नवोदय टाइम्स की खबर – पढ़ने से ही लगता है कि बड़े-बड़े नाम नहीं होते तो खबर कहीं दब जाती। कुल मिलाकर, चुनाव आयोग और सिस्टम ने मतदाताओं को भी आम और खास में बांट दिया है। राघव चड्ढा के नाम से शुरुआत हुई थी और अभी देखते जाइए। हालत यह हो गई है कि दिल्ली के करीब एक तिहाई मतदाताओं को एसआईआर (SIR) के तहत नोटिस भेजे जाने हैं। इनमें भारत रत्न लाल कृष्ण आडवाणी भी हैं, जो 1970 से दिल्ली में रहते हैं। वह सरकारी मकान में लगातार 50 से अधिक वर्षों से रह रहे हैं।
संजय कुमार सिंह
एसआईआर का काम तो शुरू से गड़बड़ है। अब जो स्थिति है वह सार्वजनिक है। ऐसे में एसआईआर की खबर भले पहले पन्ने पर आ गई है लेकिन रूटीन सरकारी काम और अधिकार की तरह छपी है जबकि मामला भयंकर लापरवाही और मनमानी का है। वैसे भी, दिल्ली की मतदाता सूची में समय-समय पर संशोधन और अद्यतन करने की प्रक्रिया चलती रही है। यहाँ तक कि विधानसभा चुनावों से ठीक पहले भी व्यापक स्तर पर मतदाता पुनरीक्षण का काम किया गया था। इतनी जल्दी अब अचानक लगभग एक तिहाई मतदाताओं को नोटिस जारी करने की स्थिति उत्पन्न होना चुनाव आयोग के रिकॉर्ड प्रबंधन और जमीनी सत्यापन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। हाल में हुए विधानसभा चुनावों के समय मतदाता सूची का संशोधन किया गया था। अब फिर इतनी बड़ी संख्या में नोटिस भेजने की जरूरत क्यों है? इतनी जल्दी एक तिहाई मतदाताओं की प्रामाणिक पहचान पर संशय जताया जाना यह दर्शाता है कि या तो पूर्व में किया गया काम सतही और त्रुटिपूर्ण था या वर्तमान में चल रही नोटिस प्रक्रिया में गड़बड़ी है।
देश के सबसे नए पहचाने गए रत्न, जो कई दशकों से देश की राजधानी में एक ही सरकारी ठिकाने पर रह रहे है उन्हें नोटिस की श्रेणी में ला खड़ा किया गया है। इससे यह तो स्पष्ट है कि जमीनी डेटा के मिलान में भारी खामी है। 98 वर्षीय भारत रत्न लाल कृष्ण आडवाणी के मतदाता होने पर शंका है तो क्यों? और किसे? प्रशासनिक स्तर पर डेटा और सूचियों का यह गोलमाल न केवल चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है, बल्कि बिना किसी ठोस वजह के लाखों नागरिकों को नोटिस का जवाब देने और सत्यापन की कागजी औपचारिकताओं में उलझाकर बेवजह परेशान भी करता है। जब व्यवस्था की अपनी लापरवाही का खमियाजा आम जनता को अपनी मानसिक और शारीरिक भाग-दौड़ से चुकाना पड़े, तो यह स्थिति और भी अधिक चिंतनीय बन जाती है।
आज मेरे 10 में से 8 अखबारों में एसआईआर की खबर पहले पन्ने पर है। दि इंडियन एक्सप्रेस और द हिन्दू दो अखबार हैं जिनमें यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। द हिन्दू ने अंदर की खबरों की पट्टी में बताया है कि खबर किस पन्ने पर है। इस खबर के अनुसार, चुनाव आयोग ने एसआईआर के तहत जो नोटिस भेजे हैं उनमें चुनाव आयोग के शिखर के अधिकारी और एक दिवंगत अर्थशास्त्री भी हैं। जाहिर है यह दिल्ली की ही खबर लगती है। इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर कोई सूचना नहीं है और दिल्ली की एसआईआर की खबर दिल्ली की खबरों के पन्ने पर है। हालांकि, हिन्दुस्तान टाइम्स की सेकेंड लीड दिल्ली एसआईआर की खबर है जो बताती है