अनिल चतुर्वेदी-
पाली भाषा मे पश्य का मतलब देखना है और बुद्ध जब विपश्यना कहते हैं तो उनका आशय है सम्यक दृष्टि से देखना। मुश्किल ये है कि जब हम देखना कहते हैं तो उसका सामान्य अर्थ हम आंख से देखना ही समझते हैं और आंख से तो वही चीज देखी जा सकती है जो बाहर है लेकिन बुद्ध के देखना शब्द का आशय आंख से देखना नही होता इसके उलट उनका मतलब होता है आंख बंद करो और भीतर देखो।
अब भीतर आंख कुछ देख ही नही सकती फिर क्या देखना तो बुद्ध कहते हैं तुम सिर्फ अपनी आती जाती हुई सांस को देखो। सारी मुश्किल यहीं खड़ी हो जाती है। मुश्किल ये कि जैसे हम आती जाती सांस को देखना शुरू करते हैं तो कुछ ही सेकंड मे कोई न कोई विचार आ जाता है और सांस पर से ध्यान हट जाता है। फिर थोड़ी देर मे आपको होश आता है अरे मेरा तो सांस से ध्यान ही हट गया था और दुबारा फिर आप सांस पर फोकस करते हैं लेकिन कुछ ही देर मे फिर वही बात यानी कोई विचार चलने लगता है फिर कुछ देर बाद आप होश मे आते हैं और सांस पर फोकस करते हैं।
यह प्रक्रिया ऐसे ही चलती रहती है यानी लगातार आप का ध्यान आती जाती सांस पर टिका नही रह पाता। सोचिए ऐसा क्यों होता है कि आप अपनी सांस पर ही लगातार ध्यान नही रख पाते। वजह है आपका मन और मन माने आटोमेशन यानी शरीर आपका हार्डवेयर है तो मन उसका साफ्टवेयर यानी मन जो आपकी कंडीशनिंग है सब कुछ वही नियंत्रित किए हुए है यानी यंत्रवत सब कुछ चल रहा आपको उसका होश ही नही। एक उदाहरण से समझते हैं।
बुद्ध का जब यश फैलने लगा तो मगध का तत्कालीन सम्राट बिंबसार ने बुद्ध को अपने दरबार मे आमंत्रित किया। बुद्ध आए और ससम्मान उन्हे आसन पर बिठाया गया। सामने सम्राट और आस पास उसके प्रमुख दरबारी बैठे। बुद्ध ने अपना प्रवचन शुरू किया। लगभग आधे घंटे तक वे लगातार बोलते रहे सब बहुत ध्यान से उन्हे सुन रहे थे तभी अचानक बुद्ध रुके और सम्राट से कहा राजन आपके दाहिने पैर का अंगूठा हिल रहा मै काफी देर से देख रहा क्या तकलीफ है आपको तो सम्राट चौंक गया कहा मेरे पैर का अंगूठा नहीं हिल रहा। बुद्ध ने कहा नहीं, मै साफतौर पर इसे देख रहा हूं।
सम्राट ने कहा माफ कीजिएगा दरअसल मुझे पता ही नही था कि पैर का अंगूठा हिल रहा। बुद्ध ने कहा राजन जिस तरह से आपका पैर और आप ही का अंगूठा हिल रहा लेकिन आपको पता नही ठीक इसी तरह आपकी जिंदगी मे चीजे घटित हो रहीं और आपको उनका होश नही क्योंकि आपका मन जिस रूप मे संस्कारित है उसी तरह वह आटोमेशन मे काम कर रहा. आपको मन का पता नही कि वह आटोमेशन मे है यानी यंत्रवत चल रहा। हमारा जीवन किस तरह से आटोमेशन मे काम कर रहा इसके लिए बुद्ध के जीवन से एक और कहानी के मार्फत इसे समझने की कोशिश करते हैं।
