चुनाव आयोग की कॉमेडी की कल की खबर के बाद आज हिन्दुस्तान टाइम्स और नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने की खबरें हैं हालांकि यह सरकारी कार्रवाई का प्रचार है।
संजय कुमार सिंह
आज हिन्दी पट्टी में भाजपा की राजनीति से संबंधित दो खबरें हैं। पहली, बिहार में लड़की से जबरदस्ती और गुंडई (देशबन्धु में लीड) तथा सुप्रीम कोर्ट से यह कहा जाना कि राम मंदिर में दान चोरी के 105 मामले सीसीटीवी में दर्ज हुए हैं (हिन्दुस्तान टाइम्स में लीड)। आईआईटी बांबे का मामला भाजपा की राजनीति से तो जुड़ा है लेकिन हिन्दी पट्टी का नहीं कहा जा सकता है। फिर भी यह अमर उजाला में लीड है। अंग्रेजी अखबारों में यह टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड है। छात्रों से संबंधित खबर है इसलिए यह भी पर्याप्त महत्वपूर्ण है। खास बात है कि, अमर उजाला ने इसे लीड बनाया है और राम मंदिर तथा बिहार की दोनों खबरों को इसके मुकाबले कम महत्व दिया है।
आज दि एशियन एज की लीड भाजपाई राजनीति की खबर है। द हिन्दू में भी एक खबर भाजपा की राजनीति का हाल बताती है। दि एशियन एज में बिहार में गुंडई की खबर चार कॉलम की लीड के नीचे तीन कॉलम में है। लीड की खबर चुनाव करीब होने के कारण उत्तर प्रदेश और पंजाब में भाजपा के बड़े नेताओं के बिखर यानी फैल जाने की है। ऐसी ही एक राजनीतिक खबर द हिन्दू में है। कांग्रेस का आरोप है कि राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनाव से पहले हरियाणा में पार्टी पार्षदों को हिरासत में ले लिया गया है। खबरों के अनुसार, ये पार्षद हिमाचल प्रदेश से लौट रहे थे। पार्टी ने उन्हें चुनाव से पहले पाला बदलने से रोकने के लिए वहां भेजा था। बताया जाता है कि राजस्थान में अहम स्थानीय निकाय चुनाव को लेकर सोमवार को पड़ोसी राज्य हरियाणा तक राजनीतिक तनाव फैल गया।
कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि पार्टी समर्थित 18 पार्षदों और चेयरमैन पद के उम्मीदवार को हरियाणा पुलिस ने हिमाचल प्रदेश से लौटते समय रोक लिया। उन्हें तिजारा नगर परिषद चेयरमैन पद के चुनाव में वोट डालना था, उससे कुछ घंटे पहले ही उन्हें रोका गया। आप समझ सकते हैं कि भाजपा की राजनीति कैसी है और चुनाव जीतने के लिए क्या कुछ करती है। इसमें दिल्ली के एसआईआर का मामला भी है। कल खबर थी कि भारत रत्न लाल कृष्ण आडवाणी से लेकर उप मुख्य चुनाव आयुक्त तक को नोटिस भेजे गए हैं या भेजे जाने हैं।
आज मेरे 10 अखबारों में सिर्फ हिन्दुस्तान टाइम्स और नवोदय टाइम्स में इससे संबंधित खबर है जो फॉलोअप नहीं है, सरकारी प्रचार जरूर कह सकते हैं। आडवाणी की मैपिंग न होने और पिछली बार इसकी चर्चा नहीं होने का कारण कोई भी समझना चाहेगा। वह तो नहीं है लेकिन यह जरूर बताया गया है कि राजधानी में जो एसआईआर नोटिस भेजे गए हैं उनमें से सिर्फ 0.7 निपटाए जा सके हैं। कल पश्चिम बंगाल की खबर थी और हम जानते हैं कि बंगाल में लाखों लोग वोट नहीं दे पाए – न चुनाव आयोग, न सुप्रीम कोर्ट न सरकार ने कुछ किया। लाखों वोटर के बिना चुनी गई सरकार सत्तारूढ़ हो चुकी है, मनमानी कर रही है सो अलग।
अमर उजाला में राम मंदिर की खबर तो पहले पन्ने पर है लेकिन बिहार में छात्रा के साथ हैवानियत की खबर नहीं है। डबल इंजन वाले बिहार में कानून व्यवस्था की खराब हालत बताने के लिए यह जरूरी खबर है। बिहार में चुनाव प्रचार के दौरान अगर 1990 के कथित जंगल राज की आलोचना होती थी तो कल की घटना किसी भी तरह से कम नहीं है। द टेलीग्राफ के शीर्षक, तीन गिरफ्तार किए गए के साथ तो यह सरकार के खिलाफ भी नहीं होता। लेकिन इसे महत्व नहीं दिया जाना पितृसत्ता का मामला है। राहुल गांधी ने ऐसा ही कहा है और यह देशबन्धु में लीड है। शीर्षक है, यह संस्कृति नहीं पितृ सत्ता है।
सवाल है कि इन गुंडों को ऐसी बदतमीजी करने का हक किसने दिया। इतनी हिम्मत कहां से आती है। कौन है इनका बड़ा भाई? और उनकी पहचान क्यों नहीं बताई जाती है? आपको याद होगा, सत्ता समर्थक एक गुंडे ने पॉडकास्ट में अपना अपराध कबूल किया तो सोशल मीडिया पर इतना हंगामा मचा कि उसे गिरफ्तार करना पड़ा। लेकिन उसे तुरंत जमानत मिल गई जबकि इतनी आसानी से जमानत फर्जी मामलों में फंसाए गए पत्रकारों को भी नहीं मिलती है। सोनम वांगचुक को फंसाया गया था पर फंसाने वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई। इसलिए मीडिया का काम है कि वह इसे सार्वजनिक करे ताकि जनता सतर्क रहे। हिन्दुओं की रक्षा करने के नाम पर सत्ता में आई सरकार के फायदे रेखांकित होते रहें।
