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आज के अखबार : हिन्दुओं की डबल इंजन सरकार के बावजूद दीवाली पर दीवाला होने की खबर, हालात

Construction site on a dusty urban street with piles of dirt and a green barrier fence to the right, trees and buildings in the background (hazy air).

दीवाली की सुबह – वैशाली, गाजियाबाद का मेरा मोहल्ला!

संजय कुमार सिंह

कांग्रेस को हिन्दू विरोधी और खुद को संतुष्टीकरण करने वाली सरकार का मुखिया कहने वाले नरेन्द्र मोदी के 12 साल प्रधानमंत्री रहने के बाद दीवाली पर देश की जनता के लिए कुछ खास बेहतरी नहीं है। वह खुशी तो नहीं ही है जो पहले रहती थी। वीडियोकॉन टीवी के प्रोमोटर वेणुगोपाल धूत के दीवाला होने की खबर कल ही छपी थी। बैंकों का पैसा लेकर फरार हुए मोदियों और चोकसियों का कुछ नहीं हुआ सो अलग। हालांकि, हिन्दी के मेरे दोनों बड़े अखबारों में ऐसा कुछ नहीं है। अमर उजाला की मानें तो अयोध्या के वैभव से जगमगाया देश। दैनिक भास्कर ने बताया है कि रक्षा निर्यात 38 हजार करोड़ पार कर गया। इसमें निजी क्षेत्र का हिस्सा 45 प्रतिशत है। तथ्य यह है कि डबल इंजन वाले गाजियाबाद के दिल्ली से लगे मोहल्लों में भूमिगत नाला बनाने का काम महीनों से चल रहा है और दीवाली पर अपार्टमेंट के गेट तक ठीक नहीं किए गए हैं। आज की यह फोटो मेरे मोहल्ले की है क्योंकि अखबारों में छपनी नहीं है।

हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक लगभग एक ही है,  दीवाली के मौके पर दिल्ली की हवा 10 साल में सबसे खराब। यह इस तथ्य के बावजूद है कि दिल्ली में प्रदूषण ज्यादा होने के कारण ग्रैप 3 के प्रावधान लागू कर दिए गए हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि दिल्ली में ग्रैप प्रावधान लागू होते ही निर्माण कार्य बंद कर दिए जाते हैं। इसका आदेश जारी होने के बावजूद काम चलता रहता है। इसका पता पिछले दिनों चावड़ी बाजार में एक निर्माणाधीन बिल्डिंग गिरने से चला था। आज खबर है इसमें मरने वालों की सख्या छह हो गई है। वैसे भी, निर्माण के काम इस तरह होने चाहिए कि दूसरों को परेशानी नहीं हो। देश के छोटे शहरों – यहां तक कि नोएडा, गाजियाबाद और फरीदाबाद में भी निर्माण पूरे साल लगभग खुले में चलता है। हरे रंग के फटे जालीदार कपड़ों का कुछ टुकड़ा जरूर कहीं-कहीं टंगा होता है। पता नहीं उससे क्या काम होता है।

प्रदूषण : निर्माण की जरूरत के अनुसार शर्त होनी चाहिए, दूसरे देशों में है भी कि धूल-मिट्टी न उड़े उसे रोकने पर खर्च किया जाए और धूल मिट्टी ही नहीं, शोर को भी रोका जाना चाहिए। दूसरी ओर  प्रदूषण लगभग पूरे साल सामान्य से बहुत ज्यादा कई साल से रहता है। बहुत ज्यादा होने पर कभी-कभी ग्रैप के प्रावधान लागू कर दिए जाते हैं। यह मुख्य रूप से वाहनों का परिचालन रोकने के रूप में ही लागू होता है। बदले में सरकार नहीं मानने वालों या अनजान लोगों से जुर्माना वसूलती है। सरकारी जुर्माना ज्यादा होगा तो लोग कम रिश्वत देकर बच जाएंगे। यह सब पुरानी समस्या है लेकिन इस पर कोई काम हुआ या नहीं, पता नहीं है। लिहाजा जो गाड़ियां पूरे साल चलती रहती हैं उन्हें कुछ दिन रोक देने से कितना फायदा होता है पता नहीं लेकिन जनता को होने वाली परेशानी की चिन्ता जनता को भी नहीं है। हो तो नागरिकों को या सरकार के पास पता करने या बताने का कोई तरीका नहीं है। कम करने की जरूरत या इच्छाशक्ति तो नहीं ही है।

