पंकज मिश्रा-
अगर वह अचानक धरने पर न बैठता , घोषित कर के आता तो उसे घर मे ही नजरबंद कर दिया गया होता | प्रियंका सहित बाकी किसी भी नेता को सड़क पर आने से पहले ही रोक दिया जाता |
सन्सद में बोलने का स्पेस नहीं है, सड़क पर मार्च का स्पेस नहीं है, कोर्ट कहती है हमें इन विवादों में मत घसीटो, जवाबदेही का आलम यह है कि resignstion जिसे ऑटोमेटिकली हो जाना चाहिए, जो विशुद्ध एडमिनिस्ट्रेटिव ऐक्शन है, जिसे नैतिकता के आधार पर पहले लोग खुद ही दे दिया करते थे और आज हाल क्या है, न तो पोलिटिकल ऐक्शन का, न एडमिनिस्ट्रेटिव ऐक्शन का, न morality का, किसी के लिए कोई स्पेस नहीं बचा है।
राहुल यदि CJP के प्रोटेस्ट में आने की घोषणा भी करते तो न राहुल को आने दिया जाता और अगर किसी छापामार तरीके से, छिपते छिपाते बच बचाकर पहुंच जाते तो आंदोलन को दो घण्टे के भीतर क्रश कर दिया जाता। टेंट फेंट उखाड़ कर पुलिस, PARA मिलिट्री कैम्प बना दिया जाता, दिल्ली की मुख्य सड़कें बैरिकेड हो जाती, कंट्रोल्ड ट्रैफिक और बार्डर सील। जैसे उत्तराखंड में protest में दिल्ली के लिए आने वालों को प्रदेश में निकलने से पहले ही डिटेन कर लिया गया जैसे किसानों को फिर रोक दिया गया है।
जब तक कंट्रोल्ड आंदोलन जंतर मंतर पर चल रहा था, बमुश्किल हजार दो हजार लोग भी नहीं थे तब तक सब होने दिया गया यह भी दिखा दिया कि देखो, देखो कितनी आसानी से परमीशन मिल गयी, आराम से धरना चल रहा है, सेलिब्रिटी आ जा रहे हैं, गाना बजाना खाना पीना सब हो रहा है, राहुल को मुसलसल बदनाम किया जाना जारी था, सब राजी खुशी से हो रहा था, मगर सोनम को तब उठाया गया जब मार्च का दिन आने लगा और मामला सैटल नहीं हुआ दूसरी लेफ्ट के स्टूडेंट्स के लिए भी सकारात्मक सन्देश जाने लगा। मामला real politik होने का अंदेशा बढ़ चला था यानी अलार्म बज चुका था और राजनीति में सब कुछ नियंत्रित नहीं हो सकता, यदि ऐसा हो सकता तो सत्ताएं कभी नहीं बदलती।
सोनम को उठाना बूमरैंग इसलिए हो गया कि ग्राउंड पर GENUINE जनरोष था, जैसे ही छात्रों अभिभावकों और जागरूक जनों को लगा कि उनकी मांगों को, उनके भविष्य को पलीता लगाया जा रहा है एक अभूतपूर्व भीड़ रातों रात एकत्र हो गयी। यह बिल्कुल ऑर्गेनिक GROUND SWELL था, यह GROUND SWELL दीपके और सोनम की इच्छा से भी और औकात से भी स्वतन्त्र था वरना इतने दिनों तक तो उनसे कोई नेता छोड़िए कोई कारिंदा तक बात करने भी नहीं आया।
फटाफट सोनम से कहलवाया की सन्सद में विपक्ष मुद्दा उठाये, अरे भाई विपक्ष क्या suo moto नहीं उठाता, वहां उठाता तो भी उस सन्सद में जहां कुछ नहीं होना जाना था, वह जगह पहले से ही नियंत्रित है। लेकिन रोचक यह था मुद्दा विपक्ष उठाये, यह मांग करवाई जा रही थी मतलब इम्प्रेशन यह convey किया जा रहा था कि विपक्ष इतना भी नहीं करता, बिल्कुल नकारा है। दूसरा पहलू ये कि मांग भी की तो विपक्ष से की, मानो वही जिम्मेदार है सत्ता पक्ष नहीं। इस मूवमेंट की कोई STEERING कमेटी नहीं थी जो नेक्स्ट प्रोग्राम दे सकती। एक बार यह आर्टीफीशियल लीडरशिप compromise हो जाये (जिसे होना ही था) तो आंदोलन खड़ा होने से पहले ही बैठ जाता।
