यशवंत सिंह-
वेबसाइट पर न्यूज़ अपलोड करने के लिए मनुष्य की ज़रूरत ख़त्म हो गई है। भड़ास4मीडिया पर आज से एआई ने न्यूज़ अपडेट करना शुरू कर दिया है। यह काम अमेरिकी कंपनी Anthropic के आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस मॉडल क्लॉड (Claude) के एडवांस वर्जन Claude Opus 5.5 के सौजन्य से हो रहा है। मुझे बस कच्चा-पक्का न्यूज़ का डिटेल एआई को देना है। एडिटिंग से लेकर अपलोडिंग, स्लग लिखने और फ़ीचर्ड इमेज लगाने तक का काम वो ख़ुद करता है।
तकनीकी भाषा में समझें तो क्लॉड को भड़ास की वर्डप्रेस वेबसाइट से एक कनेक्टर के ज़रिए जोड़ा गया है। यह कनेक्टर MCP यानी मॉडल कॉन्टेक्स्ट प्रोटोकॉल पर चलता है, जो किसी लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) को बाहरी सॉफ़्टवेयर और सर्विसेज़ से बात करने का एक मानक रास्ता देता है। वर्डप्रेस की तरफ़ एक MCP प्लगइन लगा है, जो साइट के REST API के ज़रिए पोस्ट, पेज, मीडिया लाइब्रेरी, कैटेगरी, टैग, मेन्यू, विजेट और थीम तक पहुंच देता है। क्लॉड इस कनेक्टर पर एडमिनिस्ट्रेटर एक्सेस के साथ जुड़ा है। यानी जो काम मैं वर्डप्रेस डैशबोर्ड या मोबाइल ऐप से करता था, वो अब चैट बॉक्स में लिखकर हो रहा है।

पूरी प्रक्रिया कुछ यूं है। मैं मोबाइल पर क्लॉड ऐप के चैट बॉक्स में खबर का टेक्स्ट, फोटो या स्क्रीनशॉट डालकर लिख देता हूं, “पब्लिश कर दें”। इसके बाद एआई एक-एक कदम पर काम करता है:
- एडिटिंग: व्याकरण, वर्तनी और विराम चिह्न ठीक करता है, लेकिन तथ्य, नाम और उद्धरण नहीं बदलता।
- स्लग और SEO: हिंदी हेडलाइन का अर्थ समझकर अंग्रेज़ी में SEO-फ्रेंडली URL स्लग बनाता है, एक्सर्प्ट लिखता है, टैग और कैटेगरी तय करता है।
- इमेज प्रोसेसिंग: क्लाउड पर चल रहे एक लिनक्स कंटेनर में Python की Pillow लाइब्रेरी से फोटो को 1200×675 पिक्सल के फ़ीचर्ड इमेज साइज़ में ढालता है। पोर्ट्रेट फोटो को काटने की बजाय पीछे उसी फोटो का धुंधला बैकग्राउंड बनाता है, कंप्रेशन करता है और यह जांचता है कि फोटो पर लिखा टेक्स्ट साफ़ पढ़ा जा सके।
- मीडिया अपलोड: फ़ाइल को SHA-256 हैश के साथ वर्डप्रेस मीडिया लाइब्रेरी में भेजता है, ताकि रास्ते में फ़ाइल कटे या बिगड़े नहीं। साथ में ऑल्ट टेक्स्ट और कैप्शन लिखता है।
- पब्लिशिंग: खबर को गुटेनबर्ग ब्लॉक्स (पैराग्राफ़, हेडिंग, लिस्ट, इमेज, सेपरेटर) में बांटकर पोस्ट करता है, ताकि बाद में कोई इंसान भी उसे आसानी से एडिट कर सके।
- वेरिफ़िकेशन: पोस्ट का स्टेटस ‘publish’ हुआ या नहीं और परमालिंक सही है या नहीं, यह जांचकर ही अगले कदम पर बढ़ता है।
भड़ास के संपादकीय नियम एक ‘स्किल’ फ़ाइल में लिखकर एआई को दिए गए हैं। जैसे, स्लग हमेशा अंग्रेज़ी में हो, सब-हेडिंग बोल्ड हो और हेडलाइन से छोटी हो, और मूल लेख में सब-हेड न हो तो अपनी तरफ़ से न जोड़ा जाए। एआई हर खबर पर ये नियम लागू करता है। जो पहली न्यूज़ आज एआई से पब्लिश कराई, उसमें सब-हेडिंग का फ़ॉन्ट काफ़ी बड़ा था। उसे छोटा करने के लिए कहा तो उसने ये काम भी कर दिया।
