
मनीष मिश्रा-
लखनऊ विश्वविद्यालय प्रांगण में नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा आयोजित गोमती बुक फेस्टिवल में शुक्रवार को वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और इंडियन प्रेस हाउस के संपादक छोटे भाई संदीप के पांडे से मुलाक़ात हुई, जिनकी नई पुस्तक नेपाल Chapter आजकल मैं पढ़ रहा हूँ।
बरसों तक अपराध-जगत की ख़बरें कवर करते हुए मैंने न जाने कितनी किताबें पढ़ीं, जो अपराध को नाटकीय बनाकर बेचने की कोशिश करती हैं। लेकिन यह किताब उस भीड़ से अलग खड़ी नज़र आती है। यह अपराध को सनसनी बनाकर परोसने की जल्दबाज़ी नहीं करती, बल्कि उसे तथ्यों, विश्लेषण और पृष्ठभूमि के साथ परत-दर-परत खोलती है। इसे किसी रोमांचक उपन्यास की तरह गढ़ा नहीं गया, बल्कि एक अनुभवी अपराध-संवाददाता की तरह बुना गया है, बिल्कुल वैसे ही जैसे हमारे जैसे रिपोर्टर बरसों मैदान में रहकर सीखते हैं।
सच्ची घटना ख़ुद में इतनी उलझी और गहरी होती है कि उसे बनावटी मसाला लगाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। इस किताब की सबसे बड़ी ख़ासियत यही है कि इसमें रहस्य, रोमांच और उत्सुकता किसी काल्पनिक कथानक से नहीं, बल्कि वास्तविक घटनाओं और उनके क्रमिक खुलासों से ख़ुद-ब-ख़ुद उपजते हैं।
यह पुस्तक भारत के नज़रिए से नेपाल की अपराध-भूगोल का गंभीर अध्ययन प्रस्तुत करती है, यानी यह समझाती है कि कैसे भूगोल और सीमाएँ अपराध के नेटवर्क को आकार देती हैं। इसके साथ ही यह भारतीय पुलिस और ख़ुफ़िया एजेंसियों की अपराध-मानचित्रण पद्धति और उनकी कार्यशैली को भी बारीकी से समझने का सफल प्रयास करती है। वह बारीकियाँ, जो अमूमन आम पाठक की नज़र से छूट जाती हैं।
इस किताब में एक बेहतरीन अपराध-अन्वेषण के लगभग सभी ज़रूरी तत्व मौजूद हैं। अपराधियों की मनोवैज्ञानिक परतें, समाज पर टिप्पणी, नैतिक उलझनें और एक बौद्धिक पहेली जैसा ताना-बाना। यही कारण है कि यह किताब महज़ अपराध-गाथाओं का संकलन भर नहीं रह जाती, बल्कि अपराध-जगत की मानसिकता, राजनीति और तंत्र को समझने वाला एक गंभीर दस्तावेज़ बन जाती है।
किताब के आवरण पर हिन्दी और अंग्रेज़ी शब्दों का घालमेल भी दिलचस्प है और निश्चित तौर पर नई पीढ़ी के पाठकों को अपनी ओर खींचने का माद्दा रखता है। लेकिन जैसे ही आप पन्ने पलटते हैं, भाषा किसी सुलझे हुए हिन्दी अख़बार के अनुभवी रिपोर्टर जैसी सधी हुई मिलती है। न बेवजह की अलंकारिकता, न सस्ता नाटकीयपन।
इसके पन्नों में विक्रम वाही से लेकर बबलू श्रीवास्तव तक, मिर्ज़ा दिलशाद बेग से लेकर दाऊद इब्राहिम तक अपराध-जगत के तमाम किरदार अपनी साज़िशों, अपने नेटवर्क और अपनी दास्तानों के साथ मौजूद हैं। साथ ही आईएसआई और भारतीय एजेंसियों के बीच चलने वाले शह और मात के ख़ुफ़िया खेल की भी दिलचस्प और तथ्यपरक झलक मिलती है। पढ़ते हुए बार-बार याद आता रहा कि कैसे इस तरह की कहानियाँ बरसों तक अख़बारों के दफ़्तरों में सिर्फ़ अफ़वाह बनकर घूमती रहती हैं, जब तक कोई इन्हें सिलसिलेवार तरीक़े से काग़ज़ पर नहीं उतारता। यह किताब उसी मेहनत का नतीजा जान पड़ती है।
क्या इसे पढ़ना चाहिए? अगर आप अपराध-कथाओं में सिर्फ़ थ्रिल नहीं, बल्कि तथ्य और तंत्र की समझ भी चाहते हैं, तो यह किताब निराश नहीं करेगी। संदीप भाई को दिल से बहुत-बहुत बधाई। साथ में भाई नवलकांत सिन्हा का आभार जिनके कार्यक्रम में यह भेंट हुई।



