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आज के अखबार : डरी हुई सरकार और सब सामान्य दिखाने की कोशिश में प्रधान के सम्मान की बेशर्मी

Hindi newspaper clipping with a photo of Prime Minister Narendra Modi in a traditional cap, reporting on his reception during a visit.

मोदी है तो मुमकिन है की बदौलत ही यह पहले पन्ने की खबर है। निश्चित रूप से यह पार्टी का आंतरिक मामला है और खबर है तो टिप्पणियों के साथ ही। अव्वल तो यह स्वागत का मौका नहीं है और स्वागत हुआ तो खबर नहीं है और पार्टी के मुख पत्र में जरूरी ही हो तो लीड बनाई जा सकती थी। पढ़ने वाले को पता होता है कि वह मुख पत्र पढ़ रहा है। दि इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर सिंगल कॉलम की है और इसका शीर्षक है, संसद में प्रधान का दिन भाजपा नेताओं की प्रशंसा, विपक्ष की आलोचना।

संजय कुमार सिंह

कॉक्रोच जनता पार्टी का आंदोलन भले खत्म हो गया हो सरकार पर उसका डर हावी है। दुनिया जानती है कि शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा बेहद मजबूरी में हुआ। इससे सरकार की कमजोरी का पता चलता है। इसलिए सरकार ने न सिर्फ अपनी ताकत दिखाने की कोशिश की बल्कि सरकार समर्थक आंदोलनकारियों को धमका रहे हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हो रही है। आंदोलन खत्म करने के समय जो समझौता हुआ था उसका पालन नहीं किया गया। लिहाजा कॉक्रोच जनता पार्टी (और देश ने) सख्ती दिखाई तो सरकार को फिर झुकना पड़ा। इस रस्साकशी में पेपर लीक से परेशान होकर आत्म हत्या करने वाले बच्चों के परिवार को एक करोड़ रुपए का मुआवजा देने की मांग और उससे सहमति ठंडे बस्ते में चली गई लगती है। एथेनॉल का मामला भी ठंडे बस्ते में है। हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी पुरानी खबर के अनुसार, सरकार ने नीट के कारण आत्महत्या करने वालों को “नियमों के तहत सम्मानजनक क्षतिपूर्ति देने की सहमति दी है” और जाहिर है कि यह एक करोड़ रुपए प्रति छात्र नहीं है। दे दिए जाने के बाद ही पता चलेगा कि दी गई राशि कितनी रही। इसी तरह प्रदर्शनकारियों के खिलाफ, हिंसा, बर्बरता और मनमानी के लिए “दिल्ली पुलिस और आरएएफ को माफी भी मांगनी थी”। इसपर सरकार ने कुछ कहा नहीं है। इस बीच सोनम वांगचुक के भाजपा समर्थक होने का खुलासा और प्रचार ऐसे किया गया जैसे वे आंदोलन से अलग ही हो गए लगते हैं। ऐसे में सरकार ने आंदोलनकारियों के खिलाफ मुकदमे और एफआईआर वापस नहीं लेकर सबको नाराज कर दिया था। आज अखबारों की खबर इस पूरे मामले के भिन्न पहलुओं की है जो पूरी तो नहीं ही है, भ्रम फैलाने वाली भी है। उदाहरण के लिए,  द टेलीग्राफ की खबर है – कॉक्रोच जनता पार्टी ने फिर से आंदोलन शुरू होने की चेतावनी दी; कुछ घंटों बाद, बंगाल पुलिस को ‘प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई न करने का दिल्ली से आदेश’ मिला। इस फ्लैग शीर्षक के तहत दो और शीर्षक है। इनमें पहला है, शहर में की गई कार्रवाई वादे के उलट है। सुप्रीम कोर्ट प्रदर्शनों के लिए पुलिस प्रोटोकॉल जारी करेगा। जाहिर है कि अब अगर आंदोलन हुआ तो सुप्रीम कोर्ट का प्रोटोकोल जारी हो गया रहेगा और इस बार जैसी जबरदस्ती संभव नहीं होगी। अगर ऐसा हो जाए तो कल्पना कीजिए कि कितने लोग निकल आएंगे तब जब भविष्य में डरने के कारण कम होंगे।

दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, सीजेपी ने कहा – एफआईआर रद्द कीजिए, गिरफ्तार लोगों को रिहा कीजिए या हम विरोध फिर शुरू करेंगे। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है –  सीजेपी ने सरकार के ‘वादा तोड़ने’ पर नए विरोध-प्रदर्शनों की चेतावनी दी। सीजेपी का कहना है कि केंद्र सरकार प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई न करने के अपने वादे का उल्लंघन कर रही है; संगठन के प्रवक्ता के अनुसार, सैकड़ों छात्रों को हिरासत में लिया गया है जबकि कई अन्य निगरानी में हैं; बिहार और बंगाल में एफआईआर वापस ले ली गई हैं। आज द हिन्दू की सेकेंड लीड का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट बड़े पैमाने पर प्रदर्शनों के दौरान पुलिस के व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए गाइडलाइंस पर विचार कर रहा है। आप समझ सकते हैं कि दबाव सिर्फ सीजेपी का नहीं है। उनका भी है जिन्हें सीजेपी बनाने और आंदोलन की सफलता का श्रेय अभिषेक दिपके ने दिया है। यही नहीं, नई दिल्ली में राज्यसभा सांसद कपिल सिबल ने सीजेपी नेता सौरव दास और आशुतोष रांका के साथ प्रेस कांफ्रेंस की और आंदालनकारियों को परेशान किए जाने से रोकने तथा उनकी सहायता के लिए एक करोड़ रुपए की शुरुआती सहायता की घोषणा की। इससे आप समझ सकते हैं कि सरकार के खिलाफ कितना मजबूत विपक्ष बन रहा है। मेरी नजर में इसका कारण सिर्फ और सिर्फ सरकार की कार्रवाई है या कार्रवाई नहीं करना है। यह खबर टाइम्स ऑफ इंडिया ने दी है – सीजेपी ने सरकार पर वादा खिलाफी का आरोप लगाया विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी। इस खबर का इंट्रो है, सीजेपी ने कहा, प्रदर्शनकारी गिरफ्तार किए जा रहे हैं, मामले दर्ज किए जा रहे हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड के साथ दो और खबरें हैं। दो कॉलम की खबर दिल्ली पुलिस के हवाले से है। इसका शीर्षक है, 20 जुलाई के संसद मार्च की हिंसा में 101 हत्या अभियुक्त शामिल थे। इसके साथ छपी खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह सुरक्षाबलों पर हमले के मामले भी देखेगा। सिंगल कॉलम की दूसरी खबर उस मॉडल की है जो मुंबई में पुलिस से अकेले भिड़ गई थी। खबर के अनुसार रिया अहीर ने कहा है उसे धमकी मिल रही है, गालियां पड़ रही हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि लीड के साथ ये तीनों खबरें सरकार या भाजपा की राजनीति या प्रशासनिक स्थिति बता रही हैं। एक तरफ तो सरकार पर वादा खिलाफी का सीजेपी का आरोप है दूसरी ओर दिल्ली पुलिस की यह दलील कि हिंसा में 101 हत्या आरोपी शामिल थे। हत्या आरोपी होना अपराधी होना नहीं है। इस सरकार में तो निर्वाचित नेताओं और मुख्यमंत्रियों पर आरोप लगाए जाते रहे हैं। इसलिए उनका शामिल होना गलत नहीं है। वैसे भी जब हत्या बलात्कार के आरोपी मंत्री, सांसद और विधायक हैं तो प्रदर्शन में भाग क्यों नहीं लें? पुलिस अपने इस आरोप या विवरण से विरोध प्रदर्शन को बदनाम कर रही है वह भी तब जब अभी यह स्पष्ट नहीं है कि यह सरकार द्वारा प्रायोजित तो नहीं था। फिर भी अपराधियों ने किसी नागरिक प्रदर्शन में हिस्सा लिया, पुलिस को पता था, रोक नहीं पाई, अगर कोई फरार या वांछित था तो गिरफ्तार नहीं करना भारी नालायकी है और पहले के आरोपी के अपराध का वीडियो है तो पुलिस अभी तक क्या कर रही थी, गिरफ्तार क्यों नहीं किया?

इन दिनों खबरें राजनीतिक होती हैं वरना इन सवालों के जवाब शीर्षक में या खबर के दूसरे पैरे में ही होने चाहिए थे। पुलिस का डर और इकबाल खत्म हो गया है, पुलिस स्वतंत्र रूप से काम नहीं करती है उसका पता दूसरी खबर से चलता है लेकिन उस समाज का क्या किया जाए जिसे भाजपा की ट्रोल सेना और उसके कारनामों से दिक्कत नहीं है लेकिन प्रदर्शन में शामिल लड़कियों की गाली और भाषा से ज्यादा परेशानी है। घोषित इमरजेंसी से आज भी दिक्कत है अघोषित की चर्चा भी नहीं करते। मैं नहीं कहता कि वह सही है लेकिन अभी वह मुद्दा नहीं होना चाहिए। पुलिस के पास अगर आरोपियों को पहचानने का सॉफ्टवेयर है तो इनकी भी पहचान हो ही सकती है लेकिन गाली देने वाले अपराधियों (असल में बच्चों) के खिलाफ किस मुंह से कार्रवाई होगी जब संसद में गाली देने पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। मीडिया सरकार के बचाव में लगा है और कुछ ही अखबार आम जनता या सरकार विरोधियों के बचाव में आगे आते हैं या उनकी शिकायत को जगह देते हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड यह संदेश दे रही है कि अब सब ठीक है और संसद में पेपर लीक पर ज्यादा सख्त विधेयक पर चर्चा होगी। कहने की जरूरत नहीं है कि पेपर लीक का मामला कानून का नहीं है और कानून से ऐसे मसले हल नहीं होते हैं। तमाम मामलों में अपराधी बरी हो जाते हैं, छोटी सजा से बचने-बचाने के लिए क्या-क्या नहीं किए गए हैं तो बड़ी सजा कहां किसे होगी और फांसी से अतिरिक्त उम्र कैद की सजा तो लोग यूं ही काट रहे हैं। उमर खालिद और सोनम वांगचुक ताजा उदाहरण हैं। और सजा से ना सोनम वांगचुक डरे न उमर खालिद डरने वाले हैं। जहां तक कानून की बात है, 1991 का पूजा स्थल कानून भी है, सरकार और अदालतें उसका कौन सा सम्मान कर रही हैं। पेपर लीक पर कानून बनाना उस राजनीति से घटिया है जैसी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आधार के बारे में कह कर की थी और अब उसी नंदन नीलकेणी के नेतृत्व में कमेटी बनाकर कर रहे हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की लीड और उसका शीर्षक है, संसद में प्रधान का दिन भाजपा नेताओं की प्रशंसा, विपक्ष की आलोचना।

