणु बम का परीक्षण किया था। इस साल सिन्हा के पिता ने अपनी संसदीय सीट छोड़ दी और बेटे जयंत सिन्हा को अपनी जगह लेने दी।

चुनाव प्रचार के दौरान जयंत सिन्हा के पिता यशवंत सिन्हा ने गुजरात दंगों के लिए नरेन्द्र मोदी द्वारा माफी मांगने से मना किए जाने का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया था। तब उन्होंने कहा था, “मोदी सही हैं … वे माफी क्यों मांगें?”  ओमिडयार के पूर्व कर्मचारी उनके बेटे जयंत सिन्हा ने (जब लेख लिखा गया था उससे कुछ सप्ताह पहले) दावा किया कि उनके पिता की भाजपा सरकार ने 1998 में अंतरराष्ट्रीय नाराजगी को नजरअंदाज कर परमाणु बम का परीक्षण किया जिसे पोखरण के नाम से जाना जाता है। मोदी को चुनाव जीतने में सहायता करने के लिए जयंत सिन्हा के ओमिडयार नेटवर्क छोड़ने के कुछ ही समय बाद मोदी ने एक भाषण दिया जिसमें भारत के ई कामर्स बाजार को ई-बे जैसी विदेशी कंपनियों के लिए खोलने की मांग की। ईबे के सबसे बड़े शेयरधारक पियरे ओमिडयार हैं।

संदेश स्पष्ट था- मोदी हाईटेक इंडिया के उम्मीदवार हैं, हिंसक अतिराष्ट्रवाद के बावजूद। इसी समय सिन्हा ने मोदी और बड़े अंतरराष्ट्रीय निवेशकों जैसे जेपी मोरगन, मोरगन स्टैनली और नोमुरा बैंक के बीच एक समिट मीटिंग का आयोजन करने में सहायता की। संभवत: इसमें चौंकने वाली कोई बात नहीं है कि मोदी के अति राष्ट्रवादी प्रयासों की सवारी करके पिछले सप्ताहांत (लेख पुराना है, उसके हिसाब से) जब जयंत सिन्हा चुनाव जीत गए तो ओमिडयार नेटवर्क ने उन्हें बधाई दी।  इसके कुछ ही समय बाद ओमिडयार के पूर्व कर्मी (पुराने आदमी भी कह सकते हैं) ने जोर देकर कहा कि, “श्री मोदी एक महान लोकतांत्रिक (हस्ती) हैं।”

इसके बाद pando.com पर Mark Ames ने ही 9 नवंबर  2014 को (नोटबंदी के बाद) एक और दिलचस्प पीस लिखा था। इसका शीर्षक था, भारत में पियरे ओमिडयार का आदमी मोदी मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। दूसरा शीर्षक था, ईबे के अरबपति पियरे ओमिडयार के ग्लोबल इंपैक्ट फंड में लंबे समय तक सीनियर एक्जीक्यूटिव रहे जयंत सिन्हा को भारतीय अतिराष्ट्रवादी नेता नरेन्द्र मोदी के मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है।  बोल्ड अक्षर में अपडेट के साथ शुरू होने वाली कहानी इस प्रकार थी – सिन्हा (जयंत) का नया पद स्पष्ट बता दिया गया है – वो अब भारत के जूनियर वित्त मंत्री हैं। वित्त मंत्री अरुण जेटली के तहत काम कर रहे हैं। लंबे समय तक ओमिडयार का आदमी रहा व्यक्ति अब इस स्थिति में है कि 2015 का बजट तैयार करने में सहायता करेगा जिसके बारे में (प्रधानमंत्री) नरेन्द्र मोदी ने (हिन्दुस्तान टाइम्स के मुताबिक) संकेत दिया है कि “बदलाव लाने वाला” होगा। 

जयंत सिन्हा ने 2009 में ओमिडयार नेटवर्क इंडिया एडवाइजर्स की स्थापना की थी और फर्स्ट लुक मीडिया पब्लिशर्स इंपैक्ट फंड में साझेदार और प्रबंध निदेशक के रूप में काम किया। सिन्हा ने ओमिडयार नेटवर्क की पांच सदस्यों वाली ग्लोबल एक्जीक्यूटिव कमेटी में भी काम किया था तथा ओमिडयार नेटवर्क के 100 मिलियन डॉलर से ज्यादा के फंड को भारत की ओर मोड़ दिया था। इस तरह इसे दुनिया के सबसे बड़े, 700 मिलिय़न डॉलर के इंपैक्ट फंड के लिए सबसे सक्रिय अकेले देश का निवेश बनाया था।  इस साल के शुरू में ओमिडयार नेटवर्क के साझेदार और प्रबंध निदेशक का पद छोड़ दिया था ताकि धुर दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर अपने पिता की संसदीय सीट से चुनाव लड़ सकें।

अब मोदी मंत्रिमंडल में सिन्हा की नियुक्ति ने उन्हें पिछले दो सप्ताह में किसी दक्षिण पंथी, कारोबार समर्थक सरकार में सत्ता तक पहुंचने वाली दूसरी ओमिडयार हस्ती बना दिया है।  
पांडो डॉट कॉम ने आगे लिखा है, जैसा पांडो डेली पूरे साल सूचित करता रहा है, जयंत सिन्हा और उनके बॉस, ओमिडयार भारतीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों से एक अस्वाभाविक दोहरी भूमिका निभाते रहे हैं और लोकोपकारी दिखने वाले काम सोच-समझ कर राजनीतिक निवेश के रूप में किए गए हैं जो सिन्हा के राजनैतिक अभियान का हिस्सा रहा है।

ओमिडयार के ऐसे ग्रांट में से कुछ लाभ के लिए किए गए निवेश थे। जैसे एसकेएस माइक्रोफाइनेंस जैसी माइक्रोफाइनेंस फर्म में ओमिडयार निवेश जिसका समापन बहुत ही घातक ढंग से हुआ जब एसकेएस के कर्ज वसूलने वालों ने जोर लगाया और उनपर सैकड़ों गरीब ग्रामीणों को आत्महत्या के लिए मजबूर करने का आरोप लगा। इन लोगों ने कीटनाशक पीकर, डूबकर और अन्य तरीकों से आत्महत्या कर ली थी। ओमिडयार सिन्हा का एक और निवेश गैर सरकारी संगठनों में गया जिसने धुर दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर अच्छी तरह काम किया जब वह विपक्ष में थी और यह काम खासतौर से पिछली (सेंटर-लेफ्ट) सरकार के भ्रष्टाचार पर ध्यान केंद्रित करने का था  जो 2007 से इस साल तक लगातार सत्ता में बनी रही।

भाजपा ने इस साल का चुनाव भ्रष्टाचार के विरोध के दम पर जीता और ओमिडयार सरकार ने भारत के सबसे प्रमुख भ्रष्टाचार विरोधी गैर सरकारी संगठनों के अभियान, “आई पेड अ ब्राइब” के लिए धन मुहैया कराया।  2010 में सिन्हा और ओंमिडयार नेटवर्क ने एक भारतीय गैरसरकारी संगठन, जनाग्रह को तीन मिलियन डॉलर दिए ताकि वह  “आई पेड अ ब्राइब” अभियान चला सके। इस खबर में भी जयंत सिन्हा ओमिडयार नेटवर्क की मिलीभगत का जिक्र है तथा गैर सरकारी संगठनों को आर्थिक सहायता तथा उसकी शैली का विवरण है। इसमें अजीत डोभाल के साथ मिलकर इंडिया फाउंडेशन चलाना शामिल है। 

इसी खबर में आगे बताया गया है कि सिन्हा और ओमिडयार से धन पाने वाला एक और गैर सरकारी संगठन 2012 में सांसदों को देश के सख्त ई कामर्स कानून के संबंध में अवैध रूप से प्रभावित करता पकड़ा गया था। उस समय भारत की सर्वोच्च सुरक्षा एजेंसी ने इस एनजीओ की निन्दा की थी और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घातक कहा था तथा विदेशी खुफिया एजेंसी को छिपकर काम करने और भारत सरकार में घुसपैठ करने में सहायता करने का आरोप लगाया था और इसका पंजीकरण रद्द कर दिया था (इस एनजीओ का नाम नहीं है)।

इस मामले के पकड़े जाने के बाद संबंधित एनजीओ के सह-संस्थापक सीवी मधुकर को ओमिडयार ने नौकरी पर रख लिया। अब वे “सरकारी पारदर्शिता” में  ओमिडयार नेटवर्क इंडिया के डायरेक्टर ऑफ इनवेस्टमेंट हैं। इस बीच सिन्हा अपना काम करते रहे हैं … जिससे ओमिडयार को प्रत्यक्ष लाभ होता है जो अभी भी ईबे के चेयरमैन हैं। … जून (2014 में) के शुरू में मोदी और सिन्हा के चुनाव जीतने के बाद, मोदी की नई सरकार ने ईबे साथ-साथ अमैजन और गूगल के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया था ताकि भारत के ई कामर्स कानून लिखने में सहायता की जा सके।

अनुवादक संजय कुमार सिंह ने जनसत्ता अखबार की नौकरी के बाद 1995 में अनुवाद कम्युनिकेशन AnuvaadCommunication.com की स्थापना की. बहुराष्ट्रीय निगमों और देसी कॉरपोरेट्स के साथ देश भर की तमाम जनसंपर्क और विज्ञापन एजेंसियों के लिए काम करते रहे संजय लंबे समय से सोशल मीडिया पर ज्वलंत मुद्दों को लेकर बेबाक लेखन करते हैं. संजय से संपर्क sanjaya_singh@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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लेखक, पत्रकार, चित्रकार, फ्रीलांसर… सब जीएसटी के दायरे में!

संजय कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

वैसे तो मीडिया संस्थान, अस्पताल और शिक्षा संस्थान अपने मूल कार्यों के लिए जीएसटी से मुक्त हैं पर ज्यादातर मामलों में अन्य संबंधित सेवाएं देने या प्राप्त करने के लिए जीएसटी पंजीकरण आवश्यक है। बहुत सारे लेखक पत्रकार अभी तक यह माने बैठे हैं कि जीएसटी उनके लिए नहीं है। पर है और बहुत स्पष्ट रूप से है। असल में आरएनआई से पंजीकृत मीडिया संस्थान जीएसटी में नहीं हैं और अखबार या पत्रिकाओं (उत्पाद) पर जीएसटी नहीं है इसलिए जीएसटी की आंच फ्रीलांसर्स तक पहुंचने में अभी समय लगेगा। मेरे ज्यादातर ग्राहक कॉरपोरेट और पीआर एजेंसी हैं इसलिए मुझे सबसे पहले काम मिलना बंद हो गया। जुलाई में जो काम हुआ उसका पर्चेज ऑर्डर अब आना शुरू हुआ है। और काम नहीं आ रहा है सो अलग। संक्षेप में यही समझिए कि गाड़ी पूरी तरह पटरी से उतर चुकी है।

अखबारों और मीडिया संस्थाओं के लिए काम करना जीएसटी मुक्त नहीं है। सिर्फ खबर भेजना अपवाद है और इसके लिए जीएसटी पंजीकरण जरूरी नहीं है। आप सोच सकते हैं कि कुछ ना कुछ रास्ता निकल जाएगा नहीं तो मीडिया संस्थान नकद तो दे ही सकता है। पर ऐसा कुछ भी संभव नहीं है। एक तो अब नकद देना-लेना मुश्किल होता जा रहा है या कहिए बैंक के जरिए पैसे लेना-देना अपेक्षाकृत आसान है। दूसरे, कोई भी संस्थान या व्यक्ति आयकर के लिए अपने खर्चों का हिसाब रखता है। इसलिए नकद देकर भी काम कराएगा तो खर्चा दिखाना ही पड़ेगा और वह जीएसटी के नियमों का उल्लंघन होगा। इसे ऐसे समझिए कि कोई भी संस्थान या व्यक्ति अपना खर्च ना दिखाए तो आयकर में फंसे और दिखाए तो जीएसटी में फंसे। सबको चोर मानने वाली सरकार ने कोई रास्ता नहीं छोड़ा है। इसे आप सरकार की प्रशंसा मान सकते हैं।

