अनिल भास्कर-
मीडिया हाउस! ये क्या बला है?
कई दफे हम उसी को सच या सही मान बैठते हैं जो औरों की जुबानी सुनते हैं। उसकी सच्चाई से रोज गुजरते हैं, मगर लगभग आंख मूंदकर। दिमाग को पोटली में बांधे। मीडिया हाउस भी वही बला है। विशुद्ध बिजनस हाउस। मीडिया का कारोबार करने वाला बिजनस हाउस। लेकिन किसी प्रबुद्ध ने नाम दे दिया मीडिया हाउस और हम पत्रकार भी वही मान बैठे। वही समझने-बुलाने लगे।
विचारों की कंडीशनिंग यही होती है। व्यावहारिक तौर पर अपनी सोच किसी दूसरे दिमाग में रोप देना। हम सब देखते रहे कि इन हाउसों का मूलभूत उद्देश्य सिर्फ धनार्जन है। सारे क्रियाकलाप इसी निमित्त। खबरों का कारोबार इसी का जरिया है।
जरा सोचिए। अगर मीडिया कारोबार वाली कम्पनी मीडिया हाउस हो सकती है तो ऑटोमोबाइल का कारोबार करने वाली कम्पनी को मोटर हाउस क्यों नहीं? उसे वही कहना चाहिए। बिस्किट कम्पनी को बिस्किट हाउस। फुटवियर कारोबारी कम्पनी को जूता-चप्पल हाउस।
ऑटोमोबाइल, बिस्किट या फुटवियर कम्पनी की ही तरह इन कथित मीडिया हाउसों की भी पहली प्राथमिकता कारोबार है, मुनाफा है, धनलाभ है, समाचार नहीं। पत्रकारिता से जुड़े मित्र जानते हैं कि रोजाना अखबार का ढांचा विज्ञापन विभाग तय करता है, सम्पादकीय नहीं।
जो मित्र इस पेशे से सीधे नहीं जुड़े, वे भी समझ लें कि सबसे पहले विज्ञापन विभाग सम्पादकीय विभाग को डमी सौंपता है। (डमी बोले तो अखबार का ढांचा)। यानी अखबार का स्वरूप क्या होगा? कितने पन्नों का बनेगा? किस पन्ने पर किस विषय की खबरें छपेंगी? मतलब स्थानीय, राष्ट्रीय, विदेशी, खेल या कारोबार की?
यह भी कि किस पन्ने पर किधर और कितनी खबरें छपेंगी? यहां तक कि मुखपृष्ठ कैसा होगा? यानी पूरे अखबार की रूपरेखा उपलब्ध विज्ञापनों के अनुरूप तय होती है। तभी अपन विनोद में ख़बरों की परिभाषा यूं गढ़ते थे- अखबार के पन्नों पर विज्ञापन से बचे स्थान को भरने के लिए जिन शब्द समूहों का उपयोग किया जाता है, उन्हें समाचार कहते हैं।
न्यूज़ चैनलों में भी समाचारों की परिभाषा लगभग यही है। विज्ञापनों के बीच खाली समय में जो दिखाया जाता है, वही समाचार है। समाचार या ख़बर की सबसे सटीक और व्यावहारिक परिभाषा यही है।