कि विदेश मंत्री एस जयशंकर, भारत रत्न लाल कृष्ण आडवाणी और चुनाव आयोग के शिखर के अधिकारी एसएस संधू को एसआईआर से संबंधित नोटिस मिली है या मिलेगी। अखबार में इस खबर के साथ छपी खबर के अनुसार, भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने दिल्ली के लिए 31 अगस्त को जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में शामिल लोगों को जो नोटिस भेजे हैं, उनमें से 42% नोटिस का सबसे बड़ा कारण उनका पिछले स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न से मैच न होना है। इसके बाद, पिछले रिकॉर्ड से नाम का मेल न खाना (जिसके कारण बाकी ज़्यादातर नोटिस भेजे गए) और माता-पिता या बच्चों की उम्र में बहुत ज़्यादा या बहुत कम अंतर होना तीसरा कारण हैं। हालाँकि, 59,791 नोटिस ऐसे भी हैं जिनके लिए कोई कारण नहीं बताया गया है।
दिल्ली की ऐसी खबर दिल्ली के अखबार में पहले पन्ने पर है तो कोई खास बात नहीं है। आज दिलचस्प यह है कि टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड के अनुसार, बंगाल एसआईआर ट्रिब्यूनल को अपीलों पर फ़ैसला करने में 12 साल लग सकते हैं। खबर है कि, 5 महीनों में 1.2 लाख मामलों में फ़ैसले हो पाए हैं; कुल 37 लाख मामले हैं। इस हिसाब से अपीलों पर फ़ैसला करने में 12 साल से ज़्यादा का समय लग सकता है। ऐसे ही चलता रहा तो इस बीच ये लोग वोट नहीं दे पाएंगे। अखबारों ने एसआईआर के इस फूहड़पने को एक साथ और प्रमुखता से छापा होता तो पता चलता कि सरकार एसआईआर के नाम पर असल में क्या करवा रही है और सुप्रीम कोर्ट को यह चुनाव आयोग का अधिकार लग रहा है तो चुनाव आयोग क्या कर रहा है और किसके लिए?
टाइम्स ऑफ इंडिया ने मुख्य खबर के साथ दिल्ली की खबर और फिर चुनाव आयोग के एक शपथपत्र के हवाले से लाल शीर्षक के जरिए यह भी बताया है कि अभी तक ट्रिब्यूनल के 93% फैसले मतदाताओं के पक्ष में रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि एसआईआर के नाम पर मतदाताओं को इतने बड़े पैमाने पर परेशान करने का कोई मतलब या कारण नहीं था। कथित घुसपैठियों की संख्या इतनी ज्यादा नहीं हो सकती थी और अगर चुनाव क्षेत्रों में दो चार के हिसाब से देश भर में 50-100 घुसपैठियों मिलते तो मतदाता सूची का सघन निरीक्षण हो जाता लेकिन यहां तो कुछ और चल रहा है। अभी तक खबर भी कायदे से नहीं छपी है। दि एशियन एज में दिल्ली के एसआईआर की खबर लीड है। बंगाल पहले पन्ने पर नहीं है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, एसआईआर नोटिस पाने वाले 33.1 लाख लोगों में आडवाणी, सिसोदिया भी। कलकत्ता के द टेलीग्राफ में एसआईआर पर कांग्रेस की प्रतिक्रिया है। दो कॉलम की इस खबर के अनुसार, कांग्रेस ने रविवार को एसआईआर को बड़े पैमाने पर मतदाताओं, खासकर पिछड़े और वंचित वर्गों के लोगों के नाम हटाने की प्रक्रिया बताया। इसे उन्होंने “शाह प्रेरित कार्रवाई” कहा। कांग्रेस के कम्युनिकेशन हेड जयराम रमेश ने एक बयान में कहा: “पहले और दूसरे चरण में, 7.8 करोड़ वोटर्स के नाम हटा दिए गए। एसआईआर से पहले की वोटर लिस्ट के मुकाबले नाम हटाने की दर 13% रही… अभी चल रहे तीसरे चरण में… कुल 36.06 करोड़ वोटर्स में से 6.18 करोड़ वोटर्स के नाम हटा दिए गए हैं। नाम हटाने की दर 17% से ज़्यादा है…