वैसे भी, ज्यादातर लेखक, पत्रकार, फ्रीलांसर किसी एक अखबार में तो लिखते नहीं हैं और ना ही एक राज्य की पत्रिकाओं में। और नियम है कि दूसरे राज्य के अपंजीकृत सेवा प्रदाताओं से सेवा न ली जाए। इसलिए, नियमों में छूट को एक अप्रैल से आगे बढ़ाया नहीं गया तो देर-सबेर जीएसटी पंजीकरण जरूरी हो जाएगा। ऐसी हालत में मीडिया संस्थानों की मजबूरी है कि वे फ्रीलांसर्स से जीएसटी पंजीकरण कराने के लिए कहें और पंजीकरण न होने पर देर सबेर आपको छापना बंद कर दें। क्योंकि रिकार्ड में कोई कब तक गलती या गैर कानूनी काम करता रहेगा। जहां तक जीएसटी पंजीकरण के झंझट और खर्चों का सवाल है फ्रीलांसिंग की कमाई से उसका खर्चा उठाना संभव नहीं है। दूसरी ओऱ, मीडिया वाले क्यों लेख और विचार छाप कर झंझट में पड़ेंगे। वे भी सिर्फ खबरें छापने लगेंगे।

इससे राहत तभी मिलेगी जब नियम बदले जाएं। याद रखें, छह अक्तूबर को घोषित छूट अस्थायी हैं। अगर आप एनसीआर से कोई छोटी बड़ी पत्रिका निकालते हैं और गाजियाबाद, दिल्ली और गुड़गांव के फ्रीलांसर, चित्रकार, कलाकार, प्रूफ रीडर की सेवाएं लेते हैं तो नियमतः सबका जीएसटी पंजीकृत होना जरूरी है। इस संबंध में Pankaj Chaturvedi जी ने फेस बुक पर लिखा है, “जीएसटी में बदलाव नहीं हुए तो प्रकाशन उद्योग से जुड़े लोग भूखे मरेंगे। विडंबना है कि कोई भी प्रक्षक संघ इस पर आवाज़ नहीं उठा रहा हैं। जीएसटी में मुद्रित पुस्तक को तो मुक्त रखा गया है लेकिन कागज़ तो ठीक ही है, प्रूफ रीडिंग, सम्पादन, चित्रांकन जैसे कार्यों के भुगतान पर जीएसटी अनिवार्य कर दिया गया है। पिछले दिनों 16 साल से मेरे साथ काम कर रहे एक प्रूफ रीडर मेरे पास आये, उनसे मैंने भुगतान के लिए जीएसटी में पंजीयन के लिए कहा, उन्होंने कहा- यह काम मेरा मुफ्त में मान लेना, मैं इस झंझट में नहीं पड़ सकता।

“असल में नियम है कि दो-पांच हज़ार का कार्य करने वाले ऐसे लोग भी अपने बिल में अठारह प्रतिशत जीएसटी क्लेम करें, फिर वे इस राशि को खुद जमा करवाएं, फिर उसका रिटर्न फाइल करते रहें। जाहिर है कि चित्रकार या प्रूफ का कार्य करने वाले के पास ना तो इतना समय है, न कमाई और ना ही अनिवार्य जीएसटी का तकनीकी ज्ञान। नतीजतन इस तरह के काम करने वाले कुछ और करने लगेंगे और येन केन प्रकारेन पुस्तकों को तैयार करने में बड़ा नुकसान होगा। हिंदी के प्रकाशक वैसे ही आर्थिक दवाब में हैं। पुस्तक मेले आदि में सहभागिता के लिए भी जीएसटी लगने से स्टाल का किराया बढ़ गया हैं। मेरी जानकारी में कई ऐसे प्रकाशन गृह है जो बंद होने जा रहे हैं। उनमें कुछ हिंदी-अंग्रेजी की पाठ्य पुस्तकें छापने वाले भी हैं। ऐसे में प्रूफ, चित्र, अनुवाद जैसे अस्थायी कार्य करने वालों का विमुख होना खतरे की घंटी है।”

लेखक संजय कुमार सिंह ने जनसत्ता अखबार की नौकरी के बाद 1995 में अनुवाद कम्युनिकेशन AnuvaadCommunication.com की स्थापना की. बहुराष्ट्रीय निगमों और देसी कॉरपोरेट्स के साथ देश भर की तमाम जनसंपर्क और विज्ञापन एजेंसियों के लिए काम करते रहे संजय एक जुलाई 2017 से जीएसटी लागू होने के बाद परेशान हो गए. वह जीएसटी को जानने-समझने की अपनी कोशिश और अनुभव को वे रोज फेसबुक पर लिखते हैं और अभी तक 75 से ज्यादा किस्त लिख चुके हैं. संजय से संपर्क sanjaya_singh@hotmail.com के जरिए कर सकते हैं.

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पत्रकारिता फील्ड में आने वालों, इस किताब को पढ़ लो… फिर न कहना- ‘ये कहां फंस गए हम!’

पत्रकारिता की दुनिया को ‘संजय’ की नजर से देखने-समझने के लिए ‘पत्रकारिता – जो मैंने देखा, जाना, समझा’ को पढें…

वरिष्ठ पत्रकार और उद्यमी संजय कुमार सिंह की पुस्तक “पत्रकारिता – जो मैंने देखा, जाना, समझा“ उन तमाम लोगों के लिए आंख खोलने वाली है, जो आज भी पत्रकारों में बाबूराव विष्णु पड़ारकर या गणेश शंकर विद्यार्थी देखते हैं और जो ग्लैमर से प्रभावित होकर पत्रकारिता को पेशा बनाना चाहते हैं। यह सच है कि चीजें जैसी दिखाई पड़ती हैं, उनको वैसी ही वही मान ले सकता है जिसके पास अंतर्दृष्टि नहीं होगी। पर जिसके पास अंतर्दृष्टि है वह चीजों को उसके अंतिम छोर तक देखता है। चीजें जैसी दिखती हैं, वह उसे उसी रूप में कदापि स्वीकार नहीं करता। चिंतन-मनन करता है और अपनी अंतर्दृष्टि से सत्य की तलाश करता है।

(पुस्तक लेखक संजय कुमार सिंह. उपर है संजय की किताब का कवर पेज)


इस पुस्तक के लेखक ने भी अपनी इसी अंतर्दृष्टि से तस्वीर के दूसरे पहलू को सामने लाने का प्रयास किया है और मैं कह सकता हूं कि लेखक इसमें कामयाब है। वह इस पुस्तक के माध्यम से अपने तीन दशकों से ज्यादा के पत्रकारीय अनुभवों के आधार पर नई पीढ़ी के पत्रकारों या पत्रकारिता को पेशा बनाने की इच्छा रखने वाले युवाओं को इस पेशे की हकीकत से रू-ब-रू कराकर यह समझाने में सफल हैं कि करियर के लिहाज से यह पेशा कैसे ठीक नहीं है।

अस्सी के दशक में हिंदी पत्रकारिता को नया आयाम देने वाले “जनसत्ता” के संपादक प्रभाष जोशी ने इस पुस्तक के लेखक संजय कुमार सिंह के साथ हुई एक घटना का हवाला देते हुए संपादकीय लिखा था – “तेजाब से बची आंखें।”…और कहा था कि ये आंखें राह दिखाएंगी। उनकी यह टिप्पणी भले किसी और संदर्भ में थी। पर मैं आज देख रहा हूं कि संजय कुमार सिंह की अंतर्दृष्टि वाकई नई पीढ़ी को राह दिखा रही है।

यह आदर्श स्थिति है कि पत्रकारिता ऐसी हो जो मनुष्य के पूरे व्यक्तित्व का पोषण करे। यानी उसके शरीर, मन और आत्मा को पुष्ट करे। दूसरे शब्दों में पत्रकारिता ऐसी हो जो बेहतर मनुष्यता को निर्मित करने में संलग्न हो, सिर्फ घटनाओं के वृतांत इकट्ठे न करे। पर यह पुस्तक इस सत्य से बखूबी पर्दा हटाती है कि बदलते परिवेश में पत्रकारिता जैसी वीभत्स दिखती है, उससे भी गई-बीती है। पत्रकारों को इस स्थिति में ला खड़ा किया गया है कि उसे कुछ नकारात्मक नहीं मिलता है तो वह उसे पैदा करने की कोशिश में रहता है। कह सकते हैं कि उनके सामने हर प्रकार के झूठ निर्मित करने की मजबूरी है।

मुझे उम्मीद है कि यह पुस्तक पत्रकारिता के बाहरी स्वरूप को देखकर उसे अपना कैरियर बनाने का सपना देखने वाले युवाओं को नई दृष्टि प्रदान करेगी। इसके बावजूद जो युवा पत्रकारिता को पेशा बनाएंगे तो उन्हें इस बात का मलाल नहीं होगा कि क्या सोचा था और क्या हो गया। अच्छी बात है कि यह पुस्तक Amazon पर भी उपलब्ध है। सुविधा के लिए उसका लिंक नीचे दिया जा रहा है। लेकिन उसके पहले, description पर इस किताब के बारे में जो description दिया गया है, उसे पढ़ें…

‘स्वतंत्रता मिलने के बाद देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित हुई। प्रकारांतर में अखबारों की भूमिका लोकतंत्र के प्रहरी की हो गई और इसे कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका के बाद लोकतंत्र का ‘चौथा स्तंभ’ कहा जाने लगा। कालांतर में ऐसी स्थितियाँ बनीं कि खोजी खबरें अब होती नहीं हैं; मालिकान सिर्फ पैसे कमा रहे हैं। पत्रकारिता के उसूलों-सिद्धांतों का पालन अब कोई जरूरी नहीं रहा। फिर भी नए संस्करण निकल रहे हैं और इन सारी स्थितियों में कुल मिलाकर मीडिया की नौकरी में जोखिम कम हो गया है और यह एक प्रोफेशन यानी पेशा बन गया है। और शायद इसीलिए पत्रकारिता की पढ़ाई की लोकप्रियता बढ़ रही है, जबकि पहले माना जाता था कि यह सब सिखाया नहीं जा सकता है। अब जब छात्र भारी फीस चुकाकर इस पेशे को अपना रहे हैं तो उनकी अपेक्षा और उनका आउटपुट कुछ और होगा। दूसरी ओर मीडिया संस्थान पेशेवर होने की बजाय विज्ञापनों और खबरों के घोषित-अघोषित घाल-मेल में लगे हैं। ऐसे में इस पुस्तक का उद्देश्य पाठकों को यह बताना है कि कैसे यह पेशा तो है, पर अच्छा कॅरियर नहीं है और तमाम लोग आजीवन बगैर पूर्णकालिक नौकरी के खबरें भेजने का काम करते हैं और जिन संस्थानों के लिए काम करते हैं, वह उनसे लिखवाकर ले लेता है कि खबरें भेजना उनका व्यवसाय नहीं है।

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लेखक किशोर कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क +919811147422 या kk2801@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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क्या एनडीटीवी पर नियंत्रण के लिए कॉरपोरेट तख्तापलट की कोशिश की जा रही है?

Sanjaya Kumar Singh : क्या एनडीटीवी पर नियंत्रण के लिए क्या कॉरपोरेट तख्ता पलट की कोशिश की जा रही है? शुक्रवार की सुबह एनडीटीवी के बिक जाने की खबर पढ़कर मुझे याद आया कि प्रणय राय को अगर कंपनी बेचनी ही होती तो वे आईसीआईसीआई बैंक के 48 करोड़ रुपए के लिए पड़े सीबीआई के छापे के बाद प्रेस कांफ्रेंस क्यों करते। क्यों कहते कि झुकेंगे नहीं। मुझे इंडियन एक्सप्रेस की खबर पर यकीन नहीं हुआ।

मैंने पूरी खबर पढ़ी और अंदर मिल गया कि इसकी पुष्टि नहीं हुई है और स्पाइस जेट के अधिकारी ने तो खबर को पूरी तरह गलत और निराधार कहा था। इसके बावजूद इंडियन एक्सप्रेस ने यह खबर छापी थी तो कारण सूत्र पर भरोसा होगा और इसके पक्ष में तर्क यह था कि एनडीटीवी ने इसपर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। मेरे हिसाब से ऐसी खबरों के सही होने की संभावना आधी-आधी ही रहती है। इसलिए मैं अगर ब्रेकिंग चलाने की जल्दी ना हो तो इंतजार करना पसंद करता हूं। दोपहर तक स्पष्ट हो गया कि इंडियन एक्सप्रेस चूक गया था। मेरा मानना है कि इस तरह गलत खबर प्लांट करने या कराने की कोशिश करने वालों को सबक सीखाना चाहिए पर अब नहीं लगता कि वैसे दिन कभी आएंगे। हालांकि वह अलग मुद्दा है।

