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गुजरात

व्हाट्सएप पर प्रश्नपत्र की तस्वीर भेजना प्राइवेसी उल्लंघन का केस नहीं बनता: गुजरात हाईकोर्ट

News graphic announcing Gujarat High Court ruling on privacy/IT Act issue about sending exam photos via WhatsApp; Live Law logo, 25 June 2026, Indian flag atop a courthouse illustration.

अहमदाबाद। गुजरात हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि परीक्षा के दौरान प्रश्नपत्र की फोटो खींचकर व्हाट्सएप पर भेजना सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम की धारा 66E के तहत “निजता का उल्लंघन” (Violation of Privacy) नहीं माना जा सकता। अदालत ने इस मामले में दर्ज एफआईआर से धारा 66E को हटाते हुए आरोपियों को आंशिक राहत दी है।

अदालती कवरेज करने वाली वेबसाइट लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, मामला वर्ष 2018 में आयोजित एक परीक्षा से जुड़ा है। आरोप था कि एक अभ्यर्थी परीक्षा केंद्र के भीतर मोबाइल फोन लेकर गया और प्रश्नपत्र की तस्वीरें खींचकर व्हाट्सएप के जरिए अपने भाई को भेज दीं। परीक्षा पर्यवेक्षक की शिकायत पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की थी।

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति पी.एम. रावल ने कहा कि IT Act की धारा 66E केवल उन मामलों पर लागू होती है, जहां किसी व्यक्ति के निजी अंगों या निजी क्षेत्र (Private Area) की तस्वीर बिना सहमति के ली जाए, प्रकाशित की जाए या प्रसारित की जाए। प्रश्नपत्र की तस्वीर भेजना इस परिभाषा के दायरे में नहीं आता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रश्नपत्र की फोटो को किसी व्यक्ति की निजी छवि नहीं माना जा सकता। इसलिए व्हाट्सएप के जरिए प्रश्नपत्र की तस्वीर भेजने को “प्राइवेसी वायलेशन” नहीं कहा जा सकता। इसी आधार पर धारा 66E के तहत दर्ज आरोप को रद्द कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 188 (लोक सेवक के आदेश की अवहेलना) को भी इस मामले में लागू मानने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि परीक्षा संबंधी निर्देशों को लोक सेवक द्वारा जारी कानूनी आदेश नहीं माना जा सकता, जिनके उल्लंघन पर स्वतः धारा 188 लागू हो जाए।

हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि एफआईआर पूरी तरह खत्म नहीं की गई है। यदि मामले में अन्य किसी अपराध के तत्व मौजूद हैं तो जांच एजेंसी उन धाराओं के तहत कार्रवाई जारी रख सकती है।

इस फैसले को IT Act की धारा 66E की सीमाओं को स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है। अदालत ने साफ किया कि हर डिजिटल सामग्री का आदान-प्रदान निजता के उल्लंघन की श्रेणी में नहीं आता और कानून की व्याख्या उसके मूल उद्देश्य के अनुरूप ही की जानी चाहिए।

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