“इसके अलावा, 5.43 करोड़ वोटर्स को नोटिस भेजकर वोटर लिस्ट में अपना नाम बनाए रखने के लिए और दस्तावेज़ मांगे गए हैं। इससे नाम हटने का खतरा 15% और बढ़ जाता है।” उन्होंने आगे कहा: “इस बात के बहुत सारे सबूत हैं कि अलग-अलग राज्यों में बड़े पैमाने पर जिन वोटर्स के नाम हटाए गए हैं, उनमें ज़्यादातर हमारे समाज के आर्थिक और सामाजिक रूप से सबसे पिछड़े और वंचित वर्गों के लोग हैं। ज़्यादातर बड़े राज्यों में, एसआईआर प्रक्रिया के दौरान पुरुषों की तुलना में ज़्यादा महिलाओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं।” आज की इन खबरों से आप समझ सकते हैं कि एसआईआर की खबर अब इतने अखबारों में पहले पन्ने पर क्यों है। वैसे तो पूरा मामला पहले पन्ने लायक है लेकिन अलग-अलग भी पहले पन्ने पर है तो इसलिए कि भले सुप्रीम कोर्ट न माने, अब इसका बचाव मुश्किल हो गया है।
हिन्दी अखबारों में देशबन्धु में यह खबर तीन कॉलम की है, दिल्ली के 33 लाख मतदाताओं को नोटिस। जाहिर है इतनी बड़ी संख्या में नोटिस भेजना अगर सही है तो गलती पहले हुई होगी या अब हो रही है। दोनों स्थितियों में परेशान नागरिक होंगे जबकि उसकी गलती तो नहीं ही है वोटर लिस्ट में उसका नाम होना उसकी जिम्मेदारी नहीं है चुनाव आयोग को सुनिश्चित करना है कि कोई छूटे नहीं और कोई गलत वोटर रहे नहीं। जो हो रहा है वह कुछ और है। अगर इसे जरूरी माना जाए तो इसपर इतना खर्च करने की तुक नहीं है। हटाए गए लोग जब वापस आ जा रहे हैं तो जाहिर है हटाना गलत है और बाकी के लोगों के बारे में माना जा सकता है कि उन्होंने कोशिश ही नहीं की होगी। उदाहरण के लिए, मतदाता सूची में मेरी उम्र गलत है और दिए गए दस्तावेज या पहले के नाम और उम्र से मेल नहीं खाता है लेकिन मैपिंग में पकड़ा नहीं गया। ठीक करवाने के लिए परेशान होना मैंने जरूरी नहीं समझा। इस तरह, सब करके भी गलतियां तो रह ही गई हैं।
नवोदय टाइम्स में आज की खबर दो कॉलम में है। शीर्षक में बताया गया है कि लाल कृष्ण आडवाणी के साथ विदेश मंत्री जयशंकर और चुनाव आयुक्त को भी नोटिस भेजा गया है। अखबार ने ऐसे कुछ और नाम हाइलाइट किए हैं – जगदीप धनखड़, विक्रम मिसरी, मनीष सिसोदिया, एम जगदीश कुमार, नजीब जंग, अरविन्द पनगढ़िया, तुहिन कांत पांडे, उपेन्द्र द्विवेदी, प्रवीण सूद। अमर उजाला में तो यह खबर लीड है। दिल्ली के विशिष्ट नागरिकों को नोटिस दिए जाने और 97 लाख मतदाताओं वाली ड्राफ्ट सूची में 31.63 लाख लोगों को नोटिस देने का मतलब है लगभग एक तिहाई लोगों से स्पष्टीकरण? मेरा सवाल है कि पहले काम करने वालों ने पैसे नहीं लिए थे? पैसे देकर काम करवाया गया है तो इतने मामले अब क्यों निकल रहे हैं? ठीक है कि चुनाव आयोग अपना स्पष्टीकरण दे रहा है और कई अखबारों ने उसे भी छापा है लेकिन इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है और उसके खिलाफ क्या कार्रवाई हो रही है? दैनिक भास्कर में भी यह खबर लीड है। यहां भी खबर यही है कि 33 लाख वोटर्स के रिकार्ड में गड़बड़ी और 31 लाख को नोटिस।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