शाम तक मुझे समझ में आ गया कि हो ना हो यह एनडीटीवी में तख्ता पलट की कोशिश चल रही होगी। देश में कॉरपोरेट तख्ता पलट का पहला और संभवतः सबसे चर्चित मामला अनिवासी भारतीय स्वराज पॉल और देसी उद्योग समूह डीसीएम तथा एस्कॉर्ट्स से जुड़ा था। डीसीएम यानी दिल्ली क्लॉथ मिल को तब खादी के बाद देसी कपड़ों यानी भारतीयता का प्रतीक माना जाता था। एस्कॉर्ट्स को उस समय उसके मालिक नंदा परिवार के लिए जाना जाता था। राजन नंदा दूसरी पीढ़ी के मालिक थे उनके पिता हर प्रसाद आजादी के समय पाकिस्तान से आए थे। राजन नंदा की पत्नी राजकपूर की बेटी ऋृतु हैं और उनके बेटे निखिल की शादी अमिताभ बच्चन की बेटी श्वेता से हुई है। यह विवरण ये बताने के लिए स्वराज पॉल ने किससे किसलिए पंगा लिया होगा और क्यों नाकाम रहे। एस्कॉर्ट्स समूह पर नंदा परिवार का नियंत्रण पांच से 10 प्रतिशत के बीच की हिस्सेदारी से था और नियंत्रण की इस कोशिश के बाद कई महीनों तक भारतीय उद्योग जगह में उत्सुकता औऱ चिन्ता छाई रही। आखिरकार स्वराज पॉल ने हथियार डाल दिए।

अब स्थिति थोड़ी अलग है। तख्ता पलट का उद्देश्य भी। एक मीडिया संस्थान जो सरकार के खिलाफ है उसे सरकार समर्थक ताकतें नियंत्रण में लेना चाहती हैं। तरीके वही आजमाए जा सकते हैं औऱ कल जो सब हुआ वह ऐसी ही कोशिश का हिस्सा लगता है। इसमें करना सिर्फ यह होता है कि बाजार से किसी कंपनी के इतने शेयर खरीद लिए जाएं कि जिसका नियंत्रण है उससे ज्यादा हो जाए या निदेशक मंडल में बहुमत हो जाए। यह आसान नहीं है पर तकनीकी रूप से संभव है। इसे कंपनी का बिकना नहीं कहा जाएगा पर स्थिति वैसी ही होगी। सैंया भये कोतवाल से यह संभव है। वैसे ही जैसे थानेदार अपना हो तो कितने भी पुराने किराएदार को भगा ही देगा। इसलिए मामला अभी खत्म नहीं हुआ है। पिक्चर अभी बाकी है दोस्तों।

जनसत्ता समेत कई अखबारों में काम कर चुके और इन दिनों सोशल मीडिया पर बेबाक लेखन के लिए चर्चित पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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जीएसटी का सच (पार्ट 25 से 36 तक) : छोटे अखबारों पर डीएवीपी के जरिए जीएसटी की मार

जीएसटी से बेरोजगारी की कगार पर खड़े एक पत्रकार की डायरी

जीएसटी का सच (25) सरकार की डीएवीपी पॉलिसी 2016 और जीएसटी के कारण 90 फीसदी अखबार बंद होने की कगार पर हैं

संजय कुमार सिंह
sanjaya_singh@hotmail.com

जीएसटी से छोटे अखबार भी परेशान हैं। सरकारी विज्ञापनों पर आश्रित इन अखबारों को डीएवीपी (विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय) के जरिए विज्ञापन दिए जाते हैं। केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद डीएवीपी ने विज्ञापन जारी करने के नियमों में सख्ती लाई है और इससे कई प्रकाशन पहले से मुश्किल में हैं। अब उनपर जीएसटी का डंडा भी चल रहा है। खास बात यह है कि डीएवीपी 20 लाख से कम टर्नओवर वाले प्रकाशकों पर भी जीएसटी पंजीकरण कराने के लिए दबाव डाल रहा है। डीएवीपी का कहना है कि बिना जीएसटी में पंजीकृत हुए सरकारी विज्ञापन उपलब्ध नहीं कराया जा सकता है। दूसरी ओर, एक छोटी पत्रिका के संपादक के मुताबिक जनवरी 2017 से अब तक मात्र 250 सेंटीमीटर विज्ञापन दिया गया है, जिसकी कीमत सर्कुलेशन के आधार पर 1500 सौ से 5000 रुपये है। ऐसे में डीएवीपी जीएसटी को लेकर छोटे अखबारों से क्यों जबरदस्ती कर रहा है यह प्रकाशकों की समझ से बाहर है। वो भी तब जब उनका टर्नओवर ही ढाई-तीन लाख से दस-बारह लाख तक ही है, और इसकी सीए ऑडिट, वार्षिक विवरणी हर साल ऑनलाइन और फिजिकली डीएवीपी को भेजी जाती है।

जानकारों का कहना है कि सरकार की डीएवीपी पॉलिसी 2016 और जीएसटी के कारण 90 फीसदी अखबार बंद होने की कगार पर हैं। छोटे अखबार मालिकों के मुताबिक यह समय छोटे और मध्यम अखबारों के लिए अब तक का सबसे कठिन समय है। समाचार पत्र उद्योग दूसरे उद्योगों की तरह सरकार से संरक्षण की उम्मीद करता है पर हालात उल्टे हैं। डीएवीपी की नई विज्ञापन नीति को दमनकारी बताने वाले छोटे अखबार मालिकों का कहना है जीएसटी ने प्रिन्ट मीडिया की जान लेना शुरू कर दिया है। प्रिन्ट मीडिया के लिए राज्य एवं केन्द्र सरकार ने हमेशा सर्कुलेशन स्लैब के आधार पर विज्ञापन दरें तय करने का प्रावधान रखा है। इसका नतीजा यह है कि अखबारों की सीनियारिटी पर कभी गौर नहीं किया गया। मजबूरन कुछेक अखबार मालिक विज्ञापन दर हासिल करने के फेर मे सर्कुलेशन बढा कर बताते हैं। यदि सीनियारिटी के आधार पर रेट तय होता तो अखबार वालों को यह सब करने की जरूरत ही नहीं पड़ती।

डीएवीपी की संशोधित विज्ञापन नीति से सैकड़ों अखबार पहले ही बाहर हो चुके हैं। 1 जून 17 से नई विज्ञापन नीति लागू कर डीएवीपी ने कइयों का गला घोंट दिया। अब तक डीएवीपी के सदमे से छोटे अखबार बाहर आये ही नही कि जीएसटी जैसे कानून ने इन अखबारों की जान खतरे मे डाल दी। न्यूज पेपर छापने वाली प्रिन्टिंग मशीन पर 5 प्रतिशत, विज्ञापनों पर 5 प्रतिशत और न्यूज प्रिन्ट पेपर खरीदने पर 5 प्रतिशत जीएसटी का प्रावधान हैं। हकीकत यह हैं कि राज्य एवं केन्द्र सरकार से कुल मिला कर छोटे अखबारों को सालाना एक से डेढ लाख का औसत विज्ञापन भी नहीं मिलता हैं। उसपर जीएसटी पंजीकरण की बाध्यता इन अखबारों को मार डालेगी।

प्रिंट मीडिया में विज्ञापन के लिए स्‍पेस (स्‍थान या जगह) की बिक्री पर लागू वस्‍तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की दर पर भी विवाद रहा। इस बारे में उठे सवाल पर सरकार ने एक विज्ञप्ति में कहा है कि प्रिंट मीडिया में विज्ञापन के लिए स्थान की  बिक्री पर जीएसटी 5 प्रतिशत है। यदि विज्ञापन एजेंसी ‘प्रिंसिपल से प्रिंसिपल’ के आधार पर काम करती है, अर्थात वह किसी समाचार-पत्र संस्‍थान से स्‍पेस खरीदती है और इस स्‍पेस को विज्ञापन के लिए ग्राहकों को अपने खाते के अंतर्गत ही यानी एक प्रिंसिपल के रूप में बेचती है, तो वह ग्राहक से विज्ञापन एजेंसी द्वारा वसूली गई पूरी राशि पर 5 प्रतिशत की दर से जीएसटी का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होगा। वहीं, दूसरी ओर यदि कोई विज्ञापन एजेंसी किसी समाचार-पत्र संस्‍थान के एक एजेंट के रूप में कमीशन के आधार पर विज्ञापन के लिए किसी स्‍पेस को बेचती है, तो वह समाचार पत्र संस्‍थान से प्राप्त बिक्री कमीशन पर 18 प्रतिशत की दर से जीएसटी का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होगी। इस तरह के बिक्री कमीशन पर अदा किए गए जीएसटी के आईटीसी का भुगतान समाचार पत्र संस्‍थान के लिए उपलब्ध होगा। स्पष्ट है कि जीएसटी के नियमों में कोई ढील छोटे अखबारों के लिए भी नहीं है और जीएसटी के दबाव में छोटे अखबार बंद होते हैं या नहीं निकल पाते हैं तो किसी को कोई परवाह नहीं है। अखबार मालिक अपना देखें।

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जीएसटी का सच (पार्ट 13 से 23 तक) : जीएसटी से बेरोजगारी की कगार पर खड़े एक पत्रकार की डायरी

जीएसटी का सच (13) : गाजियाबाद से एनसीआर में काम के लिए जीएसटी जरूरी

संजय कुमार सिंह
sanjaya_singh@hotmail.com

सरकारी स्तर पर जब यह तय हो गया कि जीएसटी लागू होगा ही तो मेरे दिमाग में इस बारे में तीन बातें थी – 1) कारोबार की राशि के लिहाज से मैं इससे मुक्त रहूंगा 2) नया है इसलिए अनुपालन आसान होगा, मामूली औपचारिकताएं मैं खुद कर लूंगा और 3) कोई विकल्प नहीं हुआ तो मित्र सीए हैं ही। पर जब लागू हुआ तो तीनों बातें हवा हो गईं। राशि तो पहले के 10 लाख रुपए प्रति वर्ष की तुलना में 20 लाख कर दी गई पर अंतर राज्यीय कारोबार (एक देश एक टैक्स के नारों के बीच) करने के कारण फंस जाउंगा यह तो सोचा ही नहीं था। इसका आसान उपाय था दिल्ली शिफ्ट कर जाना। ज्यादातर ग्राहक या उनका मुख्यालय दिल्ली में है। इसलिए सिर्फ दिल्ली के ग्राहकों से मेरा काम चल जाता। लेकिन कंप्यूटर और ई मेल के काम करने वाले निश्चित रूप से जीएसटी के दायरे में आएंगे – यह भी मेरी कल्पना में नहीं था। तीसरा विकल्प तो है ही। महंगा है पर मित्रों के भरोसे चल जाएगा। उसमें कोई समस्या नहीं है।

सिर्फ कंप्यूटर से अपना कारोबार कर लेना बहुत मामूली निवेश से गुजारा कर लेना है। इसे छूट मिलनी चाहिए थी तो इसपर टैक्स भरने की औपचारिकता जबरदस्ती लादी गई है। मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया के जमाने में जब रोजगार के नए मौके बन ही नहीं रहे हैं। सीए और सीए के सहायकों के काम की जो संभावना बन रही है वह बहुत सारे काम बंद कराने की कीमत पर होगा। 

अब मैं देख रहा हूं कि बहुत सारे लोगों ने पंजीकरण करा लिया है या पंजीकरण से संबंधित शिक्षण सत्रों आदि में हिस्सा लिया है। पर अनुपालन या झंझटों के संबंध में उनकी जानकारी नहीं है. यहां तक कि रिटर्न फाइल करने की तारीख निकल गई और उन्हें कुछ पता नहीं है। इससे मेरी इस धारणा की पुष्टि होती है कि पंजीकरण तो मजबूरी में हर कोई करा लेगा पर अनुपालन (बिक्री कम होने के कारण) नहीं होगा और लोग यह मानकर चलेंगे कि उनके जैसे छोटे कारोबारियों को कौन पूछेगा। यह एक हद तक सही भी है पर चुन कर परेशान किए जाने के साथ रिश्वतखोरी का रास्ता तो खोलता ही है। मेरा एतराज या मेरी परेशानी यही है।

अभी तक जिन जानकारों से मेरी बात हुई है। सब ने मुझे कंपोजिट स्कीम में पंजीकरण कराने की सलाह दी है। हालांकि, मेरे सवालों का जवाब कोई नहीं दे पाया और स्पष्ट हो गया कि उनकी जानकारी बहुत ही सतही है। इसलिए, सबके कहने के बावजूद मैंने अभी तक पंजीकरण नहीं कराया है। कंपोजिट स्कीम को अक्सर पूछे जाने वाले सवालों के सरकारी जवाब (जिसका कानूनी महत्व नहीं है) में संरचना योजना कहा गया है। जो गलत है। कंपोजिट का मतलब संयुक्त या मिश्रित होना चाहिए पर वह अलग विषय है। यह छोटे करदाताओं (जिनका वित्तीय वर्ष का कारोबार 50 लाख रुपए है) के लिए है। इस योजना के अंतर्गत करदाता बिना इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) लाभ प्राप्त किए एक राज्य में एक वर्ष के दौरान अपने कुल कारोबार के प्रतिशत के रूप में कर का भुगतान करेंगे। सीजीएसटी और एसजीएसटी / यूटीजीएसटी के लिए कर की न्यूनतम दर (उत्पादकों के लिए एक प्रतिशत, अन्य मामलों में आधा प्रतिशत और अनुसूची जो के पैरा छह (बी) में उल्लिखित विशिष्ट सेवाओं अर्थात भोजन परोसने की सेवाएं अथवा मानव उपयोग के लिए अन्य वस्तु के लिए 2.5 प्रतिशत) से कम नहीं होगा। नारा एक देश एक जीएसटी और दर अलग-अलग।