दरअसल बुद्ध जो विचार समाज मे फैला रहे थे उससे समाज का ब्राह्मण वर्ग बहुत नाराज था। बुद्ध तमाम आवांछित परंपराओं, कर्मकांड आदि के खिलाफ समाज को जागरूक कर रहे थे लिहाजा प्रभावशाली ब्राह्मणों का एक वर्ग मौका तलाश रहा कि कि कहीं बुद्ध अकेले मे मिल जायं तो उन्हे सबक सिखाया जाय और यह मौका भी मिल ही गया। बुद्ध अक्सर अपने शिष्यों के साथ ही चलते थे लेकिन एक बार जब एक गांव के पास किसी बागीचे मे वे बैठे थे और शिष्यों को आसपास के गांव मे भिक्षाटन के लिए भेजा हुआ था तभी गांव के ब्राह्मण लंबरदार को सूचना मिली कि बुद्ध अकेले ही फलाने बाग मे पेड़ के नीचे बैठे हैं और सूचना मिलते ही वह लट्ठ लेकर दौड़ा कि आज तो सबक सिखाकर ही रहेंगे।
लंबरदार जब बुद्ध के सामने पहुंचा तो देखा बुद्ध बहुत गहरे ध्यान मे हैं जाहिर है मजा चखाने का मजा तो तभी है जब सामने वाला आपकी तरफ फोकस्ड हो। इसके बाद लंबरदार ने पहले लाठी से बुद्ध को कोंचना शुरू किया। साथ मे गंदी से गंदी गालियां देना शुरू किया। इसके बावजूद बुद्ध जस का तस ध्यान मग्न रहे तो गुस्से व नफरत मे बुद्ध के मुह पर जोर से थूक कर चलने लगा तब बुद्ध ने अपनी उसी शांत मुद्रा मे उससे पूछा कि आपको और तो नही कुछ कहना है। अब लंबरदार चौंका और थोड़ा घबड़ाया भी और कहा कि मै आया तो था आपको पीटने लेकिन अब बहुत चकित व हैरान हूं कि मैने इतनी गाली बकी, मुह पर थूका भी लेकिन आप पर तो कोई असर ही नही हुआ। ऐसा तो मेरे जीवन पहली बार हुआ है कि किसी की सामने से उसकी इतनी बेइज्जती की लेकिन उसे क्रोध ही नही आया। यह बात तो मै समझ ही नही पा रहा कि कोई ऐसा इसान भी होगा।
बुद्ध ने कहा कि क्रोध तो मुझे भी आ सकता है लेकिन मै कोई बिजली का बल्ब नही कि किसी ने स्विच दबाया और मै जल उठा ( उस जमाने मे बिजली नही थी रूपक मैने समझने के उद्देश्य से रखा है) असल मे बुद्ध ने उससे कहा कुछ यही था कि मुझमे क्रोध कोई दूसरा नही पैदा कर सकता जबतक मै न चाहूं। अब समझिए हमे कोई अपशब्द कहे सामने से बेइज्जत करे तो तत्काल प्रतिक्रिया होती है एक सेकंड की भी देरी नही होगी क्योकि हमारा मन संस्कारित है और आटोमेटिक प्रतिक्रिया करता लेकिन बुद्ध यंत्रवत नही हैं उनका मन वही करेगा जैसा वे चाहेंगे वह आटोमेटिक तरीके से कुछ नही कर सकता। दरअसल हमारा शरीर जन्म से बल्कि जन्म के पहले जब मा के गर्भ मे थे तभी से सबकुछ आटोमेटिक तरीके से करने के लिए अभ्यस्त/संस्कारित होने लगता है।
जब बच्चा दुनिया मे आता है तो आते ही रोता है यह उसका रोना आटोमेटिक होता है क्यों क्योंकि जैसे ही वह गर्भ से बाहर आया और मा के नाभिनाल से संबंध कटा तो सबसे पहली जरूरत उसे सांस लेने की होती है क्योंकि फेफड़े मे तो हवा ही नही होती और जिंदा रहने के लिए पहली जरूरत आक्सीजन की है तो जब वह रोता है तो फेफड़े मे आक्सीजन जाती है। न रोये तो डाक्टर चिंतित हो जाता है कि बच्चा जी नही पाएगा। आक्सीजन के बाद पेट भी खाली होता है तो फिर रोता है तो मा समझ जाती है और उसे दूध पिलाती है और यह सब कुछ बच्चा होश मे नही बल्कि शरीर अपनी जरूरतों के अनुसार स्वतः यह करता है।यही आटोमेशन जीवन की हर गतिविधि मे संचालित होती है। आप खाना खाते है लेकिन कैसे पचता है इसमे आपको कुछ नही करना सब शरीर आंतरिक अंगों के सहारे आटोमेटिक ही करता है और जैसे भीतर सबकुछ आटोमेटिक होता है ठीक उसी तरह बाहरी जीवन के कार्य भी आटोमेटिक ही होता है और इस आटोमेशन का उपकरण है आपका मन।
