इंटरनेट पर AI की मदद से थोक में तैयार हो रही कम मेहनत वाली, दोहराव भरी और घिसी-पिटी सामग्री, जिसे अंग्रेज़ी में ‘AI स्लॉप’ कहा जाने लगा है, अब सिर्फ़ अच्छे-बुरे कंटेंट की बहस भर नहीं रह गई है। ऐसी सामग्री का मक़सद अक्सर कोई सार्थक जानकारी देना नहीं, बल्कि लोगों का ध्यान खींचना होता है। दिल्ली स्थित थिंक टैंक ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन (ORF) की वेबसाइट पर ६ नवंबर को प्रकाशित एक विश्लेषण में तनुषा त्यागी ने तर्क दिया है कि इससे निपटने के लिए सिर्फ़ यह पहचान लेना काफ़ी नहीं है कि कोई चीज़ मशीन ने लिखी है या इंसान ने।
विश्लेषण के मुताबिक, AI से सामग्री बनाना जितना सस्ता और आसान होता जा रहा है, उसे इंसानी लेखन से अलग पहचानना उतना ही मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे में डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों के सामने दोहरी चुनौती है: एक ओर बेकार, मशीनी कंटेंट की बाढ़ को रोकना, और दूसरी ओर AI के हर इस्तेमाल को नुकसानदेह मानकर उस पर डंडा न चलाना।
प्लेटफ़ॉर्म क्या कर रहे हैं
लेख में लिंक्डइन का उदाहरण दिया गया है। जुलाई २०२६ में लिंक्डइन ने यूज़र्स को किसी पोस्ट को ‘AI स्लॉप जैसा’ बताकर रिपोर्ट करने का विकल्प दिया और इन शिकायतों को अपने ऑटोमेटेड सिस्टम के साथ जोड़कर कम काम की सामग्री की पहुंच घटानी शुरू की। कंपनी के मुताबिक पहले दो हफ़्तों में ही दस लाख से ज़्यादा सदस्यों ने यह विकल्प इस्तेमाल किया, और बाद में उसने बताया कि जिस सामग्री को उसने AI स्लॉप माना, उसके व्यूज़ ४० फ़ीसदी घट गए।
दूसरे प्लेटफ़ॉर्म भी इसी समस्या से निपट रहे हैं, भले ही वे इसे ‘AI स्लॉप’ नहीं कहते। यूट्यूब ने जुलाई २०२५ में साफ़ किया कि दोहराव वाली या थोक में बनाई गई सामग्री से कमाई नहीं होगी, लेकिन क्रिएटर्स AI टूल्स इस्तेमाल कर सकते हैं। गूगल सर्च भी रैंकिंग में हेरफेर के इरादे से बड़े पैमाने पर बनाई गई बेमौलिक सामग्री को नियमों का उल्लंघन मानता है, और उसकी नीति में बिना कोई मूल्य जोड़े जनरेटिव AI से ढेरों पेज बनाने को इसके उदाहरण के तौर पर गिनाया गया है।
AI का इस्तेमाल अपने-आप में कसौटी नहीं
लेख का केंद्रीय तर्क यह है कि कोई सामग्री ‘स्लॉप’ है या नहीं, यह सिर्फ़ इस बात से तय नहीं होता कि उसे बनाने में AI का इस्तेमाल हुआ या नहीं। यूट्यूब और गूगल, दोनों के नियम सामग्री के व्यवहार पर लागू होते हैं, बनाने के तरीके पर नहीं। गूगल की नीति तो उस घटिया सामग्री पर भी लागू होती है जो मशीन, इंसान या दोनों ने मिलकर बनाई हो।
लेखिका के मुताबिक यह जानना कि किसी पोस्ट में AI की मदद ली गई, उसके बनने की प्रक्रिया के बारे में बताता है, लेकिन यह नहीं बताता कि पोस्ट उपयोगी है, दोहराव भरी है या लोगों को बरगलाने के लिए बनी है। असली स्लॉप पहचानने के लिए थोक उत्पादन, बार-बार एक जैसी पोस्टिंग, ऑटोमेटेड एंगेजमेंट और विज़िबिलिटी से खेलने की कोशिशों जैसे संकेतों को देखना होगा। इससे AI के उन सामान्य इस्तेमालों को भी अलग रखा जा सकेगा, जैसे किसी लेख का मसौदा बनाना, उसे संपादित करना या बेहतर करना।
