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सियासत

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस संजय कौल ने कॉलेजियम के बंद कमरों का ऐसा सीक्रेट खोला है जिसने सबको हैरान कर दिया है!

Group of Indian officials on a decorated stage; two men greet with a namaste as garlands drape the railing.

नरगिस बानो-

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस संजय किशन कौल ने कॉलेजियम के बंद कमरों का ऐसा सीक्रेट खोला है जिसने सबको हैरान कर दिया है।

​​नियम कहता है कि कॉलेजियम वरिष्ठ जजों की मंडली पहले आपस में बैठकर तय करेगी कि कौन जज बनेगा और फिर वह लिस्ट सरकार को भेजी जाएगी , लेकिन जस्टिस संजय किशन कौल का कहना है कि पूर्व CJI चंद्रचूड़ साहब की कार्यप्रणाली ऐसी थी मानो बारात निकलने से पहले ही समधी जी के घर जाकर पूछ रहे हों कि लड़का पसंद है न।

मतलब कॉलेजियम के साथी जजों से नाम पर बात करने से पहले ही वे सरकार से अनौपचारिक हरी झंडी या सहमति ले लेते थे, ​जस्टिस किशन कौल का मानना था कि बाहर कैमरों और भाषणों में तो न्यायपालिका की आजादी और कड़े तेवर दिखते थे लेकिन अंदरखाने सरकार के सामने उनका रुख जरूरत से ज्यादा ही आज्ञाकारी और नरम रहता था,

​अब बेचारी जनता सोचती रही कि जज साहब स्वतंत्र निष्पक्ष फैसले ले रहे हैं, जबकि असल में पत्ता भी सरकार से पूछकर हिलाया जा रहा था।


जब जज के ईमान पर जज ही सवाल करें तो मतलब है इस देश का ईमान ख़तरे में है। पूर्व जस्टिस कौल ने पूर्व चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ के बारे में जो कहा है, उसका एक ही मतलब है। सुप्रीम कोर्ट के भीतर भी लोग एक दूसरे को संदेह से देख रहे हैं। तीस साल पहले की मिसाल देने वाले संदेह के रक्षक हैं। उनका काम है संदेह फैलने से रोकना। सब कुछ मैनेज है, इस तरह की धारणा जनता के लिए ख़तरे की घंटी है। वोट चोरों को चिंता की ज़रूरत नहीं। चिता पर भविष्य है। जिन्हें यह स्वीकार नहीं होगा उनका जीवन जेल में बीतेगा। जेल के अलावा अब कोई जवाब नहीं बचा है। अच्छी अंग्रेज़ी खोखली लगती है। कॉन्वेंट की लड़कियां ऐसे लड़कों की अच्छी अंग्रेज़ी को जाल और चाल समझ कर थूक देती हैं।
-रवीश कुमार


जयराम रमेश-

पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस संजय किशन कौल की किताब ने मोदी सरकार के कार्यकाल में न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

न्यायाधीशों की नियुक्तियों में सरकार की दखलंदाज़ी, कॉलेजियम की बैठक से पहले ही सरकार की मंज़ूरी लेने की कोशिश और अल्पसंख्यक समुदाय के एक न्यायाधीश के नाम पर उनकी जाति को लेकर सरकार के बेतुके सवाल – जस्टिस कौल ने इन घटनाओं का ज़िक्र किया है। जिन बातों को लोग खुलकर कहने से कतराते थे, जस्टिस कौल ने वो सब बड़े सयंत शब्दों में दर्ज किया है।

हैरानी की बात यह है कि पूर्व चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया ने नियुक्तियों से पहले सरकार के साथ चर्चा किए जाने की बात से इनकार नहीं किया है। जब पूर्व CJI जस्टिस चंद्रचूड़ कहते हैं कि सरकार की CJI से बातचीत और नियुक्तियों में भूमिका तो होती ही है, तो न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर सवाल और गंभीर हो जाता है।

जस्टिस कौल का यह ख़ुलासा कि PMLA मामले में उनकी अध्यक्षता वाली बेंच द्वारा कोर्ट के फ़ैसले के कुछ पहलुओं पर पुनर्विचार का सवाल उठाए जाने के बाद मामला बिना उनसे चर्चा किए दूसरी बेंच के सामने पहुँचा दिया गया, बेहद गंभीर है। इससे सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के कामकाज में दैनिक दख़लअंदाज़ी का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

अगर न्यायाधीशों की नियुक्तियों पर सरकार की मंज़ूरी का दबाव हो और संवेदनशील मामलों की सुनवाई करने वाली बेंच भी बदल दी जाए, तो लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए पूछना ज़रूरी है: अगर यह न्यायपालिका पर दबाव और उसकी स्वतंत्रता को कमज़ोर करना नहीं है, तो फिर क्या है?

संविधान की रक्षा करने वाली संस्था को सत्ता के दबाव से मुक्त होना चाहिए। लोकतंत्र में न्यायपालिका की स्वतंत्रता कोई विकल्प नहीं, अनिवार्यता है।

Front page of a newspaper: 'EXPRESS special' masthead with a large headline about Justice Chandrachud and judges, plus three subheads and photos below.
Newspaper front page with the headline “Justice Kaul’s memoir reveals quiet rift” and dense column text across multiple columns of print

प्रकरण पर इंडियन एक्सप्रेस ट्वीट करता है-

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस संजय किशन कौल के संस्मरण में पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के साथ न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर मतभेदों का जिक्र सामने आया है। इस किताब में कॉलेजियम व्यवस्था, सरकार और न्यायपालिका की भूमिका को लेकर भी उनके विचार दर्ज हैं।

The Indian Express Exclusive banner with a bold headline about judges Kaul and Chandrachud; collage of their faces and a book cover featuring Justice Sanjay Kishan Kaul.
The Indian Express logo in the top left with a block of article-style quotes about Justice Sanjay Kishan Kaul, then a photo of two men in suits speaking in the foreground.

न्यूज़24 का ट्वीट-

कॉलेजियम की बैठक से पहले सरकार से राय लेते थे चंद्रजूड़ : जस्टिस कौल

जस्टिस कौल ने एक इंटरव्यू और उनकी आने वाली किताब Without Fear of Favour को लेकर किया दावा।

उन्होंने कहा कि कॉलेजियम की औपचारिक बैठक से पहले सरकार से नामों पर राय लेना नियुक्ति प्रक्रिया के लिए सही संकेत नहीं था।

जस्टिस कौल ने इसे सरकार की पहले से सहमति लेने यानी ‘प्री अप्रूवल’ जैसी व्यवस्था बताया।

Indian judge in a black robe with white neckband seated at a desk; inset photo of another official in a yellow circle; News 24 Digital logo in top right corner; Hindi news caption below.
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