सोनम हॉस्पिटल पहुंचे, वहां सोनम हस्पताल बदलने की याचिका लगा रहे थे जो कोर्ट ने खारिज कर दी फिर पता नहीं क्यों उन्हें मेदांता भेज दिया वहां बड़े नेता भी पहुंच रहे है। ये नेता पहले क्यों नहीं पहुंचे? राहुल के उतरने के बाद यह समझ में आना मुश्किल नहीं है।
उधर आंदोलन लीड करने वाले मांगपत्रक देने नड्डा के घर ऐसा गए कि 5 घण्टे वहीं रुक गए, मूवमेंट को वह motel समझ कर आराम करने लगे। जिसे फ्रंट से लीड करना था वह दुबक गए थे। अब सारा मोर्चा छात्रों नौजवानों के हाथों में था, वह सब कोई पोलिटिकल लोग नहीं थे कि इस आंदोलन के भविष्य का कोई भी खाका खींच सकते।
लेफ्ट के छात्र नेता बगल के छोटे टेंट में मर रहे थे, उनके लिए किसी सेलेब्रिटी का स्टेटमेंट नहीं आ रहा था, कुछ जिंदा जमीर लोग लिख रहे थे, कुछ मिल रहे थे। लेफ्ट आंदोलन में पहले से था, कांग्रेस आंदोलन में पहले से थी मगर वह सब कुछ बड़ा न हो जाये तो एक नियंत्रित आंदोलन की भूमिका बांधी गई, एक फेक नेता को निर्मित किया गया ताकि अन्ना 2.0 की रेसिपी फिर से काठ की हांडी पर चढ़ाई जा सके, जनता के गुस्से को VENT दे दो, एक फेक नेता खड़ा करो उसे mike दे दो, माला दे दो और TENT दे दो।
मगर एक genuine मुद्दे से जनता जुड़ गई जिसमें कोई communal angle नहीं, कोई polarizing nuance दूर तक explore नहीं हो सकता था, नितांत सेकुलर इशू जिससे सब प्रभावित थे, न नेहरू काम आ रहे थे, न पाकिस्तान, जेहाद के आगे कोई संज्ञा या विशेषण लग नहीं पा रहा था, सारा किया कराया इसी निजाम का जो था। यानी आंदोलन को भटकाना भी असफल हो रहा था, साला भटक ही नहीं पा रहा था तो इसे leader less कर दो, rudder less कर दो…..
यह क्रांति काल था, बिल्कुल क्रिटिकल juncture जब कि इस मूवमेंट को बचाना था, जनता के ख्वाबों को खाक होने से पहले सम्भाल लेना था, ऐसे में वो आया अचानक औचक बिना बताए मगर यही सब उसकी योजना थी। वह घोषणा करता तो निकल ही नहीं सकता था। वह यूँ न करता तो आज इस मूवमेंट का क्या होता, जगह जगह शहरों में प्रदर्शन शुरू हो गए है, अखिलेश का साथ दिख जाना भी एक बड़ा moment था जिसने सपा को ट्रिगर कर दिया।
राहुल आए नहीं तो छोटे हो जाएंगे, अब आ गए तो देर से आये यह राग शुरू हो गया था, दो रोज पहले आ जाते तो इनके फेक नेता को लेजिटिमेसी मिल जाती, उस नेता को जिसने इसी मुद्दे पर हो रहे NSUI और लेफ्ट के पहले से हो रहे मूवमेंट्स पर एक बयान तक न दिया हो, आज वो SERMON दे रहा है कि कौन क्या करने से बड़ा और छोटा हो जाएगा…. असली लीडर मोमेंट भी देखता है, इंटेंट भी और CONTENT भी, उसने मोमेंट देखा, प्लान किया, और मूवमेंट को RUDDERLESS होने से बचा लिया। तय तो समय करता है कि सही था और क्या गलत मगर जनता नेता को बड़ा बनाती उसे अपने रियल साथी का पता सबेर न मिले मगर देर से मिल ही जाता है।
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