विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे का एक पत्र सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। यह पत्र सूचना निदेशक विशाल सिंह के लिए लिखा गया है। इस पत्र के जरिए प्रदीप दुबे ने सोशल मीडिया पर लगाम लगाने संबंधी बात लिखी है। नीचे पढ़िए…
विवेक त्रिपाठी-
“विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना या विधानसभा के अधिकारियों, कर्मचारियों के बारे में भ्रामक, असत्य या आपत्तिजनक जानकारी पोस्ट करने पर एफआईआर हो सकती है..”
विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे ने आज सूचना विभाग के निदेशक को पत्र लिखकर सोशल मीडिया की लगाम कसने के संकेत दिए हैं..

उन्होंने पत्र में लिखा है कि सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर विधानसभा और विधानसभा सचिवालय के बारे में अनर्गल, सत्य एवं निराधार सामग्री पोस्ट की जा रही है.. विधानसभा एक संवैधानिक संस्था है और वहां के लोगों पर निराधार या असत्य टिप्पणी अनुचित और अविधिक है.. जो भी ये कर रहा है, उसके खिलाफ सुसंगत नियमों एवं विधिक प्रावधानों के अंतर्गत कार्रवाई की जाए..
हाल ही में विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना के कुछ बयान सोशल मीडिया पर छाए रहे.. उनके बयानों की तमाम लोगों ने अपने-अपने हिसाब से व्याख्या की.. किसी ने तारीफ की तो किसी ने तंज कसे.. तारीफ तो अच्छी लगी लेकिन तंज बुरे लगे.. उसके बाद ही ये चिट्ठी जारी हुई..
मीठा मीठा गप गप.. कड़वा कड़वा थू..
ये नहीं चलेगा भई.. सोशल मीडिया पर लगाम लगाना किसी के बस की बात नहीं.. गलत को गलत कहा ही जाएगा..
बृजेश सिंह-
वैसे तो इस चिट्ठी को जारी किए बगैर भी FIR दर्ज कराई जा सकती थी… अन्य जगहों पर तो यही हो रहा है।
दुबे जी के अंदर दूर-दूर तक ऐसी कोई बात नहीं थी कि कोई उनका सम्मान करे। मगर आज, पहली बार, दुबे जी के लिए मन में सम्मान का भाव आया है।वह भी अत्याधिक …सोचिए, कोई इतना अच्छा कैसे हो सकता है कि मुकदमा लिखवाने से पहले चिट्ठी लिखकर आगाह करे!
वरना आजकल तो लोग जरा-जरा सी बात पर मुकदमा दर्ज करा देते हैं और पूरी कॉपी तक नहीं देते। ऐसे में प्रदीप जी का यह कदम निश्चित रूप से सराहनीय और प्रशंसनीय है।
जब मैं दुबे जी की यह वीरगाथा लिख रहा था, तभी बगल में बैठे एक व्यक्ति, जो विधानसभा और वहां के लोगों को दुबे जी की तरह ही लंबे समय से और करीब से जानते हैं, वे दुबे जी के काफी समय पहले रिटायरमेंट से लेकर आज तक की कई बुरी-बुरी गाथाएं बताने लगे।
मैंने पहले ही यह चिट्ठी पढ़ ली थी, इसलिए उन्हें जोर से डपटा और कहा—“किसके भीतर बुराई नहीं होती? मान लिया कि दूबे जी के भीतर कई खामियां हैं, मगर आपको उनकी इतनी बड़ी इंसानियत दिखाई नहीं दे रही है!”
बहरहाल, इस पत्र के बाद से अगर मुझे कोई स्थान सबसे पाक-साफ, भ्रष्टाचार-मुक्त और इंसाफ-पसंद लग रहा है, तो वह है—विधानसभा और विधानसभा से ताल्लुक रखने वाले लोग।
दुबे जी के लिए विशेष…
“एक चिट्ठी क्या आई, हमने भी कमाल मान लिया,
विधानसभा को पाक-साफ़ और दुबे जी को बेमिसाल मान लिया।”
दूबे जी! आज तो आपने दिल जीत लिया।
Anil Kumar जी शायद यह सब आपकी मिर्चाहट के चलते हुआ है। मिर्ची कम करिये लोगों को सुबह परेशानी होती है।


