यशवंत सिंह-
कांग्रेस के एक बेहद तेजतर्रार नेता हैं जो अक्सर पर्दे के पीछे रहना पसंद करते हैं। Gurdeep Singh Sappal जी। कभी आप सीपीएम में थे। फिर कांग्रेस में आए। सप्पल साहब के चलते मैंने एक दफ़े विदेश यात्रा की थी। वेनेजुएला गया था। एक रात जर्मनी रुकते हुए। गुटनिरपेक्ष सम्मेलन था। मीडिया टीम का मुझे भी हिस्सा बनाया गया था। तब हामिद अंसारी साहब उपराष्ट्रपति थे और सप्पल साहब उनके विशेष कार्याधिकारी। साथ ही राज्यसभा टीवी के सीईओ और एडिटर इन चीफ भी थे। उपराष्ट्रपति ही वेनेजुएला गई टीम को लीड कर रहे थे।
आज बहुत दिन बाद सप्पल साहब का लिखा एक लेख पढ़ने को मिला। सोनम वांगचुक का अनशन गांधीवादी नहीं है। ग़ज़ब तर्क है। पूरा पढ़ गया। मैं सहमत हो गया। हाँ, गांधीजी ने कभी अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ अनशन नहीं किया। अनशन का इस्तेमाल वो अपने लोगों को समझाने सिखाने ठीक करने रास्ते पर लाने के लिए किया करते थे। अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ तो वो सड़क पर उतरते थे। आज के दौर में काले अंग्रेज सत्ता में हैं। ये काले दीमक मंदिर का दान, मंदिर का चंदा तक चाट जा रहे हैं। पेपर लीक, एथनॉल, गंगा सफ़ाई से लगायत अनगिनत भ्रष्टाचार खुलेआम चल और पक रहा है लेकिन इन काले कथित सनातनी भ्रष्टाचारियों की सेहत पर असर नहीं पड़ता।
आमरण अनशन करके जान देने का ये वक़्त नहीं है सोनम वांगचुक साहब। जागिये उठिए और सड़क पर निकलिए। देश भर की पदयात्रा करिए। आंदोलन के नए फार्मेट्स खोजिए। विपक्ष को एकजुट करिए। प्राण मत दीजिए। आपकी जान क़ीमती है। इन सत्ताधारी भ्रष्टाचारियों पर तनिक प्रभाव नहीं पड़ता कि आप जियें या मरें।
याद हैं न प्रो. जी. डी. अग्रवाल। इन्हें संन्यास लेने के बाद स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद के नाम से भी जाना गया। वे देश के अग्रणी पर्यावरण अभियंताओं में गिने जाते थे। Indian Institute of Technology Kanpur में प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष रहे। वे Central Pollution Control Board के पहले सदस्य-सचिव भी रहे। उन्होंने अपना जीवन गंगा नदी के संरक्षण के लिए समर्पित कर दिया और बाद में संन्यास ग्रहण किया। 2018 में उन्होंने केंद्र सरकार से गंगा के निर्मल और अविरल प्रवाह को सुनिश्चित करने, नए बांधों और जलविद्युत परियोजनाओं पर पुनर्विचार करने तथा गंगा संरक्षण के लिए प्रभावी कानून बनाने की मांग को लेकर 22 जून से आमरण अनशन शुरू किया। कई पत्र उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी लिखे, लेकिन उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं। 11 अक्टूबर 2018 को, लगभग 111 दिनों के अनशन के बाद ऋषिकेश में उनका निधन हो गया। संघी और भाजपाई हत्यारे हैं। इन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ता कोई जिये या मरे। इन्हें अपनी करप्शन की मशीन चलाये रखनी है।
इसलिए सोनम वांगचुक जी से अपील है, ज़िंदा रहेंगे तो इस मुर्दा सिस्टम को बदल पायेंगे अन्यथा आप को भी प्रोफ़ेसर अग्रवाल की तरह मरकर गुमनाम हो जाना पड़ेगा।
मैंने एआई से पूछा-
क्या गांधीजी ने कभी अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ अनशन नहीं किया था?
जवाब- हाँ, महात्मा गांधी ने अनेक बार अनशन किए, लेकिन एक महत्वपूर्ण बात यह है कि उनके अधिकांश अनशन सीधे अंग्रेज़ सरकार पर दबाव डालने के लिए नहीं थे।
गांधीजी के अनशन मुख्यतः तीन प्रकार के थे:
- अपने अनुयायियों या भारतीय समाज के नैतिक परिवर्तन के लिए।
- सांप्रदायिक हिंसा रोकने के लिए।
- अस्पृश्यता के विरोध में।
- कांग्रेस कार्यकर्ताओं में अनुशासन बनाए रखने के लिए।
- ब्रिटिश सरकार के निर्णयों के विरोध में, लेकिन सीमित अवसरों पर।
- सबसे प्रसिद्ध उदाहरण 1932 का यरवदा जेल का अनशन है। यह ब्रिटिश प्रधानमंत्री रामसे मैकडोनाल्ड के “कम्यूनल अवॉर्ड” के विरोध में था, जिसके बाद पूना पैक्ट हुआ।
- 1943 में आगा ख़ान पैलेस में उनका 21 दिन का उपवास ब्रिटिश सरकार द्वारा बिना मुकदमे कैद किए जाने के विरोध में भी था।
- हिंसा रोकने के लिए नैतिक दबाव के रूप में।
- 1947 में कलकत्ता और 1948 में दिल्ली में उन्होंने हिंदू-मुस्लिम हिंसा रोकने के लिए अनशन किया। इनका लक्ष्य मुख्यतः भारतीय समाज था, न कि अंग्रेज़ सरकार।
इसलिए यदि प्रश्न यह है कि क्या गांधीजी ने कभी अंग्रेज़ों के खिलाफ अनशन नहीं किया? तो उत्तर है—यह कहना सही नहीं होगा। उन्होंने कुछ अवसरों पर ब्रिटिश नीतियों और अपनी हिरासत के विरोध में भी अनशन किए।
लेकिन यदि प्रश्न यह है कि क्या उनके अधिकांश अनशन अंग्रेज़ों के खिलाफ थे? तो उत्तर है—नहीं। उनके अधिकांश उपवास भारतीय समाज के नैतिक आत्मपरिवर्तन और अहिंसा की स्थापना के उद्देश्य से थे।
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