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बनारस गए इन साहित्यकारों पर अनिल कुमार यादव की टिप्पणी- “चवन्नी के चंदन से आपकी पहचान बदल दे रहे हैं और आप खुश हैं!”

अनिल कुमार यादव-

प्रिय लेखकों, आप क्या बताना चाहते हैं, दो दिन के लिए बनारस आकर धार्मिक और बनारसी हो गए हैं, दो दिन बाद किसी और शहर में जाकर किन्हीं और प्रतीकों वाली तस्वीरें लगाएंगे और ‘वह’ हो जाएंगे. हम चालू नेताओं को चुनाव में पगड़ी-तलवार-टोपी-साफा-गदा-त्रिशूल के इस्तेमाल से ऐसा होते देखने के आदी हैं.

अगर आप बनारसी हैं तो इसी शहर में जो पुश्तों से रहने वाले ऐसा चंदन नहीं पोतते (डोम, कबीरपंथी, निषाद, मुसलमान, जुलाहे, रैदासी या अन्य शैलियों के तिलक लगाने वाले हिंदू) वे क्या हैं? आपने जरा देर के लिए अपना भाल किसी को दिया और आपकी छवि चमक उठी लेकिन सोचिए कैसा साम्य है- क्या आरएसएस-भाजपा ने सत्ता के लिए नाना मतों, संप्रदायों, विचारों, पूजा पद्धतियों, परंपराओं वाले हिंदू समाज पर जयश्रीराम, भगवा, मुसलमानों-इसाईयों से नफरत का ऐसा ही पोचारा मारकर अपनी राजनीति को हिंसक ढंग से नहीं चमका दिया है, यहीं जब अपनी ब्रांडिंग के लिए हर-हर मोदी का नारा लगवाया गया या मोदी ने कहा, मां गंगा ने बुलाया है या परमात्मा का भेजा स्पेशल अवतारी हूं तब क्रमशः महादेव, गंगा और सनातन पर कुटिलता से ऐसा ही सस्ता लेप नहीं चढ़ाया जा रहा था.

आपको देश के विभिन्न शहरों में लिट फेस्ट के आयोजक आपकी बौद्धिक पहचान, हुनर और साख (क्योंकि उसके बिना प्रायोजक नहीं मिलते) के लिए बुलाते थे लेकिन बोलने नहीं देते थे, आतिथ्य के अनकहे अतिरेक और कारपोरेटी विनम्रता से समझा देते थे खाइए-पीजिए-घूमिए, जनता का मनोरंजन करना हमें आता है.

इतने रंगारंग और टाइट शिड्यूल में इससे ज्यादा कुछ नहीं हो सकता. लेकिन यहां पहली बार मेरे अपने शहर में ऐसे ‘परम’ दिखाई दे रहे हैं जो चवन्नी के चंदन से आपकी पहचान बदल दे रहे हैं और आप खुश हैं, बहाना तक नहीं बना पा रहे हैं- मैंने गंगा स्नान नहीं किया है कैसे चंदन लगवा लूं.

सोचिए, आप रोज बहुरूपिया की तरह अपनी पहचान बदलते रहे तो आपके किस रूप को विमर्श के लिए आमंत्रित किया जाएगा. तब आप जो लिखेंगे या बोलेंगे- क्या उसे वैश्विक या ‘ग्लोबल’ नहीं कहा जाना चाहिए?

(बस एक निवेदन है, यह न कहिएगा कि मैं आपकी प्रसन्नता, सफलता और ग्लैमर से जल रहा हूं.)


Alka Saraogi- परेशान न हों। हम न आप हुए न वे हुए। बनारसी भी न हुए। मंदिर दर्शन में पंडित ने लगा दिया । फिर लक्ष्मी चाय में मलाई टोस्ट खाया।

Chandra Bhushan– तस्वीर में अलका सरावगी को पहचान रहा हूं। जो मित्र जानते हों, उनमें से कोई कृपया बाकी दोनों लेखकों का भी नाम बताए। उद्देश्य केवल जानकारी प्राप्त करना है।

Alka Saraogi– बीच में मेरे पति हैं। किनारे में यतीश कुमार।

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2 Comments

2 Comments

  1. अखिलेश

    March 10, 2025 at 9:01 pm

    वाह भाई, चंदन लगाने से इतनी समस्या है। जो चंदन न लगाए वह बौद्धिक। नया मानक है, चलेगा, खूब चलेगा। अब मैं भी हर उस आदमी को बौद्धिक समझूँगा जो चंदन नहीं लगाता। कुछ साल तक इस देश में कंधे पर झोला और हाथ में सिगरेट भी बौद्धिकता का प्रतीक होता था। हालांकि वह लोग अपनी बौद्धिकता से समाज का कुछ उद्धार नहीं कर पाए।

    • आप का स्नेही

      March 11, 2025 at 9:05 pm

      प्रिय यादव जी ,उन्होंने चवन्नी का टीका लगा,बनारस की मस्ती महसूस कर ली, लेकिन आपकी चवन्नी भर की बुद्धि वही अटकी रह गई।जैसे ईद में गले मिलने में,क्रिसमस में स्नेह का चुम्बन लेने से सामने वाले का मन बढ़ता है,वैसे ही धार्मिक मुलाकात में टीका लगा कर सामने वाले का मन बढ़ाया जाता है।

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