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सुख-दुख

विजय स्वामी, मनोज देवगन के बाद वरिष्ठ फोटो पत्रकार राजन सक्सेना भी चले गए!

Collage of three men: a large close-up left portrait of a man with a thick mustache, a man with purple face paint and glasses in the top-right, and a man in a striped polo with a backpack talking on a mobile in a park bottom-right; Hindi captions are overlaid on the image.

लव कुमार-

मेरठ में पिछले कुछ ही वर्षों में तीन ऐसे फोटो जर्नलिस्ट इस दुनिया को अलविदा कह चुके हैं, जिनके साथ मैंने थोड़ी या ज्यादा अवधि के लिए काम किया था। 2018 में विजय स्वामी गए। 2020 में मनोज देवगन नहीं रहे और अब 2026 में वरिष्ठ फोटो जर्नलिस्ट राजन सक्सेना का भी निधन हो गया। इस अवधि में कई दूसरे शहरों से भी फोटो जर्नलिस्टों के असामयिक निधन की खबरें आई हैं।

फोटो जर्नलिस्टों के काम करने की परिस्थितियां बड़ी विकट हैं। उन्हें कैमरे का बोझ लादे दिनभर इधर से उधर भागना होता है। मेरठ का ही उदाहरण लें तो एक कार्यक्रम विश्वविद्यालय में होता है तो उसके ठीक बाद दूसरा कार्यक्रम दसियों किलोमीटर दूर कंकरखेड़ा में या दिल्ली रोड पर होता है। वहां पहुंचते हैं तो खबर आती है कि मेडिकल में कुछ हो गया है तो फिर वापसी की दौड़ लगती है। रास्ते का धूल-धक्कड़ और निरंतर मोटर बाइक का सफर उनके चेहरे, बालों और शरीर पर साफ दिखाई देता है।

उनके काम को देखकर पता चलता है कि अब उनके पास कई जिम्मेदारियां हैं। वे फोटो तो खींचते ही हैं, उसके बाद मोबाइल से वीडियो बनाते भी दिखाई देते हैं। कई इंटरव्यू भी लेते हैं। इसके बाद भी उनका काम खत्म नहीं होता है। उन्हें खींचे गए हर फोटो और उसमें दिख रहे लोगों का विवरण भी दफ्तर में जाकर देना होता है। अखबारों में जिस प्रकार डेस्क पर स्टाफ कम है, उसी प्रकार फोटोग्राफरों की संख्या भी गिनी—चुनी ही है, जिससे काम का बोझ और ज्यादा बढ़ जाता है। ऐसे में स्वास्थ्य के मामले में जरा सी लापरवाही होते ही समस्या शिकंजा कसने लगती है। राजन सक्सेना तो शरीर से भी बहुत भारी थे। ईश्वर उनके परिवार को इस दुख को सहने की शक्ति प्रदान करे।


45 की उम्र पार कर चुके पत्रकारों को अपनी सेकंड ईनिंग के बारे में गंभीरता से विचार करना होगा। मेरे कई ऐसे दोस्त हैं जिन्होंने इसी उम्र में पत्रकारिता छोड़ दी। किसी ने कुछ बिजनेस किया, कई तो प्रॉपर्टी डीलिंग का काम करने लगे, कई नई वाली खेती करने लगे। पत्रकारिता का कीड़ा जिसे एक बार काट लेता है, वो ताउम्र इस कीड़े की जहर के वश में रहता है। किसी ने कुछ भी किया लेकिन किसी न किसी प्लेटफॉर्म पर खबर, विचार, लेख आदि भी लिखते ही रहते हैं।
-चंद्र गौरव गुप्ता


डॉ रवींद्र राणा-

राजन सक्सेना नहीं रहे! महज़ 55 साल की उम्र में राजन भाई बीते कल अपनी मुक्ति यात्रा पर चले गए।

पहले ब्रेन स्ट्रोक और बाद में पैरालिसिस ने उन्हें लंबे समय तक बिस्तर पर रखा। परिवार में तीन बेटियां और एक बेटा है। न कोई जमीन, न कोई कारोबार और न ही नियमित आय का कोई जरिया।

राजन भाई अखबारों में फोटोजर्नलिस्ट रहे। जिस दौर में मैं अखबार में था, राजन भाई भी वहीं थे। अखबार में सबसे चुनौतीपूर्ण काम अगर कोई है तो वह फोटोजर्नलिस्ट का है।

कहा जाता है कि एक तस्वीर हजार शब्दों के बराबर होती है। इसलिए अखबार में फोटोजर्नलिस्ट की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है।

