Connect with us

Hi, what are you looking for?

उत्तर प्रदेश

पत्रकार निकहत अली, करिश्मा अज़ीज़, वसीम अकरम त्यागी, सैयद कैफ हसन और नदीम सैफी के खिलाफ शामली पुलिस ने FIR दर्ज की!

नई दिल्ली। दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने गुरुवार को साइबर पुलिस को पत्रकार करिश्मा अजीज के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश दिया। इसमें कई अन्य मुस्लिम पत्रकारों का भी नाम शामिल है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर उनके अकाउंट से हिंदू धार्मिक मान्यताओं और धार्मिक एवं ऐतिहासिक हस्तियों को लेकर कथित तौर पर आपत्तिजनक पोस्ट किए गए। शिकायतकर्ता ने इन पोस्ट को सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाला भी बताया है।

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मृदुल गुप्ता ने अधिवक्ता अमिता सचदेवा की ओर से दाखिल याचिका पर यह आदेश दिया। याचिका भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(3) के तहत FIR दर्ज कर जांच की मांग को लेकर दाखिल की गई थी।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि फरवरी से अप्रैल 2025 के बीच सोशल मीडिया अकाउंट से कई पोस्ट और वीडियो अपलोड किए गए। इनमें एक हिंदू संत, भगवान राम, छत्रपति शिवाजी महाराज और सावरकर समेत हिंदू धार्मिक एवं ऐतिहासिक हस्तियों को लेकर कथित तौर पर अपमानजनक टिप्पणियां की गईं। शिकायत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों और ‘एंटी-इंडिया’ भावनाओं को बढ़ावा देने का आरोप भी लगाया गया है।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि शिकायतकर्ता ने कथित पोस्ट और वीडियो से संबंधित स्क्रीनशॉट, ट्रांसक्रिप्ट और लिंक रिकॉर्ड पर रखे हैं। कोर्ट के मुताबिक आरोप किसी एक बयान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि एक निश्चित अवधि में किए गए कई पोस्ट से जुड़े हैं।

इस मामले में साउथ साकेत साइबर पुलिस स्टेशन ने पहले स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की थी। पुलिस ने कहा था कि संबंधित पोस्ट में अश्लीलता और हिंदू धर्म को सीधे निशाना बनाने वाली सामग्री थी। हालांकि पुलिस के मुताबिक इनमें राजनीतिक या ऐतिहासिक टिप्पणी, आलोचना और व्यंग्य का पहलू भी था। पुलिस ने जांच के बाद जानबूझकर सांप्रदायिक वैमनस्य भड़काने का कोई सबूत नहीं मिलने की बात कही थी।

कोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर उसे आरोपों की सत्यता या आरोपी की आपराधिक जिम्मेदारी पर अंतिम फैसला नहीं करना है। कोर्ट के अनुसार यह जांच का विषय है कि संबंधित पोस्ट संरक्षित राजनीतिक टिप्पणी, व्यंग्य, आलोचना या ऐतिहासिक विचार की श्रेणी में आते हैं या फिर लगाए गए कानूनों के तहत अपराध की सीमा पार करते हैं।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Amish Devgan बनाम Union of India मामले के फैसले का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संवैधानिक रूप से संरक्षित है, लेकिन संदर्भ के आधार पर सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने या धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से आहत करने वाली अभिव्यक्तियां दंडात्मक कार्रवाई के दायरे में आ सकती हैं।

अदालत ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को जुटाने और सुरक्षित रखने के लिए जांच जरूरी है। इसमें सोशल मीडिया अकाउंट के संचालन और उसके लेखकत्व से जुड़ी जानकारी, अपलोड किए गए वीडियो और पोस्ट, उनके प्रसार तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड शामिल हैं।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि FIR दर्ज करने का आदेश देते समय वह आरोपों के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं कर रही है। अदालत ने शिकायत में संज्ञेय अपराध का खुलासा होने की बात कहते हुए नई दिल्ली स्थित साइबर पुलिस स्टेशन को FIR दर्ज कर कानून के अनुसार जांच करने का निर्देश दिया।

पुलिस को एक सप्ताह के भीतर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का भी निर्देश दिया गया है।

शिकायतकर्ता ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 196, 299 और 353 के तहत FIR दर्ज करने की मांग की है।


शम्स तबरेज कासमी-

मिल्लत टाइम्स की पत्रकार निकहत अली समेत करिश्मा अज़ीज़, ‘द मुस्लिम स्फीयर’, वसीम अकरम त्यागी, सैयद कैफ हसन और नदीम सैफी के खिलाफ उत्तर प्रदेश की शामली पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है। पुलिस का आरोप है कि इन लोगों ने आयुष मलिक मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले का उल्लेख करते हुए ‘फटकार’ शब्द का इस्तेमाल किया, जबकि अदालत ने शामली पुलिस को कोई फटकार नहीं लगाई थी। पुलिस के मुताबिक, यह मामला पिता-पुत्र के बीच का था।

शामली पुलिस की यह कार्रवाई साफ तौर पर उसकी बौखलाहट को जाहिर करती है। सच लिखने, सवाल पूछने और कमजोरों की आवाज उठाने वाले पत्रकारों एवं सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को डराने-धमकाने की कोशिश की जा रही है। आयुष मलिक से मोहम्मद अली बने नौजवान के मामले में शामली पुलिस की क्या भूमिका रही है, यह सभी जानते हैं। अब पुलिस एफआईआर दर्ज करके इस पूरे प्रकरण में खुद को निष्पक्ष और ईमानदार साबित करने की कोशिश कर रही है।

यह एफआईआर सरासर गलत, अनुचित और प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला है। किसी खबर में एक शब्द के इस्तेमाल को आधार बनाकर पत्रकारों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करना अस्वीकार्य है और सवाल उठाने वाली आवाजों को दबाने का प्रयास प्रतीत होता है। शामली पुलिस को पत्रकारों को डराने के बजाय अपनी कार्रवाई और भूमिका पर उठ रहे सवालों का जवाब देना चाहिए। पुलिस इस एफआईआर को तत्काल वापस ले और पत्रकारों के खिलाफ की जा रही दमनात्मक कार्रवाई बंद करे।

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन