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इस बार मेरी कोई किताब नहीं, पिछले पंद्रह सालों से मेरी कोई किताब नहीं, तो फिर मैं कैसा लेखक?

नरेश सक्सेना-

पुस्तक मेले के दौरान जैसे लेखकों की सामूहिक प्रतिभा का विस्फोट हुआ। तमाम साथी कहते दिखे— यह मेरी नई पुस्तक है, यह लोकार्पण है, यह विमोचन है, और यह उस पर टिप्पणी है। पाठक-विमुख समय में इतना उत्साह और इतनी ऊर्जा देखकर निश्चय ही मन की कई निराशाएं दूर हुईं। एक नई ऊर्जा का संचार हुआ— मुझे भी कोई किताब पूरी करनी चाहिए।

लेकिन इस बार मेरी कोई किताब नहीं। पिछले पंद्रह सालों से मेरी कोई किताब नहीं। तो फिर मैं कैसा लेखक?

इस सकारात्मक चेतना को जगाने के लिए पुस्तक मेले और सभी साथियों का आभार।

ऊपर की तस्वीर 16 जनवरी को मुंबई में मेरे जन्मदिन की है। संयोग से उसी दिन धर्मवीर भारती के जन्मशताब्दी समारोह में वाणी द्वारा मुझे “गुनाहों का देवता” के 165वें संस्करण के विमोचन के लिए आमंत्रित किया गया था।

साथ में असगर वजाहत, अतुल तिवारी, पुष्पा भारती और अनेक प्रतिष्ठित लेखक मौजूद थे। यदि 165वें संस्करण को 600 प्रतियों से गुणा किया जाए, तो संख्या 99,000 होती है।

रूस के सेलिब्रिटी लेखक करोड़ों की संख्या में छपते हैं। चीन के नए लेखक भी लाखों में बिकते हैं।

अरुंधति रॉय की “गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स” की 60 लाख प्रतियां बिकी हैं। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुआ होगा। चेतन भगत जैसों की पुस्तकें भी मिलियन में बतायी जाती हैं।

तो हिंदी में ऐसा क्या खोट है कि दस प्रदेशों और लगभग 70 करोड़ की आबादी के बावजूद पढ़ने वाले नहीं हैं?

सन 2000 में मेरी किताब समुद्र पर हो रही है बारिश का यह तीसरा संस्करण आया, जो शायद आज तक पूरा नहीं बिका।

यानी दो हज़ार प्रतियां भी नहीं बिकीं। वाणी प्रकाशन ने बताया कि सुनो चारुशीला का पेपरबैक संस्करण आया है। अब तक दो संस्करणों में कुल 1,000 प्रतियां ही बिकी होंगी, जिनमें से 10-15 प्रतियां तो मैंने खुद खरीदी हैं।

तो फिर मेरे कवि होने का क्या अर्थ है?

मेरी कविताएं खराब हैं या अच्छी—इस चिंता में कोई क्यों पड़े?

प्रकाशकों से पूछना चाहिए— इस बार मेले में हिंदी की बेस्टसेलर कितनी बिकी?

क्या यह गहन सोच-विचार और शोध का विषय नहीं है?

उत्तर प्रदेश के 27,000 प्राइमरी हिंदी स्कूलों के बंद होने के आदेश हो चुके हैं। लेकिन लेखकों की कोई सामूहिक प्रतिक्रिया नहीं।

सरकारों के इस रवैये पर हमें क्या करना चाहिए?

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