एक बड़े शहर में जहां रिपोर्टर दस-बारह हो सकते हैं, वहीं फोटोजर्नलिस्ट दो-तीन ही होते हैं। शहर के एक कोने से दूसरे कोने तक टूटी सड़कों पर दिन-रात बाइक दौड़ानी पड़ती है। हादसा हो, प्रदर्शन हो, अपराध हो, नेता का कार्यक्रम हो, कोई बड़ी घटना हो या कोई मानवीय कहानी… कैमरा लेकर सबसे पहले मौके पर पहुंचना होता है।

और यह काम सिर्फ बाइक दौड़ाने और कैमरा उठाने तक सीमित नहीं है। कई बार कैमरा लेकर मौके पर पहुंचना अपनी जान जोखिम में डालना भी होता है।

साल 2011 की बात है। एक ब्लॉक पर राजन भाई कवरेज के लिए गए थे। वहां बवाल हो गया। दंगाइयों को लगा कि राजन भाई ने उनकी तस्वीरें अपने कैमरे में कैद कर ली हैं। भीड़ ने उन्हें घेर लिया।

राजन भाई को जमीन पर गिरा दिया गया। उनका कैमरा तोड़ दिया गया। स्थिति बेहद खतरनाक थी। तभी अचानक भीड़ में मौजूद एक दाढ़ी-टोपी वाले बुजुर्ग ने राजन भाई को पहचान लिया। उन्होंने शोर मचाकर लोगों को बताया कि यह पत्रकार हैं और राजन भाई को वहां से बचाया। उस दिन राजन भाई बच गए।

लेकिन ऐसे जोखिम उन्होंने सिर्फ एक बार नहीं झेले थे। फोटोजर्नलिस्ट के कैमरे में सिर्फ तस्वीरें नहीं होतीं, कई बार उसकी अपनी जिंदगी भी दांव पर लगी होती है। और वहां से तस्वीर लेकर लौटने के बाद भी कहानी खत्म नहीं होती।

रिपोर्टर को शिकायत होती है कि तस्वीर समय पर नहीं मिली। डेस्क को शिकायत होती है कि तस्वीर अच्छी नहीं है। संपादक को शिकायत होती है कि तस्वीर में वह बात नहीं है। और कई बार पाठक को भी शिकायत होती है।

न्यूजरूम में एक आम कहावत है… पत्रकारिता एक थैंकलेस जॉब है। हर कोई पत्रकारिता से कुछ न कुछ चाहता है। लेकिन शुक्रिया कहने वालों की संख्या अक्सर शिकायत करने वालों से कम होती है।

राजन भाई की कहानी इसी पत्रकारिता की कहानी का एक हिस्सा है। काम के अनिश्चित घंटे, लंबे समय तक कंप्यूटर और बाइक पर रहना, अनियमित दिनचर्या, खान-पान की अनदेखी और लगातार तनाव… इन सबका असर मीडियाकर्मियों की सेहत पर पड़ता है।

युवावस्था में शरीर बहुत कुछ सह लेता है, लेकिन चालीस पार वही लापरवाहियां तेजी से भारी पड़ने लगती हैं। सर्वाइकल, डायबिटीज, आंखों की रोशनी कमजोर होना, गैस्ट्रिक जैसी समस्याएं इस पेशे में काम करने वाले बहुत से लोगों के जीवन का हिस्सा बन जाती हैं। लेकिन इस पूरी कहानी की सबसे बड़ी बीमारी शायद “अर्थ” है।

मीडियाकर्मियों के वेतन और सेवा शर्तों को लेकर समय-समय पर कई सिफारिशें हुईं। लेकिन बड़ी संख्या में पत्रकार आज भी आर्थिक असुरक्षा में काम करते हैं। न पेंशन। न जमीन। न कारोबार। न नौकरी की गारंटी। न मासिक आय का भरोसा।

राजन भाई का शरीर भारी था। तोंद की समस्या थी। गुटखा भी खूब खाते थे। तले-भुने खाने से कोई खास परहेज नहीं था। कभी-कभी शाम की पार्टी भी हो जाती थी। एक ब्रेन स्ट्रोक नौकरी के दौरान ही हो चुका था। उनकी सेहत, पेशे और जीवनशैली के बीच कोई तालमेल नहीं था। शायद उन्हें भी इसका अंदाजा था, लेकिन जिंदगी की भागदौड़ में सेहत अक्सर पीछे छूट जाती है।

उन्हें एक ऐसी बीमारी भी थी, जिसकी वजह से कई बार मॉर्निंग मीटिंग में ही उन्हें झपकी आ जाती थी। एक दिन एक संपादक ने सख्त लहजे में उनसे कहा, “राजन जी, अब आपसे नहीं हो पाएगा। अपने लिए कोई दूसरा काम तलाशिए। किसी नए लड़के के लिए जगह खाली कर दीजिए।”

