दयाशंकर शुक्ल सागर- दिवाली हिंदुस्तान की संस्कृति में रचा-बसा त्योहार है। दिवाली की प्राचीनता के प्रमाण हमें हजारों साल पुराने धार्मिक ग्रंथों, ऐतिहासिक शिलालेखों, पुरातात्विक अवशेषों और विदेशी यात्रियों के यात्रा वृत्तांतों में मिलते हैं। ये प्रमाण सिद्ध करते हैं कि दिवाली केवल कुछ सदियों पुराना त्योहार नहीं, बल्कि भारत की प्राचीनतम सांस्कृतिक परंपराओं में से एक है।
मैं केन्द्रीय विद्यालय का पढ़ा हूं, जिसके लोगो में शतपथ ब्राह्मण का प्राचीनतम सूक्त लिखा है- “तमसो मा ज्योतिर्गमय”, यानी हे ईश्वर, हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। यह सूक्ति तभी से दिमाग में बैठ गई है। सदियों से यह सारा संसार अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ रहा है, लेकिन देखता हूं कि अज्ञान का यह अंधकार खत्म होता ही नहीं। विज्ञान अंधकार पर विजय हासिल कर आगे बढ़ता ही जा रहा है।
स्कंद पुराण में ‘दीपावली’ शब्द का स्पष्ट प्रयोग मिलता है। इसमें लिखा है कि कार्तिक अमावस्या के दिन दीप जलाने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और घर में लक्ष्मी का वास होता है। जैन धर्म की प्राचीन कालक्रम गणना के अनुसार, पहली शताब्दी ईसा पूर्व के मध्य तक भगवान महावीर के निर्वाण (527 ईसा पूर्व) की स्मृति में दिवाली मनाने की परंपरा पूरी तरह स्थापित हो चुकी थी।
पहली सदी ईसा पूर्व (57 ईसा पूर्व) में ‘विक्रम संवत’ कैलेंडर की शुरुआत हुई। आज भी भारत के एक बड़े हिस्से में दीपावली के अगले दिन से ही विक्रम संवत का नया साल शुरू होता है, जो पहली सदी ईसा पूर्व से इसके सीधे संबंध को प्रमाणित करता है।
सातवाहन वंश के राजा ‘हाल’ ने पहली से दूसरी शताब्दी ईस्वी के बीच प्राकृत भाषा में संकलित प्रसिद्ध ग्रंथ ‘गाथासप्तशती’ में ग्रामीण भारत के जीवन का चित्रण किया है। इस ग्रंथ में एक श्लोक मिलता है, जिसमें ‘दीपावलिया’ या दीपोत्सव के समय घरों को साफ करने, मिट्टी के दीये जलाने और गलियों को रोशन करने का सुंदर वर्णन है।
पहली सदी ईसा पूर्व और पहली सदी ईस्वी के मौर्योत्तर और कुषाण कालीन पुरातात्विक स्थलों की खुदाई में भारी संख्या में एक विशेष प्रकार के पके हुए मिट्टी के दीये मिले हैं, जिनका आकार सामूहिक रोशनी के लिए बने दीयों जैसा है। इसके साथ ही पासे भी मिले हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि इस काल में लोग शरद ऋतु के उत्सवों में भाग्य आजमाने और मनोरंजन के लिए ‘द्यूत क्रीड़ा’ यानी जुआ खेलते थे, जो बाद में ‘यक्षरात्रि’ और दीपावली का अभिन्न हिस्सा बना।
तीसरी-चौथी सदी ईस्वी में वात्स्यायन के कामसूत्र में इस त्योहार को ‘यक्षरात्रि’ कहा गया है, जहां लोग रात भर दीये जलाकर कुबेर, यानी धन के देवता, और यक्षों की पूजा करते थे और जुआ खेलते थे।
4वीं या 5वीं सदी में कवि कालिदास हुए। गुप्त काल के महान कवि कालिदास ने अपने महाकाव्य ‘रघुवंशम्’ में अयोध्या के नगर-वर्णन के दौरान कार्तिक के समय दीयों से सजे महलों और गलियों का सुंदर चित्रण किया है।
फिर 7वीं शताब्दी के आस-पास संकलित माने जाने वाले कश्मीर के ऐतिहासिक ग्रंथ ‘नीलमत पुराण’ में भी शरद ऋतु के इस दीप उत्सव का विस्तृत उल्लेख मिलता है कि कार्तिक महीने की इस अंधेरी रात में लोग अपने घरों और मंदिरों को मिट्टी के दीपों की पंक्तियों से सजाते थे। 7वीं सदी के भारत के सबसे प्रतापी राजा, सम्राट हर्ष ने ‘दीपप्रतिपादुत्सव’ का विस्तार से वर्णन किया है।
11वीं सदी में अल-बिरूनी ने ‘किताब-उल-हिन्द’ में ‘दिबाली’ का बेहद बारीकी से और दिलचस्प विवरण दिया है। अल-बिरूनी ने विशेष रूप से उल्लेख किया है कि ‘दिबाली’ के दिन लोग न सिर्फ नए कपड़े पहनते थे और एक-दूसरे को बधाई देते थे, बल्कि आपस में ‘पान’ का आदान-प्रदान करते थे। अल-बिरूनी ने लिखा- ‘कार्तिक मास की अमावस्या को लोग अपने घरों, सार्वजनिक स्थानों और मंदिरों के शिखरों व छतों पर अनगिनत मिट्टी के दीये जलाते थे, जिससे पूरी हवा और रात का अंधेरा एकदम साफ व प्रकाशमय हो जाता है।’
दीपावली की यह प्राचीनता हमें बताती है कि इस 21वीं सदी के भौतिक बदलावों और आधुनिकता की चकाचौंध के बीच भी अपनी मूल सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहना कितना जरूरी है। जो संस्कृति अपनी जड़ों को याद रखती है, वह कभी नष्ट नहीं होती।
ऐसे में अल्लामा इकबाल का शेर याद आता है-
यूनान, मिस्र, रोम सब मिट गए जहाँ से, अब तक मगर है बाक़ी नाम-ओ-निशाँ हमारा। कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा।
सोशल मीडिया परिवार के सभी मित्रों को दीए के इस प्राचीनतम उत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं…।

