प्रियदर्शन-
स्मृतिशेष मधुसूदन आनंद!

क़रीब दो-तीन महीने पहले उनका फोन आया था। ‘नया ज्ञानोदय’ में छापने के लिए इरफ़ान हबीब और रोमिला थापर के दो वक्तव्यों के अनुवाद कराना चाहते थे। मैंने दफ़्तर की सहकर्मी समीक्षा शर्मा से ये अनुवाद कराए और उन्हें भेजा। ‘नया ज्ञानोदय’ के पिछले अंक में दोनों प्रकाशित भी हुए।
मुझे कुछ हैरानी हुई थी। अब भी ‘नया ज्ञानोदय’ जैसी पत्रिका में वे इरफ़ान हबीब और रोमिला थापर को छापना चाहते हैं? शायद यह उनके भीतर के संपादक की हुड़क थी जो बीच-बीच में सिर उठाता होगा।
उनसे मेरा परिचय संभवतः 1993-94 में कभी हुआ था। मैं फ्रीलांसर था, ‘नवभारत टाइम्स’ के लिए कुछ लिखा करता था और वे वहां तब सहायक संपादक थे जो उन दिनों ख़ासा महत्वपूर्ण पद हुआ करता था। बाद में वे संपादक भी बने। 2002 के आसपास वे मुझे अपनी टीम में शामिल करना चाहते थे और इसकी सूचना उन्होंने विष्णु नागर जी की ही मार्फत भिजवाई थी। लेकिन तब तक शायद मैं एनडीटीवी में आने का मन बना चुका था, इसलिए यह बात रह गई।
वैसे पद जो भी हो, उससे वे लगभग अप्रभावित थे। मृदुता और शराफ़त उनके व्यक्तित्व में रचे-बसे थे। जब भी उनसे बात होती, यह समझ में आता कि विविध विषयों पर उनका अध्ययन पर्याप्त है और उनके पास एक सुचिंतित राय है। लेकिन ख़ुद को जताने या अपने बारे में बताने से वे संकोच करते रहे। जब मंगलेश जी ने उनका कविता संग्रह ‘पृथ्वी से करें फरमाइश’ मुझे लिखने के लिए दिया तब मुझे पता चला कि वे कवि भी हैं। मेरी टिप्पणी से वे खुश थे।
हालांकि उन्हीं दिनों मेरी एक नासमझी भरी हरकत ने शायद उन्हें कुछ असंतुष्ट या नाराज़ किया था। आकाशवाणी की राष्ट्रीय प्रसारण सेवा में हम दोनों का कार्यक्रम था- जहां तक मुझे याद आता है- ज्योत्स्ना जी का भी, जो उनकी पत्नी हैं। कार्यक्रम के बाद चेक लेने की बारी आई तो एक रसीदी टिकट देना था जो मेरे पास नहीं था। मधुसूदन जी ने बड़ी सहजता से मेरे हिस्से का टिकट दे दिया। लेकिन शायद 27-28 साल की उम्र में और फ्रीलांसर होने की वजह से मधुसूदन जी जैसे वरिष्ठ पत्रकार के मुक़ाबले बहुत कमतर होने की किसी ग्रंथि ने एक अशालीन सी अकड़ मेरे भीतर पैदा कर दी होगी- मैंने उनसे पूछा कि क्या मैं उन्हें पैसे दे दूं? वे लगभग हतप्रभ हो गए। उन्हें लगा होगा कि एक रुपया देकर यह लड़का क्या साबित करना चाहता है। उन्होंने मना किया।
हालांकि तब तक मैं भी एक संकोच में डूब चुका था कि यह कैसी नादानी मैंने की है। बहरहाल, यह घटना हमारे बीच टिकी नहीं। वे तो इसे भूल भी गए होंगे।
वे कई विधाओं में लिखते रहे, लेकिन कहानियों पर लगातार काम कर रहे थे। हरियश राय के सौजन्य से मुझे उनके साथ एक कहानी पाठ का अवसर मिला। हम दोनों के साथ आकांक्षा पारे तीसरी कथाकार थी।
मेरे पास अक्सर कुछ लिखने के लिए ही उनका फोन आया करता था। उन्होंने अपना कहानी संग्रह भी मुझे भेजा था। मेरी आख़िरी बातचीत उनसे 16 जनवरी को हुई थी। मैंने किसी सिलसिले में उन्हें फोन किया था। पहले तो कभी नहीं, लेकिन इस आखिरी बातचीत में उन्होंने इसकी याद दिलाई और कुछ संकोच से इस पर लिखने का इशारा किया। तब हम दोनों इस बात से बेख़बर थे कि महीने भर के भीतर मैं उनकी स्मृति को सहेज रहा होऊंगा- यह सोचता हुआ कि उन पर कुछ लिखूं।
जब रामभद्राचार्य को ज्ञानपीठ देने का फ़ैसला हुआ तो मुझे गहरा असंतोष हुआ- मधुसूदन जी से शिकायत भी हुई- उन्होंने इसका विरोध क्यों नहीं किया। यह एहसास है कि वे किसी भी सूरत में इस फ़ैसले के साथ नहीं होंगे, लेकिन सज्जनता में दूसरों का दबाव मान लेने की जो कमज़ोरी होती है, शायद वह उनमें भी रही होगी तो उन्होंने इसे संस्था का फ़ैसला मान कर स्वीकार कर लिया होगा।
हालांकि कुछ समझौते तो हम सब जीवन में करते ही रहते हैं। चादर जस की तस धरने की बात कबीर ने भले कही हो, कौन धर पाता है? अंततः मेरी अंतिम स्मृति में एक सौम्य, संवेदनशील और कुछ संशयशील चेहरा उभरता है।
इस स्मृति को प्रणाम करते हुए सोचता हूं- ज़माने में घटते जा रहे हैं वे लोग जिन्हें कभी सम्माननीय वरिष्ठों की तरह देखा था और जो वह विराट सांस्कृतिक पर्यावरण बनाते थे जिससे हमें कुछ साफ़-सुथरी- जीने लायक- हवा मिलती थी।
‘नवभारत टाइम्स’ का वह दफ़्तर भी याद आया जिसमें उन दिनों अच्युतानंद मिश्र, प्रयाग शुक्ल, इब्बार रब्बी, विष्णु नागर, राजकिशोर, सूर्यकांत बाली, रामकृपाल सिंह, बालमुकुंद, गोविंद सिंह, सुरेश शर्मा, बलराम जैसी अलग-अलग शख्सियतों वाले कई लोग हुआ करते थे और विचार और संस्कृति का एक समृद्ध माहौल बनाते थे। राजकिशोर जी और सूर्यकांत बाली अब इस दुनिया में नहीं हैं।
ऐसी ही है दुनिया। लोग आते-जाते हैं, हम बस हिसाब लगाते हैं कि ज़माना किधर जा रहा है। एक दिन कोई हमारा भी हिसाब लगाएगा।