शायद यह उनके लिए एक बड़ा अलार्म था। लेकिन उन्होंने उस अलार्म को गंभीरता से नहीं लिया। कुछ समय बाद उन्हें सचमुच नौकरी छोड़नी पड़ी। उन्होंने कुछ दिन काम तलाशने की कोशिश की, लेकिन नियमित आय का कोई स्थायी जरिया नहीं बन सका।

फिर बीमारी ने उन्हें पूरी तरह घेर लिया। और आज राजन भाई हमारे बीच नहीं हैं। कल सूरजकुंड पर उनका अंतिम संस्कार हुआ तो राजन भाई के संघर्षों की ऐसी कई कहानियां आंखों के सामने तैर गईं।

सुनील भाई के साथ तो उनका रिश्ता ननद-भाभी जैसा था। साथ रहना भी और नोकझोंक करते रहना भी।

न्यूजरूम की वह नोकझोंक, काम को लेकर होने वाली बहसें, एक-दूसरे से नाराज होना और फिर उसी काम में साथ जुट जाना… पत्रकारिता की दुनिया में यही रिश्ते तो असली पूंजी होते हैं। आज जब राजन भाई नहीं हैं तो लगता है कि हम सिर्फ एक साथी को नहीं खो रहे हैं, बल्कि अपनी पत्रकारिता के एक दौर को खोते जा रहे हैं। लेकिन राजन भाई का जाना कई सवाल भी खड़े करता है।

इस शहर में पत्रकारों का कोई प्रेस क्लब नहीं है। ऐसी स्थिति में पत्रकारों और उनके परिवारों के लिए कोई मजबूत सामुदायिक सुरक्षा व्यवस्था भी दिखाई नहीं देती। और कल उनके अंतिम संस्कार का समय भी कुछ ऐसा था कि शायद बहुत से पत्रकार चाहकर भी वहां नहीं पहुंच सके। शाम करीब छह बजे।

Line of people standing along a metal-framed shelter watching a large bonfire burning in a dirt yard under a covered area.”
Black-and-white portrait of a middle-aged man with short dark hair and a beard, wearing a light shirt, looking at the camera with a serious expression.

न्यूजरूम में यह समय युद्ध जैसा होता है। डेडलाइन सिर पर होती है। खबरें अपडेट हो रही होती हैं। वेबसाइट पर कॉपी जा रही होती है। पेज बन रहे होते हैं। फोन लगातार बज रहे होते हैं।

अधिकांश पत्रकार कीबोर्ड और माउस के बीच फंसे होते हैं। एक तरफ खबर की डेडलाइन और दूसरी तरफ अपने साथी पत्रकार की अंतिम विदाई। यह भी पत्रकारिता की विडंबना है।

जिस पेशे में हम दूसरों की खबरों के लिए दौड़ते रहे, उसी पेशे में कभी-कभी अपने साथी की अंतिम यात्रा में शामिल होने का समय भी नहीं निकाल पाते। और शायद यही सवाल राजन भाई के जाने के बाद सबसे ज्यादा परेशान करता है।

हम पत्रकार दूसरों के लिए आवाज उठाते रहे, लेकिन अपने लिए हमारी आवाज कहां है? राजन भाई की कहानी अकेले राजन भाई की कहानी नहीं है। काजू भाई, स्वामी, खुर्रम, मनोज देवगन और अब राजन…

नाम बदलते जा रहे हैं, कहानी वही है। हम पत्रकार खबरें लिखते हैं, दूसरों की जिंदगी के सवाल उठाते हैं, व्यवस्था से सवाल पूछते हैं। लेकिन अपने पेशे के लोगों की जिंदगी, उनकी नौकरी की सुरक्षा, उनकी सेहत और उनके बुढ़ापे के सवाल अक्सर पीछे छूट जाते हैं।

राजन भाई की मौत सिर्फ एक साथी पत्रकार को खोने का दुख नहीं है। यह उन तमाम मीडियाकर्मियों के लिए भी एक सवाल है, जो आज भी कैमरा, माइक, बाइक और कंप्यूटर के बीच अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं।

पत्रकारिता की सबसे बड़ी कीमत सिर्फ समय नहीं है। कई बार पत्रकार इस कीमत को अपनी सेहत, अपनी आर्थिक सुरक्षा और अंततः अपनी जिंदगी से चुकाता है।

राजन भाई, आपको अंतिम सलाम। आपकी तस्वीरें अब नहीं आएंगी, लेकिन आपकी यादें उन तमाम न्यूजरूम में रहेंगी जहां कभी आपने कैमरा उठाकर कहा होगा… “चलो, खबर पर चलते हैं।”

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