दीवाली पर पटाखे – दिल्ली एनसीआर में दीवाली पर प्रदूषण का कारण पटाखे भी होते हैं। भाजपा के सत्ता में रहते हिन्दुओं के इस त्यौहार पर आतिशबाजी रोकना असंभव साबित हुआ है। सुप्रीम कोर्ट के प्रतिबंध के बावजूद भाजपा नेताओं ने पटाखे चलाए और कोई कार्रवाई नहीं हुई। बाद में प्रतिबंध जो भी रहा, लागू नहीं हुआ और तमाम उदाहरण हैं। आज हिन्दुस्तान टाइम्स में आरडब्ल्यूए के हवाले से खबर है कि पटाखों से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के नियमों का उल्लंघन हो रहा है।  

ग्रैप के नियम : मुझे नहीं लगता कि निर्माण के जो काम चल रहे हों उन्हें अचानक रोक देने से बहुत फर्क पड़ता होगा या पूरे एनसीआर में पूरी तरह रोकना संभव है। मकसद जनता को राहत पहुंचाना है। गाजियाबाद में भूमिगत नाला बनाने का काम कई महीने से चल रहा है। ग्रैप लागू होने से काम रोक दिया गया है या यही रफ्तार है समझना मुश्किल है। कारण जो हो, महीनों से सड़क खुदी हुई है। धूल-मिट्टी उड़ने की शिकायत का कोई प्रावधान नहीं है। और हो भी क्यों जब बरसात में किसी ने परवाह नहीं की। गड्ढे खुले रहे, प्रकाश की व्यवस्था नहीं की गई, संकेतक नहीं लगाए गए। एक दिन में आठ मोटरसाइकिल दुर्घटनाएं एक टी प्वाइंट पर बैठने वाले दुकानदार ने गिनी थी।   10 साल में शिकायत की ऐसी कोई नई व्यवस्था तो नहीं ही हुई है। पुरानी सब बेकार है इसमें कोई शक नहीं है। बाकी सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए कुछ किया हो तो प्रचार नहीं किया है, दिखता तो नहीं ही है।

पराली और खबर : सरकार के काम का पता आज द हिन्दू में छप खबर से लगता है। पहले पन्ने पर तीन कॉलम में छपी खबर के अनुसार पंजाब में पराली जलाने के 3,000 मामले रिकार्ड किए गए हैं। तरण तारण में सबसे ज्यादा 795 एफआईआर दर्ज हुई है। दिल्ली में प्रदूषण का कारण आस-पास के राज्यों में पराली जलाने को भी बताया जाता था। सबसे पास के राज्यों – हरियाणा और उत्तर प्रदेश में डबल इंजन की सरकार है और यहां पराली जलाने के मामले अब नहीं होते, एफआईआर आदि की खबरें भी अपेक्षाकृत कम दिखती है। दूर पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार है। वहां कार्रवाई होती है। राजनीतिक स्थिति यह हो सकती है कि वहां भी भाजपा की सरकार बन जाए तो पराली नहीं जलाई जाएगी और दिल्ली में प्रदूषण कम होगा। समस्या यह है कि उत्तर प्रदेश और हरियाणा में पराली जलाई नहीं जाती है या खबर नहीं छपती है – कहना, समझना, जानना मुश्किल है।