आटोमेशन का हाल ये कि जब कोई बच्चा 10-11 महीने का होता है तो खड़ा होने की कोशिश करता है और इस कोशिश मे कई बार गिरता है लेकिन जब खड़ा हो जाता है तो उसके खड़ा होने का एक पैटर्न होता है और उसी पैटर्न मे ही वह जीवन भर खड़ा होता है। इसी तरह हमारे चलने, बोलने, सोचने, खाने, विचार करने आदि सभी कार्य हम एक पैटर्न मे करते हैं। दरवाजा बंद है लेकिन आपका कोई परिचित आ रहा तो उसके पैरों की आहट से आप जान जाते है कि कौन आ रहा। फोन पर किसी परिचित की आवाज से हमे पता चल जाता है कि कौन बोल रहा। यानी पूरा जीवन ही हम एक हैबिट पैटर्न मे ही जिए चले जाते हैं बिना होश के।
मन क्या है
विपश्यना को समझने के लिए सबसे जरूरी यह जानना है कि इंसान की जिंदगी पूरी तरह से आटोमेशन मे चलती है यानी यंत्रवत। यह ऐसे ही है जैसे शरीर रूपी रोबोट मे मन रूपी एक साफ्टवेयर डाल दिया गया। मन माने आपकी कंडीशनिंग यानी जिस तरह से आप संस्कारित हैं उसी अनुरूप जीवन जीते चले जा रहे बिल्कुल आटोमेटिक एक मशीन की तरह और जिसे आप अपनी इच्छा समझते हैं और मानते हैं कि मन आपकी इच्छा पर चल रहा लेकिन यह सबसे बड़ा धोखा है कैसे जरा समझने की कोशिश करते हैं- एक व्यक्ति सुबह सोकर उठा और सामने पड़े अखबार को पढ़ने लगा। उसमे पहले ही पेज पर एक खूबसूरत महिला लक्स साबुन से नहा रही थी। उस पर नीचे लिखा था कि लक्स नहाने का सबसे अच्छा साबुन है।
सुबह नहा धोकर जब आफिस के लिए निकला तो रास्ते मे चौराहे पर एक बड़ी सी होर्डिग दिखी उसमे खूबसूरत महिला लक्स साबुन से नहाते दिखी जिसमें नीचे वही वाक्य कि लक्स नहाने का सबसे अच्छा साबुन । घर लौटकर रात मे खाते समय अपना टीवी खोला उसमे भी लक्स साबुन से नहाते वही खूबसूरत महिला दिख गई । खैर कुछ दिनो बाद संडे की शाम वो शापिंग के लिए गया दुकानदार से पूछा अरे भाई लक्स साबुन है। उसने कहा जी और उसने लक्स साबुन खरीद लिया ।
आप सोच रहे होंगे कि लक्स साबुन उसने अपनी इच्छा से लिया है। लेकिन जरा सोचिए क्या वाकई अपनी इच्छा से उसने लक्स लिया। दरअसल उसकी इच्छा को संस्कारित किया गया था। लक्स खरीदने की इच्छा उसके अवचेतन मन मे डाल दी गई थी। सच यह है पूरे जीवन मे आपको/हमको संस्कारित ही किया जा रहा। आपकी कोई भी इच्छा आपकी स्वतंत्र इच्छा नही बल्कि संस्कारित की गई इच्छा है जिसमे आपका पूरा परिवार, परिवेश बल्कि पूरा समाज ही संस्कारित करने मे जुटा है। यानी इच्छा करने के लिए भी आप स्वतंत्र नहीं है । फिर जो आप कर्म करते हैं उसमे भी आप स्वतंत्र नही है। न्यूटन का गुरुत्व का नियम कहता है कि ब्रह्माण्ड का प्रत्येक पिंड/एक दूसरे पर बल डाल रहा।