खबर लाइव होने के बाद फेसबुक, एक्स (ट्विटर) और लिंक्डइन पर भड़ास की खबरें शेयर करने का काम भी अब एआई ही कर रहा है। इसके लिए क्लॉड को सोशल मीडिया मैनेजमेंट टूल Buffer से एक दूसरे कनेक्टर के ज़रिए जोड़ा गया है, जिसमें भड़ास का फेसबुक पेज, लिंक्डइन पेज और एक्स हैंडल कनेक्टेड हैं। एआई पहले वर्डप्रेस से पुष्टि करता है कि खबर सचमुच लाइव है, ताकि किसी ड्राफ्ट का डेड लिंक बाहर न जाए। फिर Buffer के API से हर प्लेटफ़ॉर्म के लिए अलग पोस्ट ‘Share Now’ मोड में भेजता है। कंटेंट भी प्लेटफ़ॉर्म के मिज़ाज के हिसाब से अलग होता है। फेसबुक पर हेडलाइन, लेखक के नाम और फ़ीचर्ड इमेज के साथ पूरा लेख शब्दशः जाता है, ताकि पाठक वहीं पूरी खबर पढ़ सकें। लिंक्डइन पर दो-चार लाइन का सार, लिंक प्रीव्यू कार्ड और हैशटैग जाते हैं। एक्स पर 280 कैरेक्टर की सीमा में एक-दो लाइन और लिंक जाता है। कोई चैनल डिस्कनेक्ट हो या प्लान की कोई सीमा आड़े आए, जैसे Buffer के फ़्री प्लान में फेसबुक पर ‘फ़र्स्ट कमेंट’ की सुविधा नहीं है, तो एआई उसे रिपोर्ट करता है और बाकी चैनलों पर काम पूरा कर देता है।
इस एआई को वेबसाइट डिज़ाइन और अपग्रेडेशन समेत सभी तकनीकी काम करने का अधिकार दिया गया है। बोले तो फुल राइट। कुछ दिन मैं एआई के साथ यूज़-टू होऊंगा। फिर एडवांस मोड के प्रयोग किए जाएंगे। अभी तो मैं अपने मोबाइल पर एआई के चैट बॉक्स से ही भड़ास संचालित करने में सक्षम हो गया हूं। हां, आख़िरी फ़ैसला अब भी इंसान का है। क्या छपेगा, किसकी खबर जाएगी और किस पर सवाल उठेगा, यह मैं तय कर रहा हूं।
अब ज़रा सोचिए। जो काम कल तक एक कंटेंट अपलोडर, एक कॉपी एडिटर, एक ग्राफ़िक डिज़ाइनर और एक सोशल मीडिया एग्ज़ीक्यूटिव मिलकर करते थे, वह अब एक चैट बॉक्स से हो रहा है। न्यूज़रूम की डेस्क का बड़ा हिस्सा, यानी अनुवाद, प्रूफ़रीडिंग, हेडलाइन के विकल्प, SEO, इमेज एडिटिंग और सोशल मीडिया पोस्टिंग, तेज़ी से ऑटोमेशन की ज़द में आ रहा है। मीडिया संस्थानों में छंटनी की खबरें भड़ास पर आए दिन छपती हैं। एआई इस रफ़्तार को और तेज़ करेगा।
एआई के दौर में मीडिया का भविष्य दो हिस्सों में बंटता दिख रहा है। एक तरफ़ वह काम है जिसे मशीन सस्ता और तेज़ कर देगी, जैसे रूटीन खबरें, प्रेस रिलीज़ और अपडेट। दूसरी तरफ़ वह काम है जो अभी मशीन के बस का नहीं, जैसे मैदान में जाकर रिपोर्टिंग, सूत्र बनाना, सत्ता से सवाल पूछना, घोटाले खोलना और ज़मीनी सच्चाई की तस्दीक़ करना। पत्रकारों को अपना हुनर इसी दूसरी तरफ़ ले जाना होगा और एआई को एक औज़ार की तरह बरतना सीखना होगा।
लेकिन सच यह भी है कि हर पत्रकार यह छलांग नहीं लगा पाएगा। सोचिए, एआई भारत में रोज़गार तेज़ी से ख़त्म करने का कितना बड़ा माध्यम बन रहा है। जिस देश में हर साल लाखों युवा नौकरी के बाज़ार में उतरते हैं, वहां डेस्क की नौकरियों का सिमटना सिर्फ़ मीडिया का संकट नहीं, पूरे समाज का संकट है। भारत में बेरोज़गारों और बेरोज़गारी का भविष्य भयावह है।