कंपोजिट स्कीम का विकल्प चुनने वाला करदाता अपने ग्राहकों से कोई कर नहीं लेगा। लेकिन जमा कराएगा। यह रोजगार करने का टैक्स है? मोटा-मोटी इसका मतलब यही हुआ कि कारोबार का 2.5 प्रतिशत देकर जीएसटी से पीछा छुड़ाइए। पर यह जैसा मुझे समझ में आ रहा है, 20 लाख से ऊपर 50 लाख से नीचे के कारोबार वालों के लिए है जो अपना कारोबार कम समझते हैं पर सरकार जिन्हें बख्शना नहीं चाहती है। यह मेरे लिए नहीं हो सकता है। और जवाब में यह बात स्पष्ट लिखी है। 

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जीएसटी से बेरोजगारी की कगार पर खड़े एक पत्रकार की डायरी : जीएसटी का सच (पार्ट 1 से 12 तक)

जीएसटी का सच (पार्ट 1) : जीएसटी यानि छोटे और नए कारोबारों का दुश्मन

संजय कुमार सिंह
sanjaya_singh@hotmail.com

जीएसटी के बारे में बातें तो बड़ी-बड़ी की गईं पर यह छोटे और नए कारोबारों का दुश्मन है। मेरे कुछ ग्राहकों ने कहा कि अंतरराज्यीय “कारोबार” करने वालों के लिए जीएसटी पंजीकरण आवश्यक है और कायदे से वे काम कराना तो दूर जो काम करा चुके उसका भुगतान भी नहीं कर सकते। शुरू में तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ पर अब लगता है कि वे सही ही कर रहे हैं। वैसे भी नौकरी करने वाले क्यों जोखिम उठाएं। वे काम नहीं कराएंगे, गलत हो तो क्यों करें। तनख्वाह तो मिलनी ही है। पर यह सब कितने दिन कैसे चलेगा भविष्य बताएगा।

आज मैं पंजीकरण कराने के नियम देखते हुए गलती से सिंगापुर जीएसटी की साइट पर चला गया पर उसकी भाषाशैली से ही समझ में आ गया कि मैं कहीं और हूं। भारत में जीएसटी कौंसिल की साइट (http://www.gstcouncil.gov.in) अभी आधी अधूरी है और सिर्फ अंग्रेजी में है। जीएसटी हेल्प पर क्लिक कीजिए तो हेल्प डेस्क खुलता है और वहां एक फोन नंबर तथा ई-मेल के अलावा कुछ नहीं है। सर्च में रजिस्ट्रेशन (अंग्रेजी में) डालने पर ऐसा कोई पेज नहीं खुलता जहां आप सीधे पंजीकरण के लिए आवेदन कर सकें।  ढूंढ़ते हुए http://www.gstindia.com पर (यह सरकारी नहीं है) अंग्रेजी में सीए आकाश फोफलिया का एक आलेख मिला उसका यह अंश उल्लेखनीय है। जीएसटी के तहत किन लोगों के लिए पंजीकरण आवश्यक है।

3. Persons requiring registration

Following are the persons required to take registration under this act –

(a) Persons making inter-state supply, irrespective of any threshold limit
(b) Casual taxable persons, irrespective of the threshold specified
(c) Persons who are required to pay tax under reverse charge
(d) Non resident taxable persons
(e) Persons who are required to deduct tax under section 37 (TDS)
(f) Agents
(g) Input service distributor
(h) Supply of goods or services through electronic commerce operator, other than branded services
(i) Every electronic commerce operator
(j) Aggregator who supplies service under his brand name or his trade name
(k) Other notified persons

आपने पढ़ा होगा कि 20 लाख रुपए प्रति वर्ष का कारोबार करने वालों को जीएसटी में पंजीकरण कराने की आवश्यकता नहीं है। इस तरह, दावा किया गया है कि छोटे कारोबारों को जीएसटी से कोई परेशानी नहीं होगी। यहां बताया गया है कि जीएसटी किन लोगों के लिए जरूरी है और इसमें पहला बिन्दु है, जो लोग अंतरराज्यीय आपूर्ति करते हैं। आपने यह भी सुना होगा – एक देश एक जीएसटी। अब आप जानते हैं कि जीएसटी की कई दरें हैं पर कहा यही जा रहा है कि एक देश और एक जीएसटी। दूसरे अगर आप अंतरराज्यीय कारोबार करते हैं (उससे चाहे किसी तरह गुजर करते हों) तो  जीएसटी पंजीकरण आवश्यक हैं। फिर एक देश एक जीएसटी का क्या मतलब। मेरे साथ यही समस्या है – मैं गाजियाबाद में रहता हूं और मेरे ज्यादातर ग्राहक दिल्ली या गुड़गांव के हैं। इसलिए वे जीएसटी पंजीकरण के बिना मुझे काम देंगे ही नहीं। इसमें एक और बिन्दु “एच” दिलचस्प है। इसके मुताबिक, अगर आप अपनी सेवा या सामान इलेक्ट्रॉनिक कामर्स ऑपरेटर के जरिए सप्लाई करते हैं तब भी जीएसटी के तहत पंजीकरण आवश्यक है। लेन-देन डिजटल कीजिए और पूरा धंधा ही इलेक्ट्रॉनिक हो तो टैक्स के जाल में फंसना जरूरी है। यह विकास है। 

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जानिए, जीएसटी ने किस तरह एक वरिष्ठ पत्रकार को बेरोजगारी की कगार पर ला खड़ा किया

संजय कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

जनसत्ता की नौकरी के साथ शौकिया अनुवाद करने वाले संजय कुमार सिंह ने 1995 में अनुवाद कम्युनिकेशन AnuvaadCommunication.com की स्थापना की थी और 2002 में नौकरी छोड़कर पूर्णकालिक अनुवाद करते रहे। उदारीकरण के बाद देश में आने वाले बहुराष्ट्रीय निगमों और देसी कॉरपोरेट्स के साथ देश भर की तमाम जनसंपर्क और विज्ञापन एजेंसियों के लिए काम करते रहे संजय का मानना है कि एक समय आएगा जब कंप्यूटर से कायदे का अनुवाद संभव हो जाएगा। इसलिए वे इसमें भविष्य नहीं देखते और अनुवाद सिखाने में यकीन नहीं रखते। अकेले ही जितना काम कर सकते हैं, करते रहे।

सब ठीक-ठाक चल रहा था कि एक जुलाई से जीएसटी लागू हो गया और अचानक सब कुछ बदल गया। जीएसटी से संजय बेरोजगार होने की कगार पर हैं और मानते हैं कि अपनी पसंद का पेशा अपनाने की आजादी अब नहीं रही। नौकरी के साथ छोटा-मोटा काम करके आप अतिरिक्त कमाई नहीं कर सकते हैं। ना ही मामूली निवेश से छोटा-मोटा काम करके जीवन यापन कर सकते हैं। जीएसटी को जानने-समझने की अपनी कोशिश और अनुभव को वे रोज फेसबुक पर लिखते हैं और अभी तक 24 किस्त लिख चुके हैं।

संजय भड़ास4मीडिया से बातचीत में कहते हैं : ”’मुझे जीएसटी ने मारा.. ये सच है.. जीएसटी के कारण इन दिनों मेरे पास कोई काम-धंधा नहीं है… इस बारे में बताने वाला कोई (मुफ्त का भरोसेमंद जानकार) नहीं मिल रहा है.. मैं पूरे लगन से इस बारे में जानने समझने की कोशिश कर रहा हूं… तय करना है कि जीएसटी पंजीकरण कराना वाकई जरूरी है कि नहीं और है तो यह कितना मुसीबत है और कोई लाभ होगा कि ऐवें ही… कुछेक क्लाइंट्स ने पैसे नहीं दिए, उनका क्या करना है…. यही कारण है कि रोज का अनुभव फेसबुक पर डाल रहा हूं… कोई कुछ मुझे बताना समझाना चाहे तो sanjaya_singh@hotmail.com पर भेज सकते हैं.”

आइए, अब संजय का लिखा 24वां पार्ट पढ़ते हैं…

जीएसटी का सच (24) जीएसटी में पंजीकरण यानि ओखली में सिर डालना है

जीएसटी मेरे लिए मुद्दा तब बना जब दिल्ली और गुड़गांव के मेरे ग्राहकों ने कह दिया कि जीएसटी पंजीकरण के बगैर वे मुझे काम नहीं दे सकते। मैं जीएसटी के बारे में जितना जानता था उस हिसाब से पंजीकरण कराना मुझे भारी झंझट का काम लग रहा था क्योंकि रिटर्न दाखिल करना, टैक्स वसूल कर जमा करना और फिर जहां संभव हो वापस लेना – मेरे लिए असंभव नहीं तो भारी मुसीबत जरूर है और इसके लिए एक अकाउंटैंट जरूरी लग रहा था। मेरे कुछ सवाल थे जिनका जवाब नहीं था और बगैर ठीक से समझे मुझे जीएसटी पंजीकरण कराना ओखली में सिर डालने जैसा लगा। जब काम आना बंद ही हो गया तो जल्दबाजी में पंजीकरण कराने से जरूरी मुझे समझना (और समझाना) लगा क्योंकि इस बारे में कोई ठीक से नहीं जानता था।

इस क्रम में अभी तक यही समझ में आया है कि पंजीकरण जरूरी है और ग्राहक ठीक कह रहे हैं। इसमें सेवा लेने वाले के लिए यह विकल्प नहीं रह गया है कि छोटा कारोबारी जीएसटी पंजीकृत नहीं होगा तो टैक्स नहीं लेगा और सेवा सस्ती मिल जाएगी ना इस बात का कोई मतलब है कि छोटा कारोबारी अच्छी सेवा देता है। नियम ऐसे हैं कि दूसरे राज्य के (मैं गाजियाबाद में हूं, गुड़गांव हरियाणा में और दिल्ली अलग राज्य है) अपंजीकृत सेवा प्रदाताओं से सेवा ली ही नहीं जा सकती है। पंजीकृत सेवा प्रदाता न हो और आप अपंजीकृत सेवा प्रदाता से सेवा लेते हैं तो टैक्स की रकम आपको अपने पास से जमा कराना है। रीवर्स चार्ज व्यवस्था के तहत इसकी वापसी संभव हुई तो वापस भी मिलेगी पर जमा कराने से कोई छूट नहीं है।

इस तरह, यह स्पष्ट है कि कागजी खाना पूर्ति का काम काफी बढ़ जाएगा। हद तो यह है कि पंजीकरण के बाद बिक्री ना हो शून्य रिटर्न भी समय पर दाखिल करना है और न करने पर भारी जुर्माने का प्रावधान है। यह अलग बात है कि पहला ही रिटर्न सिर्फ 64 प्रतिशत कारोबारियों ने जमा कराया और बाकी के जुर्माने की रकम माफ करने और नहीं करने के संबंध में परस्पर विरोधी खबरें भी आईं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सरकार ने आधी-अधूरी तैयारी से जीएसटी लागू कर दिया है और इस बारे में जानकारी देने की कोई अधिकृत व्यवस्था नहीं है और जीएसटी कौंसिल के वेबसाइट ऐसा है कि गूगल सर्च करो तो तमाम सॉफ्टवेयर विक्रेताओं से लेकर सीए और ब्लॉग लिखने वालों के आर्टिकल मिल जाएंगे (जिन्हें अधिकृत नहीं माना जा सकता) पर जीएसटी कौंसिल की अधिकृत सूचना नेट पर नहीं मिलेगी। आप पूछ सकते हैं कि सरकारी संस्थान से ऐसी अपेक्षा क्यों? इसलिए कि जीएसटी का सारा काम कंप्यूटर और इंटरनेट से ही होना है। 20 लाख रुपए प्रति वर्ष से कम का कारोबार होने के बावजूद मुझे पंजीकरण इसीलिए कराना है कि मैं कंप्यूटर से काम करता हूं और घर बैठे अपनी सेवा दिल्ली व गुड़गांव (या कहीं के भी) ग्राहकों को भेज देता हूं और उनसे पैसे ले लेता हूं। 

अभी तक मुझे जीएसटी जितना समझ में आया है वह यही है कि आप कानून का पालन कर नहीं सकते और नहीं करेंगे तो आपके खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी क्योंकि अपराध तकनीकी होगा पर ज्यादा चूं-चां करेंगे तो आपके खिलाफ कार्रवाई की जा सकेगी। इसलिए आप डर कर रहिए। अपने काम से मतलब रखिए। अपना काम कीजिए। मुझे यह स्थिति मंजूर नहीं है। मैं यही बता रहा हूं कि नियम परेशान करने के लिए बनाए गए हैं या परेशान करने वाले हैं। पर दूसरी स्थिति यह है कि मैं अपना काम छोड़ दूं या कुछ और करूं। पर यह इतना आसान नहीं है। अभी तक यह रास्ता नजर आ रहा है कि जहां (जिस राज्य से भी) काम मिलने की संभावना हो वहां मैं किसी से साझेदारी करूं और उसके घर को अपनी फर्म का कार्यालय बताऊं तो स्थानीय सेवा प्रदाता होने के दावे पर बगैर पंजीकरण काम मिल सकता है पर चूंकि सेवा लेने वाले को टैक्स अपने पास से जमा कराना ही होगा इसलिए सेवा लेने वाला कोई प्राथमिकता नहीं देगा। विचित्र स्थिति है। 

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‘कॉमेडी नाइट्स विद कपिल’ वाले कीकू शारदा की गिरफ्तारी बाबा राम रहीम की ताकत दिखाने के लिए हुई थी!