गाड़ियों के मामले में सख्ती : इस तरह दिल्ली में प्रदूषण (है तो देश भर में लेकिन उसकी चिन्ता किसे है) का कारण राजनीतिक भी हो सकता है। दूसरी ओर, दिल्ली के मामले में केंद्र सरकार ध्यान देती होती तो मामला अलग था। ध्यान इतना ही दिया जाता है कि गाड़ियों के मामले में सख्ती है और इससे परेशानी है। इसे कम करने के लिए सार्वजनिक परिवहन का उपयोग बढ़ाने के लिए कुछ खास नहीं किया जाता है और अंतिम मील के संकट को दूर करने के लिए भी कुछ नहीं किया गया है या जो किया गया है वह व्यावहारिक और पर्याप्त नहीं है। राजधानी में जब यह स्थिति है तो बाकी शहरों की क्या बात करनी। बात हो रही थी भारत में इस बार दीवाली की। प्रदूषण पहली समस्या है। दूसरी समस्या यहां की सामाजिक, राजनीतिक या कानून व्यवस्था की स्थिति है। यह भी न तो एक दिन में ठीक होने वाली है न एक दिन में खराब हुई है। वैसे तो इससे संबंधित खबर आज कई अखबारों में पहले पन्ने पर है लेकिन दि इंडियन एक्सप्रेस में फोटो के साथ शायद सबसे प्रमुखता से छपी है।

नो एंट्री के नियम : नवोदय टाइम्स का एक शीर्षक है, नो एंट्री के नियम कड़े। तथ्य है कि रोज सैकड़ों गाड़ियां पड़ोस के राज्यों से दिल्ली में आती हैं। गाजियाबाद से गुड़गांव जाना हो तो दिल्ली में घुसना ही पड़ेगा। लेकिन अचानक सरकार ने पुरानी (खास) गाड़ियों के प्रवेश पर रोक लगा दी। सीमा पर भीड़ लगी, खबरें छपीं लेकिन समाधान कुछ नहीं। खबर भी नहीं। ऐसे में लोग नई गाड़ी खरीद लें तो गाड़ियों की बिक्री बढ़ने और सब चंगा सी का प्रचार चला आएगा।  

आज की खबरों में सोनिया गांधी की किताब पर कल द हिन्दू और द गार्जियन में छपी खबर व इंटरव्यू का फॉलोअप है। 2014 में आए अच्छे दिनों में फॉलोअप छपना लगभग बंद था। आज यह खबर प्रचार भी हो तो मौजूदा समय में इसकी पठनीयता है।देशबन्धु में छपी खबर के अनुसार, सोनिया गांधी ने इंटरव्यू में मोदी सरकार पर निशाना साधा और कहा, 12 साल में लोकतंत्र व सामाजिक ताने-बाने को भारी नुकसान हुआ है। सोनिया गांधी ने अपने इंटरव्यू में यह भी कहा है कि अब लोगों में बेचैनी नजर आ रही है, क्योंकि उन्हें अहसास हो गया है कि देश को कितना नुकसान पहुंचा है। वे एक आशावादी इंसान है और उन्हें पता है कि भारत की जनता एक बेहतर शासन व्यवस्था की वापसी का स्वागत करेगी। किताब की चर्चा आज कई अखबारों में है लेकिन दीवाली के मौके पर सामाजिक ताना-बाना छिन्न होने की खबर भी है।  

