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इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, मोदी के इशारे पर चुनाव आयोग के ज्ञानेश ही कर रहे हैं वोट चोरी!

Hindi news article screenshot about the Election Commission’s response to reported rift among EC members. Top shows blue header with icons and news logo; bold headline in Hindi discusses EC's reply.

गिरीश मालवीय-

मोदी के इशारे पर चुनाव आयोग के ज्ञानेश ही कर रहे है वोट चोरी …..और इसकी पोल किसी और ने नहीं उन्हीं दो चुनाव आयुक्तों ने ही खोली है जो ज्ञानेश कुमार के साथ काम कर रहे है नए वोटरों को जोड़ने और नाम हटाने से लेकर SIR की इस प्रक्रिया पर दो मौजूदा चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने सवाल उठाए हैं इन दो चुनाव आयुक्तों ने लिखित में सीधे चुनाव प्रक्रिया के सबसे ज़रूरी हिस्सों पर सवाल उठाए हैं।

इस खबर के सामने आने के बाद भारत में लोकतंत्र अवधारणा पर सवाल खड़ा हो गया है क्योंकि लोकतंत्र की सबसे अनिवार्य शर्त है फ्री एंड फेयर इलेक्शन यदि मुख्य चुनाव आयुक्त ही केंद्र में बैठी सत्ता की कठपुतली बन गया है तो काहे का फ्री ओर फेयर इलेक्शन और काहे का लोकतंत्र।

यह पूरा खुलासा आज इंडियन एक्सप्रेस ने किया है।

आपको पता ही होगा कि चुनाव आयोग ने जून 2025 में ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ SIR के तहत वोटर लिस्ट में सुधार की प्रक्रिया को शुरू किया था। यह प्रक्रिया बिहार से शुरू हुई थी। एसआईआर के तहत 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटा दिए गए हैं। दरअसल एसआईआर को पूरे देश में लागू करने का काम तीनों चुनाव आयुक्तों की देखरेख में हुआ लेकिन आज पता चला है कि इनमें से दो चुनाव आयुक्त संधू और जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार इसे लेकर आधिकारिक तौर पर आपत्ति जताई। इसमें एक ही दिन में चार बार इन फैसलों और आदेशों को लेकर आपत्ति दर्ज कराई गई थी।

संधू और जोशी के मुताबिक, ये फैसले या आदेश उनकी जानकारी के बिना लिए या जारी किए गए थे।

उदाहरण के लिए एक लिखित आपत्ति में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने शिकायत की कि चुनाव आयोग ने दो आयुक्तों की लिखित सलाह के खिलाफ काम किया और दावा किया कि यह कदम ‘अनाधिकृत और गैर-कानूनी’ था।

इसके बाद भी जोशी और संधू ने कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखकर काम के बंटवारे में किए गए बदलावों की शिकायत की। इन बदलावों से असल में वोटर लिस्ट के लिए आईटी सिस्टम की निगरानी का एक स्तर खत्म हो गया था

बड़ा सवाल अब यह है कि यदि वोटर सूची ही कटघरे में खड़ी की जा रही है तो चुनाव कैसे निष्पक्ष माने जाए?

क्या जून 2025 के बाद हुए राज्यों में हुए चुनाव को रद्द नहीं किया जाना चाहिए

नाव आयोग कितनी मूर्खतापूर्ण दलील दे रहा है उसका कहना है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने जो अंतिम फैसले लिए गए उनके खिलाफ औपचारिक असहमति दर्ज नहीं की

अरे भाई चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने बार-बार यह दर्ज किया है कि आयोग के नाम पर जो भी बड़े फैसले लिए जा रहे हैं, उनके बारे में न तो उनसे कोई सलाह ली गई और न ही उन्हें कोई जानकारी दी गई।

इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में साफ किया गया है कि ये दोनों चुनाव आयुक्त खुद जवाब मांगते रहे कि वो आदेश तो बताओ जिसके आधार पर निर्णय लिए जा रहे है

उदाहरण के लिए इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट कहती है, चुनाव आयोग ने अदालत को बताया कि ट्रिब्यूनल के पास 38 लाख अपीलें लंबित हैं। इसमें से 22.21 लाख अपीलें उन वोटरों ने दायर की थीं जिनके नाम हटा दिए गए थे और जो उन्हें वापस जुड़वाना चाहते थे। बाकी 16.10 लाख अपीलें उन वोटरों के खिलाफ दायर की गई थीं जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने लिस्ट में शामिल किया था और इन अपीलों में उनके नाम हटाने की मांग की गई थी। चुनाव आयोग ने यह नहीं बताया कि ये अपीलें किसने दायर की थीं।

अगस्त में, संधू ने चुनाव आयोग के अधिकारियों को पत्र लिखकर पूछा था, “आयोग की तरफ से ये अपीलें दायर करने की इजाजत किसे थी और किसने दी थी?

अब उन्हें ये आदेश ही नहीं बताया जाएगा तो वो औपचारिक असहमति किस चीज पर दर्ज करवाएंगे?

गजब ही है इस देश का मीडिया जो चुनाव आयोग का पक्ष तो सूत्रों के हवाले से बढ़चढ़ दिखा रहा है लेकिन इतनी बेसिक सी बात अपने दर्शकों/पाठकों को नहीं बता रहा है

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