Sanjaya Kumar Singh : क्या ये सच नहीं है कि कीकू शारदा की गिरफ्तारी तब बाबा राम रहीम की ताकत बताने के लिए की गई थी… धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की शिकायत पर टीवी अभिनेता कीकू शारदा के खिलाफ कार्रवाई करने वाली पुलिस को क्या यह पता नहीं था कि गुरमीत सिंह पर बलात्कार के आरोप हैं और उसकी जांच चल रही है। पुलिस जब बलात्कार के मामलों में कार्रवाई नहीं करती है और धार्मिक आस्था भड़काने की शिकायत पर कार्रवाई करेगी तो भक्त पगलाएंगे ही। जांच होनी चाहिए कि पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई किसके कहने पर की? हरियाणा पुलिस जब कीकू को गिरफ्तार कर मुंबई से ले आई थी तब स्थानीय मीडिया का काम था कि वह याद दिलाती कि बाबा बलात्कार के मामले में अभियुक्त है और पुलिस की फुर्ती असाधारण है। अगर मीडिया ने अपना यह मामूली सा काम किया होता और सरकार ने इस घटना से सीख ली होती तो पुलिस को भी जान रही होती।

‘कॉमेडी नाइट्स विद कपिल’ में पलक का किरदार निभाने वाले कीकू शारदा ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करके कहा कि डेरा सच्चा सौदा कोई धर्म नहीं है और यह बात डेरे की वेबसाइट से भी साफ पता चलती है। ऐसे में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का मामला बनता ही नहीं है। फतेहाबाद पुलिस ने जांच में पाया कि कीकू के खिलाफ मामला बनता ही नहीं है, लिहाजा उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने की अर्जी अदालत में दायर की गई है। सरकार के इस जवाब को रिकार्ड में लेते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति आरके जैन ने सुनवाई 27 अप्रैल 2016 तक स्थगित कर दी थी।

इस मामले से संबंधित मार्च 2016 की खबरें वेब साइट पर मिलीं जिनके मुताबिक कीकू की रिहाई पीएमओ के हस्तक्षेप पर हुई थी और हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा था कि कामेडियन का उत्पीड़न नहीं होने देंगे। इसके बावजूद यह सच है कि डेरा सच्चा सौदा के गुरमीत राम रहीम (और बलात्कार के आरोपी, अब दोषी) की मिमिक्री करने के ‘जुर्म’ में कमीडियन कीकू शारदा दो बार हिरासत में लिए गए। उन्होंने कहा है कि यह बेहद यातनापूर्ण और दुखद था। एनडीटीवी से बात करते हुए ऐक्टर ने कहा था, मैं खुशकिस्मत हूं कि मुझे जेल में 14 दिन नहीं गुजारने पड़े।

कीकू ने यह भी कहा था, ‘हालांकि जेल मेरे लिए ज्यादा महफूज थी, क्योंकि बाहर तो भयंकर भीड़ है।’ कीकू ने कहा कि अगली बार से वह ज्यादा सतर्क रहेंगे और ऐसे किसी ऐक्ट से पहले रिसर्च भी करेंगे। उन्होंने कहा, ‘काश हर कोई खुद पर हंसना सीख सके और सबमें थोड़ा ह्यूमर हो।’ लेकिन सरकार और पुलिस ने इससे कोई सीख नहीं ली। पुलिस को तो खैर क्या सीखना था पर सरकार कैसे चूक गई?

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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रजत शर्मा के सिर पर बालों की खेती अच्छी हो गई है!

Sanjaya Kumar Singh : इंडिया टीवी पर आप की अदालत में सोनू निगम थे। सोनू निगम के कारण आज मोदी वाले एपिसोड के बाद रजत शर्मा को देखा। बालों की खेती अच्छी हो गई है। पर फिलहाल मुद्दा यह है कि एक सवाल के जवाब में सोनू ने कहा कि मैं भिखारी बनकर यह देखना समझना चाहता था कि बिना प्रचार, ब्रांडिंग और माइक आदि के सिर्फ मेरी आवाज का क्या महत्व है। और सत्तर साल के एक भिखारी के रूप में मैंने महसूस किया कि मेरी आवाज वही कोई 12-14 रुपए की है जो उस दिन उसे मिले थे। जिसे सोनू निगम ने फ्रेम करवाकर ऑफिस में रखा है। सोनू ने स्पष्ट किया कि आदमी पर सिर्फ उसकी योग्यता का नहीं और भी बहुत सारी चीजों का असर होता है।

इस कार्यक्रम को देखने के बाद Raghwendra Singh की एक पोस्ट पढ़ने को मिली, जो इस प्रकार है-

आज किसी चैनेल पर लालूजी की जीवनी के बारे में बता रहा था। इससे पता चलता है की लालूजी तो मोदीजी से भी महान हैं। मोदीजी शहर में चाय बेचकर pm बन गये लालूजी उससे भी बुरी हालात में थे। मज़दूरी कर, काठ का सिलेट पर पढ़ाई की और भंगरैया से उसे मिटाते थे और भैंस पर चढ़कर स्कूल जाते थे और कई दिन भूखे रहे थे पर कभी भी गाला फाड़ का नहीं बोले मैं मज़दूरी कर cm बने। अगर ये भी अपनी पब्लिसिटी करते तो pm बन सकते थे।

भले ही यह पोस्ट लालू यादव या उस कार्यक्रम से असहमति में हो पर मुझे लगता है कि ब्रांडिंग का अपना महत्व तो है। वरना चार लाख का डिजाइनर सूट पहनने वाला क्यों कहता कि उसे प्रधान सेवक बना दिया जाए। क्यों सबके खाते में 15 लाख रुपए आने का सपना दिखाता? और अगर किसी ने यह सब नहीं किया तो वह कहे भी नहीं? वह भी तब जब चाय बेचने की कहानी सबको मालूम है। मालगाडियों में भी चाय बेचते थे।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से. इस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ चुनिंदा यूं हैं :

Ambrish Kumar खेती? यह कैसे संभव हुई.

Sanjaya Kumar Singh पैसों का खेल है। काफी दिन से चल रहा था। खेती 2009 में ही शुरू हो गई थी। आलोक तोमर ने तब ये लिखा था-
इससे तो टकले ही अच्छे थे रजत शर्मा!
http://old.bhadas4media.com/tv/1299-alok-tomar.html

Alka Bhartiya प्रचार करने वाले सारे साधन खरीद लिए हैं उन्होंने और साधनों के मालिक हैं की उसके आगे हाथ जोड़े खड़े हैं

Sanjaya Kumar Singh मामला सिर्फ प्रचार का नहीं। अनैतिक होने और उसकी सीमा का है। कुछ लोग प्रचार में बिल्कुल अनैतिक नहीं होते और भाजपा इसकी कोई सीमा नहीं मानती।

Anil Saxena अलका जी आपकी बात सही है लेकिन भाजपा का संगठन बहुत मजबूत है और इसी लिये अफवाह फैलाने में भी इनका कोई मुकाबला नही।

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पत्रकारिता का अर्नबीकरण!

Sanjaya Kumar Singh : अर्नब गोस्वामी को मैं नहीं देखता। भाजपा से उसके संबंध जानने और उसके झुकावों को देखने के बाद अर्नब को निष्पक्ष नहीं माना जा सकता है। ऐसे में कल नए चैनल के उद्घाटन को लेकर भी दिलचस्पी नहीं रही। लालू यादव से संबंधित ऑडियो के प्रसारण और उसमें गैंगस्टर शहाबुद्दीन का लालू यादव से कहना, “खत्तम है आपका एसपी” – ऐसा कोई मतलब नहीं देता है जो बताया और बनाया जा रहा है। एक साल पुराने इस मामले को जिस तरह पेश किया गया है वह भाजपा समर्थन और लालू-नीतिश विरोध ज्यादा पत्रकारिता या रिपोर्टिंग कम है। ठीक है, अंग्रेजी का यह चैनल बिहार के मतदाताओं पर क्या प्रभाव छोड़ पाएगा। फिर भी…

इस रिपोर्ट में नीतिश की राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में आने की संभावना के मद्देनजर उनपर टीका टिप्पणी ज्यादा है, उन्हें जवाब देना होगा, नहीं देंगे तो आप (भाजपा वाले) क्या करेंगे जैसे सवाल आदि का वीडियो देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि सब कुछ भाजपा की राजनीति का हिस्सा है। भाजपा कहती तो यह है कि कांग्रेस के लोग बेईमान हैं, पैसे कमाए हैं पर चैनल उसके समर्थकों के ज्यादा है। नया चैनल भी उसी के समर्थक का आया। तब, जब भ्रष्टाचार से कमाई बंद है और तमाम चैनलों की माली हालत खराब है। किसी कांग्रेसी का चैनल आया हो तो मुझे पता नहीं है। लेकिन होगा भी तो छोटा-मोटा। पर वह अलग मुद्दा है।

फिलहाल तो मुद्दा है यह है कि भाजपा की राजनीति का जवाब दूसरी पार्टी के लोग उसी की भाषा में क्यों नहीं दे रहे हैं। ये लव लेटर लिखने वाले लव लेटर ही लिखेंगे? पूछेंगे नहीं कि पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब क्यों नहीं दिया जा रहा है। पांच साल के लिए फर्जी सर्टिफिकेट पर सांसद चुनी गई ज्योति धुर्वे का मामला अदालत में तय हो यह अगर ठीक भी हो तो पिछली बार पांच साल में रिपोर्ट ही नहीं आने पर कार्रवाई कौन करेगा? देश की राजनीति में सिर्फ भाजपा ही सक्रिय लग रही है बाकी सब भाजपा की चालों को झेल रहे हैं, जवाब देना या दे पाना तो बहुत दूर।

सबका “काला धन” खत्म हो गया और लगता है सिर्फ भाजपा के पास सफेद धन था, है और बचा हुआ है। पत्रकारिता पर एक कार्यक्रम में कल एक मित्र ने “टीवी का अर्नबीकरण” कहा। मैं कहता हूं अर्नब से पत्रकारिता सीखिए। नए स्टार्टअप में मोटी तनख्वाह वाली नौकरी मिलेगी।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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मीडिया को लेकर आशावादी रहे पत्रकार एनके सिंह की एक महत्वपूर्ण टिप्पणी

ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव व वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह को मैंने पहली और आखिरी बार भड़ास फॉर मीडिया के आठवें स्थापना दिवस के मौके पर आयोजित एक समारोह में सुना था। भड़ास आमतौर पर मीडिया से निराश और मेरे जैसे हताश लोगों का मंच है। मैंने बहुत पहले मान लिया था कि भारत में मीडिया का कुछ हो नहीं सकता है। उसके बाद भड़ास4मीडिया की स्थापना हुई और उसकी सफलता के आठवें वर्ष एनके सिंह ने सगर्व कहा था कि भड़ास नकारात्मक है, निराशा परोसता है आदि।

उस मौके पर भी श्री सिंह ने मीडिया से जबरदस्त उम्मीद दिखाई थी जो निश्चित रूप से आशावाद का चरम था। उसके बाद ऐसा कुछ नहीं हुआ कि मीडिया से कुछ उम्मीद की जाए और मुझे ऐसा भी नहीं लगा कि मीडिया ने अपने लिए कोई और बड़ा या गंदा गड्डा खोद लिया है। भाजपा का उदय और विस्तार निश्चत रूप से एक ऐसा मुद्दा है जो मीडिया में सिरे से गायब है पर मीडिया अगर दंतहीन, विषहीन हो गया या बना दिया गया है तो वह भाजपा के लिए ही। पर वह अलग मुद्दा है।