सामाजिक ताना-बाना : खबर के अनुसार, सिंगापुर से आए हरियाणा, हिसार के मूल निवासी, 42 साल के कॉरपोरेट एक्जीक्यूटिव, परमजीत धनखड़ को पार्किंग और कुत्ता टहलाने के विवाद में गोली मार दी गई। वे दीवाली पर आए थे। रिश्ते में इस महीने के आखिर में शादी है और इसी सिलसिले में 5 नवंबर को फरीदाबाद पहुंचे थे। सेक्टर 21सी में शुक्रवार की रात गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई। 19 गोलियां मारी गईं, नौ लगीं। हिन्दुस्तान टाइम्स में भी यह खबर तीन कॉलम में छपी है। इंडियन एक्सप्रेस की एक विशेष खबर के अनुसार भारत में घी महंगा हो गया है और भारत की डेरी में चर्बी की भारी सम्स्या है। इसका कारण दूध उत्पादन के विकास में कमी है। लेकिन सरकार अयोध्या में 36 लाख दीये जलाकर सब चंगा मान रही है। इंडियन एक्सप्रेस ने पांच कॉलम की इसकी फोटो छपी है। यह इसका 10वां साल है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह फोटो दो कॉलम की है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह फोटो नहीं है। पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने की लीड इस तरह है, हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की आलोचना की कहा, लोगों के अधिकारों का जरा सम्मान नहीं है।

पुलिस चौकी में ब्लास्ट :  आज एक खबर गाजियाबाद की पुलिस चौकी में ब्लास्ट की भी है। इसके आतंकी हमला होने की भी जांच की जा रही है। लेकिन दीवाली से पहले थाने में विस्फोट अपने आप में कम नहीं है। 2019 में घुसकर मारने फिर आतंकवाद खत्म करने के दावों व प्रचार के बावजूद  दीवाली के मौके पर गाजियाबाद में विस्फोट हो सकता है तो क्या नहीं हो सकता है – आप तय कीजिए या सरकार ही बताए तो बेहतर। आप जानते हैं कि वोट चोरी की खबरों को अखबारों में नहीं के बराबर प्रमुखता मिलती है। द टेलीग्राफ की लीड, सरकार पर पेट्रोल चोरी का आरोप है। खबर के अनुसार राहुल गांधी ने सरकार पर आरोप लगाया है कि पेट्रोल में मिलाए जा रहे एथेनॉल की मात्रा ज्यादा है। इसमें दिलचस्प है कि कर्नाटक सरकार ने राज्य के पेट्रोल पंप पर मिलने वाले पेट्रोल के नमूने की जांच करवाई तो पता चला कि यह घोषित और स्वीकृत 20 प्रतिशत से ज्यादा है। सोशल मीडिया पर इसका खंडन सभी पेट्रोलियम कंपनियों ने एक जैसी भाषा और पोस्ट में किया। दिलचस्प यह भी था कि इसे लगभग समान हैंडल्स को टैग किया गया। मामला चाहे जो हो, राहुल गांधी का यह आरोप खबर तो है ही।

भारत का संकल्प : सबके बावजूद, दि एशियन एज की आज की लीड प्रधानमंत्री का भाषण और उनका प्रचार है। नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने का शीर्षक है, प्रधानमंत्री इस बार भी जवानों के साथ मनाएंगे दीवाली। दि एशियन एज की लीड के अनुसार, नागरिकों को बधाई देंगे और विकसित भारत बनाने के प्रयास नए सिरे से शुरू करने की अपील की है। खबर का मुख्य शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने कहा कि दीवाली अंधेरे से लड़ने का भारत का संकल्प दिखाता है। मुझे लगता है कि दीवाली पर सड़क की खराब बत्तियां ठीक करने, जहां अंधेरा रहता हो उसे रौशन करने या रखने जैसा कोई नियम है। लेकिन प्रधानमंत्री ऐसी बातें करने के लिए जाने जाते हैं। उदाहरण के लिए प्रदूषण कम करने के लिए गाड़ियों पर प्रतिबंध जनता के लिए मुश्किल भरा है। लेकिन शिकायत कोई नहीं करता (या कर पाता) है। मैंने जो शिकायतें की हैं उनकी पावती भी नहीं आई। प्रचार यह किया जाता है कि प्रधानमंत्री ने कितनी सख्ती कर दी। तथ्य यह है कि 10 साल पुरानी डीजल और 15 साल पुरानी पेट्रोल गाड़ियों को कंडम करने का नियम पहले से है। लेकिन पुरानी सरकारी गाड़ियां चल रही हैं।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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