पकड़ने वाले टूल्स क्यों चूक रहे हैं
ORF के लेख के अनुसार, AI से लिखे टेक्स्ट को पकड़ने वाले टूल ज़्यादातर लिखने की शैली के पैटर्न पर अनुमान लगाते हैं। उनके पास कोई पक्का निशान नहीं होता जो साबित कर सके कि टेक्स्ट मशीन ने ही लिखा है।
लेख में २०२५ के दो अध्ययनों का हवाला है। भाषा-विज्ञान के प्रतिष्ठित मंच ACL में छपे एक अध्ययन में ३०० नॉन-फ़िक्शन लेखों की जांच हुई और पाया गया कि जनरेटिव AI का अक्सर इस्तेमाल करने वाले लोग मशीन से लिखा टेक्स्ट पहचानने में काफ़ी अच्छे थे। वे सिर्फ़ AI के पसंदीदा शब्दों पर नहीं, बल्कि औपचारिकता, स्पष्टता और मौलिकता जैसी बातों पर भी ग़ौर करते थे। वहीं दूसरे अध्ययन में पाया गया कि डिटेक्टर टूल्स की सटीकता लिखने की शैली और टेक्स्ट की जटिलता के हिसाब से बदलती है, कुछ मामलों में उनके नतीजे लगभग तुक्के जैसे थे, और आसान भाषा में लिखे टेक्स्ट को ग़लती से AI का लिखा मान लेने की आशंका ज़्यादा थी।
लेखिका का कहना है कि इससे शैली को लेखक तय करने का आधार बनाने की बुनियादी कमज़ोरी सामने आती है। और जब ये संकेत एक बार समझ में आ जाते हैं, तो इन्हें जानबूझकर बदला भी जा सकता है।
‘ह्यूमनाइज़ेशन’ की होड़
मुश्किल अब सिर्फ़ इतनी नहीं कि डिटेक्टर ग़लती करते हैं। AI से लिखे टेक्स्ट को अब ऐसे तैयार या दोबारा लिखा जा सकता है कि वह स्वाभाविक इंसानी लेखन जैसा लगे। इसे ‘ह्यूमनाइज़ेशन’ कहा जाता है।
लेख में सितंबर २०२६ के एक शोध का ज़िक्र है, जिसे ड्यूक यूनिवर्सिटी के भुवन ढींगरा और भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) के दानिश प्रुथी ने प्रकाशित किया। इसमें ४०० कामों पर परखा गया कि क्या कोई AI सिस्टम किसी दूसरे बेस मॉडल के लिखे टेक्स्ट का भरपूर इस्तेमाल करके अपने जवाब को पकड़ से बचा सकता है। नतीजों के मुताबिक, Pangram नाम के डिटेक्टर ने Claude के ख़ुद लिखे ७७ फ़ीसदी जवाब पकड़ लिए, लेकिन जब Claude ने दूसरे मॉडल के टेक्स्ट से जवाब जोड़े तो वह सिर्फ़ २४ फ़ीसदी पकड़ पाया। तीन अन्य डिटेक्टर १० फ़ीसदी से भी कम पहचान सके। कुछ जवाबों में ९० फ़ीसदी तक हिस्सा दूसरे मॉडल का था, फिर भी जवाब कई कामों में ठीक-ठाक असरदार रहे। यह शोध अभी पीयर-रिव्यू से नहीं गुज़रा है।
लेखिका के मुताबिक यह इसलिए अहम है कि तकनीक अब पहले लिखवाकर बाद में शब्द बदलने के पुराने तरीके से आगे निकल गई है और टेक्स्ट बनते समय ही पकड़ से बचने लगा है। ऐसे में कोई सामग्री मशीनी लगती है या नहीं, यह उसके साथ बर्ताव तय करने का भरोसेमंद आधार नहीं रह जाता।
सरकारों के नियम ‘सिंथेटिक कंटेंट’ पर, ‘स्लॉप’ पर नहीं
विश्लेषण बताता है कि कई सरकारों ने सिंथेटिक और इंसानी सामग्री में फ़र्क करने की बढ़ती मुश्किल पर क़दम उठाए हैं, लेकिन उनके नियम आमतौर पर पहचान और पारदर्शिता पर टिके हैं, सामग्री की गुणवत्ता पर नहीं।