मुझे तो गुजरे करीब साल में ऐसा कुछ खास फर्क नजर नहीं आया कि उसके बारे में राय बदली जाए (जिसकी पहले खराब नहीं थी उसकी बात कर रहा हूं)। हां, एनके सिंह को फिर कहीं सुनने का मौका नहीं लगा। आज यूं ही अखबार पलटते हुए एनके सिंह का लिखा एक लेख दिखा- ‘आज के जमाने में हिन्दी अखबारों का एडिट पेज कौन पढ़े औऱ किस लिए पढ़े’।

फिर भी एनके सिंह की तस्वीर देखकर और पुराने संदर्भ के मद्देनजर पढ़ना पड़ा। अब अगर एनके सिंह को मीडिया की हालत खराब लग रही है तो मैं मान लेता हूं कि मैं इस मामले में उनसे योग्य चाहे ना हूं, 10-12 साल आगे जरूर चल रहा हूं। मीडिया की हालत पर एक जानकार, अनुभवी और काफी समय तक आशावादी रहे एनके सिंह की निश्चित रूप से महत्वपूर्ण टिप्पणी है। आप भी पढ़िए। नीचे दिए लिंक पर क्लिक करिए…

http://epaper.navodayatimes.in/c/18283157

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जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से हिन्दी पत्रकारिता को अच्छे कार्यकर्ता मिले। उनमें से ज्यादातर अब बूढ़े, रिटायर और पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। इस बीच, नौकरी का हाल भी सबको पता चल गया है। छह लाख की फीस और 10 हजार की सैलरी। संयोग से छह लाख के एजुकेशन लोन की ईएमआई भी इतनी ही बनती है। ऐसे में शिक्षित पत्रकार कितने होंगे ये तो भविष्य बताएगा। राष्ट्रवादी सरकार कुछ मजबूर पत्रकार जरूर बनाएगी। कार्यकर्ताओं की यह नई खेप शौक से या मजबूरी में पत्रकारिता ही करेगी। हिन्दी मीडिया को 25 साल और वेतन भत्तों की चिन्ता करने की जरूरत नहीं है। मंदिर बने ना बने। हिन्दी पत्रकारिता ऐसे ही चलती रहेगी।

जनसत्ता समेत कई अखबारों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके पत्रकार और उद्यमी संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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पीएम मोदी के घर पर एसपीजी की महिलाएं रात में ड्यूटी क्यों नहीं करना चाहतीं?

Sanjaya Kumar Singh : प्रधानमंत्री के घर और निजता से संबंधित ये कैसी खबर? इस बार के “शुक्रवार” (24 फरवरी – 02 मार्च 2017) मैग्जीन में एक गंभीर खबर है। पहले पेज पर प्रमुखता से प्रकाशित इस खबर का शीर्षक है, “फिर विवादों में घिरी एसपीजी” लेकिन यह प्रधानमंत्री निवास से संबंधित विवाद खड़ा कर रही है। खबर के मुताबिक एसपीजी की महिला सुरक्षा कर्मियों ने अपने आला अफसरों से गुहार लगाई है कि उन्हें रात की ड्यूटी पर न रखा जाए।

यहां यह गौरतलब है कि प्रधानमंत्री के घर में परिवार की कोई महिला सदस्य नहीं रहती है। आम जानकारी यही है कि प्रधानमंत्री अपने घर पर अकेले रहते हैं। ऐसे में भारतीय संस्कारों के लिहाज से महिला सुरक्षा कर्मियों की रात की ड्यूटी लगनी ही नहीं चाहिए। उन्हें अधिकारियों से गुहार लगाने की आवश्यकता ही क्यों पड़े? यही नहीं, खबर में आगे कहा गया है, “माना जा रहा है कि वे किसी विवाद का साक्षी बनना नहीं चाहती हैं।” यह और गंभीर है।

खबर में (टाइपिंग की कुछ गड़बड़ी है) कहा गया है कि एसपीजी के तत्कालीन निदेशक दुर्गा प्रसाद को हटा दिया गया था। हटाने की कोई वजह नहीं बताई गई थी। हालांकि जिस तरह से यह कार्रवाई की गई थी उसमें तमाम अटकलों को बल मिला था। इनमें एक अटकल यह भी थी कि दुर्गा प्रसाद चाहते थे कि प्रधानमंत्री से जो भी मिलने आए उसे कैमरों के सामने से गुजरना पड़े और उसका पूरा रिकार्ड रखा जाए। इसमें कोई बुराई नहीं है और यह जरूरी भी लगता है। पर उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी (और पद से हटा दिया गया)। खबर में यह नहीं लिखा है कि दुर्गाप्रसाद के बाद कौन निदेशक हैं और अब क्या होता है। ना ही अभी के निदेशक से कोई बातचीत की गई है।

खबर में आगे लिखा है, अब यह अफवाह जोर पकड़ रही है कि प्रधानमंत्री नहीं चाहते हैं कि उनके निवास में लगे कैमरे कमरों के अंदर नजर रखें। इसमें कोई बुराई नहीं है। अगर प्रधानमंत्री नहीं चाहते हैं तो शयन कक्षों में कैमरे नहीं होने चाहिए और दरवाजे तक को कैमरे की नजर में लाकर अंदर छोड़ा जा सकता है और इस पर कोई विवाद नहीं होना चाहिए। पर विवाद हैं औऱ महिलाएं रात में ड्यूटी करना नहीं चाहती हैं – सबको जोड़ कर देखिए तो एक बड़ी खबर बनती है। अगर अधिकृत खबर नहीं छपी तो तरह-तरह की अफवाहें उड़ती रह सकती हैं और प्रधानमंत्री के घर के बारे में ऐसी खबरें, जैसे अंदर जाने वालों के लिए कैमरा नहीं है – सुरक्षा की दृष्टि से खतरनाक है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं हैं…

Pratima Rakesh दाल में काला है या पूरी दाल काली है ?स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप कहीं साहब के पास आने वाले लोगों की सूचना लीक ना कर दे इसलिये ये मनाही हो रही है!

Surendra Grover इस खबर को पढ़ कर लग रहा है कि दाल में कुछ काला ज़रूर है जिसकी साक्षी वे महिला सुरक्षा कर्मी नहीं बनना चाहती..

Sanjaya Kumar Singh है कोई जो कर सके इस खबर का फॉलो अप? कांग्रेसी इस स्तर तक नहीं गिरते।

Pankaj Pathak लगता है ‘साहेब’ खुद घर में रेनकोट पहने घूमते हैं, नहाने का तो पता नहीं।

Sunil Kumar Singh गुजरात में मुख्यमंत्री रहने के दौरान मोदी के आवास पर एक महिला आती थी जिससे वो अकेले में मिलते थे । ऐसा एक आईपीएस ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा है इस मुद्दे पर दिल्ली विधानसभा में चर्चा भी हो चुकी है जो ऑन दी रिकॉर्ड है ।

आलोक पाण्डेय कांग्रेसी अफवाह उड़ाने में माहिर है

Sanjaya Kumar Singh हां भाई। कैमरा ही नहीं रहेगा तो सबूत कहां से आए। वो तो एनडी तिवारी जैसे लोग लगवाते हैं और खुद वीडियो बांटते हैं।


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भाजपा के पक्ष में प्रायोजित तरीके से लिखने वाले प्रदीप सिंह कोई अकेले पत्रकार नहीं हैं

संजय कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

Sanjaya Kumar Singh : चुनाव जीतने की भाजपाई चालें, मीडिया और मीडिया वाले… उत्तर प्रदेश चुनाव जीतने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपने सारे घोड़े खोल दिए हैं। भक्त, सेवक, कार्यकर्ता, प्रचारक सब अपनी सेवा भक्ति-भाव से मुहैया करा रहे हैं। इसमें ना कुछ बुरा है ना गलत। बस मीडिया और मीडिया वालों की भूमिका देखने लायक है। नए और मीडिया को बाहर से देखने वालों को शायद स्थिति की गंभीरता समझ न आए पर जिस ढंग से पत्रकारों का स्वयंसेवक दल भाजपा के पक्ष में लगा हुआ है वह देश के भविष्य के लिए अच्छा नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा एक सांप्रादियक पार्टी है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था का पालन मजबूरी में ही करती है।

नरेन्द्र मोदी को जिन स्थितियों में जिस तरह प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया और उसके बाद जीतने पर उन्होंने जो सब किया, जो कार्यशैली रही वह काफी हद तक तानाशाह वाली है। इसे उनकी घोषित-अघोषित, दिखने वाली और न दिखने वाली अच्छाइयों के बदले तूल न दिया जाए यह तो समझ में आता है। पर अपेक्षित लाभ न होने पर भी नरेन्द्र मोदी और आज की भाजपा का समर्थन भारत जो इंडिया बन रहा था उसे हिन्दुस्तान बनाने का समर्थन करना है। मीडिया का काम आम लोगों को इस बारे में बताना और इंडिया से हिन्दुस्तान बनने के नफा-नुकसान पर चर्चा करना है पर मीडिया के एक बड़े हिस्से ने तय कर लिया हो उग्र हिन्दुत्व ही देशहित है।

मीडिया पैसे के लिए और दबाव में ऐसा करे – तो बात समझ में आती है। उसे रोकने के लिए भी दबाव बनाया जा सकता है। पाठकों को बताया जा सकता है और उम्मीद की जा सकती है कि जनता चीजों को समझेगी तो मीडिया से ऐसे प्रभावित नहीं होगी जैसे आमतौर पर हो सकती है। लेकिन स्थिति उससे विकट है। मीडिया के लोग खुलकर भाजपा का समर्थन कर रहे हैं। कुतर्क कर रहे हैं और स्वीकार कर रहे हैं वे तथाकथित राष्ट्रवादी, देशभक्ति वाली और हिन्दुत्व की पत्रकारिता कर रहे हैं। जो पुराने लोग संघ समर्थक पत्रकार माने जाते हैं उन्हें भी अब घोषित रूप से समर्थन करने में हिचक नहीं है।

इसी क्रम में आज वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह ने आज जागरण में प्रकाशित अपने लेख, “उत्तर प्रदेश की चुनावी हवा” का लिंक फेसबुक पर साझा किया है। पूरा लेख क्या होगा इसका अंदाजा है इसलिए पढ़ा नहीं और जो अंश हाइलाइट किया गया है उसे पढ़ने के बाद समझ में आ जाता है कि लेखक कहना क्या चाहता है। संबंधित अंश है, “यदि भाजपा मोदी के प्रचि वंचित तबकों के आदर भाव को वोट में बदल लेती है तो चुनाव जातीय समीकरणों से परे जा सकता है।” प्रदीप सिंह फेसबुक पर सक्रिय नहीं है। इस लेख से पहले उनका जो लेख उनकी वाल पर दिख रहा है वह 2 दिसंबर का है। आज 23 फरवरी को एक लेख का लिंक देने भर से यह आरोप लगाना उचित नहीं है कि वे भाजपा का प्रचार कर रहे हैं। पर दो दिंसबर की उनकी पोस्ट है, “राज्यसभा में हंगामा और नारेबाजी कर रहे सदस्यों से सभापति हामिद अंसारी ने पूछा ये नारे सड़कों पर क्यों नहीं लग रहे? सवाल तो बड़ा वाजिब है। पर अभी तक कोई जवाब आया नहीं है।” इसे 17 लोगों ने शेयर किया है।

दो दिसंबर को ही उनकी एक और पोस्ट है जो एक दिसंबर को जागरण में ही प्रकाशित उनके लेख का लिंक है या उसे साझा किया गया है। इससे पहले उनकी पोस्ट 6 अक्तूबर की है। यह भी जागरण में प्रकाशित उनके लेख का लिंक है। लेख का शीर्षक है, “कुतर्कों के नए देवता” और यह सर्जिकल स्ट्राइक पर है। इसकी शुरुआत इस तरह होती है, “कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना। फिल्म अमर प्रेम का यह गाना भारतीय नेताओं पर सटीक बैठता है। नेता किसी घटना, बयान या भाषण पर प्रतिक्रिया देने से पहले यह सोचता है कि जो हुआ है उसका फायदा किसे होगा। फायदा अपने विरोधी को होता दिखे तो वह विरोध में किसी हद तक जाने को तैयार रहता है। इस मामले में अमूमन फौज को अपवाद माना जाता था, लेकिन अब नहीं। यह नरेंद्र मोदी का सत्ता काल है।” इस पोस्ट में लिखा है, “मित्रों लम्बे अंतराल के बाद आपसे मुखातिब हो रहा हूं। दैनिक जागरण के आज के संस्करण में सम्पादकीय पेज पर छपा मेरा लेख आपकी सेवा में पेश है।”

इससे पहले की पोस्ट सात जुलाई की है जो उन्होंने किसी और का लिखा साझा किया है और अंग्रेजी में है। यह पोस्ट राजनीतिक नहीं है। प्रदीप सिंह का रुझान भाजपा की तरफ है, यह कोई नई बात नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि वे इनदिनों अपने सामान्य कार्य से अलग जागरण में लिख रहे हैं उसे फेसबुक पर साझा कर रहे हैं और जागरण उनके नाम के साथ उनकी ई-मेल आईडी नहीं, response@jagran.com छाप रहा है। क्या यह पेड न्यूज या प्रायोजित लेख है? कहने की जरूरत नहीं है कि Pradeep Singh अकेले ऐसे पत्रकार नहीं हैं।

जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक कार्यरत रहे और इन दिनों सोशल मीडिया पर बेबाक लेखन के लिए चर्चित वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से यह मीडिया विश्लेषण लिया गया है. संजय से संपर्क anuvaad@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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TH TIGER HOLIDAYS वालों की इस नोटिस से कौन डरेगा!

