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अगर तीनों नौकरी से निकाले गए हैं तो चुप क्यों हैं, खुलकर विरोध क्यों नहीं दर्ज कराते!

Vivek Satya Mitram

ABP News (पूर्ववर्ती Star News) से एक झटके में तीन बड़े पत्रकारों मिलिंद खांडेकर, पुण्य प्रसून वाजपेयी और अभिसार की विदाई के पीछे का सच (अगर वही है जो लिखा जा रहा है) तो यकीनन बहुत ख़ौफ़नाक है और इसकी कड़ी से कड़ी निंदा होनी चाहिए। मैं इमरजेंसी के बाद पैदा हुआ लेकिन कह सकता हूं मौजूदा सरकार में मीडिया का जो हस्र है वो शायद इमरजेंसी के वक्त भी नहीं रहा। और ये वाकई लोकतंत्र के लिए एक बड़ा ख़तरा है।

जबसे मिलिंद के इस्तीफ़े की ख़बर आई हज़ारों लोग सोशल मीडिया पर लिख-पढ़ रहे हैं और आगे भी लिखते रहेंगे लेकिन मैं इसी मामले के प्रकाश में कुछ इतर सवालों से जूझ रहा हूं और बहुत सी घटनाएं स्मृति पटल पर अंकित होकर मुझे उलझा रही हैं। मैं पहले ही कह चुका हूं कि ये घटना इस देश के इतिहास में एक काला दिन है (अगर वैसी ही है जैसी बताई जा रही है) पर मेरे भीतर कुछ अलग तरह के सवाल मचल रहे हैं जो मैं साझा करना चाहता हूं —-

1. जैसा कि चारों ओर कहा जा रहा है कि ये तीनों ही टीवी पत्रकार काफ़ी बेबाक और निर्भीक हैं और इसी वजह से इन तीनों को सरकारी (मोदी के) दबाव में निकाला गया है तो ये सभी के सभी इस मामले पर इतने चुप क्यों हैं या फ़िर अपने सोशल मीडिया पर सब कुछ सामान्य होने का ढोंग क्यों कर रहे हैं?

2. जिस देश में सुप्रीम कोर्ट के जज सरकारी अंकुश के ख़िलाफ़ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सकते हैं वहां मीडिया की ताकत से बखूबी वाकिफ़ सरोकार की पत्रकारिता करने वाले इन तमाम पत्रकारों को ऐसा करके दुनिया को सच बताने में कैसा डर लग रहा है? क्या ये उनकी नैतिक ज़िम्मेदारी नहीं कि वो सरकार के इस निरंकुश चेहरे को सबके सामने एक्सपोज़ करें? या फ़िर सच कुछ और है?

3. सिर्फ़ इसलिए कि अगली नौकरी मिलने में दिक्कत ना आए या फ़िर सरकार आगे भी दमन ना करे, अपने साथ हुए अन्याय पर चुप्पी साध लेना या सब कुछ सामान्य होने का ढोंग करना किस निर्भीक पत्रकार की निशानी है?

4. अगर मोदी सरकार अपनी कारगुजारियां छिपाने के लिए इस तरह बड़े पत्रकारों की बलि ले रही है तो ये मामला कतई उनका निजी मामला नहीं रह जाता। ये मामला देश के करोड़ों लोगों की आज़ादी के ख़तरे में पड़ जाने का हो जाता है। मामूली से मामूली ख़बर से तिल का ताड़ बनाने वाले इन पत्रकारों को क्या इस बात का अहसास नहीं होगा? और इस अहसास के बाद भी इसकी जानकारी देश को नहीं करवाना क्या देश के करोड़ों लोगों के साथ एक तरह का धोखा नहीं है?

5. एक बड़ा सवाल ये भी है कि पत्रकारिता के संकट काल में इस मसले पर मचे इतने होहल्ले के बाद भी टीवी और प्रिंट के ज्यादातर (रवीश को छोड़कर) पत्रकारों को सांप क्यों सूंघ गया है? या तो उनकी कोई प्रतिक्रिया ही नहीं आई, या फिर प्रतिक्रिया बहुत सधी हुई है ताकि अपनी गर्दन बची रहे? क्या दूसरे मीडिया संस्थानों को नहीं लगता कि ये घटना देश में ‘अघोषित इमरजेंसी’ को दर्शाती है और फिलहाल इससे बड़ी कोई ख़बर नहीं हो सकती फिर इस मामले पर कोई बात करने की हिम्मत क्यों नहीं दिखा रहा? इसलिए कि सरकार से डरते हैं? फ़िर ये खुलकर क्यों नहीं कह देते कि उनकी ख़बरें विश्वसनीय नहीं हैं, क्योंकि वो दबाव में काम कर रहे हैं। कम से कम आम जनता तो बेवकूफ़ ना बने।