चीन का तरीका सबसे व्यापक बताया गया है। सितंबर २०२५ से लागू उसके नियम AI से बने टेक्स्ट, तस्वीरों, ऑडियो, वीडियो और वर्चुअल दृश्यों, सब पर लागू होते हैं। सेवा देने वाली कंपनियों को कुछ स्थितियों में दिखने वाला लेबल लगाना होता है और मेटाडेटा में जानकारी डालनी होती है, AI सामग्री पोस्ट करने वाले यूज़र्स को इसकी घोषणा करनी होती है, और लेबल को बदनीयती से हटाने या छिपाने पर रोक है।
यूरोपीय संघ (EU) के AI क़ानून का अनुच्छेद ५०, जो अगस्त २०२६ से लागू है, AI से टेक्स्ट, ऑडियो, तस्वीरें या वीडियो बनाने वाली कंपनियों से कहता है कि उनका आउटपुट मशीन से पढ़ा जा सके और AI से बना हुआ पहचाना जा सके। सार्वजनिक हित के मुद्दों पर लोगों को जानकारी देने के लिए छपे कुछ AI-जनित टेक्स्ट पर ख़ुलासा भी ज़रूरी है, हालांकि जहां इंसानी समीक्षा और संपादकीय ज़िम्मेदारी हो, वहां छूट का प्रावधान है।
भारत के बारे में लेख कहता है कि यहां का ढांचा दिखाता है कि स्रोत साबित करने पर टिके नियम आंशिक रूप से ही असरदार हो सकते हैं। २०२५ के AI गवर्नेंस दिशानिर्देशों में वॉटरमार्किंग और प्रोवेनेंस मार्कर जैसे उपायों की बात है, लेकिन यह भी माना गया है कि इन्हें बायपास किया जा सकता है। २०२६ में IT नियमों में हुए संशोधन ने सिंथेटिक सामग्री के लिए ठोस ज़िम्मेदारियां तय कीं, लेकिन उनका दायरा ऑडियो, वीडियो और तस्वीरों तक सीमित है। AI से लिखा गया केवल टेक्स्ट इसके बाहर है।
लेखिका के अनुसार ये नियम एक ज़रूरी काम करते हैं, यानी लोगों को बताते हैं कि सामग्री सिंथेटिक है, लेकिन यह तय नहीं करते कि वह दोहराव भरी है, घटिया है या इतने बड़े पैमाने पर बनाई गई है कि सूचना के माहौल को ही बिगाड़ दे।
पहचान से आगे, इस्तेमाल पर नज़र
लेख का निष्कर्ष है कि ह्यूमनाइज़ेशन के दौर में पारदर्शिता और डिटेक्शन अकेले जवाब नहीं हो सकते। मशीन से पढ़े जा सकने वाले मार्कर और मेटाडेटा, लेखन-शैली के मुक़ाबले स्रोत का बेहतर सबूत देते हैं, और चीन व EU के नियम इन्हीं संकेतों को बचाए रखने की कोशिश करते हैं। लेकिन जहां प्लेटफ़ॉर्म भाषा देखकर AI का अंदाज़ा लगाते हैं, वहां नई तकनीकें इस आकलन को कमज़ोर कर रही हैं।
इससे भी बुनियादी बात यह है कि अगर AI से बनी हर सामग्री को पूरी सटीकता से पहचान भी लिया जाए, तब भी स्लॉप की समस्या हल नहीं होगी। लेबल यह बता सकता है कि सामग्री कैसे बनी, यह नहीं कि वह जानकारी देती है, दोहराव भरी है, बरगलाने वाली है या सैकड़ों लगभग एक जैसी ऑटोमेटेड पोस्टों में से एक है। लेखिका के मुताबिक इसलिए प्लेटफ़ॉर्मों को यह भी देखना होगा कि ऐसी सामग्री बड़े पैमाने पर कैसे फैलाई और इस्तेमाल की जा रही है। हल हर पोस्ट की पहरेदारी में नहीं, बल्कि यह पहचानने में है कि कब ऑटोमेटेड उत्पादन ऑनलाइन दुनिया की गुणवत्ता को खोखला करने लगता है।
मीडिया और प्रकाशन जगत के लिए भी यह बहस सीधे मायने रखती है। ख़बरें और लेख तैयार करने में AI टूल्स का दख़ल बढ़ रहा है, और EU के नियमों में संपादकीय ज़िम्मेदारी को दी गई जगह यही बताती है कि आख़िरकार पाठकों का भरोसा इस पर टिका है कि सामग्री के पीछे कितनी जांच और जवाबदेही है।
(मूल विश्लेषण अंग्रेज़ी में ORF की वेबसाइट पर Beyond Detection: The Challenge of Governing AI Slop शीर्षक से प्रकाशित है।)