Sanjaya Kumar Singh : इन्हें अंग्रेजी तो नहीं ही आती है, हिन्दी आती होती तो हिन्दी में ही लिखते! अगर आप किसी को कोई सेवा प्राप्त करने के लिए पैसे दें और बाद में महसूस करें कि आपको सेवा ठीक नहीं मिली, ठग लिया गया और यह भी कि आप किसी ठग या चोर कंपनी के चक्कर में फंस गए थे तो क्या करेंगे? मेरे ख्याल से सबसे पहले यही कोशिश करेंगे कि अपने सभी मित्रों-परिचितों को बताएंगे कि फलां कंपनी ठीक नहीं है, पैसे लेकर पूरी सेवा नहीं देती है, मैं ठगा जा चुका हूं आदि।

इससे पहले कुछेक मामलों में कंपनी को चिट्ठी लिखना भी बनता है पर उसे आप हिन्दी में शिकायत करें वह अंग्रेजी में जवाब दे या आप अंग्रेजी में शिकायत करें और वह जिस अंग्रेजी में जवाब दे वही समझ में नहीं आए तो क्या करेंगे? अभी तक मैं समझता था कि निजी क्षेत्र में योग्य लोग रखे जाते हैं। और नौकरी चलती रहने की गारंटी भले ना हो काम करने वाले की पूछ रहती ही है। मैं समझता था कि हिन्दी में ही भाषा और शुद्धता से कोई मतलब नहीं होता है पर अब तो अंग्रेजी वालों का भी वही हाल दिख रहा है। आज यह नोटिस पढ़कर लगा कि क्या मजाक चल रहा है। कैसे-कैसे लोग काम करने के लिए रख लिए जा रहे हैं और शिक्षा का क्या स्तर है। हिन्दी में छपी शिकायत पर एतराज अंग्रेजी में आया और अंग्रेजी भी क्या शानदार !!

एक भी वाक्य सही नहीं है। इनमें ज्यादातर गलतियां तो कंप्यूटर बता दे। पर उसकी भी जरूरत नहीं समझी गई। व्याकरण से लेकर वाक्य विन्यास और हिज्जे तक की ऐसी-तैसी की गई है। इस नोटिस से कौन डरेगा और इस नोटिस के बाद अदालत में भी कंपनी क्या जाएगी और कैसे वकील कर लेगी राम जाने। और काम करने वाले लोग ऐसे हैं तो कंपनी क्या खाकर सेवा देगी। कैसे देगी? हम कहां जा रहे हैं? देश में पहली जरूरत रोजगार के मौके बढ़ाने की है जिनलोगों को अपनी औकात ही मालूम नहीं है उनके लिए रोजागर के मौके कैसे बनेंगे और नहीं बनेंगे तो भविष्य कैसा होगा?

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वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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घटिया और लचर है प्रधानमंत्री का मीडिया मैनेजमेंट

Sanjaya Kumar Singh : घटिया और लचर है प्रधानमंत्री का मीडिया मैनेजमेंट… खादी एंड विलेज इंडस्ट्रीज कमीशन की डायरी और कैलेंडर पर महात्मा गांधी की फोटो हटाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फोटो लगाए जाने के सवाल पर भक्त मीडिया ने पता नहीं अधिकारियों की इच्छा या आदेश पर या अपने स्तर पर ही नया पैंतरा लिया है। और, इस मामले में प्रधानमंत्री की छवि को हो सकने वाले नुकसान को धोने की कोशिश है। तर्क वही कि फोटो के उपयोग से पहले प्रधानमंत्री कार्यालय से अनुमति नहीं ली गई थी। यहां, यह खबर जब पहली बार आई थी तो आधिकारिक तौर पर क्या कहा गया था, उल्लेखनीय है। इंडियन एक्सप्रेस की साइट पर मूल खबर के साथ पीएमओ की प्रतिक्रिया भी है और इसका उल्लेख शीर्षक में ही है, “विवाद अनावश्यक है”।

इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें :

indian express news

पीटीआई के हवाले से 13 जनवरी को शाम 740 बजे की इस खबर में कहा गया है, The Prime Minister ‘s Office (PMO) said the controversy was “unnecessary” as “there is no rule in KVIC that it’s diary and calendar should have only Gandhiji’s photo.”

PMO sources said in the past also, there was no picture of Mahatma Gandhi on such KVIC material.

“In the calendars and diaries of 1996, 2002, 2005, 2011, 2012, 2013, 2016, there was no picture of Gandhi. So there is no question of Modi replacing Gandhiji’s picture,” the sources said.

“Those stoking the controversy over the issue should realize that during Congress rule of 50 years, the sale of khadi remained restricted to 2 per cent to 7 per cent but in last two years, the sale has seen an unprecedented jump of 34 per cent. This is because of PM’s efforts to popularise khadi,” they added.

The PMO said “Modi is an icon of the youth and the growing popularity of khadi in the world is testimony to this.”

The PMO said the KVIC diary and calendar has photographs of Modi distributing charkha among poor women, they said.

लगभग ऐसा ही बयान उसी दिन केवीआईसी के चेयरमैन के नाम से जारी किया गया है। बाद में एनडीटीवी के कार्यक्रम में भी श्री सक्सेना ऐसी ही बातें करते रहे। इसके बाद अब यह छापने, कहने या लिखने का क्या मतलब कि प्रधानमंत्री की अनुमति के बिना उनकी फोटो का इस्तेमाल किया गया? तमाम लोग इस निर्णय का बचाव कर चुके हैं। भक्तगण चाहे जो कहें, महात्मा गांधी की फोटो हटाकर प्रधानमंत्री की फोटो लगाना चापलूसी के अलावा कुछ और हो नहीं सकता। इसके समर्थन में कुछ तर्क ढूंढ़े और गढ़े भी जा सकते हैं। बात खत्म हो जाती और मामला ठंडा हो ही जाता। पर अब यह खबर पूरे मामले में प्रधानमंत्री के लचर मीडिया मैनेजमेंट की पोल खोल रही है। प्रधानमंत्री के स्तर पर ऐसी खबरें कोई उच्च अधिकारी यूं ही नहीं छपवाएगा। इकनोमिक टाइम्स की यह खबर आज की है और एक्सक्लूसिव के तौर पर दी गई है। किसी अनाम सूत्र से ऑफ दि रिकार्ड बातचीत के आधार पर ऐसी खबरें हिन्दी में क्षतिपूर्ति कही जाती हैं और बड़े पदों पर बैठे लोगों की भक्ति और चापलूसी में ही चलवाई जाती हैं। पर होती मीडिया मैनेजमेंट का हिस्सा ही है। इसमें सूचना तो है नहीं. जो तर्क दिया जा रहा है वह भी निराधार।

इकानामिक टाइम्स में छपी न्यूज पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें :

economic times news

प्रधानमंत्री कार्यालय की सेवा में दी गई यह खबर बहुत ही लचर है और इसमें अनाम शिखर के अधिकारी के हवाले से कहा गया है, “This is not the first instance of someone walking the extra mile to impress the PM or to show their association with the PM.” इससे विवाद बढ़ेगा ही घटेगा नहीं और इन तर्कों को कोई मानने से रहा। इस खबर से यह समझना मुश्किल नहीं है कि पीएम से करीबी दिखाने की कोशिश करने वाले का पूर्व में बचाव करने के बाद अब उसी को बलि का बकरा बनाने की कोशिश की जा रही है और कोई भक्त होगा तो बन भी जाएगा या शहीद होना खुशी-खुशी स्वीकार कर लेगा। पर इससे यह भी साफ हो रहा है कि प्रधानमंत्री का मीडिया मैंनेजमेंट बहुत ही घटिया है। चर्चा है कि प्रधानमंत्री सारे निर्णय स्वंय लेते हैं और सलाहकारों की नहीं चलती है। ऐसे में उन्हें मान लेना चाहिए कि मीडिया मैनेजमेंट और राजनीति अलग-अलग चीजें हैं। मीडिया को दबाने, खरीदने धमकाने के आरोपों के बाद इस तरह की चूक उन्हें कहीं का नहीं छोड़ेगी।

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक वरिष्ठ पद पर कार्यरत रहे. उनसे संपर्क anuvaad@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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आत्महत्या पर उतारू है BSNL

वैशाली, गाजियाबाद में मेरे पास बीएसएनएल के तीन लैंडलाइन नंबर थे। वैशाली में एयरटेल आने के बाद बीएसएनएल पर निर्भरता कम होती गई और बिल का भुगतान नहीं हुआ। टेलीफोन कटा रहा और कटा ही रह गया। कोई हिसाब नहीं, कोई सूचना नहीं, कोई कार्रवाई नहीं। मैंने मान लिया कि जमा की गई सुरक्षा राशि बीएसएनएल ने रख लिया। सरकारी कंपनी खा गई। मैंने भी छोड़ दिया। वास्तविकता चाहे जो हो।

अभी नोटबंदी के बाद जब डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देना शुरू हुआ तो मैंने बीएसएनएल के अपने आखिरी फोन का बिल भी चुका दिया। फोन उपयोग नहीं के बराबर होता था पर बकाया बताने वाला एसएमएस आता रहता था तो सोचा कौन कर्ज रखे। बिल चुकाने पर जब फोन चालू नहीं हुआ तो पता चला कि बिल तीन महीने से भुगतान नहीं हुआ था इसलिए कट गया है और अब चालू कराने के लिए फिर से फॉर्म भरना होगा। मैंने कहा कि फॉर्म भेज दिया जाए, भर दूंगा। पर कोई सुनवाई नहीं हुई। बीएसएनएल के अधिकारियों को मेल भेजने और फोन करने के बाद भी कोई सुनवाई नहीं हुई।

बताया गया कि बीएसएनएल के ऑफिस जाकर ही फॉर्म भरना होगा। मैंने मना कर दिया। मेरा कहना है कि आज के जमाने में ये कैसे चलेगा? जब दूसरी प्रतिद्वंद्वी कंपनियां घर बैठे फोन दे रही हैं तो बीएसएनएल के दफ्तर जाकर कौन और क्यों फोन कनेक्शन लेगा। आखिरकार एक सज्जन फॉर्म लेकर आए। उन्होंने बताया कि फॉर्म के साथ 500 रुपए भी देने होंगे। बात मेरी समझ में नहीं आई। उनका कहना था कि मेरा कनेक्शन बंद किया जा चुका है और मेरे पैसे (सुरक्षा राशि और जो बिल मैंने जमा कर दिया उसके समायोजन के बाद, टेलीफोन इंस्ट्रूमेंट के पैसे काटकर) वापस आ जाएंगे। अगर मुझे बीएसएनएल का फोन चाहिए (जो बंद हो चुका है) तो नए सिरे से आवेदन करना होगा और सुरक्षा राशि एडवांस देनी होगी। मैंने पूछा नहीं कि चेक चलेगा या नकद ही देना है। मैंने मना कर दिया कि जब बीएसएनएल को नंबर बंद करने की इतनी जल्दी है तो उसकी इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए और नंबर बंद रहे।

पर मुद्दा यह है कि पहले जो दो नंबर दो बंद हुए उनके हिसाब का क्या हुआ? जब टेलीफोन उपकरण के पैसे काटे जाने हैं तो वापस करने के लिए क्यों नहीं कहा गया (मेरे पास बीएसएनएल के तीनों घटिया उपकरण लगभग अनुपयुक्त सुरक्षित रखे हैं, लौटाने के लिए ही) और जब मेरे पैसे बीएसएनएल के पास हैं ही तो कनेक्शन बंद करने की इतनी जल्दी क्यों? इन सबके अलावा ये स्क्रीन शॉट देखिए – मेरे पास 23 नवंबर को संदेश आया कि 25 नवंबर तक पैसे जमा कराए जा सकते हैं।

जब बंद कर दिया था तो संदेश क्यों? मैंने 24 नवंबर को पैसे जमा करा दिए 25 नवंबर को मुझे संदेश भी मिला कि पैसे प्राप्त हो गए हैं। फिर फोन बंद क्यों हो गया? बंद ही था तो पैसे क्यों मांगे जा रहे थे और जब इंतजार ही नहीं करना था तो 25 नवंबर की तारीख किसलिए बताई जा रही थी? यह सरकारी कंपनी का भ्रष्टाचार नहीं तो और क्या है? बीएसएनएल को बंद कराने की साजिश के अलावा क्या है?  देखता हूं, पैसे वापस आते हैं कि फोन चालू होता है। मुझे तो दोनों की उम्मीद नहीं है। 

लेखक Sanjaya Kumar Singh वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक हैं. उनसे संपर्क anuvaadmail@gmail.com या +91 98101 43426 के जरिए किया जा सकता है.