आज की इन तीनों खबरों में बिहार की खबर नारी शक्ति वंदन, ऑपरेशन सिन्दूर और महिला आरक्षण जैसी राजनीतिक नौटंकी के बीच आई है। डबल इंजन वाले बिहार की है। इसलिए मुझे लगता है कि जनहित में इसे सबसे ज्यादा महत्व दिया जाना चाहिए था। द टेलीग्राफ में यह टॉप पर तीन कॉलम की खबर है। राहुल गांधी की फोटो के साथ है। आप इसे राहुल गांधी या कांग्रेस का प्रचार-समर्थन भी मानें तो शीर्षक है, बिहार में सड़क पर अव्यस्क बच्ची के साथ जबरदस्ती, तीन गिरफ्तार। जाहिर है, अपराध हुआ, कार्रवाई भी हुई इसलिए खबर को महत्व देना बनता है। तीन गिरफ्तारियां कम नहीं हैं – फिर भी अमर उजाला ने इस खबर को पहले पन्ने पर जगह नहीं दी है।
दैनिक भास्कर में भी यही स्थिति है। अखबार में काम कर चुका हूं इसलिए समझ सकता हूं कि ऐसी खबरों को महत्व क्यों नहीं मिल पाता है, पहले पन्ने की खबरें कैसे चुनी जाती हैं और अंततः कौन रह जाती है। लेकिन सब कुछ जानते समझते हुए भी हेडलाइन मैनेजमेंट से इनकार नहीं कर सकता हूं। इसलिए मेरा मानना है कि इस समय देश में जो स्थितियां हैं, राजनीति ने जो हाल कर रखा है उसमें ऐसी खबरों को प्रमुखता मिलनी चाहिए। नारी शक्ति वंदन, ऑपरेशन सिन्दूर आदि जैसी खबरों को प्रचार देने के बाद अगर सच्चाई बताई जाती रहेगी तो प्रासंगिता बनी रहेगी वरना टेलीविजन मीडिया का हाल हो जाएगा।
भाजपा शासित राज्यों में महिलाओं के साथ अभद्रता और जबरदस्ती का मामला अब तो आम है। सरकार अगर आवश्यक कार्रवाई नहीं कर रही है तो उसके समर्थकों और प्रचारकों को बताना होगा कि डबल इंजन वाले राज्यों में कानून व्यवस्था की बुरी हालत है, कार्रवाई नहीं के बराबर है। इस लिहाज से आज द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर छपी खबर के अनुसार, दक्षिण कलकत्ता के कस्बा स्थित एक मॉल में छह जनों ने महिलाओं से छेड़छाड़ और गाली ग्लौच की। इन्हें तेजी से जमानत मिल गई। घटना कल की ही है और कुछ ही घंटों में जमानत मिल गई थी।
आपको याद दिला दूं कि भाजपा शासन से पहले तृणमूल सरकार में एक महिला चिकित्सक से अस्पताल में ड्यूटी के समय जबरदस्ती और हत्या के मामले को भाजपा ने मुद्दा बनाया था और विधानसभा चुनाव में महिला की मां को टिकट दिया जो अब विधायक हैं। भाजपा की ऐसी राजनीति में राम मंदिर की खबर द हिन्दू में सेकेंड लीड है। आज की खबरों में आईआईटी का मामला भी गंभीर है। छात्रों से संबंधित तो है ही। लेकिन खबरों से जाहिर है इस मामले में राजनीति हो रही है। इसलिए खबर पूरी नहीं है। पूरी तब होगी जब इसके पीछे की राजनीति तथा भागीदारों की पहचान बताई जाए।
अमर उजाला में मुख्य शीर्षक है, आईआईटी आंदोलित है। इसके तहत दो कॉलम के दो शीर्षक हैं, पहला – छात्र आत्महत्या मामले में डीन को हटाया गया, माफी भी मांगी। दूसरा शीर्षक है – डीन के पक्ष में शिक्षक, आईआईटी मद्रास-दिल्ली के टीचर भी साथ। दैनिक भास्कर के शीर्षक में यह भी है, प्रो डूला को जांच तक डीन पद से हटाया। मुझे लगता है कि यह सही है और उनके पद पर रहते हुए जांच का कोई मतलब नहीं है। इस लिहाज से कार्रवाई सही दिशा में चल रही है। खबर इस ‘कार्रवाई’ का प्रचार लग रहा है और इसे महत्व देना जनहित नहीं है।
उल्लेखनीय है कि है मामले की शुरुआत एक छात्र की आत्महत्या से हुई थी और पूरा मामला परिसर के माहौल से जुड़ा हो सकता है। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर भी लगभग वैसी ही है। अमर उजाला में बिहार और चंदा चोरी की खबर छोड़कर आईआईटी मुंबई की खबर को लीड बनाना और परोक्ष रूप से यह संदेश देना कि कार्रवाई सही दिशा में जा रही है, खबर नहीं प्रचार है। नवोदय टाइम्स में बिहार की खबर के साथ आईआईटी की खबर भी है लेकिन यहां मंदिर से चंदा चोरी की खबर पहले पन्ने पर नहीं है। मुझे लगता है कि हिन्दी अखबार के लिए राम मंदिर की खबर आईआईटी की खबर से ज्यादा महत्वपूर्ण होनी चाहिए।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


