अविनाश दास-
कल विनोद कापड़ी की ‘पायर’ देखी और देर तक इस हैरत में बैठा रहा कि क्या यह उसी फ़िल्मकार की फ़िल्म है, जिसने कोई दस साल पहले ‘मिस टनकपुर हाज़िर हो’ बनायी थी? यह बात दोनों फ़िल्मों में किसी एक को छोटा और दूसरी को बड़ा बताने के लिए नहीं कह रहा। बस उस यात्रा के बारे में सोच रहा हूं, जो एक फ़िल्मकार अपने भीतर करता है। ‘मिस टनकपुर हाज़िर हो’ व्यवस्था की बेहूदगी पर हंसते हुए हमला करती थी। ‘पायर’ लगभग चुप रहकर मनुष्य के भीतर उतरती है। पहली फ़िल्म के पास व्यंग्य का शोर था। इस फ़िल्म के पास मौन की भाषा है। यह मौन इतना गहरा है कि फ़िल्म ख़त्म होने के बाद भी आपके भीतर बोलता रहता है।
उत्तराखंड का एक लगभग खाली हो चुका पहाड़ी गांव। घर बचे हैं, रास्ते बचे हैं, पहाड़ बचे हैं, जीवन धीरे-धीरे विदा हो रहा है। इन सबके बीच दो बूढ़े मनुष्य बचे हैं, जो एक-दूसरे से झगड़ते हैं, हंसते हैं, रूठते हैं, दवा और शराब पर बहस करते हैं और भीतर ही भीतर यह हिसाब लगाते रहते हैं कि पहले कौन जाए। क्योंकि पीछे छूट जाना मृत्यु से भी अधिक डरावना है। ‘पायर’ पलायन पर कोई भाषण नहीं देती। वह केवल हमें उसके बाद बची हुई जगह दिखाती है। शहरों की चकाचौंध के पीछे ऐसे कितने घर हैं, जिनमें मां-बाप अपने बच्चों की आहट सुनते-सुनते बूढ़े हो गये। विकास के हर चमकते हुए आंकड़े के पीछे कोई सूना आंगन है, कोई बुझता हुआ चूल्हा है और कोई दरवाज़ा है, जो अब भी इस उम्मीद में खुलता है कि शायद आज कोई लौट आया हो।
इस फ़िल्म के मुख्य किरदार पदम सिंह और हीरा देवी पेशेवर अभिनेता नहीं हैं। इसलिए वे अभिनय करते हुए दिखाई भी नहीं देते। लगता है जैसे कैमरा पहली बार मनुष्य के चेहरे को उसकी पूरी उम्र के साथ देख रहा है। मानस भट्टाचार्य की सिनेमैटोग्राफ़ी पहाड़ को पर्यटन की ख़ूबसूरत तस्वीर नहीं बनाती। यहां पहाड़ विशाल भी हैं और निर्मम भी। उनके सामने आदमी बहुत छोटा है, लेकिन उसका प्रेम नहीं। यही ‘पायर’ की सबसे बड़ी ख़ूबी है। यह बुढ़ापे, अकेलेपन और मृत्यु की फ़िल्म होते हुए भी जीवन से भरी हुई है।
दुनिया के कई बड़े फ़िल्म समारोहों में ‘पायर’ घूम चुकी है। टालिन से लेकर लंदन, बर्मिंघम, स्पेन और जर्मनी तक दर्शकों ने इसे अपने सबसे बड़े पुरस्कार दिये हैं। यह महत्वपूर्ण है, मगर उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि दुनिया ने जिस भारतीय फ़िल्म में अपने अकेलेपन, अपने बूढ़े मां-बाप और अपने छूटे हुए घरों को पहचान लिया, अब उसे उसके अपने देश के दर्शक पहचानें। 23 अक्टूबर को ‘पायर’ बहुत सीमित स्क्रीन्स पर रिलीज़ हो रही है। ऐसी फ़िल्मों की त्रासदी यह है कि हम उन्हें देखने की इच्छा तो जताते हैं, मगर अक्सर कहते हैं, कल देखेंगे। सीमित स्क्रीन्स वाली फ़िल्मों के पास कई बार वह ‘कल’ नहीं होता। इसलिए ‘पायर’ को पहले दिन देखिए। दूसरे दिन पर मत टालिएगा।
यह फ़िल्म सिर्फ़ देखे जाने लायक नहीं है। इसे दिखाया जाना चाहिए, इसकी चर्चा होनी चाहिए और इसके लिए सिनेमाघर तक जाना चाहिए। क्योंकि अच्छी फ़िल्मों के पक्ष में हमारी सबसे सच्ची टिप्पणी टिकट ख़रीदकर अंधेरे हॉल में बैठना है। और हां, विनोद कापड़ी को बहुत-बहुत बधाई। दस साल में उन्होंने केवल अपनी सिनेमाई भाषा नहीं बदली है। उन्होंने उस ख़ामोशी को सुनना सीख लिया है, जहां पहुंचने में कई फ़िल्मकारों को पूरी उम्र लग जाती है।