6. वो तमाम बड़े पत्रकार कहां गए जो कन्हैया कुमार और रोहित वेमुला के इंसाफ़ के लिए जुलूस निकासी करते थे? लाखों पत्रकारों का प्रतिनिधित्व करने वाले एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया, एनबीए और प्रेस क्लब जैसे संगठन इस गंभीर मुद्दे को लेकर सरकार के ख़िलाफ़ बगावत का बिगुल क्यों नहीं फूंकती? सभी मीडिया संस्थान इस घटना के विरोध के लिए एकजुट क्यों नहीं हैं? क्या मोदी ने सबको खरीद लिया है? या सबको जान-माल का ख़तरा है? अगर हां तो पूरी दुनिया के लिए इससे बड़ी ख़बर नहीं हो सकती।

7. आख़िर इन तीनों पत्रकारों ने अपने साथ हुई इस हिटलर शाही के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? मुकदमा क्यों नहीं ठोंका अपने संस्थान के ख़िलाफ़? लेबर कमिश्नर से क्यों नहीं मिले? मीडिया रेगुलेशन से जुड़ी संस्थाओं के पास क्यों नहीं गए? कोई धरना/ प्रदर्शन ही क्यों नहीं कर लिया? अगर वो सही हैं तो डर किस बात का है? क्या इसका खुलासा नहीं होना चाहिए?

8. एक और बात, इनके निकाले जाने पर इतना बवाल क्यों हो रहा है? क्योंकि ये बड़े पत्रकार हैं इसलिए? या इनके साथ ग़लत हुआ इसलिए? अगर ये अन्याय की लड़ाई है और इन पत्रकारों को भी यही लगता है तो उसी चैनल में राजनीति और ख़ेमेबाज़ी के शिकार पिछले दशक से बिना प्रमोशन और रेशनल सैलरी इन्क्रीमेंट के काम करने वाले मिडिल लेवल पत्रकारों के साथ हो रहा अन्याय इन तमाम लोगों को क्यों नहीं नज़र आया? क्या वो सही है? फ़िर जानकारी के बावजूद इन तमाम बड़े पत्रकारों का ऐसे मुद्दों से मुंह फेर लेना क्या ग़लत नहीं है? ऐसे में बड़े पत्रकारों के लिए लड़ना और छोटों को उनके हाल पर छोड़ देना कहां का इंसाफ़ है?

उम्मीद करता हूं इन बड़े पत्रकारों को करीब से जानने वाले, धुर प्रशंसक या फिर फैन क्लब चलाने वाले लोग मेरी जिज्ञासा शांत करने में मदद करेंगे। इंतज़ार रहेगा।

टीवी पत्रकारिता कर चुके और इन दिनों उद्यमी के रूप में सक्रिय विवेक सत्य मित्रम की एफबी वॉल से.

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https://www.youtube.com/watch?v=BnYX-BA4c4E

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2 Comments

2 Comments

  1. K K Agnihotri

    August 3, 2018 at 10:37 am

    याद है..पिछले साल ही ‘हिंदुस्तान’ से निकाले गए एक पत्रकार ने दिल्ली के फुटपाथ पर भूखहडताल करते हुए दम तोड़ा था.. तब मीडिया का आसमान नहीं टूटा था..।

    पुण्यप्रसून जैसे लोग खाए-पिए-अघाए पत्रकारों पर हायतौबा करने के बजाय जीने की जद्दोजेहद कर रही नब्बे फीसदी पत्रकार बिरादरी को ‘जन्नत की हकीकत’ समझनी चाहिए।

    ऐसे ही सेलेब्स पत्रकार जब किसी मीडिया हाउस के मैनेजिंग या ग्रुप एडिटर बनते हैं तो उनमें से ज्यादातर हर वक्त आधीनस्थों को कच्चा चबा जाने वाले भेड़िये की तरह पेश आते हैं। इनका वर्ग चरित्र समझिए..!

    कोई सेठ अपने धनपर उन्हें अपनी बीन क्यों बजाने देगा..। याद रहे पत्रकारिता अब जनसेवा नहीं रही..। हर मीडिया घराना सत्ता के मेवा की चाहत में अपनी दुकान खोले बैठा है।

  2. Ajay gupta

    August 4, 2018 at 7:39 pm

    Agar wo sc ke judge ki tarah pc kar khulkar apni baat rakhte bhi hai toh unhe dikhayega kaun aur chhapega kaur sabhi toh modi bhakt hai.

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