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अपनी रिपोर्टर पूजा की आड़ क्यों ले रहे हो सुधीर चौधरी, साफ कहो नैतिक जिम्मेदारी मेरी है

Sanjaya Kumar Singh : गैर-जिम्मेदार रिपोर्टिंग पर एफआईआर हुई तो पढ़िए सुधीर चौधरी का बचाव। संपादक जी कह रहे हैं कि रिपोर्टर पूजा मेहता सिर्फ 25 साल की है। पूजा को ममता बनर्जी की असहिष्णुता झेलना पड़ रहा है जबकि पूजा अपने संपादक की नालायकी झेल रही है। ज़ी न्यूज संतुलित खबरें कर रहा होता तो खिलाफ खबरों पर भी एफआईआर नहीं होती है और संपादकी झाड़ने वाले मौका मिलते ही फंसा दिए जाते हैं – ये कौन नहीं जानता है। पूजा नहीं जानती होगी सुधीर चौधरी को तो पता ही है। अब पूजा की आड़ क्यों ले रहे हो। कहो, नैतिक जिम्मेदारी मेरी है। पूजा का नाम एफआईआर से हटा दिया जाए। पूजा की आड़ में खुद बचने का रास्ता क्यों खोज रहे हो।

कायदे से रिपोर्टिंग के लिए परेशान किया जाना गलत है। ममता बनर्जी ने जो किया वह समर्थन करने लायक नहीं है लेकिन संपादक रिपोर्टर की आड़ क्यों ले? दोष उसके सिर क्यों मढ़े? जिम्मेदारी तो संपादक की होती है और अगर रिपोर्ट सही है तो संपादक कहेगा सही है और नहीं तो माफी मांगेगा? रिपोर्टर की आड़ लेने का क्या मतलब लगाया जाए?

मैं ज़ी न्यूज की रिपोर्टिंग / संपादकी देखता नहीं लेकिन संपादक के रूप में बचाव बड़ा लचर है। दम है तो यही कहते कि रिपोर्ट सही है। ममता मुझे झेल भेज दें। अब जूनियर रिपोर्टर की आड़ में रिरिया क्यो रहे हो? आखिर स्टोरी पास करने की जिम्मेदारी तो तुम्हारी है सुधीर चौधरी।  अगर ममता ने सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया (अभी तो एफआईआर ही हुई है) तो लिखो ना बताओ, दिखाओ, रोने क्यों लगे? अगर एफआईआर कराना मुख्यमंत्री की असहिष्णुता है तो तुम्हारा यह बचाव दुम दबाकर रिरियाना है। इससे अच्छा होता, सीधे गलती मान लेते। तुम भी तो मीडिया की आजादी के नाम पर भौंक रहे हो।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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ईमानदारी के इस पर्व में सबसे ज्यादा नकदी भाजपाइयों के पास पकड़ी गई

Sanjaya Kumar Singh : भ्रष्टाचार दूर करने और देश में ईमानदारी स्थापित करने के भाजपाई राष्ट्रवादी त्यौहार के 50 दिन जैसे-जैसे पूरे होने के करीब आ रहे हैं इसका क्रूर और असली चेहरा सामने आ रहा है। यह रंगपोत कर चेहरा चमकाने की कोशिश का वीभत्स रूप था। लोगों की जान लेकर भी छवि बनाने का क्रूर खेल। भक्तों और सरकार के हिसाब से ईमानदारी स्थापित हो चुकी है और कालाधन लगभग खत्म हो गया है।

मुझे तो लग रहा है कि यह चुनाव में चंदा नहीं देने वालों को धमकाने, ब्लैकमेल करने की एक मान्यताप्राप्त राजनैतिक दल की कोशिश का सरकारी रूप था जो संयोग से सत्ता में भी है। अब यही बचा रह गया है कि सरकार एक नियम बनाए जिसके मुताबिक नोटबंदी की घोषणा के बाद 1000 या 500 के पांच या कम नोट जमा करने वाले गरीबों के बारे में मान लिया जाए कि उन्होंने राष्ट्रवादी पार्टी के राष्ट्रनिर्माण प्रयासों में सहयोग नहीं किया है और उनके ये पैसे सीधे भाजपा के खाते में ट्रांसफर हो जाएं।

सुनने में यह अटपटा लग रहा है। पर अभी तक जो हुआ वह कम अटपटा नहीं है। और, जब इतना सब हो गया तो यह भी हो सकता है। पढ़िए यह खबर। इसके अलावा, आप जानते हैं कि सबसे ज्यादा नकदी भाजपाइयों के पास पकड़ी गई। सबका हिसाब भी है। तो यह ईमानदारी पर्व था किसके लिए? और इतने लोगों को इतना परेशान करके, करीब 100 लोगों की जान लेकर मिला क्या?

मुंबई में पकड़े गए 10 करोड़ रुपए पंकजा-प्रीतम मुंडे के को-ऑपरेटिव बैंक के निकले

मुंबई. यहां से पकड़ा गया 10 करोड़ रुपए का कैश महाराष्ट्र सरकार की मंत्री पंकजा मुंडे और उनकी सांसद बहन प्रीतम मुंडे के को-ऑपरेटिव बैंक का निकला। सांसद प्रीतम ने इस मामले में कहा- “मुंबई ब्रांच से पुणे ब्रांच में ले जाया जा रहे कैश का पूरा हिसाब बैंक के पास है।” बता दें कि गुरुवार को मुंबई में एक कार से पुलिस ने 10 करोड़ 10 लाख रुपए का कैश बरामद किया था। इसमें 10 लाख रुपए 2000 रुपए के नए नोटों में थे। बोरों में भरा था कैश. पुलिस ने गुरुवार को घाटकोपर-मानखुर्द लिंक रोड स्थित छेड़ा नगर के पास यह कैश पकड़ा था। – इसे बोरों में भरकर मुंबई से पुणे ले जाया जा रहा था। इस मामले में पुलिस ने 3 लोगों को हिरासत में लिया था। 10 करोड़ के पुराने नोट और 10 लाख के 2000 के नोट थे. यह छापेमारी एन्फोर्समेंट डायरोक्टोरेट (ईडी), इनकम टैक्स डिपार्टमेंट और मुंबई पुलिस ने की थी। पकड़ी गई रकम में 10 करोड़ रुपए 500 के पुराने नोट और बाकी के 10 लाख 2000 के नए नोटों में मिले थे। डीसीपी शाहजी उमाप ने बताया कि यह कार्रवाई इंटेलिजेंस इनपुट्स पर की गई थी। पूरा कैश कार से बरामद हुआ था। कार में बैठे तीन लोगों को पुलिस ने हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू की तो तीनों ने खुद को पुणे के वैद्यनाथ अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक का इम्प्लॉइज बताया। पुलिस ने बताया, “पकड़े गए लोगों में से एक वैद्यनाथ शहरी सहकारी बैंक की पिंपरी चिंचवाड ब्रांच का मैनेजर है। जबकि 2 ने बैंक के कर्मचारी होने का दावा किया है।”

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और प्रोफेशनल अनुवादक हैं.

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मोदी के पीएम पद पर बने रहते हुए सबूत कैसे जुटाए जाएंगे माई लॉर्ड!

Sanjaya Kumar Singh : मामला पर्याप्त सबूत होने या न होने का नहीं है… मामला देश की सर्वोच्च अदालत में है और बड़े-बड़े लोग जुड़े हैं। मेरी कोई औकात नहीं कि इस मामले में टिप्पणी करूं पर जैन हवाला मामले को अच्छी तरह फॉलो करने के अपने अनुभव से कह सकता हूं कि सुप्रीम कोर्ट की चिन्ता जायज है। लेकिन यहां मामला पर्याप्त सबूत होने या न होने का नहीं है। मामला ठीक से जांच कराए जाने का है।

जैन हवाला मामले में 115 अभियुक्त थे और सभी मामलों की जांच, तथा उन्हें साबित करना अपेक्षाकृत मुश्किल था। पर यहां मामला सीधा है। आज टेलीग्राफ की इस खबर से भी लगता है गुजरात सीएम अगर गुजरात अलकली केमिकल है तो उसे भुगतान क्यों हुआ, हुआ कि नहीं इसकी जांच हो जाए और यह रिश्वत है (किसी और कारण से, किसी और को) तो उस मामले में कार्रवाई हो और इसे खत्म माना जाए। पर मामला है तो उसे अंजाम तक पहुंचाना ही चाहिए।

राजदीप सरदेसाई के साथ अरविन्द केजरीवाल की बातचीत से जो मामला समझ में आता है वह यह है कि बुनियादी तौर पर एक मामला है, शक है। सुप्रीम कोर्ट के लिए यह पर्याप्त नहीं है इस पर कोई विवाद नहीं है। पर मामला यह है कि इसकी जांच होनी चाहिए। पर्याप्त सबूत जुटाए जा सकते हैं कि नहीं? जुटाने की कोशिश हुई कि नहीं? कौन करेगा? क्यों और कैसे करेगा? अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि इसकी जांच नहीं कराई जा रही है, नहीं होने दी जा रही है। संबंधित अधिकारियों का तबादला कर दिया गया आदि। इस लिहाज से सुप्रीम कोर्ट में अपील यह होनी चाहिए थी (मुझे लग रहा है अभी ऐसा नहीं है, मैं गलत हो सकता हूं) कि इस मामले की निष्पक्ष जांच कैसे सुनिश्चित हो? यह नहीं कि उपलब्ध सबूतों पर ही कार्रवाई हो। सबूत कार्रवाई के लिए पर्याप्त न हों, यह संभव है। पर जांच के लिए तो पर्याप्त हैं ही।

इस खबर में कहा गया है कि गुजरात सीएम का मतलब गुजरात अलकली केमिकल्स है – गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं। ठीक है। हो सकता है। पर इस बात की जांच हो जाए पुष्टि हो जाए कि गुजरात सीएम गुजरात अलकली केमिकल्स ही है। अगर किसी ने किसी कंपनी को इतनी राशि दी है तो उसका कारण होगा, संबंध होगा, सबूत भी होंगे। आदि। साबित होना कोई मुश्किल नहीं है।

और, जब ईमानदारी की बात हो रही है और वह देश के सभी लोगों पर समान रूप से लागू होना है तो गुजरात अलकली केमिकल्स को यह भुगतान किसलिए हुआ, नकद हुआ कि चेक से और नकद हुआ तो क्यों? संतोषजनक जवाब मिल जाए। बात खत्म। नैतिकिता का तकाजा है और चूंकि मामला प्रधानमंत्री से संबंधित है, और प्रधानमंत्री न भी चाहें तो जांच करने वाले को एक भय रहेगा इसलिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि काम (जांच) करने वालों को यह भय न रहे। कैसे न रहे – यह सुनिश्चित करना संबंधित विभागों, लोगों और संस्थाओं का काम है।

इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट की यह चिन्ता भी जायज है कि चूंकि मामला प्रधानमंत्री के खिलाफ है इसलिए इसे जल्दी निपटाया जाना चाहिए और सबूत जल्दी चाहिए। अगर सुप्रीम कोर्ट में अपील करने वालों को अपने सबूतों पर यकीन है और लगता है कि सब साबित हो सकता है पर प्रधानमंत्री के इस पद पर बने रहते हुए सबूत कैसे जुटाए जाएंगे या सबूत जुटाने में क्या समस्या आ रही है – सुप्रीम कोर्ट को यह बताया जाता तो मेरे ख्याल से बेहतर रहता।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : https://www.facebook.com/sanjaya.kumarsingh

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