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उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश के हर वकील, कानून के विद्यार्थी, पुलिस अधिकारी और नागरिक को ये चार फैसले क्यों पढ़ने चाहिए?

राजेश्वर सिंह-

इन चारों मामलों की शुरुआत उत्तर प्रदेश से हुई और प्रत्येक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे निर्णयों को सुधारा, जिनके कारण गंभीर अपराधों की जांच प्रभावित हुई या दोषी सजा से बच गए। ये फैसले आपराधिक न्याय व्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों का उत्तर देते हैं—जांच पूरी करने की समय-सीमा कब तय की जा सकती है, कब मृत्यु-पूर्व बयान अकेले दोषसिद्धि का आधार बन सकता है और अपूर्ण या त्रुटिपूर्ण गवाही का मूल्यांकन कैसे किया जाना चाहिए।

इन सभी फैसलों का मूल संदेश स्पष्ट है—न्यायालय का दायित्व है कि किसी निर्दोष को दंड न मिले और कोई दोषी कानून की पकड़ से बच न पाए।

  1. State of U.P. v. Mohd. Arshad Khan, 2025 INSC 1480 (19.12.2025)

न्यायमूर्ति संजय करोल एवं न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट द्वारा पुलिस को जांच पूरी करने के लिए 90 दिनों की समय-सीमा देने और आरोपियों को गिरफ्तारी से संरक्षण देने का आदेश रद्द किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच में वास्तविक देरी सामने आने पर ही ऐसी समय-सीमा तय की जानी चाहिए। FIR रद्द किए बिना blanket protection नहीं दिया जा सकता और गिरफ्तारी से पूर्व संरक्षण चाहने वाले आरोपी को अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करना चाहिए।

  1. State of U.P. v. Veerpal (01.02.2022)

न्यायमूर्ति एम.आर. शाह एवं न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना

ससुराल पक्ष द्वारा एक महिला को केरोसिन डालकर जलाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि और IPC की धाराओं 302/34 के तहत आजीवन कारावास की सजा बहाल की। कोर्ट ने कहा कि यदि मृत्यु-पूर्व बयान सत्य, स्वैच्छिक और विश्वसनीय है, तो उसके आधार पर बिना किसी अतिरिक्त corroboration के भी दोषसिद्धि कायम की जा सकती है।

  1. State of U.P. v. Krishna Master, (2010) 12 SCC 324 (03.08.2010)

न्यायमूर्ति हरजीत सिंह बेदी एवं न्यायमूर्ति जे.एम. पंचाल

फर्रुखाबाद में छह लोगों की गोली मारकर हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के बरी करने के फैसले को पलटते हुए IPC की धाराओं 302/34 के तहत दोषसिद्धि बहाल की। कोर्ट ने कहा कि गवाहों के बयानों में मामूली omissions अपने आप में घातक नहीं हैं। ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई मृत्युदंड की सजा के स्थान पर आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी गई।

  1. State of U.P. v. Anil Singh, 1988 Supp SCC 686 (26.08.1988)

न्यायमूर्ति के. जगन्नाथ शेट्टी एवं न्यायमूर्ति जी.एल. ओझा

सुप्रीम कोर्ट ने बरी किए जाने के फैसले को पलटते हुए हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा बहाल की। कोर्ट ने माना कि गवाह अपने बयानों में कुछ embellishment कर सकते हैं, लेकिन यदि पूरे मामले के मुख्य हिस्से में “ring of truth” मौजूद है, तो केवल इन्हीं कारणों से अभियोजन के मामले को खारिज नहीं किया जाना चाहिए।

आपराधिक न्याय व्यवस्था को समझने वाले हर व्यक्ति के लिए ये चारों फैसले महत्वपूर्ण अध्ययन हैं।

राजेश्वर सिंह जी लखनऊ की सरोजिनी नगर विधानसभा से विधायक हैं।

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