हिन्दी के मेरे चारो अखबारों की हालत अपनी डफली अपना राग वाली ही है। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, पहले हंगामा, फिर सहमति परीक्षा बिल पर आज चर्चा! हालांकि उपशीर्षक में बताया गया है, छात्रों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर दोनों सदनों में विपक्ष का हंगामा यह नहीं बताया गया है कि अमित शाह ने राहुल गांधी की चिट्ठी और सवालों के जवाब में क्या कहा या कुछ नहीं कहा और सहमति कैसे हुई किस बात पर हुई। खबर यह है कि, बिरला की पहल पर प्रमुख दल विधेयक पर चर्चा करने को सहमत। एक सूचना यह भी है कि स्पीकर ने की दलों से बात, तब बनी सहमति। विधेयक को बिरला के हवाले से युवाओं के भविष्य से जुड़ा महत्वपूर्ण विधेयक कहा गया है। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, संसद में टूटा गतिरोध, परीक्षा में सुधारों से जुड़े विधेयक पर चर्चा आज, वोटिंग संभव। इसके साथ छपी खबर का शीर्षक है, विपक्ष पैलेट गन और एके-47 पर हमलावर। हाईलाइट किया हुआ एक अंश है – सिस्टम जानलेवा : राहुल (गांधी) ने कहा कि पूरा सिस्टम ही जानलेवा है। यह सरकार झूठी है। बातों से मुकर जाएगी और हर तरीके से छात्रों की आवाज दबाएगी। मोदी जी, देश के छात्रों से माफी मांगिए। यह मोदी है तो मुमकिन है की बदौलत ही सिंगल कॉलम की खबर है वरना इससे बहुत साधारण और हल्के आरोप लीड बनाए जा सकते थे। अभी स्थिति यह है कि धर्मेन्द्र प्रधान का स्वागत टॉप पर है। अव्वल तो यह स्वागत का मामला नहीं है और हुआ तो खबर नहीं है और पार्टी के मुख पत्र में जरूरी ही हो तो लीड बनाई जा सकती थी।  दैनिक भास्कर की लीड संसद के मानसून सत्र में एंटी पेपर लीक बिल पेश विधेयक, विपक्ष के हंगामे के चलते चर्चा नहीं हो पाई। मुख्य शीर्षक है – “पेपर लीक…. 10 साल जेल, 10 करोड़ जुर्माने का प्रस्ताव; आज बहस संभव”। इसके साथ दूसरी कई खबरें हैं लेकिन छोटी-छोटी। देशबन्धु में लीड का शीर्षक है, शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर लाठीचार्ज सही नहीं। इसके ठीक नीचे पांच कॉलम का ही शीर्षक है, श्रीराम मंदिर चढ़ावा मामला : एसआईटी से दो हफ्ते में मांगी स्टेटस रिपोर्ट। इस अखबार में पहले पन्ने पर कई ऐसी खबरें हैं जो बाकी नौ अखबारों में किसी में पहले पन्ने पर नहीं दिखी। बिना कैप्शन वाली फोटो के नीचे फ्लैग शीर्षक है, प्रधान के इस्तीफे से कम नहीं हुई सरकार की मुसीबतें। यह फोटो कैप्शन भी हो सकता है क्योंकि फोटो संसद की है और कई सांसद एक बैनर लेकर खड़े हैं। इसपर लिखा है – लोकतंत्र – वोट चोरी, शिक्षा – पेपर चोरी और आस्था – चंदा चोरी। मुझे लगता है कि सत्तारूढ़ गठबंधन के खिलाफ यह गंभीर है और सांसदों का इसे लेकर खड़ा होना उससे भी ज्यादा गंभीर है। लेकिन अच्छे दिन चल रहे हैं सो इंतजार कीजिए।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।   

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