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उत्तर प्रदेश

नेता-मंत्री नहीं, ‘बेचारा’ पत्रकार ही तो मरा है…

संजीव चौहान

त्तर प्रदेश के सीतापुर में दैनिक जागरण अखबार के पत्रकार राघवेंद्र बाजपेई को, दिन-दहाड़े गोलियों से भून डाला गया. शोर मचना लाजिमी था. सो शोर-शराबा खूब हो-हंगामा मचा है. इस कोहराम में अगर जमाने को किसी की खामोशी अखर रही है तो वह खामोशी है, सीतापुर पुलिस की खामोशी.

पीड़ित परिवार में महिला, बच्चे बिलख रहे हैं. राघवेंद्र बाजपेई के दोस्त बिलबिला रहे हैं. इस तमाम के बीच पुलिस खामोश और राघवेंद्र के दुश्मन खुश हैं! मुसीबत की इस घड़ी में बस 100 टके का यही वो सवाल है, जिसका हर जायज इंसान सीतापुर पुलिस से जवाब मांग रहा है. और फिर भला सोचो जवाब क्यों न मांगा जाए? घटनाक्रम को लेकर दो दिन बाद भी सीतापुर पुलिस किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंची है.

शायद इस उम्मीद में कि शव का दाह-संस्कार होने के कुछ देर बाद ही, रोने-धोने वाले थक-हारकर खुद ही खामोश होकर बैठ जाएंगे. पीड़ित परिवार को सांत्वना देने आने वालों की लाइन भी वक्त के साथ धीरे-धीरे छोटी होगी और फिर दो चार दिन में यानी दसवां-तेरहवीं के बाद घर की देहरी खुद ही सूनी हो जाएगी. फिर कौन चीखे-चिल्लाएगा. जब कोई चीखने-चिल्लाने रोने-धोने वाला होगा तब तो, कोहराम सुनाई पड़ेगा.

पुलिस की खामोशी के पीछे छिपी मंशा अगर यही है तो क्या यह मंशा सही है? मगर बिचारी-बेबस और लाचार सीतापुर पुलिस भी क्या करे? सड़क का आदमी समझा जाने वाला एक पत्रकार ही तो गोलियों से भूनकर मार डाला गया है! कोई सत्तासीन पार्टी का कद्दावर नेता-मंत्री थोड़ा ही न मरा है. जो एक-दो घंटे में ही हत्यारों की लाशें, सीतापुर पुलिस कथित एनकाउंटर में कंधे पर टांगकर ले आए.

वो (सीतापुर पुलिस) सोच रही होगी कि राघवेंद्र बाजपेई को उसने (सीतापुर पुलिस) तो मार नहीं डाला है. जिन्होंने मारा है उन्हें आज नहीं तो कल सही. देर-सबेर जब हत्यारे मिल जाएंगे तो, पुलिस कोर्ट-कचहरी में मुकदमा दाखिल कर देगी. सोचो और भला किसी अदना से एक आम बिचारे-निरीह पत्रकार के लिए क्या सीतापुर अपनी ‘जान’ दे दे?

ऐसा थोड़ा ही नहीं कहीं होता है कि, पत्रकार के हत्यारों को पकड़ने के लिए पुलिस अपनी या किसी अपने की ‘कुर्बानी’ दे डाले. खाकी वर्दी की कुर्बानी तो उस सत्ता के किसी मंत्री-कद्दावर नेता के लिए दी जाती है जो, खाकी वर्दी के कंधे पर ‘सितारे-बिल्ले’ उतारने और चढ़ाने की कुव्वत रखते हैं. पत्रकार बिचारा मर गया तो मर गया. कौन सा आसमान फट पड़ेगा. सड़क की आदमी तो होता है न पत्रकार. सत्ता और सरकारी मशीनरी के बेशर्म ‘दीदे’ में.

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