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सियासत

बीमार और मरती गायों की वीडियो बना रहे पत्रकार को पीटने पर क्यों नहीं जागा हिन्दुओं के ठेकेदारों का जमीर?

चरण सिंह-

उत्तर प्रदेश के ललितपुर से 36 सेकंड का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें एक पत्रकार स्थानीय गौशाला की बदहाल हालत दिखा रहा है। वीडियो रिकॉर्डिंग के दौरान अचानक कुछ महिलाएँ और पुरुष पीछे से पत्रकार को दौड़ाते दिखाई देते हैं। आरोप है कि यह हमला गौशाला के सचिव ने ही करवाया। विडंबना यह है कि बीमार और मरती गायों की हालत दिखा रहे पत्रकार देवेंद्र कौशिक पर ही एससी-एसटी एक्ट, रंगदारी मांगने समेत कुल 8 गंभीर धाराओं में FIR दर्ज कर दी गई है। उनका “गुनाह” सिर्फ इतना था कि वे उन गायों की असलियत दिखा रहे थे, जिन्हें आदर्श कहकर गोशालाओं में रखा जाता है।

गौशाला में मरती, भूखी-प्यासी और तड़पती गायों को दिखाना अगर अपराध बन चुका है, तो सवाल यह है—हिन्दुओं के स्वयंभू ठेकेदारों का जमीर इस मुद्दे पर क्यों नहीं जाग रहा? शायद इसलिए कि यह मुद्दा न तो धार्मिक ध्रुवीकरण करता है और न ही सत्तारूढ़ दल के वोट बैंक को मजबूती देता है।

दुखद यह भी है कि विपक्ष ऐसी घटनाओं पर माहौल तो बनाता है, लेकिन जनहित में काम कर रहे पत्रकारों के हक में खुलकर खड़ा नहीं होता। क्या विपक्ष को नहीं पूछना चाहिए कि आखिर एक पत्रकार पर एससी-एसटी एक्ट जैसी गंभीर धाराएँ क्यों लगाई गईं? उसका अपराध आखिर था क्या?

पत्रकारों के हितों की लड़ाई लड़ने वाले संगठन भी अपने-अपने आरामदायक दायरे में सिमट चुके हैं। प्रेस क्लब तो शराबखानों में तब्दील हो गए हैं। देशभर में कई पत्रकार संगठन मौजूद हैं, लेकिन अधिकांश सत्ता के करीब खड़े नजर आते हैं। मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई हो, मीडिया हाउसों में छंटनी, या चार लेबर कोड—कितने संगठन वास्तव में पत्रकारों के लिए लड़ रहे हैं?

इसके उलट स्थापित मीडिया घराने यह नैरेटिव बनाने में लगे हैं कि “यूट्यूबरों ने पत्रकारिता खराब कर दी।” जबकि सच्चाई यह है कि सत्ता की गलतियों को दिखाने की हिम्मत जो मुख्यधारा मीडिया नहीं कर पाता, वही कुछ स्वतंत्र पत्रकार और यूट्यूबर कर रहे हैं—और यही बात सत्ता और उसके नजदीकी मीडिया को खटकती है।

सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि समाज को पता ही नहीं चल पा रहा कि जाति और धर्म के नाम पर बनाई जा रही नफरत की राजनीति उसका कितना नुकसान कर रही है। गाय तस्करी और कटान का मुद्दा इसलिए उछाला जाता है क्योंकि इसे मुस्लिमों से जोड़कर वोटबैंक मजबूत किया जा सकता है। लेकिन गोशालाओं में बीमार पड़ती और मरती गायों पर चुप्पी इसलिए है क्योंकि इससे गोशालाओं और सत्ता—दोनों की छवि खराब होती है।

हकीकत यह है कि सत्ता पक्ष का लक्ष्य सिर्फ हिन्दू वोटबैंक को साधना है—न उसे सच में गायों से लगाव है, न हिन्दुओं से। और विपक्ष भी कोई जनहित की राजनीति नहीं कर रहा; उसे भी केवल सत्ता चाहिए। SIR (सत्ता से जुड़े मुद्दे) विपक्ष के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन बेरोजगारी, महंगाई, कानून व्यवस्था जैसे जनता के मुद्दों पर उनकी सुस्त चुप्पी बहुत कुछ कहती है।

जब तक इस देश में राजनीति जनहित की नहीं होगी, तब तक पत्रकारिता भी जनहित की नहीं हो सकती। पत्रकारिता का काम जनता की आवाज बनना है, सत्ता का प्रवक्ता नहीं।

मूल खबर…

ललितपुर में पत्रकार को महिलाओं से पहले पिटवाया फिर 8 धाराओं में मुकदमा लिखाया, देखें वीडियो!

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