आप एक अतर्सबंधित ब्रह्माण्ड में जी रहे। आपको क्या यह पता है कि जहां इस वक़्त आप बैठे/खड़े या चल रहे प्रकृति की कितनी शक्तियां आप पर लग रही। कुछेक शक्तियों को विज्ञान जान गया है लेकिन विज्ञान अभी भी बहुत कुछ नही जान सका है । दिलचस्प बात यह है कि प्रकृति की जो शक्तियां कार्यरत है उनमे से एक पर भी आपका कोई नियंत्रण नहीं । जाहिर है इसीलिए कृष्ण गीता मे कहते है कि तुम कर्ता नही हो। सब कुछ घटित हो रहा। अपने अहंकार (ego) की वजह से कर्ता बन जाते हो।
under the false impression of ego one thinks to be the door of activities while in reality all activities are carried out by nature as natural process (lord Krishna in Gita)
कृष्ण कह रहे कि कर्ता तुम नही हो बस अहंकार की वजह से कर्ता बन जाते हो जबकि सच यह है कि सब कुछ प्रकृति वत घटित हो रहा। गुणा गुणेश वर्तंते यानी गुण ही गुण मे बरत रहा। लेकिन समझ मे नही आता क्यों क्योंकि हमे देह कैसे बनी उसका पता नही। दरअसल देह तत्वों से बनी है और कुल पाच तत्व -पृथ्वी, अग्नि, वायू, जल व स्पेस यानी आकाश और इन तत्वो के अपने गुण धर्म हैं । भारतीय संस्कृति मे रज,तम व सत तीन गुण बताए गए हैं इन तीन गुणों के समिश्रण से अनंत गुण बन जाते हैं। यानी हर जीव का अपना एक विशिष्ट गुण है और पूरा जीवन वह आटोमेटिक तरीके से अपने इसी विशिष्ट गुण के अनुरूप जीता है और मर जाता है। बुद्ध कहते हैं यह आटोमेशन खत्म किया जा सकता है।
विपश्यना और कुछ नही बस इसी आटोमेशन को तोड़ने की तकनीक है आटोमेशन के खत्म होते ही आपको पता चल जाएगा कि इच्छा क्या है और क्यों है, सुख दुख की संवेदना कैसे मन ग्रहण करता है और जैसे आप इसे खुद से जानेंगे आप सुख दुख से परे हो जाएंगे। फिर क्या होगा – फिर जीवन होशपूर्वक जीने लगेंगे और तब आपको पता चल जाएगा कि आप हैं कौन। विपश्यना ध्यान करते करते बुद्ध पर जब परम ज्ञान का उद्घाटन हुआ तो जो पहला वाक्य उन्होने यही कहा -ऐ घर बनाने वाले तुझे देख लिया गया है अब तू घर नही बना पाएगा यानी अब पुनर्जन्म नही होने वाला यानी जन्म-मरण के भव चक्र से मुक्ति यही मोक्ष है।
एक खास बात यह भी हुई कि बुद्ध ने यह तो बताया कि घर बनाने वाले ( बार बार जन्म लेने वाले) को उन्होने देख लिया लेकिन यह नही बताया की जिसने देखा वह कौन है और सच यही है कि देखने वाला ही ब्रह्म/परम सत्ता है। इसका खुलासा न करने की वजह से बुद्ध को अनीश्वर वादी मान लिया गया। यह विडम्बना है। आखिर वेदांत भी तो नेति नेति कहकर ही ब्रह्म को जानने की बात कहता है। अब नेति नेति के माने तो यही है कि जो कुछ भी आप मन,बुद्धि, इन्द्रियों से जान सकते हैं वह ब्रह्म नही और यह नेति नेति आपको कुछ नही पर ले जाएगी क्योंकि ब्रह्म तो समय व स्थान (time, space) से बाहर है उसे बताएंगे कैसे।
…जारी…
अनिल चतुर्वेदी स्वतंत्र पत्रकार के अलावा कवि भी हैं। वे पूर्व मीडिया सलाहकार (सर्व शिक्षा अभियान) भी रहे हैं। उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनसे संपर्क +91 73553 68323 के ज़रिए किया जा सकता है।



